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व्यंग्य // बुद्धिजीवी होने से बचिये // पूरन सरमा

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हिंदी का एक साहित्यकार मुझे एक बार मूंगफली गटकता हुआ मिला, मैंने कहा-‘अमां यार, साहित्य की थोड़ी बहुत तो गरिमा रखो, मूंगफली खाकर तुम साहित्य...

हिंदी का एक साहित्यकार मुझे एक बार मूंगफली गटकता हुआ मिला, मैंने कहा-‘अमां यार, साहित्य की थोड़ी बहुत तो गरिमा रखो, मूंगफली खाकर तुम साहित्य का अवमूल्यन कर रहे हो।’

साहित्यकार बोला-‘यही तो कमी है। आम आदमी की समझ में मूंगफली शुद्ध जनवादी खाद्य है। मैंने सदैव सर्वहारा तथा आम जनता के हित में सृजन किया है। फिर मैं दोहरा जीवन भी नहीं जीता जिस यथार्थ को मैं जीता हूँ वही मेरी रचना का मर्म भी है।’

मैं साहित्यकार का उत्तर सुनकर हतप्रभ रह गया। साला अजीब जीव है मूंगफली खाना भी जनवाद में शामिल करता है। तभी मैंने भी दहला मारा-‘लेकिन एक बात मुझे और समझाओ जब मूंगफली जनवादी है तो यह पेंट की जेब में रखा रम का क्वाटर किस वाद को समर्थित करता है।’

साहित्यकार घुटा हुआ था। तनिक भी चेहरे पर परिर्वतन नहीं होने दिया, बोला-‘ऐसा है साहित्यानुरागी, शराब और साहित्य का संबंध अनादिकाल से शाश्वत रूप में चला आया है। जिस शराब को लेकर तुम मुझे नीचा दिखाना चाहते हो, वह भी साहित्य सृजन का मूल स्रोत है। मैं कहता हूँ कि बिना शराब के साहित्य में गंभीरता तथा वास्तविकता आ ही नहीं सकती। मैंने शराब पीना शुरू ही इसलिए किया था ताकि साहित्य अपना सही स्वरूप ग्रहण कर सके।’

‘इसका मतलब साहित्य की अनिवार्यता शराब की घुट्टी के सहारे साहित्यकार को जीवनदान देती है और बिना इस पेय के कोई आदमी साहित्यकार हो नहीं सकता।’

‘अब समझे आप, साहित्यकार और आदमी दो अलग विचार हैं। साहित्यकार आदमी नहीं होता तो फकत आदमी किसी कीमत पर साहित्यकार नहीं हो सकता। अब तुम्हें साहित्य से शराब का सरोकार विषय पर मैं तुम्हें और समझाऊँ। देखो भाई शराब एक नशीला पेय है। इसे पीने के बाद सब चीजें एक समान दिखाई देती हैं। ऊँच-नीच, जांत-पांत सभी तरह के भेदभाव समाप्त हो जाते हैं। जिसने यह दर्जा हासिल कर लिया वह पक्का जनवादी साहित्यकार बन जाता है।’ साहित्यकार ने शराब के पक्ष में दलील दी।

‘परन्तु क्या साहित्यकार के लिए यह नित्य पीना अनिवार्य है अथवा आकेजनली।’ मैंने पूछा।

साहित्य ने उत्तर दिया-‘यह साहित्य की चतुराई पर निर्भर करता है। जो साहित्यकार रोजाना पीता है, वह आम आदमी के निकट पहुँचता चला जाता है।


यदि वह आकेजनली पीता है तो वह यह दर्शाता है कि वह भीतर से भयाक्रांत है। जिसके भीतर भय है वह साहित्य का सृजन ईमानदारी से नहीं कर सकता। फिर साहित्यकार किसे कब-कितनी बार शराब पिलाने की टोपी पहना सकता है। यह चतुराई में है। नये-लेखकों को वह इस मामले में मूंडता है तथा साहित्य का मेनटेन करता है।’

‘जैसे आज जो गोष्ठी साहित्य की उपादेयता पर की जाने वाली है, क्या उसमें यह पेय मान्य है ?’ मैंने कहा।

वह बोला-‘वाह भाई, गोष्ठी और वह भी बिना शराब के-समझ में आने वाली बात नहीं है।’

‘लेकिन यह क्यों होता है ?’

‘देखिये गोष्ठी तो बहाना है बाकी इसकी मौलिकता तो शराब खोरी में निहित है। अनेक साहित्यकार जिन्हें उनकी जेब घर में पीने को एलाऊ नहीं करती वे साहित्यिक गोष्ठियों में इसे पीकर सहित्य को साधे रहते हैं।’

मैं बोला-‘अब आपसे एक बात और जानना चाहूँगा कि आपकी जेब का क्वाटर कब खुलेगा।’

साहित्यकार जिन्हें उनकी जेब से क्वाटर निकाला जो आधा खाली था, और सीधा ही मुंह से लगाकर गटा-गट पी गया। मैंने कहा-‘यह क्या कर रहे हैं आप। क्या इसमें से दो घूँट आप मुझे नहीं देंगे।’

साहित्यकार की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं, वह झल्लाया-‘तुम निरे बेवकूफ हो, तुम्हारी नियत को देखकर तो मुझे इसी समय इसे खाली करना पड़ा है। जिस शराब को मैंने पिया है, तुम्हारे लिए अपाच्य थी। क्योंकि तुम साहित्यकार अथवा बुद्धिजीवी नहीं हो। यदि अभी तुम पी जाते तो बुद्धिजीवी होने की गलतफहमी अलग पाल लेते।’

‘यह बुद्धिजीवी क्या होता हैं ?’ मैंने पूछा।

साहित्यकार ने कहा-‘बुद्धिजीवी वह है जो बुद्धि से कमाकर खाये। जैसे मैं हूँ। मैं बुद्धि का पूरा लाभ उठा रहा हूँ मैं साहित्य की वकालात करता फिरता हूँ और मेरी बीबी कमाकर लाती है। मैं मुफ्त में खाता हूँ। सबसे बड़ा बुद्धिजीवी वही है जो अपनी बुद्धि दूसरे को बेवकूफ बनाने में लगाये। यह बुद्धि का कतई अर्थ नहीं है कि आप नौकरी करने लगें और साहित्य को त्याग दें।

प्रगतिशीलता यही कहती है कि साहित्य व नौकरी दो अलग-अलग धरायें हैं। नौकरी करने वाला साहित्य के प्रति ईमानदार नहीं हो सकता। इसलिए मैंने बौद्धिक स्तर पर अपनी पत्नी को नौकरी करने का फैसला किया ताकि मेरा साहित्य बना रहे।’


‘वाकई आपकी दलील तो सार्थक व बड़ी उपादेय है। क्या आप यह भी बता सकेंगे कि आपके घर में गृह कलह का मूल कारण क्या है ?’

इस बार मेरा तीर शायद निशाने पर लगा था सो हिंदी साहित्यकार बगलें झांकने लगा। उसे उत्तर देते नहीं बना तो मैंने कहा-‘मेरी राय में साहित्य के कारण आपके घर की खुशियों का लोप हो गया। जब साहित्य के रचयिता का जीवन सुखी नहीं है तो वह साहित्य सामाजिक व पारिवारिक सुख में क्या भूमिका अदा करेगा ? समझ से परे है।’

‘एक बात बताऊँ आपको, वह यह कि सफल साहित्यकार गृहस्थ जीवन में कभी सफल नहीं रहा है। पति-पत्नी में कभी नहीं बनती है। इसलिए ही तो साहित्यकार के जीवन में पत्नी के अलावा प्रेमिका की भूमिका स्वीकार की गई है। अब आप कहेंगे कि प्रेमिका कैसे मिलती है तो इसका उत्तर इतना ही है कि बिगड़े हुये केस इतने हैं कि सब शांति की तलाश में भटक रहे हैं। मन की यही अशांति साहित्यकार की निकटता का अहसास कराती है। अनेक मामलों में साहित्यकार बहुपत्नीवाद का समर्थक व शिकार रहा है।’ हिंदी साहित्यकार ने असलियत से साक्षात्कार कराया।

मैंने कहा-‘इसका मतलब तो यह हुआ कि जितना बिखराव साहित्यकार के जीवन में हो-वही सही व सफल है। अर्थात् साहित्य और जीवन में विरोधाभास इस नजरिये से अनिवार्य है।’

‘मुझे लग रहा है कि तुम बुद्धिजीवी बनते जा रहे हो और तुम्हारा बुद्धिजीवी बनना तुम्हारे खुशहाल दाम्पत्य जीवन के लिए ठीक नहीं है-अतः उचित तो यह हो कि तुम अकेला छोड़ दो। गर्मी बढ़ रही है-मैं अब ठण्डी बीयर की बोतलें पीना चाहूँगा।’

‘बीयर तो मुझे भी अच्छी लगती है।’

‘मुफ्त की हर चीज अच्छी होती है। यदि तुम अपनी जेब से पैसे निकालकर एक क्वाटर व नमकीन खरीद लाओ तो मेरा जीवन धन्य हो जाये।’ साहित्यकार बोला।

मैंने कहा-‘इसका मतलब हम दोनों ही बुद्धिजीवी हैं। यदि एक जगह ज्यादा देर रहे तो झगड़े की नौबत सौ फीसदी है।’

‘लेकिन तुम अपने आप को घण्टे भर के लिए बुद्धिजीवी समझो ही मत। मुझे पिलाओ और चलते बनो। जिस चेतना ने इस समय मेरे अंतर में जन्म लिया है,

वह चेतना तुम्हारी जेब को हल्का कर देने वाली है और यह निश्चित है कि सार्थक साहित्य के लिए शराब तुम ही ला सकते हो।’ साहित्यकार अत्यंत बेचैनी से बोला।

मुझे तरस आ गया, बोला-‘लेकिन तुम इतने अथिष्ट हो कि इतनी देर से अकेले जनवादी खाद्य खाकर पगतिशील बने हुये हैं।


क्या यह बात तुम्हारे प्रति-क्रियावादी होने तथा दक्षिणपंथी ताकतों से मिला होने का सबूत नहीं है कि तुमने जेब की तमाम मूंगफलियों पर एकाधिकार कर रखा है।’

साहित्यकार ने खींसे निपोर दी, बोला-‘भाई अभी एक पाठक मिल गया था-दिला गया। आपको इसमें से दे दंू यह मेरे भूखे पेट के साथ अनाचार होगा।’

‘इसका मतलब भूख भी सृजन को जीवंत बनाती है।’

इस बार साहित्यकार के मुँह से कडु़वाहट भर गई, वह मुँह बनाकर बोला-‘जिस देश का साहित्यकार भूखा हो और मूंगफलियां खाकर साहित्य की रचना करता हो लानत है मेरे भाई उस देश की सरकार पर।’

‘लेकिन अब तुम ज्यादा देर भूखे नहीं रह सकोगे साहित्यकार। यह लो तीन रूपये और जाकर ढ़ाबे में भोजन कर आओ। तुम्हारा ज्यादा देर भूखा रहना तुम्हारे स्वास्थ्य, साहित्य व तुम्हारी पत्नी के हित में नहीं है।’

साहित्यकार वाकई जरूरतमंद था। उसकी आँखों में चमक लौट आई। वह तीन रूपये लेकर रफू हो गया।

मैंने लौटते हुये देखा तो वह देसी शराब के ठेके पर सडि़यल लोगों के बीच खड़ा साहित्य का गरिष्ठ राग अलाप रहा था। उसने तीन रूपये की रोटी खाने की एवज शराब पीना श्रेष्ठ समझा। मेरा सिर साहित्यकार की समझ पर गर्व से ऊँचा हो गया। मैं उसे धन्यवाद देने ठेके पर जा पहुँचा। मुझे देखते ही वह बोला ‘तुम यहाँ भी आ गये। जाओ साहित्य के दुश्मन तीन रूपये देकर तुमने मुझे देसी शराब पीने को विवश किया है। मैंने पहली बार देसी पी है। क्या तुम मुझे बीस रूपये नहीं दे सकते थे।’

मेरा सिर इस बार उसकी इस चुनौती से शर्म से नीचा हो गया, बोला-‘माफ करना भाई साहित्य और शराब के शाश्वत संबंधों की इतनी नाजुकता का मुझे पता नहीं था, वरना सच कहता हूँ मैं तुम्हें स्वयं ढ़ाबे में ले जाकर साहित्य का ठोस आहार तंदूर की रोटियां खिलाकर साहित्य का भविष्य अंधकारमय करता।’

साहित्यकार शराब के नशे में धुत था-बहकने लगा-‘साली बीस किताबें लिखी, हजारों लेख लिखे फिर भी शराब के तीन रूपये भीख में मिलते हैं

मेरे बच्चे-बीबी सब मुझे लेकर दुखी हैं। साहित्य से संबंध रखने से मुझे मिला क्या है ? मैं साहित्य को आग लगा दूंगा इसने मेरा पूरा जीवन चौपट कर दिया है।’

मैंने कहा-‘धैर्य रखो सब ठीक हो जायेगा। साहित्य का अजीर्ण कई बार यह विफलता जगाता है। घबराओ नहीं मैं तुम्हें आज एक गोष्ठी में पेश करूंगा।’


‘गोष्ठी-साहित्य-किताब सृजन सबसे मुझे घृणा हो गई है मुझे शराब चाहिए शराब।’

साहित्यकार का प्रताप सुनकर मेरी आँखें नम हो गई। रिक्शा में डालकर उसे मैं उसके घर ले आया। कबाड़खाना बना उसका घर सन्नाटे में भन्ना रहा था। मैं उसे खाट पर डाला और चला आया।

घर आकर मैंने भी विचार किया कि साहित्य से अनुराग उत्पन्न किया जावे अथवा नहीं। तो पाया कि साहित्य का यही राग कालान्तर में शराब प्रेम में बदलकर जीवन को तोड़ता है तथा दो कौड़ी की मानसिकता को जन्म देता है। ऐेसे हालात में यदि साहित्य के प्रति रागात्मकता को दूर ही रखा जावे तो श्रेष्ठ है। मैंने साहित्य के प्रति राग जगाने वाली तमाम चीजों को इकट्ठा किया और जला दिया। आज मैं आदमी पहले हूँ। बच्चे खुश हैं तथा साहित्य की छाया भी नहीं पड़ने देता अपने घर के वातावरण पर-साहित्य और शराब से बुद्धि प्रखर होकर आदमी को बुद्धिजीवी बनाती है और बुद्धिजीवी होना किसी भी तरह खतरे से खाली नहीं इसलिए बद्धिजीवी होने से बचिये।

(पूरन सरमा)

124/61-62, अग्रवाल फार्म,

मानसरोवर, जयपुर-302 020,

(राजस्थान)

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3789,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,326,ईबुक,182,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2744,कहानी,2067,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,224,लघुकथा,806,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,306,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1880,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,676,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,52,साहित्यिक गतिविधियाँ,181,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,52,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: व्यंग्य // बुद्धिजीवी होने से बचिये // पूरन सरमा
व्यंग्य // बुद्धिजीवी होने से बचिये // पूरन सरमा
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