बुधवार, 6 दिसंबर 2017

दूर तलक जाने वाली कवितायेँ // डॉ मनोज 'आजिज़'

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दूर तलक जाने वाली कवितायेँ
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डॉ मनोज 'आजिज़'

बहुभाषीय कवि, सहायक प्राध्यापक

जमशेदपुर

९९७३६८०१४६

कविता मानव जीवन के सूक्ष्म अनुभवों व अनुभूतियों का कलात्मक प्रलेख है। कविता मानव अस्तित्व का दस्तावेज़ है। कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है जब हम युवा कवि अखिलेश्वर पाण्डेय की कविताओं से बावस्ता होते हैं। पत्रकारिता से जुड़े हुए रहने के कारण अखिलेश्वर की कविताओं के अंदर कथा-तत्व चलता रहता है जिससे उनकी कविताओं की आयु निःसंदेह दीर्घ होगी। "पानी उदास हैँ" कवि का पहला कविता-संग्रह है जो इसी वर्ष जयपुर के बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। कुल ६३ कविताओं का इस संग्रह में प्रतिरोध, प्रेम, सामाजिक विद्रूपता, मूल्य-बोध, मानवीय संवेदना आदि विविध विषयों पर कवि की कलम चली है और नितांत ही परिष्कृत लक्ष्य के साथ शब्दों का चयन किया गया है। कवि के शब्द उनके दर्शन की मूल अवधारणाओं को प्रतिपादित करने में सक्षम हुए हैं जो आज की आपाधापी वाली ज़िंदगी में एक बड़ी सफलता है। 'पानी उदास है' संग्रह की पहली कविता है और संग्रह का नाम भी। इस कविता की पहली चार पंक्तियाँ ही कवि की भावनाओं को टटोलने में सहयोग करती हैं :

कहन के बिना कहानी उदास है

रोज़गार के बिना जवानी उदास है

टूट गए सपने उम्मीदें उदास हैं

मेरे देश की आंख का पानी उदास है।

अखिलेश्वर के इस संग्रह में एक बात की तरफ बारं-बार इंगित है और वह है कि 'इंसानियत ख़ामोश हैँ'।  कवि-कर्म को उद्देश्यपूर्ण बनाने की कवि में प्रबल इच्छा है और वे कहते हैं:

मुझे लिखना है पृथ्वी पर ख़त्म होती मनुष्यता के बारे में

इंसानियत की ख़रीद-फ़रोख़्त और

ख़ौफ़ज़दा दुनिया के बारे में लिखना है।

कवि बाज़ारवाद पर तंज कसते हुए कहना चाहते हैं कि बाज़ारवाद संवेदनशील होने वालों को आदर्श नहीं मानता। वे लिखते हैं:

कवियों !

तुम्हारी कविता

खोटा सिक्का है...

जो चल नहीं सकता

इस दुनिया के बाजार में... !

"पानी उदास है" पढ़कर ऐसा लगता है कि कविता हमेशा की तरह अब भी एक समुज्ज्वल विधा है और उसकी पकड़ हमारे मस्तिष्क और रुचिबोध पर है। अखिलेश्वर जैसे कवि ही कविता को सुग्राह्य बनाये रखेंगे।

शहरी जीवन-शैली ने मनुष्य को संकीर्ण मानसिकता से भर दी है। मनुष्य अपनी बौद्धिक क्षमता का भी ह्रास करवा रहा है। कवि सहजता से इस विषय पर लिखते हैं :

अटालिकाओं की छाया ने

हमें बौना बना दिया है

मल्टीप्लेक्स ने छिन ली हमारी मासूमियत...

...बंजर हो गयी है

हमारी भावभूमि

अब उगते नहीं उस पर

सुविचार।

एक बात बिल्कुल कही जानी चाहिए कि "पानी उदास है" सही मायने में हिन्दी कविता-संग्रह है। कवि ने अनावश्यक उर्दू और अंग्रेज़ी शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया है और तत्सम शब्दों की बहुलता से भी बचा है बल्कि सहज भाषा में बोधगम्य अंदाज में वाक्य-निर्माण किया है जिसमें पाठक कवि के भाव-जगत में सहज ही विचरण करता है और प्राञ्जल कविताओं का पाठ करता है। उन्होंने लोक-भाषा का भी सुन्दर प्रयोग किया है जिससे कवितायेँ और भी जीवंत बन पड़ी हैं।

इस संग्रह की कविताओं को पढ़कर यह कतई नहीं लगता कि कवि का यह पहला प्रकाशित संग्रह है। उनकी काव्यिक पक्वता हर शब्द से झलकती है। छोटी कविताओं के माध्यम से ही अखिलेश्वर ने कविता का आकाश को विस्तारित किया है और विद्रूपताओं और संघर्ष को चित्रित करते हुए भी कविता अपनी कलात्मकता नहीं छोड़ती वरन मस्तिष्क पर दीर्घकालिक छाप छोड़ती है। रिश्तों पर जहाँ सवाल उठने लगे हैं वहीँ अपने पिता, माता और पुत्री पर कवितायेँ लिखकर कवि ने इन रिश्तों को और भी गंभीरता प्रदान की है। पानी उदास है, सुनो लड़कियों, मुझे लिखना है, यह सच है, गांव और शहर इतनी सी गुज़ारिश समेत सभी कवितायेँ कथ्य और शिल्प के दृष्टिकोण से नए प्रतिमान गढ़ती हैं। कोलाहल और चांचल्य के इस युग में अखिलेश्वर की कवितायेँ ठहराव प्रदान करती हैं और पाठ्य-सुख के साथ-साथ स्वयं से इतर भी सोचने को मज़बूर करती हैं। "पानी उदास है" में कई प्रवाद-सुलभ पंक्तियाँ हैं जो सदा ताज़ा रहेंगी और आशा है कवि की कविता दूर तलक जाएगी।

पुस्तक का नाम--पानी उदास है (कविता-संग्रह)

प्रकाशक-- बोधि प्रकाशन, जयपुर

कवि-- अखिलेश्वर पाण्डेय

मूल्य--१००/- पृष्ठ-- ९६

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Image_Dr Manoj AAjiz

From :-

Dr. Manoj K Pathak (Dr. Manoj 'Aajiz')

Adityapur, Jamshedpur.

Mob. : 9973680146

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