अल्ला कसम बाजरा // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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जाड़े गुज़र जाएं और आप एक बार भी बाजरे की रोटी न खाएं, ऐसा शायद ही संभव हो। सर्दियों में बाजरे की रोटी खाना अब एक “डैलीकेसी” है। आज सुबह के खाने में मुझे जब बाजरे की रोटी और सरसों का साग परोसा गया तो दिल बाग़-बाग़ हो गया। अरसे बाद बाजरा खाया था। मज़ा आ गया।

एक ज़माना था जब लोग अधिकतर मोटा अनाज ही खाया करते थे और मोटापा उन्हें छूता नहीं था। तब गेहूँ और चावल कम ही लोग खाते थे। वह महंगा जो था। गेहूँ की रोटियाँ कभी-कभी ही बनती थीं। तब गेहूँ की रोटी एक “डेलीकेसी” थी। पर आज पांसा पूरी तरह पलट गया है।

दिन एक से नहीं रहते। लगता है अब बाजरे के दिन जल्दी ही फिरने वाले हैं। कर्नाटक के कृषि मंत्री, कृष्ण बायरा गोडा, ने तो बाजरे के पक्ष में एक देश व्यापी आन्दोलन ही खड़ा करने का संकल्प ले लिया है। दिल्ली और बंबई तक इसकी गूँज आ गई है। उनका कहना है लोगों को वैकल्पिक आहार के रूप में बाजरा अपनाना चाहिए। बाजरे के सेवन के बस फायदे ही फायदे हैं।

गेहूँ ने बाजरे और अन्य मोटे अनाजों पर बड़ी ज्यादती की है। उन्हें पीछे ढकेल कर खुद उनकी जगह हथिया ली। तब शायद लोगों को पता नहीं था, बाजरा खाना कितना लाभप्रद है। बेचारे बाजरे को ‘मोटा’ अनाज कहकर उसकी खिल्ली उडाई गई। कितनी अजीब बात है। बाजरे की फलियों में बाजरा हरे रंग के छोटे छोटे दानों के रूप में उगता है। यह नन्हें-नन्हें बेचारे दाने, “मोटा” अनाज क्योंकर कहे गए, समझ से परे है। कोई भी अनाज इनकी ‘बारीकी’ के सामने खड़ा नहीं रह सकता। फिर भी बाजरे को “मोटा” कह कर चिढाया जाने लगा, सरासर दादागीरी है। पर आज भी, जब बाजरे का सेवन एक ‘डेलीकेसी’ हो चुका है, गेहूँ की यह दादागीरी बरक़रार है ! जाड़ों में विशेष रूप से बाजरे की रोटी तो लोग खाते ही हैं, बाजरे का मलीदा, बाजरे के लड्डू, बाजरे की टिक्की, बाजरा वडा, बाजरे का ढोकला, बाजरे का दलिया, और बाजरे का चूरमा भी खूब स्वाद लेकर खाया जाता है।

बाजरा आम आदमी की तरह साधारण है। बाजरे की फसल को ज्यादह पानी की ज़रूरत नहीं होती। साधारण सिंचाई से भी इसका काम चल जाता है। ज़मीन भी बहुत उर्वरा नहीं चाहिए होती है। साधारण ज़मीन में भी यह उगाया जा सकता है। पर साधारण अनाज हो या आदमी, पूछता कौन है ? जन-तंत्र तक में तो जन-सत्ता है नहीं। बाजरे की खेती विकसित देशों में नहीं के बराबर होती है। विकासशील देशों में ही यह उगाया जाता है। भारत में भी इसकी फसल केवल राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हरियाणा तक ही लगभग सीमित है। कर्नाटक में बाजरे के पक्ष में जो आन्दोलन हुआ है, उसका कारण ही यह है। वहां की साधारण ज़मीन में इसकी अच्छी फसल ली जा सकती है लेकिन नहीं उगाया जाता। गेहूँ की दादागीरी ख़त्म करने के लिए, यह ज़रूरी है कि हम अब बाजरे को तरजीह दें। गेहूँ - हाय, हाय। बाजरा ज़िदाबाद।

बाजरे की चर्चा चल रही थी। मेरे मित्र ने बिना किसी सन्दर्भ के एक जुमला उछाल दिया। बोले, बाजरा स्त्रियों के काम को बढाने वाला है। क्या मतलब ? बोले कुछ नहीं, बस हंसने लगे। मैंने यह तो सुना था कि बाजरा बड़ा स्वास्थ्यवर्धक होता है, कि इसका सेवन हड्डियों को मज़बूत करता है, कि कोलेस्ट्रोल को कम करता है, कि रक्त-चाप को नियमित करता है, इत्यादि। लेकिन यह कभी नहीं सुना कि यह स्त्रियों के काम को बढाने वाला है। बोले, आपने वह लोक-गीत सुना है – अल्ला कसम बाजरा।

याद आया। मेरी माँ इसे गाया करती थीं। तब शायद यह गीत सार्थक था। लेकिन बाद में, जैसा कि अक्सर होता है, लोक-गीत भले ही अपनी सार्थकता खो दें, पीढ़ी दर पीढ़ी गाए जाते हैं। मेरी बेटी ने भी अपनी माँ से यह गीत सीख लिया था। छुटपन में इसे गा गा कर खूब नाचती थी। लीजिए आप भी सुनिए और समझिए की बाजरा किस तरह स्त्रियों के काम को बढाने वाला है –

मेरी पड़ोसन बाजरा – तेरी कसम बाजरा, अल्ला कसम बाजरा, जी को जंजाल मेरो बाजरा

जब मैं बाजरे को कूटन बैठी – छिटक छिटक जाए मेरो बाजरा, अल्ला कसम बाजरा

जब मैं बाजरे को फटकन बैठी – उड़ उड़ जाए मेरो बाजरा, तेरी कसम बाजरा

जब मैं बाजरे को गूँथन बैठी चिपक चिपक जाए मेरो बाजरा, अल्ला कसम बाजरा

जब मैं बाजरे को खावन बैठी – अटक अटक जाए मेरो बाजरा, तेरी कसम बाजरा

जी को जंजाल मेरो बाजरा, अल्ला कसम बाजरा

ज़ाहिर है, अब बाजरे को घरों में कूटने और फटकने की ज़रूरत नहीं रही लेकिन लोकगीतों में स्त्रियों के काम को बढाने वाला यह बाजरा बदस्तूर कायम है। जय हो।

-डा, सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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1 टिप्पणी "अल्ला कसम बाजरा // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. बाजरे के फायदे से अवगत कराता हुआ आलेख पढ कर बैंगन के भुर्थे के साथ बाजरे की रोटी खाना याद आ गया।

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