मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

बिहार (तथा झारखण्ड) का सांस्कृतिक वैभव // विद्याभूषण ’श्रीरश्मि’

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आधुनिक बिहार (तथा झारखण्ड) प्राचीन काल में तीन भाग में विभक्त था - मगध, विदेह और अंग। गंगा के दक्षिण-पश्चिम का क्षेत्र मगध था, उत्तर का क्षेत्र विदेह, और पूर्व का क्षेत्र अंग। ये तीनों ही क्षेत्र सभ्यता और संस्कृति की दृष्टि से आयावर्त के मस्तक पर स्वर्ण-किरीट सदृश थे। द्वापर युग में मगधराज जरासन्ध ने चक्रवर्ती पांडव-नरेश युधिष्ठिर को चुनौती दी थी और जरासन्ध को परास्त कर सकना भगवान् कृष्ण के लिए भी टेढ़ी खीर बन गया था। आख़िर, कृष्ण ने छलपूर्वक जरासन्ध की हत्या कराई। जरासन्ध की वीरता और कुशल प्रशासन-प्रबन्ध का उन दिनों सम्पूर्ण आर्यावर्त लोहा मानता था। कहते हैं कि जरासन्ध का मगध धन-धान्य से परिपूर्ण था और प्रजावर्ग कष्ट का नाम तक नहीं जानता था। द्वापर युग में ही अंग के राजा दानवीर महारथी कर्ण थे। कर्ण का अंग ’वीरप्रसवा भूमि’ के नाम से प्रसिद्ध था। खेती-बारी और कला-कौशल की दृष्टि से भी अंग की समृद्धि चरमोत्कर्ष पर थी। एक प्राचीन कथा के अनुसार, कर्ण ने प्रागज्योतिषपुर (असम) के राजा भगदत्त की कन्या भानुमति के स्वयंवर में जरासंध को मल्ल-युद्ध में परास्त किया था। मगध और अंग की प्रतिद्वन्द्विता की बात सर्वज्ञात है। तीसरा राज्य विदेह तो ज्ञान-विज्ञान और सभ्यता-संस्कृति के क्षेत्र में सम्पूर्ण बिहार का आदर्श था। भगवान् राम के युग में, विदेहराज राजर्षि जनक की विद्वत्ता विश्वविख्यात थी। उनकी राजसभा में कुरू-पंचाल, चीन, यवद्वीप, सुमात्रा, मलयदेश, तिब्बत, स्याम, आदि देशों के विद्वान रहा करते थे। बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं के अतिरिक्त, सुख्यात ऋषि-महर्षि भी अपनी ज्ञान-पिपासा शान्त करने के लिए जनक के पास आया करते थे। जनक का ब्रह्मज्ञान सबके लिए स्पृहा का विषय था। ’वृहदारण्यकोपनिषद्’ के अनुसार, गार्ग्य ऋषि ने काशिराज को प्रलोभन दिया था कि यदि वे उनके शिष्य बन जाएँ, तो वे उन्हें जनक के समान बना देंगे; हालाँकि गार्ग्य स्वयं जनक के पसंगे में भी नहीं आते थे। एक पौराणिक कथा में यह भी कहा गया है कि जब रावण पद्मा पर मुग्ध हो गया, तब उसने पद्मा के पिता के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। उसका यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया गया; फलतः क्रोध में आकर उसने पद्मा के पिता को मार डाला। फिर भी, पद्मा उसे प्राप्त न हो सकी - वह एक रत्न में परिवर्तित हो गई। कुबेर के सम्पूर्ण कोष पर अधिकार रखनेवाले रावण ने ऐसा रत्न कभी नहीं देखा था। उसने अनुभव किया कि इस रत्न के समक्ष कुबेर का सम्पूर्ण कोष मूल्यहीन है। अतः वह रत्न को एक सन्दूक में रखकर लंका ले गया। परन्तु वहाँ सन्दूक खोलने पर रत्न के स्थान पर एक सहस्त्रमुखी विकराल देवी प्रकट हुई। देवी ने कहा कि यदि रावण अपनी ख़ैर चाहता हो, तो रत्न को संसार की किसी सर्वथा पवित्र भूमि में गाड़ आए - रत्न का उसके पास रहना उसके विनाश का कारण बनेगा। तदनुसार ही, रावण रत्न को संसार की सर्वाधिक पवित्र भूमि, विदेह, में गाड़ आया। यही पद्मा कुछ समय बाद जनक द्वारा भूमि से निकाली गई और जानकी अथवा सीता के रूप में राम की अर्द्धांगिनी बनी। विदेह अथवा मिथिला की पवित्रता की यह कहानी अपने-आप में इस तथ्य का एक प्रबल प्रमाण है कि सभ्यता-संस्कृति के क्षेत्र में उसकी उपलब्धियाँ कितनी महत् थीं।

बिहार वैदिक सभ्यता का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण केन्द्र था। ज्ञान-विज्ञान की जो सलिला बिहार में प्रवाहित होती थी, वह सम्पूर्ण भारतवर्ष - केवल भारतवर्ष ही क्यों, सम्पूर्ण संसार - को अभिसिंचित करती थी। न्याय-सूत्रों के रचयिता महर्षि गौतम सारण ज़िले के गोदना नामक स्थान में निवास करते थे। ’अष्टाध्यायी’ के रचयिता पाणिनि पटना के पंडित उपवर्ष के विद्यार्थी थे। महर्षि च्यवन शाहाबाद ज़िले में सोन के तट पर रहा करते थे। उनकी कुटिया से थोड़ी ही दूर पर ’कादम्बरी’ के प्रणेता महाकवि वाणभट्ट का भी निवास था। महर्षि विश्वमित्र बक्सर के पास गंगा तट पर रहते थे। यहीं राम ने तारकासुर का वध किया था। महर्षि भृगु और मैत्रेयी-जैसी ब्रह्मवादिनी विदुषियाँ भी राजर्षि जनक की ही राजसभा की शोभा बढ़ाती थीं।

हालाँकि पाश्चात्य विद्वानों का कहना है कि भारत में आर्य बाहर से आए थे और उनका आदि निवासस्थान मध्य-एशिया अथवा उसके आसपास कहीं था, परन्तु वास्तव में यह प्रसंग अब तक विवाद के घेरे से बाहर नहीं निकला है। डा. राजबली पांडेय के कथनानुसार, आर्यों का आदि निवासस्थान मध्यप्रदेश अथवा उत्तरप्रदेश और बिहार था। परन्तु उनके इस कथन को बहुमत का समर्थन प्राप्त नहीं है। बहुमत इसी पक्ष में है कि आर्य भारत के मूल निवासी नहीं थे और वे कई दलों में बँट कर भारत आए थे। परन्तु इस बहुमत का भी यही कहना है कि आर्यों का जो पहला दल भारत आया, वह पूर्व की ओर बढ़ता-बढ़ता मगध पहुँचा और उसने वहाँ ’व्रात्य सभ्यता’ को जन्म दिया। फिर, जब वेद रचयिता आर्य-दल भारत में आकर बसा, तब उसने लक्ष्य किया कि मगध में आकर बसनेवाले उनके भाई-बन्धु बहुत-सी बातों में उनसे अलग हो गए हैं। अतः उसने व्रात्यों की निन्दा आरम्भ कर दी। यही कारण है कि वैदिक साहित्य में मगधवासियों के विरुद्ध बहुत-सी बातें देखने को मिलती हैं। ’शतपथजाहमण’ में स्पष्टतः कहा गया है कि ’’कुरु-पंचाल के ब्राह्मणों को काशी, कोशल, विदेह और मगध नहीं जाना चाहिए क्योंकि वहाँ के ब्राह्मणों ने वैदिक धर्म त्याग दिया है और वे एक नए धर्म का प्रचार कर रहे हैं जिसमें यज्ञ तथा पशुवध की मनाही है। ... पूर्वी क्षेत्र का समाज पतित हो गया है, क्योंकि वहाँ ब्राह्मणों का स्थान क्षत्रियों ने ले लिया है और तीनों वर्णों के लोग क्षत्रियों की अधीनता में रहते हैं।’’ हालाँकि उपनिषदों के उत्कर्ष-काल में महान् उपनिषद्कार याज्ञवल्वय और उनके अध्यात्म-प्रवीण संरक्षक विदेहराज जनक के कारण विचारों का नेतृत्व-सूत्र पश्चिम-भारत की बजाय पूर्व-भारत के हाथों में आ गया और पूर्व के ज्ञानलोक के सामने पश्चिम का ज्ञानाग्रह फीका पड़ गया, फिर भी दोनों आर्य दलों का परस्पर-गतिरोध मिट न सका, क्योंकि पूर्व-विशेष पर मगध में आर्य अथवा ब्रह्म-धर्म की नींव कभी भी अच्छी तरह न जम सकी। फिर, आगे चल कर ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का विरोध करनेवाले बुद्ध और महावीर को भी मगधवालों ने ही आश्रय प्रदान किया।

बुद्ध और महावीर के प्रादुर्भाव ने भारत के आध्यात्म-क्षेत्र में कितनी बड़ी क्रान्ति उपस्थित की, यह सर्वज्ञात है। इन दोनों महापुरुषों ने ब्राह्मणवाद - दूसरे शब्दों में, आडम्बरवाद - की जड़ें खोखली कर दीं और धर्म का एक नया मूल्यांकन प्रस्तुत किया। प्राणिमात्र के प्रति प्रेम भाव और कर्म पर आधारित सिद्धान्तों ने एक युगान्तकारी स्वरूप ग्रहण किया। संसार के अनेक देश बौद्ध धर्म की शरण आ गए। इन दो महान् धर्मों - बौद्ध धर्म और जैन धर्म को जन्म देने का श्रेय वस्तुतः बिहार-भूमि को ही है। जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर तो, ख़ैर, वैशाली में पैदा ही हुए, कपिलवस्तु में जन्म लेने वाले गौतम बुद्ध भी बिहार के ही हो रहे। उन्हें बिहार में ही बुद्धत्व प्राप्त हुआ और यही उनका कर्म-क्षेत्र भी बना। फिर, सम्राट अशोक के राजत्व-काल में उनका यह अभिनव धर्म-सन्देश संसार में दूर-दूर तक प्रचारित हुआ।

आध्यात्मिक क्षेत्र में संसार को दिशा-निदेश देने वाला बिहार, राजनीति के क्षेत्र में भी किसी से पीछे नहीं रहा। मगध, विदेह और अंग की सुचारू शासन-व्यवस्था सदा ही दूसरों के लिए आदर्शस्वरूप रही। ’’प्रजा ही किसी राज्य का मेरुदण्ड है और उसकी सुख-सुविधा पर ही राज्य का कल्याण निर्भर करता है’’ - इस सूत्र-वाक्य को यहाँ के नरेशों ने सदा स्मरण रखा। इस तरह, राजतंत्र तो यहाँ लोकहितैषी आधार पर परिचालित हुआ ही, लोकतांत्रिक पद्धति को भी यहाँ फूलने-फलने का पूरा अवसर मिला। वैशाली का वज्जी गणराज्य इसका प्रबल प्रमाण है। इस राज्य की स्थिति कितनी दृढ़ थी, इसकी स्पष्ट घोषणा बुद्ध ने मगध-नरेश अजातशत्रु को परामर्श देते हुए की थी। जब अजातशत्रु ने वैशाली पर आक्रमण करने का निश्चय किया, तब उसने अपने महामात्य वर्षकार को बुद्ध के पास परामर्श के लिए भेजा। उत्तर में बुद्ध ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वैशाली के निवासियों में प्रबल एकता है और वे अपने धर्म का सचाई से पालन करते हैं, इसलिए वैशाली अपराजेय है। हालाँकि बुद्ध की मृत्यु के उपरान्त, राज्यलिप्सा के वशीभूत होकर, अजातशत्रु ने कूटनीति का प्रयोग किया और वैशाली-निवासियों में फूट पैदा करके अपनी मनोकामना सिद्ध की, फिर भी वैशाली-गणराज्य ने समस्त संसार के समक्ष लोकतांत्रिक पद्धति की सफलता-असफलता के सम्बन्ध में एक संदेश उपस्थित किया, जिसका महत्व आज भी कम नहीं है।

फिर, राजतंत्र में शासन-व्यवस्था का अभिनव स्वरूप उपस्थित किया चन्द्रगुप्त मौर्य ने। चन्द्रगुप्त के राजत्व-काल में मगध का सितारा ख़ूब चमका। इस समय मगध-साम्राज्य उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में नर्मदा-प्रदेश तक और पश्चिम में अफ़ग़ानिस्तान से लेकर पूर्व में बंगाल तक विस्तृत था। जैसा कि यूनानी राजदूत मेगास्थनीज़ ने लिखा है, चन्द्रगुप्त कार्यपालिका का प्रधान होने के साथ-साथ साम्राज्य का सर्वोच्च न्यायाधिपति तथा प्रधान सेनापति भी था। वह मंत्रिपरिषद् की सलाह से काम करता था, जिसके 12 से 20 तक सदस्य होते थे। केन्द्रीय शासन विभिन्न विभागों में बँटा था और हर विभाग एक अमात्य के अधीन था। सम्पूर्ण साम्राज्य को पाँच प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया था और हर प्रदेश के लिए ’कुमार’ नामक अधिकारी नियुक्त किया जाता था। शासन-व्यवस्था के छः विभाग थे - (1) सेना विभाग, (2) आय-व्यय-विभाग, (3) न्याय और शासन-विभाग, (4) गुप्तचर विभाग, (5) कृषि-विभाग, और (6) लोक-कल्याण-विभाग। फिर, पाटलिपुत्र और अन्य सभी नगरों की व्यवस्था के लिए नगर-सभाएँ थीं, जिनका स्वरूप आधुनिक काल के नगर-निगमों अथवा नगरपालिकाओं सदृश था। 2,250 वर्ष पहले की यह शासन-व्यवस्था निस्संदेह चौंका देनेवाली है। अपने महामात्य कौटिल्य अथवा चाणक्य की सहायता से चन्द्रगुप्त मौर्य ने शासन-व्यवस्था के क्षेत्र में वस्तुतः एक क्रान्ति उपस्थित की थी।

सम्राट अशोक के राजत्व-काल में मगध-साम्राज्य की सीमा दक्षिण में और बढ़ी। लगभग सम्पूर्ण भारतवर्ष मगध-साम्राज्य में आ गया। शासन-व्यवस्था में भी पहले की अपेक्षा कई सुधार हुए। यदि अशोक ने आगे चल कर पूर्णतः धार्मिक जीवन न अपना लिया होता, तो सम्भवतः मगध का राजनीतिक-रथ और अधिक वेग से संचालित होता। परन्तु ऐसा नहीं हुआ। फिर भी, धार्मिकता के संयोग ने राजनीति को अधिकाधिक लोक-कल्याण-अभिमुखी तो बनाया ही - अशोक ने लोक-कल्याण के क्षेत्र में ऐसे-ऐसे काम किए, जिन्हें कर सकना आज के प्रगतिशील युग में भी सभी राष्ट्रों के लिए सम्भव नहीं है।

अशोक के बाद मगध का सवार्धिक प्रभावशाली राजा हुआ, समुद्रगुप्त, जिसे ’भारत का सिकन्दर’ भी कहा जाता है। उसकी मृत्यु के 24 वर्ष बाद, चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन-काल में चीनी यात्री फ़ाहियान भारत आया था। उसने तत्कालीन मगध की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि वहाँ के निवासी बहुत ही सदाचारी थे और अहिंसा का पालन करते थे। उसके कथनानुसार, मगध में शिक्षा का बड़ा प्रसार था - मगध संसार का अद्वितीय शिक्षा-केन्द्र था।

वस्तुतः शिक्षा के क्षेत्र में बिहार का स्थान वैदिक काल से ही अत्यन्त महत्वपूर्ण रहा है। अनेक ऋषि-महर्षियों का निवासस्थान होने के कारण देश के विभिन्न भागों के लोग शिक्षा-प्राप्ति के लिए बिहार आते थे। महर्षि भृगु, गौतम, विश्वात्रि, याज्ञवक्य, च्यवन, आदि के यहाँ रह कर विद्याध्ययन करने वाले छात्रों की संख्या बहुत बड़ी थी। मिथिला तो विद्याध्ययन का अन्यतम केन्द्र था ही। शिक्षा-विषयक बिहार की यह परम्परा बौद्ध-धर्म के उत्थान-काल में और भी समृद्ध हुई। नालन्दा-विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ बिहार को संसार का दूसरा सबसे प्राचीन शिक्षणालय प्राप्त हुआ। पहला स्थान तक्षशिला विश्वविद्यालय का था। कुछ काल बाद बिहार में विक्रमशिला-विश्वविद्यालय की भी स्थापना हुई। इस प्रकार, बिहार शिक्षा के क्षेत्र संसार से काफ़ी आगे बढ़ गया। अशोक ने शिक्षा की प्रसार-गति और भी तीव्र की। उसने स्थान-स्थान पर शिलालेख खुदवाए और सर्वसाधारण की शिक्षा के लिए प्रचुर राजकीय सहायता उपलब्ध की। अशोक के काल में बिहार में ब्राह्मी-लिपि का प्रचलन था। इस लिपि में स्वर, व्यंजन, मात्रा, अनुस्वार, विसर्ग, आदि के अलग-अलग संकेत थे - साथ ही, संयुक्ताक्षर भी लिखे जाते थे। पंडित-समाज की भाषा संस्कृत और जनसाधारण की प्राकृत भाषा पाली, दोनों के लिए इस लिपि का प्रयोग होता था। बौद्ध-धर्म के उत्थान-काल में बौद्ध-पिटकों की रचना तो बिहार में हुई ही, कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा चाणक्यनीति-जैसे उत्कृष्ट संस्कृत-ग्रन्थों का भी सृजन हुआ। अधिकांश जैन ग्रन्थ भी इसी काल में लिखे गए। इसी समय सूत्र-ग्रन्थों का भी सम्पादन हुआ। श्रीमती एनी बेसेन्ट के कथनानुसार, ’’बौद्ध धर्म के उत्कर्ष-काल में बिहार ने अपने यहाँ शिक्षा की ऐसी लहर व्याप्त की, जिसके स्पर्श से सम्पूर्ण देश लाभान्वित हुआ।’’

नारी-शिक्षा के क्षेत्र में भी बिहार वैदिक काल से ही अग्रणी रहा। वैदिक काल में गार्गी, मैत्रेयी, अहिल्या-जैसी विदुषियों का अस्तित्व इस कथन के पक्ष में एक प्रबल प्रमाण है। बौद्ध-धर्म के उत्कर्ष-काल में अशोक की पुत्री संघमित्रा बहुत ही विलक्षण प्रतिभा-सम्पन्न हुईं। उन्हें अशोक ने बौद्ध-धर्म के प्रचारार्थ लंका भेजा था। कुछ और बुद्ध-भिक्षुणियाँ भी पांडित्य में बेजोड़ थीं। इसके बाद 9-वीं शताब्दी के आरम्भ में जगद्गुरू से मिथिला के पंडित मंडन मिश्र ने तो शास्त्रार्थ किया ही था, उनकी पत्नी सरस्वती ने भी इस शास्त्रार्थ में भाग लिया था। फिर, चौदहवीं शताब्दी में विद्यापति की पुत्रवधू चन्द्रकला संस्कृत की प्रकांड पंडिता हुईं। उन्हें ’महामहोपाध्याय’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था।

खेती-बारी के क्षेत्र में भी बिहार वैदिक काल से ही अग्रगामी रहा। जरासंध और कर्ण के राजत्व-काल में मगध और अंग के धन-धान्य से परिपूर्ण होने की चर्चा वैदिक ग्रन्थों में मिलती है। राम के काल में तो बिहार में खेती का बहुत ही अधिक महत्व था। वहाँ वर्षा के उपरान्त सबसे पहले राजा स्वयं खेत में हल चलाता था। राजा जनक के हल चलाने और सीता के जन्म की कहानी सुप्रख्यात है। उस काल में बिहार की भूमि दो भागों में विभाजित थी - उवरी और खिल्म। उवरी में तो अनाज उपजाया जाता था और खिल्म भूमि पशुओं के चरागाह के काम आती थी। वस्तुतः आरम्भ से ही बिहार-निवासियों की मुख्य वृत्ति खेती रही। आज भी अनेक बिहारी खेती करके ही जीवन-यापन करते हैं। मेगास्थनीज़ ने चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन-काल में बिहार में खेती-बारी की अवस्था का उल्लेख करते हुए लिखा है - ’’प्रत्येक गाँव एक छोटा-सा प्रजातंत्र था। भूमि के स्वामी किसान ही होते थे - ज़मींदार या जागीरदार नहीं। राजा किसानों से उत्पादन का दसवाँ हिस्सा कर के रूप में लेता था। गाँव की पंचायत उत्पादन का हिसाब करके उसमें राजा और किसान के हिस्से का निश्चय करती थी। गाँवों के चारों ओर हरे-भरे खेत, जंगल और चरागाह दिखाई पड़ते थे। फ़सल काफ़ी अच्छी होती थी और गाँव वाले आनन्द से जीवन बिताते थे। परन्तु कभी-कभी अतिवृष्टि हो जाने से उनकी स्थिति ख़राब हो जाती थी। ऐसे समय राजा भूमि-कर तो माफ़ कर ही देता था, किसानों को आर्थिक सहायता भी पहुँचाता था।’’ चीनी यात्री फ़ाहियान ने भी लिखा है - ’’मगधवासियों का मुख्य धंधा खेती था। पैदावार काफ़ी अच्छी होती थी और लोग इतने ख़ुशहाल थे कि कोई शायद ही कभी अपराध-कर्म करता था। प्रायः हर घर में मवेशी पाले जाते थे।’’

खेती-बारी अच्छी होने के कारण, व्यापार के क्षेत्र में भी बिहार का इस देश में काफ़ी ऊँचा स्थान रहा। वैदिक काल में बिहारी वणिक व्यापार करने के लिए विदेश तो नहीं जाते थे, परन्तु देश के विभिन्न भागों से उनका व्यापार अवश्य होता था। यह व्यापार वस्तु-विनिमय के रूप में होता था। बौद्ध-काल में व्यापार का क्षेत्र आशातीत रूप से प्रसारित हुआ। मगध के व्यापारी राजपूताने की मरुभूमि पार कर भड़ोच और सूरत के समुद्र तट पर पहुँचते थे और बेबीलोन तक व्यापार करते थे। इसके अलावा, लंका और पूर्वी एशिया के देशों में भी वे व्यापार करने जाते थे। देश में कई बड़े-बड़े व्यापारिक मार्ग थे। एक मार्ग श्रावस्ती से राजगृह तक जाता था और दूसरा अंग से सिंध और सूरत तक। एक तीसरा मार्ग विदेह से गांधार तक जाता था। बौद्ध-जातकों में मगधवासियों-द्वारा विदेशों के साथ व्यापार के सम्बन्ध में काफ़ी सामग्री उपलब्ध है। बौद्ध-काल में सिक्कों का भी जन्म हो गया था, अतः अब ख़रीद-बिक्री सिक्कों के माध्यम से होने लगी थी, परन्तु वस्तु-विनिमय का भी प्रचलन था। व्यापारी आपस में हुंडियों का भी व्यवहार करते थे। परवर्ती काल में व्यापार का क्षेत्र दिन-दिन विस्तृत होता गया और रही-सही त्रुटियाँ भी कालान्तर में समाप्त हो गईं।

खेती-बारी और व्यापार-सम्बन्धी समृद्वि से उद्योग-धंधों और कला-कौशल को भी काफ़ी प्रोत्साहन मिला। वैदिककाल में बिहार में खेती-सम्बन्धी औजारों का तो निर्माण होता ही था, सोने-चाँदी के आभूषण और ताम्बे-पीतल के बर्तन भी बनते थे। कुछ हद तक चमड़े की वस्तुएँ भी बनती थीं। फिर, ज्यों-ज्यों वर्ण-व्यवस्था की प्रबलता बढ़ी, विभिन्न उद्योगों ने पैतृक व्यवसाय का रूप प्राप्त किया और उन्हें विकसित होने का पर्याप्त अवसर मिला। प्राचीन बौद्ध ग्रन्थों में विभिन्न व्यवसायों और उद्योग-धंधों का ज़िक्र मिलता है - जैसे बढ़ई, सुनार, लोहार, चमार, रंगरेज़, हाथी-दाँत के शिल्पी, जौहरी, जुलाहे, कुम्हार, चित्रकार, तेली, आदि। इन पेशों को अपनाने वाले लोगों के अपने अलग-अलग संघ थे। संघ का प्रधान ’प्रमुख’ कहलाता था। सभी उद्योगों के प्रतिनिधियों को राजसभा में स्थान प्राप्त था और उनकी अभिवृद्धि के लिए राजकीय सहायता प्राप्त होती थी। विलक्षण कारीगरी प्रस्तुत करने के लिए शिल्पियों में होड़-सी मची रहती थी। बिहार में बनी वस्तुओं का विदेशों में निर्यात भी होता था।

स्थापत्य-कला की दृष्टि से भी बिहार का अतीत बड़ा गौरवपूर्ण रहा है। कहते हैं, जरासन्ध का महल सम्पूर्ण भारत में बेजोड़ था। बौद्ध-काल में इस कला का और अधिक विकास हुआ। चन्द्रगुप्त मौर्य के राजत्व-काल में पाटलिपुत्र की अवस्था का जो वर्णन मेगास्थनीज़ ने किया है, वह वस्तुतः चमत्कारपूर्ण है। उसने लिखा है - ’’चन्द्रगुप्त की राजधानी सोन और गंगा नदियों के संगम पर बसी थी। यह नौ मील लम्बी और डेढ़ मील चैड़ी थी। इसके चारों ओर लकड़ी का परकोटा था, जिसमें 94 दरवाज़े और 570 बुर्ज थे। परकोटे की बगल में, बाहर की ओर, खाई बनी थी, जिसमें सोन का पानी भरा रहता था। राजमहल पत्थर के बने थे और देखने में बड़े सुन्दर थे। उनमें पत्थर खोद कर नाना प्रकार के चित्र भी अंकित किए गए थे।’’ एक अन्य यूनानी लेखक ने लिखा है कि चन्द्रगुप्त के महलों की बनावट ईरान के सूसा और एकबटाना के विश्वप्रसिद्ध राजभवनों की सजावट से भी अधिक सुन्दर थी। फ़ाहियान भी अशोक के महलों को देख कर चकित रह गया था। सन् 1915 में भारतीय पुरातत्व-विभाग के डा. स्पूनर ने अशोक के पाटलिपुत्र-स्थित महल के एक विशाल कमरे की खोज की थी। उसमें अनेक स्तम्भ थे, जिनकी लकड़ी उस समय भी नयी-जैसी लगती थी। उनके जोड़ों की रेखाएँ तक दिखाई नहीं पड़ती थीं। बौद्ध-विहारों और स्तूपों तथा अशोक के लाटों के निर्माण में भी बिहारी शिल्पियों ने अपनी अपूर्व कला-प्रवीणता का परिचय दिया। बिहार की स्थापत्य-कला का गौरव आज भी अक्षुण्ण है। अंग्रेज़ों के ज़माने में निर्मित पटना का गोल-घर इसका एक सजीव प्रमाण है। 90 फ़ीट ऊँचा और 420 फ़ीट घेरे वाला यह गोलाकार भवन 18-वीं शताब्दी में बनाया गया था। इसमें कहीं किसी स्तंभ का उपयोग नहीं किया गया है।

चित्रकला और मूर्तिकला के क्षेत्र में भी बिहार का अतीत बड़ा गौरवमय रहा है। कहते हैं कि अंग के चित्रकार दूर-दूर से बुलाये जाते थे। अंग का राजमहल भाँति-भाँति के चित्रों से सज्जित था - अनेक चित्र पत्थर खोद कर बनाये गये थे। मिथिला भी चित्रकारी की दृष्टि से बड़ा समुन्नत था। परन्तु बिहार की चित्रकला और मूर्तिकला विषयक प्रतिभा बौद्ध-काल में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची। नालंदा के खंडहर और विभिन्न विहारों तथा स्तूपों के अवशेष इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। भारत का वर्तमान राजचिन्ह भी बिहारी मूर्तिकला का एक अच्छा नमूना है। कुछेक विद्वानों का तो यहाँ तक कहना है कि अजन्ता के चित्र बिहारी चित्रकारों की ही कल्पना के परिणाम थे। चित्रकला की बौद्ध-शैली का प्रवर्तक वस्तुतः बिहार ही था। गुप्त-काल में भी बिहार की चित्रकला और मूर्तिकला समृद्धि के पथ पर बढ़ती रही। आज भी चित्रकला की पटना-शैली आदर्श, व्यवस्था एवं भाव-प्रवणता के लिए प्रसिद्ध है।

संगीत के क्षेत्र में बिहार का इतिहास सामवेद के मंत्रों से आरम्भ होता है। वैदिक काल में बिहार-भूमि ऋषियों द्वारा ऋग्वेद के मंत्रों के गायन से गूँजती थी। यही मंत्र बाद में सामवेद के रूप में संगृहीत हुए। राजा जनक की राजसभा में भी नियमित रूप से संगीत-समारोह आयोजित होते थे। मेगास्थनीज़ के कथनानुसार, चन्द्रगुप्त की राजसभा में अच्छे-अच्छे संगीतज्ञ थे। साथ ही, नटों, नर्तकों और वादकों द्वारा जनता के मनोरंजन के लिए नाटक, उत्सव, आदि का आयोजन किया जाता था। फिर, गुप्त-काल में सम्राट समुद्रगुप्त स्वयं एक अच्छा संगीतज्ञ था। उसकी कुछ मुद्राओं पर वीणा बजाती हुई उसकी मूर्ति उत्कीर्ण है। वह कविता भी अच्छी करता था। इसी कारण उसे ’कविराज’ की उपाधि दी गई थी। संगीत की यह सरिता आगे भी बिहार में प्रवाहित होती रही। चौदहवीं शताब्दी में विद्यापति के ’नाचारी’ भजन घर-घर गाये जाते थे। इसी समय सिंधभूपाल ने ’संगीतरत्नाकर व्याख्या’ ग्रंथ की रचना की। फिर, 16-वीं शताब्दी में पंडित जगद्धर ने ’संगीत सर्वस्व’ लिखा और 17-वीं शताब्दी में लोचन की सुविख्यात कृति ’रागतरंगिणी’ का जन्म हुआ। बिहार के लोककंठ से आज भी चैती, कजरी, झूमर और सोहर की मृदुल ध्वनि उन्मुक्त भाव से प्रसारित होती है। फ़ाहियान का यह कथन कि ’’भारत का प्रत्येक गाँव संगीत-लहरियों से आच्छादित है’’ बिहार के गाँवों के बारे में पूर्णतः सत्य उतरता है। वसन्त की सन्ध्या में बिहार में शायद ही कोई ऐसा गाँव मिले, जिसका वातावरण संगीत से मुखरित न हो। आदिवासी-इलाकों की सन्ध्याएँ तो नित्यप्रति संगीत-परिव्याप्त रहती हैं। उनकी ’हो’, ’झाऊ’ आदि नृत्यों की परम्परा भी पूर्ववत् चली आ रही है। वस्तुतः नृत्य-संगीत का जो इन्द्रधनुषी स्वरूप बिहार में उपलब्ध है, वह शायद ही कहीं और देखने को मिले। विविधतामय सांस्कृति कोष आरम्भ से ही बिहार (तथा झारखण्ड) की विविधता रही है - आज भी है।

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विद्याभूषण ’श्रीरश्मि’- परिचय

विद्याभूषण ’श्रीरश्मि’ हिन्दी अकादमी द्वारा पुरस्कृत लेखक थे। यह पुरस्कार उन्हें स्वयं उनके जीवन पर आधारित उपन्यास, ’दिव्यधाम’, के लिए 1987 में मिला था। विद्याभूषण ’श्रीरश्मि’ (11 दिसम्बर 1930 - 25 अगस्त 2016) का वास्तविक नाम विद्याभूषण वर्मा था।

वे मात्र 16 वर्ष की वय में दिल्ली के ’दैनिक विश्वमित्र’ समाचारपत्र के सम्पादकीय विभाग में नौकरी करने लगे। वे रात में काम करते और दिन में पढ़ते। अल्प वेतन से फ़ीस के पैसे बचा-बचा कर उन्होंने विशारद, इंटरमीडियेट, साहित्यरत्न, बी. ए. तथा एम. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।

’श्रीरश्मि’ ने ’दैनिक विश्वमित्र’ के अतिरिक्त ’दैनिक राष्ट्रवाणी’, ’दैनिक नवीन भारत’, साप्ताहिक ’उजाला’, साप्ताहिक ’फ़िल्मी दुनिया’ तथा मासिक ’नवनीत’ के सम्पादन में भी सहयोग दिया। वे 1959 से भारतीय सूचना सेवा से सम्बद्ध हो गये।

’श्रीरश्मि’ की लगभग तीन सौ रचनायें 1960 के दशक की प्रमुख हिन्दी, उर्दू, गुजराती तथा कन्नड़ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। हिन्दी पत्रिकाओं में से कुछ के नाम हैंः ’नीहारिका’, ’साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ’कादम्बिनी’, ’त्रिपथगा’, ’सरिता’, ’मुक्ता’, ’नवनीत’, ’माया’, ’मनोहर कहानियाँ’, ’रानी’, ’जागृति’ तथा ’पराग’।

उनके उपन्यास हैंः ’दिव्यधाम’, ’तो सुन लो’, ’प्यासा पंछीः खारा पानी’, ’धू घू करती आग’, ’आनन्द लीला’, ’यूटोपिया रियलाइज़्ड’ तथा ’द प्लेज़र प्ले’।

उन्होंने ’विहँसते फूल, नुकीले काँटे’ नाम से महापुरुषों के व्यंग्य-विनोद का संकलन किया।

’श्रीरश्मि’ द्वारा अनुवादित रचनायें हैंः ’डॉ. आइन्सटाइन और ब्रह्मांड’, ’हमारा परमाणु केन्द्रिक भविष्य’, ’स्वातंत्र्य सेतु’, ’भूदान यज्ञः क्या और क्यों’, ’सर्वोदय और शासनमुक्त समाज’, ’हमारा राष्ट्रीय शिक्षण’ तथा ’विनोबा की पाकिस्तान यात्रा’।

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