बुधवार, 6 दिसंबर 2017

गाय एक पशु ही नहीं प्रतीक भी है // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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प्रत्येक संस्कृति के अपने अपने प्रतीक होते हैं जो उस संस्कृति के मान्य मूल्यों को रूपायित करते हैं। भारतीय संस्कृति में गाय एक ऐसा ही प्रतीक है; और जिस प्रकार कोई भी संस्कृति अपने प्रतीकों को किसी भी कीमत पर सुरक्षित रखना चाहती है, भारतीय संस्कृति भी गाय की सुरक्षा के लिए कटिबद्ध है। यही कारण है कि गोवध के विरुद्ध भारत में समय समय पर आन्दोलन और सक्रिय प्रतिरोध होते रहे हैं। आपको याद होगा इन प्रतिरोधों की श्रृंखला में विनोबा भावे तक ने एक समय आमरण अनशन किया था।

गोवध के समर्थन में प्राय: यह तर्क दिया जाता है कि गाय किसी ज़माने में बड़ा उपयोगी पशु रहा होगा किन्तु उसकी उपयोगिता दिन ब दिन कम होती जा रही है, कि बूढ़ी गायें सर्वथा अनुपयोगी होती हैं और उनका रख रखाव बहुत मंहगा पड़ता है; एक तर्क यह भी है कि गोवध से खाद्य सामग्री भी प्राप्त होती है। तमाम लोग गाय का मांस खाने के आदी हो चुके हैं और हमें व्यक्तिगत खाने पीने के किसी विकल्प पर बंदिश नहीं लगाना चाहिए। ज़ाहिर है, ये सारे तर्क उपयोगितावादी चिंतन पर आधारित हैं जो हमें गैर-भारतीय प्रदेशों से मिले हैं। किन्तु केवल उपयोगितावादी दृष्टिकोण को ही भारतीय मनीषा और संस्कृति में कभी मूल्यवान नहीं माना गया। हमारे यहाँ बेशक गाय एक अत्यंत उपयोगी पशु तो है किन्तु गाय की उपयोगिता ही उसकी मूल्यवत्ता को निर्धारित नहीं करती। गाय हमारे लिए इसलिए मूल्यवान है कि वह हमारे सांस्कृतिक मूल्यों की वाहक भी है।

व्यक्ति के सन्दर्भ में व्यक्तित्व का जो अर्थ है, वही अर्थ समाज के सन्दर्भ में संस्कृति का है। संस्कृति समाज का व्यक्तित्व है और व्यक्तित्व व्यक्ति की संस्कृति है। जिस प्रकार कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तित्व से अलग नहीं होता उसी तरह कोई भी समाज संस्कृति शून्य नहीं हो सकता। व्यक्तित्व और संस्कृति दोनों ही व्यवहार के समग्र-गुण की ओर संकेत करते हैं। (व्यवहार से तात्पर्य केवल वाह्य व्यवहार से ही नहीं बल्कि सोच-विचार और कल्पना करने से भी है।) व्यवहार के समग्र गुण को, अपेक्षाकृत स्थिर और समान रहने वाले प्रधान विशेषकों (ट्रेज़) द्वारा ही समझा जा सकता है। इस प्रकार किसी भी समाज के स्थिर और समान रहने वाले विशेषक ही उसकी संस्कृति का निर्माण करते हैं। जब हम किसी समाज की संस्कृति को भीरु या आक्रामक, अथवा सहिष्णु या असहिष्णु कह रहे होते हैं तो वस्तुत: हम उसके प्रधान विशेषक की ओर संकेत कर रहे होते हैं। भारतीय समाज के परम्परागत प्रधान विशेषक क्या हैं जो उसके व्यवहार के समस्त गुण को – उसकी संस्कृति को – समझ पाने में सहायता देते हैं ? और जो उसे अन्य संस्कृतियों से अलग करते हैं ?

पाश्चात्य संस्कृति मूलत: एक उपयोगितावादी संस्कृति है। वहां जो उपयोगी है, वही मूल्यवान है। वही सत्य है उपयोगितावादी संस्कृति होने के कारण वहां जिन अन्य मूल्यों की कद्र की जाती है वे हैं शक्ति और गत्यात्मकता (power and dynamism ) क्योंकि ये वे साधन हैं कि जिनसे उपयोगी वस्तु हासिल की जा सकती है। साध्य मूल्य केवल उपयोगिता है। यही कारण है कि वहां गाय की बजाय घोड़ा सांस्कृतिक प्रतीक हो गया है। जिस प्रकार कृषि कर्म में भारत में गाय उपयोगी रही है उसी तरह पाश्चात्य देशों में घोड़े की उपयोगिता स्वीकार की गई है। घोड़ा न केवल वहां उपयोगिता में खरा उतरता है बल्कि शक्ति और गति के लिए भी उसकी पहचान बनी है।

घोड़ा पश्चिम में एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक प्रतीक है। पश्चिम के चित्रकार भागते हुए घोड़े को गति के प्रतीक के रूप में चित्रित करते हैं और साधारणत: शक्ति का माप “हार्स पावर” है। पर यहाँ एक और बात ध्यान देने की है। पश्चिम में घोड़े का वध वर्जित नहीं है। इसका कारण वहां की उपयोगितावादी संस्कृति ही है। उपयोगिता एक ऐसा मूल्य है, एक ऐसा साध्य है, जिसकी वेदी पर हम कितने ही घोड़ों का वध कर सकते हैं।

पश्चिम की तुलना में भारतीय संस्कृति की मनीषा बिलकुल दूसरे ही प्रकार की है। ऐसा नहीं है कि यहाँ उपयोगिता के मूल्य को अस्वीकार किया गया हो, किन्तु उपयोगिता को यहाँ कभी साध्य मूल्य नहीं समझा गया। भारत में उपयोगिता “अर्थ” के रूप में एक आवश्यक पुरुषार्थ है, किन्तु यह केवल साधन मूल्य है। गाय भी यहाँ उपयोगी है किन्तु केवल इसीलिए वह मूल्यवान नहीं हो जाती। यह मूल्यवान इसलिए है कि वह प्रतीकात्मक रूप से भारतीय संस्कृति के किन्हीं अन्य मूल्यों का प्रतिनिधित्व करती है। बेशक गाय कामधेनु है। वह दूध देती है। उसके बछड़े बड़े होकर बैल बनकर खेतों में हल जोतते हैं। मृत्योपरांत भी गाय का प्रत्येक अंग – उसके सींग, चमड़ी, खुर आदि, - किसी न किसी रूप में काम आते हैं। यहाँ तक की ज़िंदा गाय का मल-मूत्र भी स्वच्छता और औषध गुणों के लिए उपयोगी है।

किन्तु इतना सब होते हुए भी गाय केवल अपनी उपयोगिता की दृष्टि से मूल्यवान नहीं है। यदि ऐसा होता तो गो ह्त्या का विरोध न होता क्योंकि गाय ह्त्या के बाद भी उपयोगी रहती है। वस्तुत: गाय भारत में सांस्कृतिक प्रतीक इसलिए है कि गाय के व्यवहार में उन चारित्रिक गुणों की पहचान की गई है जो भारतीय संस्कृति के साध्य मूल्य रहे हैं ये मूल्य हैं – सहिष्णुता और प्रेम। गाय पशु-बल और गति की प्रतीक न होकर आत्म–बल और धैर्य का प्रतीक है। अहिंसा और सदाग्रह का प्रतीक है। इसीलिए इसे माता का दर्जा दिया गया है। किन्तु घोड़ा जिस बल और गति के लिए जाना जाता है वह केवल पशुबल है। भारत में पशुबल की बजाय आत्म-बल पर अधिक बल दिया गया है। इस आत्मबल को ही अहिंसा और प्रेम से जोड़ा गया है (संदर्भ, गांधी) एक पशु होते हुए भी इन गुणों की गाय में पहचान की जा सकती है। गाय प्रेम और धैर्य की प्रतिमूर्ति है और इसीलिए वह पूजनीय है। वह हमारी संस्कृति का प्रतीक बन गई है

सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में गाय हमारे समाज और हमारी भाषा में पूरी तरह रच-बस गई है। हमारी सम्पूर्ण परस्पर बातचीत ही ‘गोष्ठी’ है। यह गायों की अन्तरंग बैठक मात्र नहीं है। ‘गो’ केवल गाय नहीं है हमारी ‘वाणी’ और ‘आँख’ की पर्यायवाची है। वह ‘धरती’ भी है और ‘सूर्य’ और ‘चंद्रमा’ भी है। वह ‘आकाश’ भी है और ‘जल’ भी है। ‘गयल’ (गैल) गाय के चलने से बना हुआ रास्ता ही नहीं है, मनुष्य के आगे बढ़ने का उचित ‘मार्ग’ भी है। ‘गौख केवल वह झरोखा ही नहीं जिसमें से गाएं झांकती हैं, हमारे घर की छोटी खिड़की भी ‘गवाक्ष’ ही है। ‘गवेषणा’, कभी खोई हुई गाय की भले ही तलाश रही हो, यह आज शास्त्रीय शोध है। केवल गाय का वर्णन ही गाथा नहीं है, यह मानव अभिरुचि की कोई भी कथा है। “गुहार” कभी सिर्फ गाय की आवाज़ रही होगी, आज यह किसी भी व्यक्ति की पुकार हो गई है। ‘गोधूलि’ धूल उडाती गायों की लौटने की वेला तो है ही, संध्या काल ही ‘गोधूलि’ हो गया है। ‘गोरस’ दूध दही मट्ठा का ही रसास्वादन न रहकर समस्त इन्द्रियों का सुख है। ‘गोपुर’ स्वर्ण का वह द्वार है जो गोप्य है, रक्षणीय है। गोचर और गुप्त – दोनों ही स्थितियों में गाय समान रूप से उपस्थित है।

गांधी जी ने एक बार कहा था खादी वस्त्र नहीं प्रतीक है। समानांतर यह कहने में कि गाय पशु नहीं प्रतीक है, मुझे कोई दोष प्रतीत नहीं होता।

-डा. सुरेन्द्र वर्मा ( मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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