व्यंग्य // साइकल के दिन फिरे // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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(ऊपर का चित्र - AFP news agency Former California governor Arnold Schwarzenegger arrived for a meeting with Paris Mayor Anne Hidalgo on a Vélib city bike. The two were set to unveil a study regarding the number of lives saved by city and regional air quality policies)

दिन हमेशा एक से नहीं रहते। चाहे जितने बुरे दिन क्यों न हों, कभी न कभी अच्छे दिन आते ही हैं। हमारे प्रधानमंत्री ने अच्छे दिनों का वादा किया था। पता नहीं हमारे अच्छे दिन आ पाए या नहीं, साइकल के दिन तो फिर ही गए हैं। इसमें मोदी जी का हाथ बेशक रहा ही होगा। दिल्ली में प्रदूषण से कारगर मुकाबला करने के लिए वित्तीय वर्ष से पहले ही दिल्लीवासी साइकल चलाने लगेंगे। बेचारे साइकल चलाना ही भूल गए थे। बहुतों को फिर से सीखना पड़ेगी। जिन्होंने कभी नहीं चलाई, अब साइकल चलाना सीख जाएंगे। बच नहीं सकते। साइकल चलाना अब बहुत ज़रूरी हो जाएगा। कारें बेकार हो जाएंगी। कहा था एक दिन ऑड एक दिन ईवन नंबर की गाड़ियां चलें। नहीं माने भाईलोग। बड़ा ऑड लगा उन्हें यह सुझाव। लो अब भुगतो। साइकल चलाओ। रूट, किराया और जगहें तय कर दी गईं हैं। बिसात बिछ गई है। साइकल चलाओ।

एक ज़माना था साइकल बड़ा सम्मानजनक वाहन था। लोग कोसों साइकल से सफ़र कर लेते थे। थकते नहीं थे। सेहत अलग ठीक रहती थी। लेकिन जब से स्कूटर आए, ‘बाइक’ आई, कारों के नए नए इफरात से मॉडल आए, साइकल का ज़बरदस्त अपमान होने लगा। धीमी चलती है, खुद अपने पैरों से चलाने पड़ती है। चलाने में आदमी थक जाता है। बहाने दर बहाने। लोगों ने साइकल चलाना छोड़ दी। किसे पता था पैट्रोल से चलने वाले इन वाहनों से दिल्ली ऐसी प्रदूषित हो जाएगी की बुद्धू को लौट कर घर आना पडेगा और अपनी पुरानी साइकल की आदत को फिर से दुरुस्त कराना पडेगा। लो अब भुगतो।

मैं तो कहता हूँ साइकल जितनी, क्या कहते हैं आजकल उसे,‘सेक्सी’ गाड़ी है और कोई हो नहीं सकती। नाज़ुक-नरमा, दुबली पतली, सुकुमार। तन्वंगी। जीरो फिगर। और फिर भी क्या जीवट है। है और कोई ऐसी गाडी ? मुझे याद है अपनी जवानी के दिनों में मैं कैरियर पर अपने किसी मित्र को बैठाकर मीलों तफरीह के लिए निकल जाता था और साइकल का बाल-बांका भी नहीं होता था। लेकिन लोग हैं कि देखते देखते उस मुटल्लो ‘बाइक’ पर फ़िदा हो गए। साइकल बेचारी चुपचाप बैठी रही। सोचती रही, कभी उसके भी दिन आएँगे। आखिर आ ही गए उसके भी अच्छे दिन।

साइकल बेचारी ने सचमुच बड़ा भुगता है। घर में बेकार पडी रही और कार मज़े लेती रही। रईसजादे कार घुमाने लगे। लेकिन कार पर एक्सरसाइज़ तो कर नहीं सकते थे। सो कसरत के नाम पर घर में पडी साइकल पर पैडल मारने लगे। और साइकल वहीं की वहीं पडी रही। बेचारी को बाहर की हवा ही नहीं लगने दी। पर उसके अच्छे दिन आखिर आ ही गए। अब कारें अपने अस्तबल, सौरी – गेराज में, मुंह फुलाए बिसूरती पडी रहेगीं। साइकल उड़ती फिरेगी।

साइकल की बस यही खूबी लाजवाब है। चाहें जहां घुस जाती है। कितना ही भीड़-भड़क्का हो वह अपने लिए जगह बना ही लेती है। कारें खड़ी टापती रह जाती हैं; यहां तक कि ‘बाइक’ तक बस शोर मचाती हांपती रहती है। पर साइकल धीरे धीरे ही सही, सबको अंगूठा दिखाती आराम से अपनी बढ़त बना लेती है।

अब देखिए न, हिंदुस्तान में आई तो हिन्दी में घुस गई। है कोई हिन्दी में साइकल के लिए शब्द ? नहीं न। उसे मौक़ा मिल गया, और घुस गई हिन्दी में। ऐसी घुसी कि अब हिन्दी की ही होकर रह गई। मैंने अपने पोते से पूंछा, साइकल कौन सी भाषा का शब्द है? बोला, हिन्दी का, इसमे भी कोई पूछने की बात है ? साइकल मराठी भाषा में मराठी की हो गई; गुजराती में गुजराती की। ऐसे घुसपैठिए को भला कौन रोक सकता है ? घुसपैठ करके साइकल ने अपनी जगह लगभग हर भाषा में बना ली है। जहां कोई सफल नहीं होता घुसपैठिए सफल होते देखे जा सकते हैं। अभी तक राजनीति में घुसपैठियों का राज था। अब साइकल सडकों पर,अन्य वाहनों को धता बता कर, राज करेगी। बिसात बिछ गई है।

साइकल चलती है, साइकल दौड़ती है, साइकल खड़ी हो जाती है। लेकिन कभी साइकल दौड़ में हिस्सा लीजिए की जिसमें सबसे धीमी साइकल चलानेवाले को पुरस्कृत किया जाता है। धीमी साईकल पर अपना संतुलन बनाए रखना कोई हंसी खेल नहीं है। लेकिन खेल यही है – स्लो साइकल रेस।

साइकल की घुसपैठ सडकों में, भाषा में और खेल में ही सिर्फ नहीं है, भारतीय दर्शन में भी उसकी खासी पैठ है। बस वहां यह “साइकल” नहीं कहलाती। इसे ‘आवागमन’ कहते हैं, ‘चक्र’ कहते हैं। जन्म-मरण का चक्र, जिससे हर जीव बंधा हुआ है। इस ‘साइकल’ से पार पाना असंभव है। इसी चक्र को तोड़ने के लिए भारत का सारा दार्शनिक चितन युगों से बेचैन है, पर अभी तक कोई मार्ग ढूँढ़ नहीं पाया। साइकल अजेय है। (बाई द वे -मैं क्या, हम सभी सर्कुलर रोड पर ही रहते हैं।

-डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

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1 टिप्पणी "व्यंग्य // साइकल के दिन फिरे // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. बहुत अच्छा लगा पढ़कर
    बहुत अच्छी प्रेरक प्रस्तुति
    घूरे के दिन भी फिरते हैं
    लोग बाग़ तमाम बीमारियों से घिर रहे हैं तो सायकिल याद आ रही है कुछ तो शर्म से घर में पैदल मार हांफ रहे हैं कुछ जिगर वाले सड़कों पर दिख रहे हैं धीरे धीरे

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