दरिया दरिया – साहिल साहिल // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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जाहिद अबरोल / ‘दरिया दरिया साहिल साहिल’ (उर्दू ग़ज़ल-संग्रह) /साम्या प्रकाशन /नई दिल्ली/२०१४

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जाहिद अबरोल का हाल ही में प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह ‘दरिया दरिया-साहिल साहिल’ का आकर्षक शीर्षक देख कर मुझे बरबस “पत्ता पत्ता–बूटा बूटा हाल हमारा जाने है” पद-बंध याद आए बिना न रहा. पत्ता हो या बूटा, साहिल हो या दरिया दोनों में अटूट सम्बन्ध है और दोनों को एक साथ लाकर हम न जाने कितने ख़्वाब बुन सकते हैं और कितनी ही अच्छी-बुरी यादों को सतह पर ला सकते है. जाहिद अबरोल ने यही किया है. वह दरिया-दरिया साहिल-साहिल की बात चलाते हैं और खूब चलाते हैं. उनकी इन ग़ज़लों में ज़हनी और जज्बाती बातें तो हैं ही, ज़मीनी और दुनियादारी की बातें भी हैं, इनमें उनकी सोच और समझ है, साथ ही संवेदनशीलता और खूबसूरती भी है. दरिया की रवानी भी है और साहिल का ठहराव भी. तो सबसे पहले तो मैं शायर को किताब के इस नफीस उन्वान के लिए मुबारकबाद पेश करता हूँ.

जनाब जाहिद अबरोल उर्दू शायरी में कोई अपरिचित नाम नहीं है. वह अपनी कृति ‘फरीद नामा’ से काफी प्रसिद्धि पा चुके हैं. भले ही वह रचनात्मक अनुवाद ही क्यों न हो, ‘फरीद नामा’ उनका हस्ताक्षर काव्य बन चुका है. इसके अतिरिक्त उनकी नज्मों के दो संग्रह भी आ चुके हैं. अबरोल साहेब उत्तर भारत में मुशायरों में अपनी काव्यात्मक शिरकत के लिए भी खासे मशहूर हैं. कितनी अजीब बात है कि इस शायर ने कभी संस्थागत रूप से उर्दू नहीं पढी लेकिन आज अच्छे अच्छे उर्दू के जानकार इनसे कुछ न कुछ सीख सकते हैं.

ऐसा नहीं है कि उर्दू ग़ज़लों के परंपरागत मिज़ाज से, और नए अंदाज़ से भी, शाहिद अबरोल वाकिफ न हों. वह अपने शे’रों में अपनी महबूबा से प्रेमालाप कर सकते हैं. शराब की बोतलें खोल सकते हैं और ग़ज़ल कहने का रदीफ़ और काफिया भी वह जानते हैं लेकिन वह यह भी मानते हैं कि शायरी “और भी कुछ है फकत लफ़्ज़ों के जमघट के सिवा.” यही वजह है की उनकी शायरी में हमें ज़मीनी हकीकत की तस्बीर भी मिलती है और यथास्थिति को बदलने की छटपटाहट भी दिखाई देती है. लेकिन ऐसी शायरी करना कोई खेल नहीं है. वह कहते हैं,-

माएं तो दो चार बार इस दर्द को सहती होंगीं

शायर तो जब भी लिखता दर्द-ए-ज़ह सहता है

शायर की प्रसव पीड़ा किसी माँ की प्रसव पीड़ा से कम नहीं होती.

बहुत मुश्किल होता है अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्ति दे पाना.

जाहिद अबरोल अपने समाज के मौजूदा हालात से बेहद नाराज़ और दुखी हैं. भारत की स्वतंत्रता ने बड़ी बड़ी उम्मीदें जगाई थीं, लेकिन क्या से क्या हो गया ! भारत की एकता छिन्न भिन्न हो गई, सभी रास्ते जिनसे उजाला आता था बंद हो गए. खुदपरस्ती के सिवा कुछ न रहा. तहजीब बला–ए- ताक रख दी गई. खुशबूदार फूल मुरझा गए और ताज़े फूल लाए ही न जा सके. लोग अपने में सिमटे बैठे हैं. सब एक दूसरे से डरे हुए हैं. परिंदे परिंदों से डर रहे हैं. होठों पर मुस्कराहट है लेकिन दिलों में चीख है. ऊपर ऊपर खामोशी है लेकिन अन्दर ही अन्दर लोग रो रहे हैं. किसी की हिम्मत नहीं कि इस निजाम के विरुद्ध आवाज़ उठा सके. –

तुमने तो भर लिए कान अपनी ही आवाजों से यारो

मेरी आवाज़ को अब कौन सुनेगा यारो


ज़हन पर एक स्याहपोश घटा छाई है

हमको बिकते हुए सूरज की खबर आई है


छत टपकती है किसी दीदएतर की सूरत

काश देखे कोई आकर मिरे घर की सूरत


गमज़दों डाल लो चेहरों पर तबस्सुम का निकाब

हाकिमें मुल्क है इस शहर में आनेवाला


ख़ाक दर ख़ाक ही मिलते देखे

मेरी आँखों ने जो सपने देखे


जुर्म, सच्चाई, दलीलें, इन्साफ

सब कचहरी में बिकते देखे


सोचता हूँ क्या से क्या हो गया

इक समुन्दर कैसे सेहरा हो गया

धज्जियां उड़ती रहीं तहजीब की

पल में मेरा मुल्क नंगा हो गया


लोग हैं कि जैसे हों बांस के जंगल

आग को जन्म देकर खुद ही उसमें जलते हैं.


यह कैसा दौर है ‘जाहिद’ कि जिसमें

परिंदे से परिन्द: डर रहा है


घर की चिमनियाँ खामोश लेकिन

कोई परदों के अन्दर रो रहा है


बहरहाल, शायर कहता है, -


‘आज कुछ नज़र नहीं आता

गर्द हर सू बिखर गयी यारो’


ऐसे में आखिर अब क्या करें? क्या चुप बैठ जाएं और जो चल रहा है उसे मूक दर्शक की तरह देखते रहें? नहीं, बात तो अपनी कहानी ही होगी और अपने पूरे आत्मविश्वास के साथ और पूरे होशो-हवास में कहनी होगी –

बात कहानी है तो फिर ठोंक बजा कर कहिए

जिनसे कहनी हो उसी को सुनाकर कहिए


जागते लोगों को बस इशार: काफी है

सोने वालों को जो कहना है हिलाकर कहिए


पीठ पीछे तो लगा देते हैं इलज़ाम सभी

जो भी कहना है उसे सामने आकर कहिए


अगर हममें इतनी हिम्मत और आत्म विश्वास जाग जाए तो इत्मीनान रखिए कि –


दूर बिलकुल नहीं वो वक्त है आने वाला

होश खो बैठेगा जब होश उड़ाने वाला


हमारा कवि समस्याओं से भागना नहीं चाहता. वह उनसे जूझता है, पलायन नहीं करता. वह धर्म का दामन भी नहीं पकड़ता. अपने अन्दर के डर को मंदिर मस्जिद और गिरजाघर में डुबो नहीं देता. वस्तुत: ये सारे इबादत-घर इंसान के अन्दर के डर के ही प्रतीक हैं. –‘इंसा के अन्दर के डर – मन्दिर मस्जिद गिरजा घर’. कितना अजीब है कि ‘लाखों इंसा बेघर हैं / एक खुदा के लाखों घर’ सच तो यह है कि कवि की अपनी मंजिल की तलाश उसके राह भटक जाने पर ज्यादह आसान हो जाती है. वह कहता है –

जब किसी भी राह में भटके हैं हम

मंजिलों का कुछ पता हमको मिला.


अध्यात्म और पारलौकिक जगत की बातें सब बेमानी हैं. हमें तो इसी संसार में रहना है. हम और कहीं भाग नहीं सकते.

अपनों का दिल तोड़ के बाबा

क्यूँ आए घर छोड़ के बाबा


किससे रिश्ता जोड़ रहे हो

सबसे रिश्ता तोड़ के बाबा.


हर कोई ग़मज़दा है और हरेक का गम बेइंतहा है. शायर कहता है,

‘गम को अगर पानी समझो

हर इक शख्स समुन्दर है’. ऐसे में,


जब भी कोई गम नया हमको मिला

फलसफ: इक जीस्त का हमको मिला


आंसुओं की नगरी से लाया हूँ मैं सौगातें

कुछ सियाह दिन और कुछ उजली उजली सी रातें


कभी वक्त पर रहम खाकर शायर शिकवा नहीं करता,

किस तरह करूं शिकव: वक्त से मैं ऐ ‘जाहिद

’ वो भी मेरे जैसा है, यूं ही रूठ जाता है.


लेकिन कभी वह इतना परेशान हो उठाता है कि मन करता है, सबकुछ उलट पुलट दिया जाए –

पीठ पर उठाए हूँ बोझ सारी दुनिया का

जी में है कि करबट लूँ और सब उलट जाए

आँख कान ज़हन-ओ-दिल, बेजुबां कोई नहीं

जिस पर हाथ रख दोगे खुद-ब-खुद बोलेगा


लेकिन कवि अच्छी तरह जानता है कि हिंसक क्रान्ति के अलावा कई और विकल्प भी हो सकते हैं जो शायद ज्यादह कारगर साबित हों. गमज़द: ज़माने से, जिसमें सभी गम के मारे हैं, उसे यह सबक मिला है कि सिर्फ अपने गम में डूबे रहना कोई मतलब नहीं रखता. हमें लोगों से जुड़कर उनके दर्द को समझना और उसका निवारण करने का प्रयत्न करना ज्यादह ज़रूरी है. –

गमज़द ज़माने का कुछ तो मुझपर है अहसान

जब भी उसको ताकता हूँ खुद को भूल जाता हूँ


दूसरों की सुनता हूँ खुद को इक तरफ रखकर

अपने दिल पर जो गुज़रे, कब किसे सुनाता हूँ


सच तो यह है की जबतक लोगों में एका नहीं होगा, एकत्व की भावना नहीं होगी हम कभी सुखी नहीं रह सकते. धर्म और राजनीति ने तो अपने स्वार्थ के चलते हमेशा लोगों को बांटा ही है. एक ही धर्म में न जाने कितनी शाखाएं हो गईं और एक ही जाति न जाने कितनी उपजातियों में बंट गई कि मुख्य जाति और धर्म का तो पता ही न रहा. लोगों को याद है की वे हिन्दू या मुसलमान हैं कि वे कायस्थ या ब्राह्मण हैं लेकिन वे भूल गए कि उनका मूल मज़हब केवल मानवता है यही उनकी जाति है. –

इसे कुछ इस कदर पूजा गया है

शजर शाखों में बंटता जा रहा है


शजर तो बंट चुका है टहनियों में

बस उसका नाम बाकी रह गया है


जाहिद अबरोल सबसे पहले एक शायर हैं और शायर की विशेषता होती हैं उसकी कोमल भावनाएं. वह अन्याय और गैर बराबरी से समझौता नहीं कर सकता. वह साफ़ कहते हैं –

नादार के सीने पे लगा तीर गलत है

बेबस पर जो उठती है वो शमशीर गलत है.


इस लिए हमें जल्द से जल्द इस तरह की नाइंसाफियों को ख़त्म करना होगा.

कहने को बहुत कुछ है तो कह क्यूँ नहीं देते

जज़्बात के इज़हार में ताखीर गलत है.


परवाज़ की ख्वाहिश से नवाज़ा है जब इसको

फिर फ़िक्र के पैरों में यह ज़ंजीर ग़लत है.


बेशक जाहिद अबरोल की शायरी का ख़ास मसौदा समाज में व्याप्त नाइंसाफी है लेकिन वह पुराने किस्म की शायरी से अपने को पूरी तरह अलग नहीं कर सके हैं. वह खुद ही कहते हैं,

नाम जाहिद है तबीयत है मगर रिन्दाना

नाम बदला न तबीयत ने ही छोड़ा मुझको


कभी कभी वे दुनिया से भागने लगते हैं और उसी शराब और शबाब में डूबने लगते हैं जिसने कभी ग़ज़ल को डुबो दिया था. उनकी एक ग़ज़ल का मुलाहिजा कीजिए (ग़ज़ल ७०) -

हमको रोको न कोई पीने से

दर्द सा उठ रहा है सीने से


हम पिएँ और हमको होश न हो

होश आता है हमको पीने से


ज़िदगी मौत से भी बदतर है

बाज़ आए हम ऐसे जीने से


आपका हुस्न इक क़ियामत है

पूछिए जाकर आगबीने से


सौ ग़मों का इलाज होता है

एक जाम-ए-शराब पीने से

लेकिन मानना पडेगा इक इस तरह की शायरी जाहिद अबरोल के यहाँ सिर्फ़ अपवाद के रूप में ही देखी जा सकती है.

मैं अंत में उनके कुछ निहायत उम्दा शे’रों को उद्धृत कर अपनी बात ख़त्म करना चाहूँगा –

इक न इक दिन इसी धरती पे गिरेगा यारो

मोम के पंख लगाकर जो उड़ेगा यारो


एक घर में तो फकत एक जला करता था

घर में बेटे जो हुए जल उठे चूल्हे कितने


हम पुरानी यादों को भूल तो गए लेकिन

अब भी इन मजारों में कुछ चराग जलते हैं


बादल आंसू प्यास धुआं अंगारा शबनम साया धूप

तेरे गम को जाने क्या क्या भेस बदलते देखा है


ज़िंदगी में इस तरह के भी कई बाजार हैं ‘जाहिद’

मैं खरीदूं खुद को खुद से और खुद के हाथ ही बिकता रहूं


तू मेरी कैद में है मैं भी तिरी कैद में हूँ

देखें कब कौन किसे पहले रिहा करता है


मेरे घर में सब मेहमाँ , बन संवर के आते हैं

इक तिरा ही गम है जो नंगे पाँव आता है


मुश्किल है समझ पाना, शायर की तबीयत को

इक पल में वो सहारा है, इक पल में समुन्दर है

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डा. सुरेन्द्र वर्मा

मो.-०९६२१२२२७७८

१०, एच आई जी /१, सर्कुलर रोड इलाहाबाद २११००१

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