मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

चिकित्सा में भ्रष्टाचार // यशवंत कोठारी

पहले कुछ समाचार देखिये.एक अस्पताल ने १५ लाख का बिल थमाया. एक दूसरे अस्पताल ने जिन्दा बालक को मृत घोषित किया. एक अन्य अस्पताल ने मृत बीमार को कई दिनों तक वेंटीलेटर पर रखा, भारी बिल वसूला .बंगलौर में डाक्टर टेस्टों में भारी भ्रष्ट चार के चलते आय कर विभाग ने छापे मारे. आपको याद होगा एक बार मेडिकल कौंसिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष के यहाँ से छापे में सोने की छड़े बरामद हुयी थी .

चिकित्सा जैसा पावन व्यवसाय जो पीड़ित मानवता के लिये बना है ,घोर अनियमितता, लूट खसोट, भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी के कारण रोज बदनाम हो रहा है. मरीज को अनावश्यक टेस्ट लिखे जाते हैं, कमीशन का यह गोरखधंधा सर्वत्र चल रहा है. निजी अस्पतालों में तो लूट के नए रिकार्ड स्थापित हो रहे हैं. कार्पोरेट अस्पताल तो किसी की नहीं सुनते.एक केन्द्रीय मंत्री तो खुद अस्पताल चला ते है. गंभीर बिमारियों के इलाज की तो पूछो ही मत. केंसर के एक दवा की कीमत अलग अलग जगहों पे अलग अलग होगी. आपको वहीं से लेनी है जहां से डाक्टर ने कहा है.

कोढ़ में खाज की तरह मेडिकल इन्सुरेंस कम्पनियां , हर बड़े कार्पोरेट अस्पताल में इन कम्पनियों के बन्दे मिलेंगे, ये डाक्टर से सांठ गांठ कर बिल बनवा देंगे. अनावश्यक महंगे टेस्ट करवाएंगे, रोगी को कौन पूछता है, रोगी या परिजन कुछ पूछते हैं तो डाक्टर में हूं या तुम या फिर रोगी को ले जाओ. बड़े अस्पताल आई सी यू के नाम पर वेंटिलेटरके नाम पर, विजिट के नाम पर बड़े और भारी बिल बनाते हैं .सरकार कुछ कर नहीं पाती. मेडिकल काउन्सिल अंत तक डाक्टर का साथ देती है. लाइसेंस निलंबित करने के इक्के दुक्के उदाहरण हैं लेकिन हजारों ये सब सहन करते हैं वे भगवन के बराबर डाक्टर को समझते हैं, मगर डाक्टर पर कम्पनी का दबाव होता है. अपनी नौकरी को बचाए रखना होता है. एक करोड़ से भी ज्यादा डोनेशन देकर बने डाक्टर से ईमानदारी या सस्ते इलाज की उम्मीद रखना बेवकूफी है. छोटे छोटे मेडिकल कोलेज भी लाखों करोडों मांगते हैं, और यह बाद में डाक्टर रोगियों से ही वसूलता है. जाँच केन्द्रों से कमिशन की कोई रेट नहीं होती. डाक्टरों का कमीशन ५० से साठ प्रतिशत तक होता है. यह कमीशन बड़ी कम्पनियां डाक्टर के खाते में मासिक आधार पर डालती हैं. एक बड़े अस्पताल में डाक्टर को वेतन कम और कमिशन ज्यादा होता है. यदि डाक्टर सर्जन है तो आपरेशन और टेस्टों के नाम पर भारी राशि वसूली जाती है. मरता क्या न करता. रोगी और उसके परिजन जमीं जायदाद बेच कर इलाज कराते हैं.

बकाया राशि नहीं मिलने पर डेड बॉडी तक नहीं दी जाती है .इस पेशे को बदनाम करने में सबसे बड़ा योगदान निजी अस्पतालों का हैं वे मनमर्जी का इलाज करते हैं. ऐसे सेकड़ों उदाहरण मिल जायेंगे जिसमें मामूली बीमारी को गंभीर रोग बता कर मरीज़ को लूट लिया जाता है, गरीब मरीज़ भगवान के नाम पर सब सहन करता हैं. कोमा में पड़े मरीज को मौत के बाद भी नहीं दिया जाता.

पूरे बिल का भुगतान करो तो बॉडी मिलेगी उनका वेद वाक्य होता है. अंतिम क्रियाकर्म करने की खातिर परिजन सब सहन करते हैं. सरकारी अस्पताल कुछ बेहतर है वहां रोगी को नहीं लूटा जाता है. टेस्टों की लूट सर्वत्र एक जैसी है. रेट का अंतर हो सकता है. दावा, टेस्ट, फीस, वेंटिलेटर सब का भार सहन करना इस गरीब देश के लिए संभव नहीं है

आजकल चिकित्सा शिविर लगा कर रोगियों को पकड़ा जाता है, ग्राहक ढूंढे जाते हैं उन्हें अपने अस्पताल में लाकर मूंडा जाता है. कई अस्पताल ट्रस्ट चलाते हैं सस्ती जमीं, व् अन्य सुविधाओं के बावजूद रोगी को कोई लाभ नहीं मिलता है. सभी डाक्टर कमीशन खोर हो ऐसा नहीं है. मगर अधिकांश डाक्टर इसी श्रेणी में आते हैं. ज्यादातर वे जो कम्पनियों के अस्पताल में काम करते हैं, यदि वे यह सब नहीं करे तो कम्पनी अस्पताल मेनेजमेंट उनको निकाल देता है. मेडिकल कोलेजों में तो केपिटेशन वाला छात्र लाओ तो वेतन मिलेगा, और यह एक करोड़ देकर बना डाक्टर यही सब करेगा.

इस से बचने का एक ही रास्ता है चिकित्सा हर नागरिक को निशुल्क मिले. अनावश्यक टेस्ट करने पर डाक्टरों के खिलाफ कठोर कार्यवाही हो. हालात इतने विकट हैं कि क्वालिफाइड पैथोलोजिस्ट बहुत कम निदान केंद्र रखते हैं, पैथोलोजिस्ट की सील तक मासिक रॉयल्टी पर चलती हैं, लेब टेक्नीशियनों की योग्यता हमेशा ही संदेह के घेरे में रहती है.

जो दूसरी पेथी के लोग हैं वे टेस्टों के कमिशन से तो बचते हैं लेकिन दवा के कमिशन के आरोप उन पर भी हैं कई अन्य पेथी के डाक्टर भी अब टेस्ट लिख कर इस कमिशन खोरी में घुस गए हैं. गरीब रोगी का तो बस भगवान का ही भरोसा है.

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यशवंत कोठारी

८६.लक्ष्मी नगर ब्रह्मपुरी बहार जयपुर-२

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