गुम हुए कागज़ की कश्ती, उड़ गये बंद मुट्ठी से चांद-सितारे

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सोनम सिकरवार की कलाकृति

बचपन- यह शब्द जबान पर आते ही आँखों के आगे मासूमियत और चंचलता की छवि उभर आती है . बचपन एक ऐसी अवस्था है जिसे कोई भी अपने जीवन से दूर नहीं करना चाहता है और अगर दूर हो  चूका है तो दुबारा पाने की ललक हर पल बनी ही रहती है. इस बचपन के साथ हर वर्ग जीने की इच्छा रखता ही है क्योंकि यह बचपन ही है जो हर तरह की परेशानियों से दूर ले जाकर एक खूबसूरत-सी जिन्दगी को महसूस कराती है.

लेकिन आज इक्कीसवीं सदी में हम बच्चों की ही मासूमियत को खोते हुए देख रहे हैं. बचपन की चंचलता कहीं किसी कोने में दुबक कर बैठ गई है. आज के बच्चों में वो निश्चल हंसी, उनकी वो बेबुनियादी मस्ती, अपने हमउम्र के साथ लुका छिपी का खेल और बिना बात की जिद यह सब कहीं गुम सी हो गई है. अब तो दीखता है सिर्फ उनके हाथ में रिमोर्ट कंट्रोल और भावी प्रतियोगिता. इन दो वजहों  ने बच्चों से उनका बचपना पूरी तरह छीन लिया है . टीवी की चकाचौंध जिन्दगी से अब बच्चे भी अछूते नहीं रहे, यह चकाचौंध अपने आगोश में धीरे-धीरे बच्चों के बचपने को निगलती ही जा रही है. जगजीत सिंह की यह गज़ल खोते हुए बचपने पर बिलकुल सटीक बैठती है–

दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो

भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी

मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन

वह कागज़ की कश्ती, वह बारिश का पानी.

गज़ल की इन लाइनों में बचपन की कीमत को बयां किया है लेकिन अब यह कीमत गजलों और गीतों में ही सुनने को मिलते हैं. असल जिन्दगी में कहाँ रहा ऐसा बचपन. इक्कीसवीं सदी के बच्चों को तो कागज़ की कश्ती का मतलब भी शायद ही पता होगा.

आज के बाजारवाद ने खुद के प्रचार प्रसार के लिए बच्चों को भी नहीं बख्शा. शुरुआत हुई इनके छोटे-छोटे विज्ञापनों से और धीरे-धीरे इतना पैर फैला लिया कि अब दिन रात बच्चों के रियलिटी शोज और टीवी सीरियल्स की भरमार है. जितने ज्यादा आधुनिक विकास की बात हो रही है, उतनी ही तादाद में बच्चों का बचपना तेज़ी से पिसता जा रहा है.

अपने बचपने से दूर छोटी-छोटी उम्र के बच्चे अपनी पर्फोमेंस बेस्ट देने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं और समय से पहले ही खुद को बड़ा साबित कर देते हैं. इन सब में वह अपने बचपन का अनमोल समय गवां देते हैं. टीवी वाले अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए कुछ भी करते हैं, सबसे सहज उपाय टीआरपी बढ़ाने का बच्चों से काम कराना है क्योंकि बच्चों की मासूमियत दर्शकों को खूब लुभाती है और छोटे-छोटे बच्चों से बड़े-बड़े संवाद बुलवा लेना, यह भी दर्शकों को खूब भाता है. दर्शक कभी भी इसके पीछे के सच को जानने की कोशिश भी नहीं करते हैं. आजकल टीवी पर बच्चों के ड्रामा प्रोग्राम, बच्चों के डांस प्रोग्राम और बच्चों के ही गाने का प्रोग्राम काफी लोकप्रियता बटोर रही है. साथ ही साथ अब बच्चों को ही केंद्र में रख बच्चों के ही एक्टिंग द्वारा बड़े-बड़े सौ-सौ एपिसोड वाले सीरियल्स बनने लगे हैं. जिन कारणों से प्रत्येक बच्चों पर काम का पूरा दबाव रहता है और जिस वजह से वह बच्चा अपनी पढाई तक भी ठीक से नहीं कर पाता है. बस यह सभी एक प्रतियोगिता का हिस्सा बन कर रह जाते हैं. प्रत्येक बच्चे को उसकी मासूमियत की वजह से टीवी पर ब्रेक मिलता है, इसी मासूमियत को टीवी वाले बेचते हैं. जैसे ही यह मासूमियत खत्म, बाजारवाद में बच्चे की अहमियत खत्म.

बच्चे तो बिना सोच समझ के एक लुभावने की वजह से इस फील्ड की ओर आकर्षित होते हैं लेकिन इनके माता-पिता सब कुछ जानते समझते हुए अपने बच्चों को इस ओर भेजते हैं. आज के माता पिता के पास एक तो अपने बच्चों के लिए समय ही नहीं होता और ना ही वह समय निकालने की कोशिश भी करते हैं. आधुनिक माता पिता अपने बच्चों को हमेशा सबसे आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं चाहे वह किसी भी भीड़ का शिकार क्यों ना बन जाये . किसी अभिभावक का बच्चा सुंदर है और उसमें कोई भी प्रतिभा है तो माता-पिता तुरंत उसे कमर्शियल बनाने में लग जाते हैं. वह यह भी नहीं सोचते कि जिस उम्र में बच्चा खेलता-कूदता, हंसता, शरारत करता है उस उम्र में उसे अपने आप को साबित करने के लिए मेहनत करने के गुण सिखाये जाते हैं. बच्चों के बचपने को दांव पर लगाने में जितना हाथ बाजारवाद का है उतना ही बच्चों के माता-पिता का भी है.

कहने और सुनने में हर बार यही आता है कि गरीब तबके के मजदूर लोग ही अपने बच्चों से मजदूरी कराते है क्योंकि गरीब बच्चों के माता पिता उनके लिए दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पाते हैं. तभी गरीब तबके का हर दूसरा बच्चा ईंट पत्थर उठाता हुआ या कूड़ा बीनता हुआ या फिर किसी होटल में बर्तन साफ करता, झाड़ू लगाता हुआ नज़र आ ही जाता है. अगर ऐसा है तो फिर क्यों हाईफाई घरों में रहने वाले माता पिता अपने बच्चों से टीवी सीरियल और रियलिटी शो में काम करवाते हैं? या यूं कहें कि यह इनका शौक है या फिर बच्चों से पाने वाले पैसों का लालच.

12 जून को बाल श्रम विरोधी अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है. बाल मजदूरी कानून के तहत 18 साल से कम आयु के बच्चों को काम करने की अनुमति नहीं दी जाएगी. “1999 में विश्व श्रम संगठन (आईएलओ) के सदस्यों ने एक संधि कर शपथ ली की 18 से कम उम्र के बच्चों को मजदूर नहीं बनने दिया जायेगा.” किन्तु आज भी  भारत में लाखों लगभग बाल मजदूर हैं. बाल मजदूरी पर कानून और नीतियाँ दोनों है परन्तु इसपर ध्यान कौन देता है? यह कानून और नीतियाँ सिर्फ वादें और बातें करने के लिए ही है ..... बचपन बचाने के लिए नहीं .....

कुछ बच्चे मजबूरी में, तो कुछ दबाव में काम करते है. बाल श्रम विरोधी अंतरराष्ट्रीय दिवस केवल कहने भर का ही है, बच्चों का बचपन तो बस खत्म हुआ या यह कहे उनका बचपना देखने और महसूस करना एक सपना ही बन गया.

निदा फ़ाज़ली ने बिलकुल सही फरमाया है –

“बचपन के नन्हे हाथों को

तुम चाँद सितारे छूने दो,

दो चार किताबें पढ़कर

यह भी हम जैसे हो जायेंगे”

बेहतर हो इसे असल जिन्दगी में अपनाया जाये, तभी शायद बच्चों का बचपना फिर लौट आये. बच्चे फिर से जिन्दगी को मुट्ठी में बंद कर उसे ही अपनी दुनिया समझ अपने अनमोल बचपन को जी पाए.

सुमन कुमारी

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