कहानी // कुरबानी // राजेंद्र चंद्रकांत राय

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वह बेरोज़गार था।

एक मैकेनिक की दूकान पर जाया करता और दिन भर वहाँ खटने के बाद सिर्फ़ तीस रुपया मजदूरी बनती। तीस रुपया और आठ जनों का परिवार। रोटी पकती तो चावल रह जाता और चावल पकता तो सालन के शोरबे में खाया जाता। दाल की छुट्टी। वह कुछ खास पढ़ा-लिखा भी न था कि रोज़गार का कोई बड़ा ख्वाब देखता। हाँ, कभी-कभी यह ज़रूर सोचता कि अगर गाड़ियों की मरम्मत का खोखा भी वह कहीं रख सके तो सौ रुपया दिन की कमाई का जरिया बन सकता है। पर इत्ता छोटा सा ख्वाब भी पूरा होते न दिखता था।

ऐसे में एक आदमी उससे मिला। हालचाल पूछे। घर और घर की परेशानियों पर अफसोस जताता रहा। हसन को अच्छा लगा कि चलो कोई तो है, जो उसकी तकलीफों पर अफसोस जताने के लिये हाजिर है। वरना तो किसे फुरसत है।

कई दिनों तक ऐसी ही मुलाकातें होती रहीं, फिर एक दिन उसने पूछा - बाहर रोज़गार मिले तो करोगे...?

वह हँसा - रोज़गार मिले तो...!

- मिल सकता है। मैं कोशिश करूँगा।

- आप कोशिश करेंगे तो ज़रूर मिल जायेगा...।

अगले दिन उस आदमी ने कहा - मुबारक हो, मामला जम गया है।

- क्या मुझे रोज़गार मिल जायेगा...?

- हाँ, मिला हुआ ही समझो।

- तनखा कितनी होगी ?

- जितनी तुम सोच भी नहीं सकते

वह हैरत में पड़ा - क्या कहते हैं भाई जान...?

- सही कहता हूँ। वो लोग तुम्हें पाँच हजार रुपया महीना देंगे...।

- पाँच... हजार... रुपया... महीना...? उसने शब्दों को चबा-चबा कर पूछा।

- हाँ। और घर वालों को दो लाख रुपया एडवांस, एक मुश्त।

- दो लाख एडवांस ?

- हाँ।

- मैं तो गश्त खाकर गिर जाऊँगा।

- तो गिर जाओ।

- मजाक ना करो भाई जान।

- मैं तो मजाक नहीं कर रहा।

- मुझमें ऐसे कौन से तारे जड़े हैं जो...?

- जड़े होंगे। हमें-तुम्हें क्या पता। खुदा बड़ा कारसाज है। उसने किसकी किस्मत में क्या लिखा है, किसे पता...?

उसने खुदा का शुक्रिया अदा किया। पाँचों वक़्त की नमाज अदा करने, रोजे रखने और ईमान पर चलने का सिला इतना अच्छा और इतनी जल्दी हासिल हो जायेगा, उसे पता न था।

जुमे की नमाज के बाद हसन को रुखसत होना था। घर के लोगों की खुशी का ठिकाना न था। अम्मी-अब्बू के होठों पर हर वक़्त दुआ रहती कि ऐसा कमाऊ और नेक बेटा सबको दे। ऐसे ऐबी जमाने में बेऐब बेटे किसे मिलते हैं ?

हसन मस्जिद से बाहर आया तो हरे रंग वाली एक जिप्सी उसका इंतज़ार कर रही थी। उसे टेªनिंग पर रवाना होना था। गाड़ी पहले उसे उसके घर लेकर गयी। उसने अपना बैग सम्हाला। अम्मी-अब्बू, भाई-बहनों, चचा-चची और बूढ़े दादाजान को खुदा हाफिज कहा।

दादा ने पूछा - अब कब लौटोगे, हसन बेटे...?

उसने खुशदिली से जवाब दिया - ट्रेनिंग पूरी होते ही, जल्दी।

जिप्सी के ड्राइवर ने हॉर्न बजाया। वह लस्टम-पस्टम भागा और पीछे की सीट में घुस गया। उसके बाजू में एक अजनबी पहले से बैठा हुआ था। उसने अपने सिर पर चैखाने का रूमाल बाँध रखा था। आँखें गहरे रंग के चश्मे के पीछे कैद थीं। शरीर पर पठान-सूट और पैरों में शानदार जूतियाँ थीं।

हसन ने कहा - सलाम वालेकुम, सर !

उसने धीमी मगर गुर्राहट भरी आवाज में जवाब दिया - वालेकुम-अस्सलाम...।

वह एक दरम्यानी-उम्र का आदमी था, जिसे हसन से या किसी से भी बातें करने में कोई दिलचस्पी न थी। वह सामने वाले विंडस्क्रीन के पार नज़रें गड़ाये हुए था।

हसन को अपने बातूनीपने पर काबू न था, उसने कहा - शुक्रिया सर !

बिना उसकी ओर देखे ही, उसने बेअदबी से पूछा - किस बात का...?

- इस जाहिल और गरीब को रोज़गार से लगाने का...।

- शुक्रिया उस ऊपर वाले का अदा करो। वही सब करता है। बंदों का क्या शुक्रिया अदा करना। बंदे तो अल्ला और मजहब के हुक्मबरदार होते हैं, बस।

- जी, सर...।

- सर नहीं, भाई कहा करो...।

- जी, भाई जी...।

हसन जिप्सी के साइड-ग्लास के पार, चुपचाप गुजरता हुआ अपना मुहल्ला और मुहल्ले के बाद पीछे को सरकते हुए अपने शहर को देखता रहा। जिप्सी जब शहर के बाहर निकल गयी तो उसने फिर एक सवाल किया - भाई जान, मेरा काम क्या होगा...?

- मजहब की खिदमत।

- वो तो मैं अब भी करता हूँ। पाबंदी के साथ रोजे रखता हूँ... जकात देता हूँ... किसी का दिल नहीं दुखाता... ईमान पर चलता हूँ...। इंसानियत का जज़्बा अपने भीतर जगाये रखता हूँ। अम्मी कहती है। इंसानियत ही दीन है।

- अब बड़ी खिदमत के लिये तुम्हें चुना गया है...।

- उसमें क्या करना होगा...?

- जो करना होगा, उसी की ट्रेनिंग होना है। ट्रेनिंग में सब जान जाओगे...।

- मगर...?

- अब खामोश रहो। खुदा के काम में बोलने की बजाय, खामोशी की ज़रूरत ज्यादा होती है।

उस आदमी की गुर्राहट और बेअदबी ने उसे चुप करा दिया।

कई घंटों के सफर के बाद जिप्सी जंगल के रास्ते की ओर मुड़ गयी। वह खिल गया। कितना हसीन नज़ारा है। जंगल, झाड़, पेड़-पŸो, नदी और तालाबों का इलाका। उड़ते-चहचहाते पक्षी। खेतों में काम करते किसान। गलियों से गुजरते पशु। यही सब उसे अच्छा लगता है। जी करता है जंगलों में भागता फिरे। नदी में छलांगें लगाये और मछलियों को दाना चुगाये। गौरैय्यों के मटकते हुए सिरांे को देखे। वह कुछ कहने के लिये उस आदमी की तरफ घूमा, परंतु उसके तने हुए चेहरे ने उसे खामोश कर दिया। अल्फाज हलक में अटके रह गये।

जिप्सी जहाँ पहुँची वह जंगल का सघनतम इलाका था। पर एक उजाड़-उजाड़ सी खामोशी वहाँ पसरी हुई थी। दो बंदूकधारी निगरानी पर खड़े थे। जिप्सी में बैठे आदमी को उन लोगों ने सलाम कहा। जब मोड़ से घूमकर जिप्सी और भीतरी इलाके में पहुँची तो वहाँ पर एक खंडहर दिखायी दिया। एक टूटी-फूटी इमारत या क़िला। वहाँ चहल-पहल थी। लोग आ-जा रहे थे। बड़ी-बड़ी देगों में कुछ पक रहा था। एक बड़े से कमरे में कोई पढ़ा रहा था। कई बंदूधारी यहाँ चैकसी पर थे।

उसे हैरत हुई - क्या मुझे फौज में नौकरी मिली है...?

जिप्सी रुकते ही काले चश्मे वाला आदमी, दरवाज़ा खोलकर खटाक् से नीचे उतरा। दो-तीन लोग भागकर उसे पास आये।

उसने कहा - मेहमान को सम्हालो।

हसन के अंदर हँसी फूटी - मेहमान ? नौकरी पर आये हुए को भी मेहमान के ओहदे पर रखने वाले कितने अच्छे लोग...।

वह आदमी तेजी से कहीं चला गया।

बचे हुए लोगों ने उसे देखा और मुस्कराकर कहा - खुशआमदीद... खुशआमदीद...।

- शुक्रिया। वह खुश हुआ। मुस्कराहटें उसे अच्छी लगीं।

फिर उसे उतारकर एक बड़े से कमरे में ले जाया गया। वहाँ दोनों तरफ की दीवारों से चिपकाकर छोटी-छोटी, बहुत सी दरियाँ बिस्तर की मानिंद बिछी हुई थीं। दरियों के बाजू में थैले, थालियां और मग्घे रखे हुए थे। एक दरी की ओर संकेत करते हुए कहा गया - ये तुम्हारी जगह है। तुम्हें एलाट हुई है...।

- अच्छा भाई...।

- अपना सामान उधर रख दो और टेªनिंग-क्लास में चले जाओ। पानी-वानी पीना हो तो उधर है...।

वे लोग चले गये।

ट्रेनिंग-क्लास में घुसकर उसने सलाम वालेकुम कहा। जवाब कोरस मे आया। ज़मीन में बिछी हुई बिछायत पर, सबसे पीछे जाकर वह बैठ गया। वहाँ कोई तीस-बत्तीस लड़के रहे होंगे।

मास्टर ट्रेनर ने कहा - अल्ला का शुक्रिया अदा करो कि मजहब की खिदमत की खातिर उसने तुम्हें चुना।

सब लड़कों ने हाथ उठाकर शुक्रिया अदा किया।

- तुम लोगों की क्लास-रूम ट्रेनिंग चंद रोज ही चलेगी, मगर फील्ड-ट्रेनिंग जरा बड़ी होगी। तुम लोग मेहनत करने के लिये दिल से तैयार हो न्...?

सबने कहा - हम तैयार हैं...।

- तो आज पहले दिन का सबक शुरू करते हैं। यह बहुत अहम् है। गौर से समझना। अपने घर और घरवालों को भूल जाओ...।

हसन के दिल पर चोट पहुँची। घरवालों की खातिर ही तो वह इस काम पर आया था। उसे लगा कि शायद उसने ठीक से नहीं सुना।

- तुम अब घर से निकलकर घर के न रहे, बल्कि अल्ला की बनायी हुई पूरी क़ायनात के हो गये।

हसन को यह बात अच्छी लगी। समझ मंे भी आयी।

- अल्ला की बनायी हुई इस क़ायनात पर खतरा मंडरा रहा है।

हसन फिर असमंजस में पड़ गया। खुदा की बनायी क़ायनात पर कोई खतरा आ ही कैसे सकता है ? अल्ला से बड़ा कौन है ?

- इस खतरे की मुखालफत करनी है और मजहब को बचाना है।

हसन को बेतरह हँसी आयी, पर उसने उसे जब्त कर लिया।

- अल्ला ने मजहब को बचाने के लिये तुम्हंे चुना। तुम नसीबों वाले हुए।

भला हमारी क्या औकात कि हम उसके बनाये-बताये दीन को बचा सकें। इंसान की आखिर हैसियत ही क्या है ? उसने कहना चाहा, मगर औरों को खामोश देखकर खुद भी चुप रहा आया।

- मजहब बहुत बड़ी चीज है और इंसान बहुत छोटी। बिल्कुल ना-हैसियत।

यही तो। यही तो। उसके मन से आवाज निकली।

- मजहब और अल्ला के लिये कुरबानियों की ज़रूरत होती है।

उसे पता है - कुरबानी से शवाब हासिल होता है।

- कुरबानी के लिये तैयार रहो।

यह भी कोई कहने वाली बात हुई ?

- चाहे खुद की देना पड़े या दूसरों की।

कुरबानी तो बकरे की दी जाती है - इंसान की नहीं।

- जैसे अभी-अभी तुम लोग अपने-अपने घरों की कुरबानी देकर आये हो।

घर की कुरबानी देकर नहीं, घर को आबाद रखने के लिये यहाँ आये हैं, उस्ताद जी। वह मुस्कराया

- ये कुरबानियाँ बकरीद वाली कुरबानियों से कहीं बड़ी कुरबानियाँ होंगी।

उसके अंदर सवाल पैदा हुआ - बकरीद से बड़ी भी कोई कुरबानी हो सकती है ?

- लोगों की जानें लेना पड़ सकती हैं।

लोगों की जानें लेना पड़ेंगी ?

- अपनी जान देना पड़ सकती है।

अपनी जान दे दी तो घर वाले बे-मौत मारे जाएंगे।

- जानों का लेना-देना ज़रूरी होगा।

यानी की मारकाट। इस्लाम में इसकी मुमानियत है।

- जान लेना-देना कोई हँसी-खेल नहीं।

वही तो। वही तो।

- बड़े कलेजे का काम है।

वही तो। वही तो।

- इसीलिये यह ट्रेनिंग दी जा रही है।

हसन फिर चक्कर में पड़ा - मारकाट की ट्रेनिंग ?

- ट्रेनिंग का पहला कदम - सोचना हराम है।

अरे, पैगम्बर साहब ने जिन चीजों को हराम फरमाया है, सोचना तो उसमें शामिल नहीं है।

- सोचने से फितूर पैदा होता है। फितूर से रुकावट आती है। हर रुकावट के खिलाफ हम मैदान में उतरे हैं।

मैदान में...? तो यह फौज की ही नौकरी लगती है।

- हुक्म-बरदारी ही असल चीज है।

हम पैगंबर साहब के हुक्म-बरदार हैं। और रहेंगे। ताजिंदगी।

- तुम्हें तुम्हारे कमांडर से हुक्म मिलेंगे।

कमांडर से ? यह हमारे और पैगंबर साहब के बीच में कौन आ गया ?

- कमांडर कहे, खड़े रहो; तो खड़े रहो। कहे, बैठो; तो बैठे रहो।

हँू, तो पक्का..., फौज की ही नौकरी है।

- कहे फॉयर, तो गोली चला दो, फिर सामने कोई भी हो...।

मगर फौज तो केवल दुश्मनों पर गोली दागती है।

- हो सकता है कि सामने एक औरत हो या एक मासूम बच्चा, तो भी हुक्म माने हुक्म।

मगर फौज तो औरतों-बच्चों की हिफाजत करती है, फिर...?

- हो सकता है कि तुम्हें दया आ जाये और तुम रहम के बारे में सोचने लगो।

रहम ही तो दीन का असली सबक है।

- इसीलिये सोचने से तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं होना चाहिये। जैसे बंदूक नहीं सोचती। जैसे छुरा नहीं सोचता। जैसे बम नहीं सोचता। सिर्फ हुक्म मानता है।

पर इंसान बंदूक तो नहीं है, छुरा भी नहीं है, और बम तो हरगिज-हरगिज नहीं है।

- रहम से निज़ात हासिल करो।

रहम से निज़ात कैसे हासिल होगी, वह तो अम्मी ने घुट्टी में पिलायी है। रहम न हो तो पक्षियों को कोई दाना-पानी क्यों दे ? प्यासे को पानी क्यों पिलाये। मुहर्रम पर आखिर शरबत क्यों बांटा जाता है ? हसन और हुसैन की प्यास की यादों में ही न्...! फिर...?

- कठोर बनो। पत्थर बनो। वरना मजहब पर मंडराते ख़तरों से कैसे जूझोगे ? मुहब्बत से किनारा कर लो। मुहब्बतें आदमी को कमजोर बनाती हैं।

क्या बात कर रहे हो उस्ताद जी, मुहब्बत ने फरहाद को ताकतवर बनाया कि वह नहर काटकर शीरीं के घर तक ले आया। मुहब्बत ने लैला को कच्चे घड़े के सहारे नदी तैरने की ताकत अता की। और वो एक फिलम् देखी थी ‘गदर’ कि एक अकेला मुहब्बत करने वाला दूसरे मुल्क से अपनी माशूका को वापस ले आया और फौजें देखती रह गयीं।

- भाई से मुहब्बत हो और उस पर गोली चलाना पड़े तो कैसे चलाओगे ?

भाई से मुहब्बत ही होती है और उस पर गोली क्यों चलायी जाएगी।

- बम जहाँ चलाना हो और वहाँ बच्चों का मक़तब हो तो बम कैसे चलाओगे ?

-बच्चों पर बम, यह कैसी ट्रेनिंग है उस्ताद जी...?

वह खड़ा हो गया।

उस्ताद ने कहा - बैठ जाओ।

उसने कहा - एक सवाल है...।

- सवालों की इज़ाजत नहीं है यहाँ...।

- फिर भी उस्ताद जी, सवाल तो है...।

- कहा न्, इज़ाजत नहीं।

खुदा की इज़ाजत से सवाल करता हूँ - बच्चों पर बम क्यों फेंका जायेगा ? बच्चे किसी भी मजहब के दुश्मन नहीं होते।

तमाम ट्रेनीज ने हुक्म-उदूली की और पीछे गर्दन घुमाकर हसन को देखा।

हसन ने बुलंद आवाज में कहा - उस्ताद जी, बच्चे तो खुदा की नियामत हैं। नमाज की तरह पाक और मासूम।

टेªनीज ने और भी बड़ी हुक्म-उदूली की। वे उस्ताद की तरफ पीठ करके बैठ गये और हसन को सुनने लगे।

- रहने दो उस्ताद जी, हमंे ऐसी नौकरी नहीं करनी। ऐसे रोज़गार से तौबा जो बच्चों की जान लेने पर मुनहसिर हो। वह गाड़ी-मरम्मत की मजदूरी भली। हमें मुआफ करें।

ट्रेनीज ने खड़े होकर कहा - हमें मुआफ करें।

हसन ने कहा - अब हमें इज़ाजत दीजिये।

टेªनीज ने कहा - अब हमंे इज़ाजत दीजिये।

हसन - खुदा हाफिज !

ट्रेनीज - खुदा हाफिज, उस्ताद जी।

हसन लंबे कदम उठाकर बाहर निकल आया।

ट्रेनीज उसके पीछे-पीछे बाहर निकल आये।

उस्ताद जी हक्का-बक्का होकर देखते रह गये, यह क्या हो रहा है, ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ।

शोरोगुल सुनकर वही काले चश्मे वाला आदमी कहीं से कूदकर सामने आ खड़ा हुआ। उसके हाथों में एके-47 थी और उसका मुँह उन लोगों की ओर।

वह गरजा - कहाँ चल दिये कुत्तो...?

हसन ने बेखौफ होकर कहा - मजहब के रास्ते पर।

तमाम ट्रेनीज ने बेखौफ होकर बा-बुलंद आवाज में कहा - मजहब के रास्ते पर।

फिर वहाँ आँधियाँ चलने लगीं। धूल के गुबार उड़ने लगे। पेड़ों पर बैठे परिंदे घबराहट के मारे इधर-उधर भागने लगे। बादलों जैसी गर्जना और बिजली जैसी कड़क होने लगी। तड़-तड़ा-तड़-तड़।

जब गुबार थमा। धूल बैठी। शोर-शराबा मिटा तो ज़मीन पर बेतरतीब ढंग से साये हुए बहुत सारे लड़के दिखाई दिये; जबकि सोने के लिये उन्हें दरियाँ मुहैया करायी गयी थीं।

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