मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

शब्द संधान // कैसे कैसे संन्यास // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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संस्कृत में एक शब्द है, न्यास। यों तो इसके कई अर्थ हैं किन्तु एक अर्थ इसका त्याग या निवृत्ति से भी

है। ज़ाहिर है, संन्यास शब्द ‘सम’ और ‘न्यास’ की संधि से बना है। सम का संधिगत रूप ‘सं’ है। इस प्रकार सम और न्यास मिलकर “संन्यास” हो गया। सम, अर्थात - उचित, बरोबर, सही। जो सही निवृत्ति है, उचित त्याग है, वही संन्यास है।

भारत में जीवन के चार पड़ाव या ठहराव माने गए हैं। इन्हें आश्रम कहा गया है। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वाना- प्रस्थ और संन्यास। सन्यास हमारे जीवन का आखिरी पड़ाव है। इस पड़ाव पर आते आते व्यक्ति सांसारिकता छोड़ देता है। संसार का त्याग ही संन्यास है। भारतीय चिंतन और दर्शन में संन्यास का यही पारिभाषिक अर्थ है। यह संसार के किसी एक पहलू का त्याग नहीं है। समग्र रूप से संसार से निवृत्ति है। यह अभोग, अनासक्ति, अलिप्तता की स्थिति है। यह दुनिया में रहते हुए भी दुनिया का तलबगार न होना है। “बाज़ार से गुज़रा हूँ खरीदार नहीं हूँ।” यह दृश्य में सम्मिलित होने की बजाय दृष्टा होने की स्थिति है। बड़ी मुश्किल से यह स्थिति प्राप्त होती है। संन्यास की मानसिकता तैयार कर पाना कोई हंसी खेल नहीं है।

न्यास का एक अर्थ और भी है। इसे अंग्रेज़ी में “ट्रस्टीशिप” कह सकते हैं। मुझे धरोहर के रूप में किसी की कोई वस्तु मिली है। वह बेशक मेरे पास बनी रहती है। लेकिन मैं उसे अपने उपयोग में नहीं ला सकता क्योंकि वह मेरी नहीं है, मुझ पर विश्वास करके किसी ने मुझे सौंपी है। वह किसी की अमानत है। मैं उसका केवल ट्रस्टी हूँ, “न्यासी” हूँ। अमानत की वस्तु के प्रति मैं कोई आसक्ति नहीं रख सकता। मुझे उसके प्रति अलिप्त रहना होगा। मेरे लिए वह भोग नहीं अभोग की वस्तु है। वह मेरे पास “है” लेकिन मैं उसका भोग नहीं कर सकता। अमानत में खयानत नहीं कर सकता। अमानत में खयानत न करना ही “संन्यास” है – सही या उचित त्याग-वृत्ति के साथ वस्तु को अपने पास बने रहने देना है। धरोहर के प्रति अनासक्त हो जाना है| गांधी जी ने कहा था कि हर धनवान को अपने धन के प्रति यही न्यास-वृत्ति अपनाना चाहिए। आखिर उसने यह धन समाज के ज़रिए ही कमाया है। समाज की यह धरोहर है। उसी को लौटा देना है। अर्थात, उसी के कल्याण के लिए वह खर्च किया जाना चाहिए। यदि ऐसा हो जाए तो आर्थिक वैषम्य ही समाप्त हो जाएगा। लेकिन धरोहर के प्रति भी यह संन्यास भाव रख पाना भी कितना कठिन है।

नौकरी पेशा लोग एक निश्चित समय पर ‘सेवा-निवृत्त’ हो जाते हैं। जैसे साठ, बासठ या पैंसठ वर्ष की आयु पर। सेवा निवृत्त व्यक्ति निवृत्ति के बाद, अपनी निर्धारित सेवाओं से मुक्त हो जाता है, छुटकारा पा लेता है। संन्यास का एक यह भी रूप है। अब वहां कोई सेवा करे, इससे मैं अनासक्त हूँ, अलिप्त रहता हूँ। मैं दृश्य में नहीं रहता। दृश्य से हट जाता हूँ। जो लोग इस प्रकार निर्धारित समय पर सेवा-निवृत्त नहीं होते वे अक्सर सेवा-निवृत्ति का अपना समय खुद चुन लेते हैं और घोषित कर देते हैं कि हम अब अपने पद और उसकी सेवाओं से संन्यास ले रहे हैं। वे अपना त्याग-पत्र दे देते हैं और दृश्य से हट जाते हैं।

खिलाड़ी सही समय आने पर खेल से निवृत्ति ले लेता है। उसकी जगह दूसरा खिलाड़ी आ जाता है। अब कोई भी आये, वह निस्पृह भाव से दृष्टा बना रहता है। आए दिन हमें समाचार मिलता है कि अमुख खिलाड़ी के क्रिकेट से संन्यास ले लिया। क्या इसे भी हम संन्यास कह सकते हैं ? कहा तो गया ही है।
कभी कभी लगता है कि समग्र जीवन से संन्यास ले लेना, उसके प्रति अनासक्त हो जाना, शायद इतना कठिन नहीं है जितना जीवन के किसी एक क्षेत्र या पक्ष से संन्यास ले पाना है। जिन्होंने क्रिकेट से संन्यास ले लिया है वे क्रिकेट में दखल देते ही रहते हैं। राजनीति को ही ले लें। अडवानी जी अब भी राजनीति में फंसे हुए हैं। सोनिया गांधी ने बेशक कांग्रेस के सभापति के पद को त्याग दे दिया है, लेकिन खबरे बराबर आ रहीं हैं कि उन्होंने न तो कांग्रेस को छोड़ा है और न राजनीति को। मुंह की लगी आसानी से छूटती नहीं।

संन्यास शब्द का उपयोग इन दिनों, हमारी रोज़मर्रा की भाषा में, बड़ा गलत-सलत हुआ है। सही तरह से, सम्यक निवृत्ति लेने में सामान्यत: लोगों की दिलचस्पी नहीं होती। अधिकतर अपने स्वार्थ के लिए वे संन्यास लेने जैसी बात करने लगते हैं। जिसका वस्तुत: कोई मतलब नहीं होता। संन्यास के नाम पर, त्याग और निवृत्ति के भाव को ठेंगा दिखाकर जाने कितने तथाकथित साधु-सन्यासी, लोगों को ठगते हैं, स्त्रियों का अपहरण करते हैं, दुराचार करते हैं। संन्यास शब्द के दुरुपयोग के प्रति सजग रहने की अत्यंत आवश्यकता है। संन्यास कहने से नहीं, करने / रहने से सार्थक होता है।

--डा.सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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