गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

व्यंग्य // कॉफी कल्चर // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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जब से साहित्यकारों ने कॉफी हाउज़ जाना बंद कर दिया है, उनका साहित्यिक कर्म शिथिल पड़ गया है। क्या आप जानते हैं कि पिछले दो दशकों से हमारे नगर में साहित्यिक सन्नाटा छाया हुआ है ? इसका एक मात्र कारण बस यही है कि कॉफी हाउज़ सूना है। वहां केवल अब खाते-पीते लोग खाने-पीने के लिए ही जाते हैं।

मेरे साहित्य-प्रेमी मित्र अपना रोना रो रहे थे। बोले, कॉफी हाउज़ की मेरी धारणा एक ऐसे स्थान की है जहां मेजें और कुरसियाँ पडी हों और जहां आप एक कप कॉफी के साथ राजनीति और साहित्य संबंधी विचार-विमर्श में तल्लीन हो जाएं। कॉफी के एक कप का मूल्य चुकाने के बाद आप इत्मीनान से वहां काफी देर तक बैठ कर अपनी बौद्धिक क्षमताओं को पैना कर सकते हैं। कॉफी चीज़ ही ऐसी है। वह हमारी तंत्राओं को जगाती है, हमारे विचारों को धार देती है। लेकिन अब तो लगता है यह बीते ज़माने की बात हो गई है। सारे साहित्यकार अपने अपने दबडों में बंद हैं और कॉफी की बजाए मिनरल वाटर पीने लगे हैं।

सच तो यह है कि मेरा इस तरफ ध्यान ही नहीं गया था। सुना तो था कि फ्रांस की क्रान्ति का बीज वहां सर्वप्रथम एक कॉफीहाउज़ में ही बोया गया था। लेकिन हम तो अभी तक कॉफी को सिर्फ अन्य और पेय पदार्थों की तरह एक पेय-मात्र ही समझते रहे कि जिसका लुत्फ़ आप थोड़ा सा ‘पे’ करके आसानी से उठा सकते हैं। कॉफी की पसंद और किस्में भी मेरे लिए हमेशा बस गिनी-चुनी ही रहीं। हॉट से ज्यादह मुझे कोल्ड कॉफी पसंद है। बिना शकर की कॉफी मुझे अच्छी नहीं लगती, न ही ब्लैक कॉफी पसंद करता हूँ, कॉफी में जबतक पर्याप्त शकर और दूध न हो, कॉफी मुझे बेस्वाद लगती है। चिकोरी ब्लेंडेड कॉफी की बजाए मुझे शुद्ध प्योर कॉफी ही ठीक-ठाक लगती है। लेकिन पीने को यदि ‘एस्प्रेसो’ मिल जाए तो क्या कहने !

मेरे एक मित्र अभी अमेरिका से लौटे हैं। कहते हैं, हिन्दुस्तानी क्या ख़ाक कॉफ़ी पीएंगे ? कॉफी का आनंद तो आप अमेरिका में लीजिए। वहां लोग जिस तरह खाने-पीने के लिए होटलों/मोटलों में जाते हैं, सिनेमा देखने के लिए जिस तरह पिक्चर हाल में जाते हैं वैसे ही आजकल वे कॉफी के लिए कॉफी-बार में जाने लगे हैं| कॉफी बारों की एक पूरी श्रृंखला वहां बाज़ारों में पसरी हुई है। लोगों को कॉफी पीने का एक ज़बरदस्त क्रेज़ है। कैसी कॉफी पसंद करेंगे आप ? यूगैंडा-कॉफी, पेरू-कॉफी, जमाइका-कॉफी, ग्वाटेमालियन- कॉफी, न्यूगिनी-कॉफी, यूथोपिया-कॉफ़ी या कोलंबिया-कॉफी ?

इन सब कंट्री-वाइज़ कॉफी के नामों के स्वाद क्या अलग अलग होते हैं ? ज़रूर होते होंगे। मैंने तो खैर पी ही नहीं है। हाँ एक बार झाग वाली कोलंबिया-काफ़ी ज़रूर ली थी। इसमें तीन चौथाई झाग था और एक चौथाई पेय पदार्थ, बस दो घूँट के बराबर ! इस कॉफ़ी के हर घूँट के लिए मुझे दो डालर चुकाने पड़े थे !!

लगता है, कॉफी पीने वालों में भी एक प्रकार का कॉफी-दंभ होता है। स्नौबरी होती है। वे कॉफी उसी नाज़ और नखरे के साथ लेते हैं मानो कोई वाइन-शाइन ले रहे हों। जिस तरह वे उसके झाग में धीरे से फूंक मारते हैं, जिस तरह वे कॉफी के कप को अपने दोनों हाथों में प्यार से लपेट लेते हैं, जिस अदा से वे उसे अपने होठों से छुआते हैं और हौले से चूमते हुए चुस्की लेते हैं, -बस देखते ही बनता है। उनका उस समय सारा ध्यान केवल कॉफी पर रहता है। सिवा कॉफी के उन्हें तब कुछ नहीं सूझता। अन्य विषयों के चर्चा के लिए तो सारी ज़िंदगी पडी है। अभी तो सामने सिर्फ कॉफी है – इर्रेसिस्टब्ल कॉफी।

एक दक्षिण भारतीय महिला पिछले दिनों मेरी मेहमान थीं। सुबह उठकर मेरी पत्नी ने उन्हें बैड-टी के लिए आमंत्रित किया। “नो, थैंक्स। इट्स बैड टी। आई स्टार्ट माँई डे विथ अ कप आफ़ गुड कॉफी।” अब ऐसी अदा पर भला कौन न फ़िदा हो जाए !

कॉफी केवल एक पेय भर नहीं है। एक पूरा कल्चर है। एक सम्पूर्ण जीवन-पद्धति है। बनाने वाले इसे बड़े नियम और कायदे से तैयार करते हैं। पीने वाले पूरे विधि-विधान से इसे पीते हैं। पूजा के बर्तनों की तरह कॉफी के बरतन बड़े एतिहात से साफ़ किए जाते हैं। कॉफी बनाने वाले इसे बनाने की रहस्यमय विधियां एक-दूसरे से शेयर नहीं करते। एक महिला ने एक बार बड़े अहसान से काफी बनाने का वास्तविक रहस्य मुझे बताया। बोलीं, कॉफी का एक अच्छा प्याला बनाने के लिए जिस चीज़ की सर्वाधिक ज़रूरत होती है, वह है, प्यार। कॉफी की महक बाहर लाने के लिए, बस दो प्यार भरे हाथ चाहिए। मैं निहाल हो गया।

ऐसी काफ़ी भला क्या नहीं कर सकती ! वह मन को पुलकित करती है, स्फूर्ति देती है। राजनैतिक बहस को बढाती है। साहित्यिक सन्नाटा तोड़ती है। आप कॉफीहाउज़ जाना कब से शुरू कर रहे हैं ?

--डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी, / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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