रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

दोहे सुशील यादव के.......

साझा करें:

दोहे सुशील यादव के....... दीप उधर भी जल रहा ,थका-थका मायूस.....। गन्ना सहित किसान को ,सरकार रही चूस…..।। मंदिर बनना राम का ,तय करते तारीख......

दोहे सुशील यादव के.......

दीप उधर भी जल रहा ,थका-थका मायूस.....।

गन्ना सहित किसान को ,सरकार रही चूस…..।।

मंदिर बनना राम का ,तय करते तारीख.....।

चतुरे-ज्ञानी लोग क्यों,जड़ से खायें ईख…..।।

इस सूरत का आदमी,पायें कभी-कभार.....।

बिना-गिने ही नोट को,सौपे गंगा धार…..।।

गुण को पीछे छोड़ कर ,अवगुन करे बखान.....।

राजनीति के छल-कपट, लंपट खुली दुकान…..।।

मजहब मेरे मुल्क का,ऐसा कुछ हो जाय.....।

जब -जब भूखा मैं रहूं,तू खाए पछताय…..।।

क्यों बेमतलब पीटते ,फटे-फटे से ढोल.....।

नाहक छोडो राम को ,केदार बबम बोल…..।।

दुनिया तो समझी नहीं,नहीं समझते आप.....।

मुझे अगर है जानना ,मेरे कद को नाप…..।।

तेरस के हो तोहफे ,खुशियां मिले अपार.....।

विनती करें कुबेर से ,भरा रहे भंडार…..।।

पहन मुखौटा बैठना ,करना बस आराम.....।

आप लगे है छीनने ,तुलसी से सिय-राम…..।।

गांधी ! मिल घर गोडसे ,पूछते कुशल क्षेम.....।

इसे नोट महिमा कहें ,या मानवता प्रेम…..।।

चौथ-चाँद करवा अभी ,छलनी ओट निहार.....।

साजन तुमसे मांगती ,सुख जीवन आधार…..।।

बन्द किया जो आपने ,ढक्कन वो तो खोल.....।

राम- रसायन स्वाद को ,चख लें सब बेमोल…..।।

रथ चुनाव का है खड़ा ,चलकर तू भी बैठ.....।

नखरा भारी आड़ में ,मतदाता की ऐंठ…..।।

रावण हरदम सोचता,सीढ़ि स्वर्ग दूं तान ...।

पर ग्यानी का गिर गया ,गर्व भरा अभिमान…..।।

सदा लक्ष्य पर छोड़िये,निज भाषा का तीर ....।

तब जाकर बदले कहीं,हिंदी की तस्वीर ।।…..।।

रावण बाहर ये खड़ा ,भीतर बैठा एक.....।

किस-किस को अब मारिये, सह-सह के अतिरेक…..।।

एक शराफत आइना ,ले के बैठा यार.....।

दुनिया रही कराहती ,कहो न तुम बीमार…..।।

लक्ष्य निशाने साधिए ,शीतल वचन समीर..... ।

हिंदी का होगा भला ,बदलेगी तस्वीर…..।।

कहीं ढपली की गूंज है , कहीं नगाड़ा थाप.....।

फिरतु फगुनाय फिर रहा,कहाँ घूमते आप…..।।

हममे ये संस्कार हो ,होली हो शालीन.....।

किसी ड्राइंग रूम का ,बिगड़े ना कालीन…..।।

नोटबन्दी हुई वजह , हाथ जरा है तंग.....।

वरना हम भी डालते ,अमिट असीमित रंग…..।।

होली जैसी गालियां ,आम हुआ सब ओर.....।

कहो इसे हुड़दंग या ,कहीं चुनावी शोर…..।।

लिखो समय के भाल पर ,फागुन के सुर गीत.....।

हर व्यथा के गाल हो, ख़ुशी अबीर प्रतीत…..।।

फागुन में क्यों साँवरे ,मन आकुल हो जाय.....।

बिना कहे सब जानती ,सखी नेह लिपटाय…..।।

मन की जैसी धारणा ,वैसा ही उत्साह.....।

जलन की चिंगारी लगी ,वो घर हुआ तबाह…..।।

अपने बस में अब नहीं ,बस में करना आज.....।

बिखरा है कुनबा सभी ,टूटा हुआ समाज…..।।

बूढ़े बरगद ने पढा ,पोथी- ज्ञान किताब.....।

एक सड़क की चाह में ,तुमने किया हिसाब…..।।

कितनी करके नेकियाँ ,दिए कुए में डाल.....।

अगर बचा हो आब तो,तू ही जरा निकाल…..।।

बैरागी मन गा रहा ,विरहा व्याकुल गीत.....।

जाने अब किस हाल में,तुम हो मेरे मीत…..।।

कुछ दिन का तुमसे हुआ ,विरहा,विषम,वियोग.....।

तब जाना कहते किसे,जीवन भर का रोग…..।।

चलना दूभर है कहीं,थके हुए हैं पांव.....।

हांडी तेरी काठ की,करे अधमरा गांव…..।।

तेरा होना इत्र सा ,देता था अहसास.....।

तेरे बगैर यूँ लगे,चला गया मधुमास…..।।

जर्जर कितने हो गए ,मजबूती आधार.....।

जो तुमको धोखा लगे,वही हमारा प्यार…..।।

रावण करता कल्पना ,सोना भरे सुगन्ध ....।

पर कोई सत कर्म सा,किया न एक प्रबन्ध…..।।

कौन छुआ बुलन्द शिखर,कौन हुआ भयभीत.....।

समय-समय की बात है ,समय-समय की प्रीत…..।।

दुविधा में दिखने लगे ,दिव्य जहां प्रकाश.....।

समझो मिले उसी जगह , बाबा घासीदास…..।।

मंदिर- द्वारे छोड़ के ,भटक रहा है राम.....।

फिर थोड़े विश्वास का,अलख जगा गुमनाम…..।।

उम्मीद लगा बैठते ,गुठली के हों दाम.....।

सीख गए वे बेचना ,बात-बात में राम…..।।

नींद भरी थी आँख में ,खुली रही लंगोट.....।

कोई तपसी दे गया ,जी भर पीछे चोट…..।।

इक रावण को मारकर ,करते हो कुहराम..... ।

भीतर फिर से झांक लो , साबुत कितने राम…..।।

जनता बहती धार में ,बिखरा टूट जहाज.....

लहरें भी करती कहाँ ,कितनी देर लिहाज…..।।

आप लगा के बैठते ,अति नीरस अनुमान।.....।

फिर से लंका जीत ले ,थका हुआ हनुमान।।…..।।

संकट, विपदा,त्रासदी ,सबका एक निदान.....।

भक्तो भगवा ओढ़ के ,खूब लगाओ ध्यान…..।।

होना -जाना कुछ नहीं ,बस कर अपनी भौक.....।

जितना चरना चर लिया ,बिन बघार बिन छौंक…..।।

आशा का दीपक जला,तम में हुआ अधीर.....।

शांत रहो उजला दिखे,हिंदी की तस्वीर…..।।

बदला चरित्र आपका ,रचते-रचते स्वांग.....।

जिधर कुआ-पानी नहीं,उधर घोलते भांग…..।।

मंदिर धजा उतार के ,पहिने हैं लँगोट.....।

प्रभू नाम की जाप के ,पीछे कितने खोट…..।।

उम्मीदों के दौर में ,तुम भी पालो ख़्वाब.....।

कैशलेस हो खोपड़ी,'बाबा छाप'खिजाब…..।।

हैरान यही देखकर ,बदल न पाए लोग.....।

पाखंडी-पापी चढ़े ,छप्पन- छप्पन भोग…..।।

दीमक बन के खा रही ,दीमागी भूगोल.....।

दुनिया कल भी गोल थी ,दुनिया अब भी गोल…..।।

पंछी बैठे छाँव में,उतरा दिखे गुरूर.....।

आसमान ऊंचाइयां,कतरे पँखो दूर…..।।

थूक-थूक के चाटना, आज यही है रीत.....।

सत्ता-कुर्सी चाह की ,घुटन भरी है प्रीत…..।।

चतुरे कुछ तो लोग हैं ,संयम अपरंपार.....।

बिना नोट के खींच लें,मायावी संसार…..।।

संसद में इस बात पर, है मचा घमासान.....।

नोट नाम का काग ही, ले उड़ भागा कान…..।।

व्यभिचारी मारो वहीँ,अवगुण रहे न शेष.....।

हाथ दुशाशन से बचे,रजस्वला के केश…..।।

बेटे से पद छीनता,कितना बाप कठोर.....।

यौवन ययाति सा मिले,बात यही पुरजोर…..।।

हलके हमको ले रहे,होंगे भारी चीज.....।

समय आपका मान लें ,सीखें अदब तमीज…..।।

माया कलयुग में जहां ,दिखे नोट की छाप.....।

सार दौलत बटोर के ,हुए वियोगी आप…..।।

खंगाल रहे क्यों मिया ,नियम और कानून.....।

फतवा एक निकालिये ,सब लो भट्टी भून…..।।

फिर मेढक को तौलने ,क्यों आये हो आप.....।

टाँग आपसी खींचना, बन पंचायत खाप…..।।

ज्ञान गणित के फेल हैं ,फेल जोड़ औ भाग..... ।

राजनीति की मिर्च से ,लगती है जो आग…..।।

फूटे करम बिहार के,आग लगी कंदील.....।

किसको सूझे देखना ,पैरों कांटे कील…..।।

अपने मकसद पास वो,बाकी दुनिया फेल.....।

रखता जला मशालची ,खून पसीना तेल…..।।

सन्नाटे की गूंज है ,केवल हो अहसास ..।

बैठ लुटा के आसरा, जीवन के अवकाश ।।

मिला किसे है आजतक,सच्चा प्यार समूल.....।

अब अतीत क्या खोदना ,दब जाने दो भूल…..।।

राहत जिसे मिला नहीं ,ये वंचित से लोग ....।

छप्पन इंची खा गया ,छप्पन-छप्पन भोग .।।

मन के भीतर मच गया ,सुबह -सुबह कुहराम ....।

तन के खातिर नाम पर ,माया मिली न राम ।।….

एक अजूबा आज भी ,दिखता है सब ओर ।.

असफलता में नाचता ,झूम झूम के मोर ।।…

छोटे-छोटे दिन हुए ,बड़ी-बड़ी सी रात.....।

शीत सुबह के कोहरे ,सिहरन का आघात…..।।

सोते से अब जागिये ,होने को है देर.....।

नफरत के बारूद का ,बिछा हुआ है ढेर…..।।

खाते छप्पन भोग थे,अब खाने मुहताज.....।

ताजमहल की अप्सरा,दफन हुई मुमताज…..।।

महाकाय सी छवि बनी,दिखता कहीं न काम.....।

बातो की बस छूरियां,संकट रहता राम…..।।

राम-रसायन घोल के ,जी भर करना प्रीत.....।

मन आपा मत खोइये ,स्तिथि चाहे विपरीत…..।।

मजहब का परचम दिखा , खून लगा ये दाग.....।

तुम मशाल क्या ढूढते ,लगी हुई जब आग…..।।

संयम की मिलती नहीं,हमको कहीं जमीन.....।

लुटी-लुटी सी आस्था ,है अधमरा यकीन…..।।

माधों किस मिटटी बने ,तुम हो मेरे यार..... ।

नेता जड़े दुलत्तियाँ , समझे हो उपकार…..।।

अगहन के दिन आलसी ,कंपकपाती पूस.....।

नेता आकर जीम लो,कंबल वाली घूस…..।।

चलती चक्की देख कर ,रोया दास कबीर.....।

माया छलनी नोट भी ,कहे अपना फकीर…..।।

कोई भी अब सामने ,नहीं चुनौती शेष.....।

लंका पूरी ढह गई ,बचा नहीं लंकेश…..।।

कौन किया है बोल ना ,पानी तेरा खून.....।

मिटा-मिटा जज्बात है ,लुटा-लुटा जूनून…..।।

आत्मचिंतन सुई पकड़,ज्ञानी डाले सूत.....।

तप किस तपसी ने किया ,मल के राख भभूत…..।।

देख जुलाहा हाथ की , तिरछी-खड़ी लकीर.....।

ऊपर ने बुन क्या दिया,उलझी सी तकदीर…..।।

लोह ताप से भूलता ,अपनी खुद तासीर.....।

खुद बिरादरी से पिटे,कभी न बोले पीर…..।।

नीयत नेक किया करो ,अपने सारे काम.....।

बाबा घासीदास का ,इतना ही पैगाम…..।।

पार लगाने अब कहाँ ,आए घासीदास.....।

मन का वही जगा अलख ,जग में भर विश्वास…..।।

हाथो में चिनगारियां ,फुलझड़ियों के नाम.....।

बारूदी बस्ती हुई ,सरहद है बदनाम…..।।

संभव सा दिखता नहीं,हो जाना आसान.....।

शुद्र-पशु,ढोंगी-ढोर में ,व्यापक बटना ज्ञान…..।।

जनमानस की मैं कहूँ ,कोई कहे न और.....।

मुझको चिता खा रही ,मुंह छिने तू कौर…..।।

सक्षम वही ये लोग हैं,क्षमा मांगते भूल.....।

शंका हमको खा रही ,बिसरा सके न मूल…..।।

साल नया है आ रहा,हो न विषम विकराल.....।

संयम उर्वर खेत में, बीज-व्यथा मत डाल…..।।

की थी हमने नेकियां,नोट कुएं में डाल.....।

उस नेकी की फाइलें ,पुलिस रही खंगाल…..।।

सदमे में है आदमी ,सहमे-सहमे लोग.....।

कोई भूखा है कहीं ,हाथों छप्पन भोग…..।।

अच्छे-अच्छे दिन गए ,संग चने के भाड़.....।

बिन बरसे तुम भी चलो ,सावन और अषाढ़…..।।

हम विकास क्या देखते ,असफल रहे उपाय.....।

झाँक सके वो आकड़े,पब्लिक दिया बताय…..।।

मंजिल तेरी पास है ,ताके क्यूँ है दूर.....।

चुपड़ी की चाहत अगर , ज्ञान जला तंदूर…..।।

जिससे भी जैसे बने ,ले झोली भर ज्ञान.....।

चार दिवस सब पाहुने ,सुख के चार पुराण…..।।

तीरथ करके लौट आ,देख ले चार धाम.....।

मन भीतर क्या झांकता ,उधर मचा कुहराम…..।।

मिल जाये जो राह में, साधू -संत -फकीर.....।

चरण धूलि माथे लगा ,चन्दन-ज्ञान-अबीर…..।।

आस्था के अंगद अड़े ,बातों में दे जोर.....।

तब -तब हिले पांव-नियम ,नीव जहाँ कमजोर…..।।

कारावास मिला उसे,कर देगा उद्धार.....।

जली-कटी सी रोटियां,होगी फाइव-स्टार…..।।

कब-कब,किस-किस नाम से,होता रहे बवाल.....।

एक निशानी प्यार की ,रखो जरा सम्हाल…..।।

चल विकास की बात कर, तुझको रोके कौन.....।

नहीं खोलते मुँह कभी ,रहते हरदम मौन…..।।

खाने को मुहताज वे ,परसे छप्पन भोग.....।

शंका उनको खा रही ,थे जो भूखे लोग…..।।

शासक ही बहरा हुआ,बेमतलब उल्लेख.....।

सोया है प्रहरी जहां,दुर्घटनाएं देख…..|।

दंगल दिखा कमा गए ,भारी भरकम नोट.....।

प्रभु हमारे दिमाग वो ,फिट कर दो लँगोट…..।।

हमको कौन हिला गया ,चुप बैठे थे मौन ।.....

मन बबूल से छिल गया,अर्थहीन सागौन ।।

पुरखो की आशीष में,सुख के खुलते द्वार .....।

कल तर्पण याचक अभी ,डाल सही संस्कार ।।…

अवसर तुमको है मिला ,पितर करो सम्मान ।.

दुविधाओं के द्वंद से ,निकलो भी यजमान ।।

जिनकी संगति में पले , वैतरणी के पास ।

फुर्सत का तर्पण मिले, यही अधूरी आस।।…

फूटे करम बिहार के,साथ नहीं कंदील.....।

जो अन्धेरा देख ले ,पैरों कांटे कील…..।।

दुनिया तो समझी नहीं,नहीं समझते आप.....।

मुझे अगर है जानना ,मेरे कद को नाप…..।।

मन इतना उजला नहीं ,जितनी रही कमीज.....।

देख समझ के बोलना ,सीखो कहीं तमीज…..।।

इत्र-फरोश बने सभी , आदम बदबूदार.....।

नेताओं के रूप में ,निभा रहे किरदार…..।।

बाग़ हरे अब हों भले ,मन मुरझाया फूल ।

वादा टहनी टूटती ,काँटों सहित बबूल।।

अंगद के जैसा जमे,उखड़े ना ये पाँव.....।

सौ बार लुटे गजनवी ,उजड़े ना ये गाँव…..।।

बच्चा तडफा भूख से ,मातायें बेहाल.....।

साफ सियासत की नहीं,घटिया होवे चाल…..।।

कांटो का मौसम कहीं,आज हुआ अनुकूल.....।

हाथ बचा के तोड़ ले,देख गुलाबी फूल…..।।

नाहक रोना-पीटना,नासमझी फरियाद.....।

तेरे पीछे घूम कर ,हुआ समय बर्बाद…..।।

संयम की हर धारणा ,हो जाती निर्मूल.....।

कांटा ही उपजे वहां ,बोया जहाँ बबूल…..।।

माथे किसने लिख दिया ,स्याही अमिट कलंक.....।

राजा कभी न बन सका ,मन से रहता रंक…..।।

जागी उसकी अस्मिता,उठा आदमी आम.....।

कीमत-उछले दौर में ,बढ़ा हुआ है दाम…..।।

सब बत्तीसी झड़ गई ,अकड़ गई है भाग.....।

खुले बदन इस पूस में,कैसे आवे आग…..।।

नोट बन्दी नियम तहत,लाया चार हजार.....।

दो दारु की भेट चढ़ा,गया दो जुआ हार…..।।

हैं खूनी छीटे पड़े ,पत्थर महज जनाब.....।

रहे सलामत देख लो,कुर्सी सहित खिताब…..।।

सत्तर बीते साल तब ,आया हमको होश..... ।

कैसे मूक बधिर रहे ,बैठे थे खामोश…..।।

खोया क्या हमने यहाँ ,पाया सब भरपूर.....।

जाने क्यों तब भी कहे ,दिल्ली है अति दूर…..।।

अपनी दूकान खोल के,कर दे सबकी बन्द.....।

राजनीति के पैंतरे ,स्वाद भरे मकरन्द…..।।

किसकी नीयत कब कहें ,आना है भूचाल.....।

लोभी- लंपट दुष्ट को ,कलयुग स्वर्णिम काल…..।।

हम भी नहा-निचोड़ के ,बैठे हुए शरीर.....।

दिमाग लेकिन देखता , अधनंगी तस्वीर…..।।

एक शराफत आइना , समझ दिखा यार.....।

चल- फिर सके मरीज या,बेसुध-बीमार…..।।

कॉलर नही कमीज में,पेंट नही जेब.....।

नँगा होने तक रचो,नया नित फरेब…..।।

तुलसी घिस चन्दन तिलक,निर्णय रघुबीर.....।

राम -राज दिन वो फिरें ,बिना नोक तीर…..।।

जिस भाषा जो बोलता ,करो तुम दहाड़.....।

हिम्मत से अब काम लो ,ताकते जुगाड़…..।।

निर्णय को अब बाँट दो,जहाँ दिखे अतिरेक.....।

बीच अधीर धीरज तुम ,चुनना कोई एक…..।।

मंदिर बनना राम का ,आये याद चुनाव.....।

बस तत्परता से भरें ,हर माहौल तनाव…..।।

डर से कोई छुप गया ,लेकर हाथ गुलाल.....।

मैं भी सम्मुख क्यों रखूं ,निर्मोही के गाल…..।।

पता नहीं ये रास्ता ,किधर -किधर को जाय.....।

कोई कहे विकास पथ ,संसद कभी पठाय…..।।

चाँद सतह पर हो गया ,बूढा मातादीन.....।

बोतल दारु सब खतम,हाथो भी नमकीन…..।।

बरय दिवाली के दिया,नइये कछु अंजोर.....।

करिया-करिया कस दिखे,टिकली-विकली तोर…..।।

सुलगे-रमचे गोरसी,ओधा करे कपाट.....।

बेचे माल बनारसी ,बिना तराजू बाट…..।।

विपदा कभी छुई नहीं,घिरे कभी न क्लेश.....।

दूर हुए यशवंत तुम ,यादें हैं अब शेष…..।।

जब हो जाए रोकना ,मुश्किल से आवेग.....।

साधू -सन्तों का हुआ ,विचलित मन उद्वेग…..।।

पाये प्रभु हम आपसे ,कितने भी दुत्कार.....।

हम आखिर में जानते,होना है उपकार…..।।

लेकर मन की आस्था ,चढ़ा रहे हैं फूल.....।

सदा यहीं माथा लगे ,मिटटी-चन्दन धूल…..।।

मन के भीतर बोलता ,साधु !साधु सा बोल.....।

पर बाहर आ पीटता ,अहंकार के ढोल…..।।

बिना फसल डारन कती ,खातु करम के खाद.....।

पांच बछर धर घुमत हन,आवेदन फरियाद…..।।

कहीं तकाजे उम्र के ,कुछ नादानी भूल.....।

मेरे अपने तोड़ते ,मेरे बने उसूल…..।।

गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार.....।

कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार…..।।

जिसे चला तू काटने ,वे तेरे ही लोग.....।

करा इलाज हकीम से,बरसो का ये रोग…..।।

प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन.....।

मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन…..।।

मकसद कब पूरा हुआ ,रहे अधूरे काम.....।

सुख की मिलती छाँव तो,लेता मन विश्राम…..।।

फिरे कैदियों दिन यहां,गया रामअवतार.....।

बाहर करना रह गया ,भीतर का उपचार…..।।

खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले जमीन।

हर करतूत मियाद पर,पाती सजा यकीन ।।

जाने कैसे लोग ये ,होते रहे शिकार।.

बौने से कद में दिखा ,प्रभु जैसा अवतार।।

सौदा-सच्चा मत कहो ,घाटे का व्यापार.....।

बाबाओं के फेर में ,अस्मत लुटे बजार…..।।

आतंक तहों झांकिए,बाबा छाप त्रिशूल।

भगआ-खाकी आड़ ले,सुविधा में मशगूल।।

मेरा बस चलता नहीं,इनकम करता खोज.....।

दावत इनको दें तभी ,जब हो मृत्यु भोज…..।।

जन-सेवा की बात पर,बना बैठा सरताज।

वैभव सारा रह गया ,गिरी काल की गाज।।

सावधान रहिये सदा ,जब हों साधन हीन.....।

कानून-नियम नीच का,रखना कठिन विधान।।…..।।

सुलग रही है बस्तियां,शहर मचा कुहराम।.

छूरी वाले हाथ हैं ,बगल दबे हैं राम…..।।

अफवाहों के पैर में ,चुभी हुई जो कील.....।

व्याकुल वही निकालने ,बैठ गया सुशील…..।।

अफवाहें मत यूँ उड़े ,मन हो लहू-लुहान.....।

मंदिर सूना भजन बिन,मस्जिद बिना अजान…..।।

मेरे घर में छा गया, मेरा ही आतंक.....।

राजा से कब हो गया ,धीरे-धीरे रंक…..।।

हाथ लगी जब चाबियां ,निकले नीयत खोर.....।

बन के भेदी जा घुसे ,लंका चारों ओर…..।।

समय यही माकूल है ,रह लो उस पासंग.....।

सोच समझ के तौलता ,भाई है बजरंग…..।।

रहते हाँ सोए सभी,जनमत हरदम लोग.....।

कौन जगाने आ सका,पाँच साल का रोग…..।।

जिस पर तुझे गुमान था,है बीमार हकीम.....।

जड़ी बूटियाँ या दवा ,समझे कौन सलीम…..।।

भूली बिसरी याद कुछ,कोई छेड़ प्रसंग.....।

भटका लोक जहान से,माया-मदिरा संग…..।।

मेरे भीतर मर गया ,पढा-लिखा इंसान ।.

उस दिन से नेता सभी ,बाँट रहे हैं ज्ञान ।।…..।।

सहमा सोया आदमी,बहुत सहा अपमान ।.

लेकिन फिर भी कह रहा,भारत यही महान ।।

पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम ।

आज उसी की कोठियां,भरे-भरे गोदाम ।।

ऐनक टूटा आँख का,कब सुन पाया कान ।

तेरा बन्दर बाप जी ,है चतुर बदजुबान ।।

सुलगाते ही सोचते ,धूप- अगर-लोभान.....।

मंदिर बज ले घण्टियाँ ,मस्जिद होय अजान…..।।

निकला जगत खरीदने,कौड़ी हाथ छदाम.....।

इस माया संसार का,किसके पास लगाम…..।।

लिख-लिख के पाता गया,ढेरों ढेर खिताब.....।

फुरसत में बुनता रहा ,एक जुलाहा ख़्वाब…..।।

हिंसा औ प्रतिशोध का,व्यापक सह व्यापार.....।

जिसके पास लगाम है ,करता अत्याचार…..।।

काँटा राह चुभे नहीं,कारज कठिन दुश्वार.....।

तेरा अडिग सुहाग हो ,अमर रहे बस प्यार…..।।

पुरखों के तारक बने,प्रेम सजग व्यवहार.....।

इस जीवन में आपको,मिले खुशी भंडार…..।।

अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध.....।

नफरत के माहौल में ,ढूंढो प्रेम सुगंध…..।।

जलते जलते बच गया ,आहत अमन सुहाग.....।

मन की बस्ती में लगी ,नफरत की फिर आग…..।।

प्रजातन्त्र की रीढ़ को ,मिले कहाँ आराम ....।

विधायक जहाँ हो रहे ,सरे आम नीलाम…..।।

एक नुमाइश वोट की,जीती बाजी हार.....।

बदला मन में चोट का ,रखना सदा उधार…..।।

वोट दिखाकर आदमी,हो जाता मशहूर.....।

भरोसा मगर आपसी ,होता चकनाचूर…..।।

लूटा जैसे गजनवी ,गया खजाना हाथ.....।

पीट-पीट के रह गए ,अपने-अपने माथ…..।।

सब का मालिक एक है,क्या गुजरात बिहार ।

चारो-खाने चित हुई ,जनता की सरकार ।।

देख समझ के बोलिये ,नाविक-खेवनहार।

पास हमारे वोट हैं,करते तुम तकरार।।

मन में अदभुत शांति का ,आवे कभी विचार ।

दौरा कर गुजरात का ,विधायक ले उधार ।।

किस किस को अब है यहाँ,मुश्किल वाला दौर.....।

कल की बातें और थी ,अब की है कुछ और…..।।

सीढि स्वर्ग पहुचा सके ,किया रावण विचार.....।

आड़ मगर आता गया ,खुद का ही व्यभिचार…..।।

मन ने मन से बात की ,खुला रहा इतिहास.....।

कुछ गौरव की बात थी ,दिया किसी ने त्रास…..।।

कौन -कौन आ बैठते,माया रूप जहाज.....।

ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज…..।।

बैठी हूँ मैं छोड़ के,सभी नियम-संकोच.....।

जिस दिन से दरिंदा मुझे ,राहों लिया दबोच…..।।

हम बच्चो को दे रहे ,कैसी ये तालीम.....।

मौजूदा माहौल से, नफरत करे सलीम…..।।

गिनती की हैं रोटियां,मतलब के रखवाल.....।

जनता अपने खून में,पाती नहीं उबाल…..।।

आओ मिल कर बाँट लें ,वहमों का भूगोल.....।

अगर कसैला स्वाद है ,चीनी ज्यादा घोल…..।।

संकट, विपदा,त्रासदी ,सबकी एक ही जात.....।

जब ये आवें साथ में ,जगत हुआ बौरात…..।।

अपने मकसद डालता,देख परख के घास.....।

जो कल उनके आम थे ,आज वही है ख़ास…..।।

इक रावण बाहर खड़ा ,भीतर बैठा एक.....।

किस किस को तुम मारते ,सह-सह के अतिरेक…..।।

किसकी है सरकार जी , कौन लूटता देश.....।

कल की आहात द्रोपदी ,बाँध चुकी है केश…..।।

ओढ़ पहन के बैठिये,नैतिकता की खाल.....।

जनता केवल है खड़ी,चौराहे बे-हाल…..।।

आओ चल कर ढूढ ले ,गुमा हुआ संस्कार.....।

तेरे -आगे मैं झुकूं ,मेरे पालनहार…..।।

भाई -चारा छीनता,चारे की सब देन.....।

मर्यादा की खींच दी ,जनता ने फिर लेन…..।।

रहने हो हर बात को ,सदा आपसी-बीच.....।

पाप घड़ा जिस दिन भरे,दोनों हाथ उलीच…..।।

पानी-पानी सब तरफ ,चित्र खींच लो आप.....।

विपदा के माहौल में ,चारो ओर विलाप…..।।

महुआ खिला पड़ौस में,मादक हुआ पलाश.....।

लेकर मन पछता रहा ,यौवन में सन्यास…..।।

संकट में हो निकटता, दुःख में रखना नेह.....।

ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह…..।।

काशी मथुरा घूम के ,घूम देहरादून.....।

देख बिहार यही लगे ,अदभुत है कानून…..।।

होना -जाना कुछ नहीं ,बस कर अपनी भौक...।

मन माफिक तो चर लिया ,बिन बघार बिन छौंक…..।।

किस माथे टीका लगा,किसको लगा कलंक.....।

कौन बना राजा उधर ,कौन यहां पे रंक…..।।

चुनती है जनता जिसे,देकर भारी वोट.....।

हैरत देके खैरियत,पूछे कभी न चोट…..।।

रहने दो हर बात को ,निजी आपसी तौर.....।

कुछ खाने के दांत हैं ,दिखलाने के और…..।।

जिसको चाहत से चुना,देकर भारी वोट.....।

उस जनता की खैरियत,पूछे कभी न चोट…..।।

छाँव पलक मैं पालती,रखती तुझे सहेज.....।

भाई निर्मल नेह को, धूप न लगती तेज…..।।

ले चुनाव-रथ घूमते ,देने को सौगात.....।

निकले कैसे बाढ़ में ,थमने दो बरसात…..।।

सोने की हो बालियां , चाह न मोती हार.....।

साजन तेरा बाह ही ,जीवन का उपहार…..।।

बंधन समझ न राखिया ,बहन रही जो भेज.....।

पाकर भाई धन्य हूँ ,उत्तम दान-दहेज…..।।

इस कमरे में बन्द है ,बरसो का इतिहास.....।

आकर तुम भी खोल लो ,मजहब बातें ख़ास…..।।

अंतस डाका डालकर ,चलता दिखा बसंत.....।

यादों के पत्ते झरे ,जिसका आदि न अंत…..।।

भीतर मन की राख में ,ढूंढ जरा सी आग.....।

सारी दुनिया गा रही ,तू भी गा ले फाग…..।।

ढपली गूंज कहीं- कहीं, कहीं नगाड़ा थाप.....।

फगुनाय फिरतु फिर रहा ,कहाँ घुमाते आप…..।।

भूख गरीबी झेलती . जनता है बेहाल.....।

अपना सिक्का ढालने,बिठा रही टकसाल…..।।

उपलब्धी के नाम जब ,हो जाए अभिमान.....।

दूर इलाके जा कहीं,चिंतन तम्बू तान…..।।

इतने सीधे लोग भी ,बनते हैं लाचार.....।

कुंठा मजहब पालते ,कुत्सित रखें विचार…..।।

दिन में गिनते तारे हम ,आँखों कटती रात.....।

लक्षण जवानी के नहीं ,सठियाने की बात…..।।

सरहद रखवाली लगे ,अपने वीर जवान.....।

उनके हक में त्याग दें ,खर्चीले अरमान…..।।

जिस दिन से बन्दी हुआ,साधू लिपटा भेष.....।

इस धरती पर ज्ञात है,अवगुण रहे न शेष…..।।

आखिर में बन्दी हुआ ,साधू लिपटा भेष.....।

अत्याचारी ज्ञात हो ,अवगुण रहे न शेष…..।।

पत्थर दिल पिघले कभी ,कर लेना संवाद.....।

बन्द नहीं होता कहीं ,साँसों का अनुवाद…..।।

संग तुम्हारा छोड़ के,कहीं न जाती नाथ.....।

गठबन्धन निभती रहे ,राजनीति के साथ…..।।

भरसक अपना है अभी,इतना महज प्रयास.....।

रूठी जनता से मिले ,वोट हमी को ख़ास…..।।

कल थे वे जो रूबरू ,जन सेवक बन बीच.....।

आज अपनी नीयत से,बन बैठे हैं नीच…..।।

रेखा कभी कहाँ खिंची,परंपरा के खेल.....।

हरदम जला मशालची,देखत तेली तेल…..।।

मुन्नी बनकर आज जो ,गली-गली बदनाम.....।

टूटा पत्ता डाल का ,कल आवे किस काम…..।।

चलता रहा चुनाव में,भेट-व्यवहार दाम.....।

आज अचानक रोक के,खीचन लगे लगाम…..।।

आज आदरणीय परम,रूठ गए हैं आप.....।

लायक सपूत से कभी ,रूठा करता बाप बाप…..।।

आहत मन से देखते ,कुछ अनबन कुछ मेल.....।

सायकल की मान घटी ,पटरी उत्तरी रेल…..।।

बेटा करता बाप से ,इतनी फकत गुहार.....।

दिलवा दो अब सायकिल ,पंचर दियो सुधार…..।।

लिखने वाले लिख रहे ,तरह तरह आलेख.....।

सबके अपने मन-गणित,अलग-अलग उल्लेख…..।।

विकसित होते राज में,है विकास की गूंज.....।

एक दूजे टांग पकड़,तंदूरी में भूंज…..।।

कितनी है संभावना ,फैला देखो पाँव.....।

सीमित होती आय की,चादर जिधर बिछाव…..।।

हरि को भज या,हाथ मल ,हो आ चारो धाम.....।

बिना नोट के साल भर ,घोडा बिना लगाम…..।।

पन्ने बिखरे अतीत के ,सिमटा देखा नाम.....।

बैठी रहती तू सहज ,पलक काठ गोदाम…..।।

हमको तुमसा आदमी,मिलता कभी-कभार.....।

बिना जान पहिचान के ,देता नोट उधार…..।।

शक्कर मिले न नोट बिन,जानो गुड़ का स्वाद.....|

बिना हवन बटने लगा , सरकारी परसाद…..।।

जिसको हम समझा किये ,मन के बहुत करीब.....।

आखिर मे बन वो गया ,आडे प्यार रकीब…..।।

मन भौरा मंडरा रहा ,तुझे समझ के फूल.....।

यही अक्ल की खामियां ,बचपन मानो भूल…..।।

मन भी कुछ बौरा गया ,देख आम मे बौर..... ।

बिन तुझसे मिल भेंट के ,हलक न उतरे कौर…..।।

नोट-शहद क्या चांटना,चिल्हर गुड़ का स्वाद.....।

बैंकों से बटने लगा, सरकारी परसाद…..।।

कर्तव्य न जाने तनिक ,जो मागे अधिकार.....।

रुइया कानो डाल के, बैठी है सरकार…..।।

हरि को भज या हाथ मल ,हो आ चारो धाम.....।

बिना नोट के साल भर ,घोडा बिना लगाम…..।।

बन मे सूखी लकडियाँ ,घर मे सुलगे देह.....।

धुंआ- धुआ होता रहे ,मन उपजा संदेह…..।।

मौन जुलाहा कह गया ,ले धागा औ सूत.....।

ताने से तन ढांक ले ,बाने से मन भूत…..।।

साई कभी करो जतन ,दे दो राख भभूत.....।

पीढी को जो तार दे ,अकेला हो सपूत…..।।

लकड़ी मे जस घुन लगे ,लोहे मे तस जंग.....।

यश -अपयश सब साथ है ,भले-बुरे के संग…..।।

तू भी बन के देख ले ,पंडित ,पीर फकीर.....।

राम -रहीम दुआर मे ,कौन गरीब -अमीर…..।।

नफरत के इस कुम्भ मे ,खोज प्रेम लेवाल.....।

जिसके भीतर 'मै' घुसा ,उतरे तो वह खाल…..।।

गली-गली मे जीत का ,सिक्का तभी उछाल.....।

हो खजांची बाप अगर ,घर मे हो टकसाल…..।।

मत माथा अब पीट तू,कर मत तनिक मलाल.....।

उपर वाला देख रहा,छप्पर है किस हाल…..।।

अंग-अंग है टूटता,छलनी हुआ शरीर.....।

कब छोड़ोग बोलना,अपना है कश्मीर…..।।

जिस झंडे की साख हो,अहम सितारा-चाँद.....।

आखिर वही झुका-झुका ,शरीफजादा मांद…..।।

परिचय अपना जान लो ,पाकिस्तानी लोग.....।

बीमारी उपचार भी ,जान-लेवा हम रोग…..।।

सठियाये हो पाक जी ,बोलो करें इलाज.....।

आतंक की गोद उतर ,चल घुटने बल आज…..।।

बेहद सुशील बोलता ,सीमा-सरहद छोड़.....।

मन भीतर कइ घाटियाँ ,जगह-जगह हैं मोड़…..।।

सत्तर बरस ओढ़-पहिन ,चिथरागे जी कोट.....।

प्रभू नाम तो जापते ,मन में कतको खोट…..।।

साल-नवा, उतरे मुडी, बइठे हवस सियान.....।

कांदी-बदरा तै लुअस,बइहा ले गे धान…..।।

खेत ज्ञान रोपा लगा ,लूबे अब्बड़ धान.....।

राचर ब्यारा ज्ञान के ,लगाय रखव मितान…..।।

तोर भरोसा जागही ,हमर देश के शान.....।

खोच बीड़ी अधजरहा,किंजरय मगन किसान…..।।

समझ हमे चट्टान सा ,नजर लिए हो फेर.....।

प्रेम बरसाय देख लो ,हम माटी के ढेर…..।।

मौन पीठ में लादकर ,चलता है ये कौन.....।

जंगल सारा जल गया,बचा-खुचा सागौन…..।।

लौटेगा कब मालया ,गर्म रखो तन्दूर.....।

मारो डंडे पाँव में , उतरे सभी गुरूर…..।।

मेरे माथे जड गया ,मुझसे जुडा सवाल.....।

Sले हाथों में उस्तरा ,बजा गया वो गाल…..।।


टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

-----****-----

-----****-----

---***---

-----****-----

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधाएँ ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|नई रचनाएँ_$type=complex$count=8$page=1$va=0$au=0

|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=blogging$count=8$src=random$page=1$va=0$au=0

|हास्य-व्यंग्य_$type=complex$count=8$src=random$page=1$va=1$au=0

|कथा-कहानी_$type=blogging$count=8$page=1$va=1$au=0$com=0$src=random

|लघुकथा_$type=complex$count=8$page=1$va=1$au=0$com=0$src=random

|संस्मरण_$type=blogging$au=0$count=7$page=1$va=1$com=0$s=200$src=random

|लोककथा_$type=blogging$au=0$count=5$page=1$com=0$va=1$src=random

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3821,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,335,ईबुक,191,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2761,कहानी,2094,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,485,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,329,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,49,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,8,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,16,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,234,लघुकथा,816,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,306,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1904,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,642,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,684,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,54,साहित्यिक गतिविधियाँ,183,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,66,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: दोहे सुशील यादव के.......
दोहे सुशील यादव के.......
http://lh3.googleusercontent.com/--XURgqrWGDU/VXk-rIq5iII/AAAAAAAAjnc/pyEoOoBBLNk/image%25255B2%25255D.png?imgmax=200
http://lh3.googleusercontent.com/--XURgqrWGDU/VXk-rIq5iII/AAAAAAAAjnc/pyEoOoBBLNk/s72-c/image%25255B2%25255D.png?imgmax=200
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2017/12/blog-post_78.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2017/12/blog-post_78.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ