श्रीहनुमान् कथा प्रसंग हनुमान्जी की नटखट लीला एवं गुरू सूर्य देव से वेदाध्ययन // डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

श्रीराम

श्रीहनुमान् कथा प्रसंग

हनुमान्जी की नटखट लीला एवं गुरू सूर्य देव से वेदाध्ययन

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डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

'मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति

बाल्यावस्था में हनुमान्जी बहुत ही नटखट और चंचल थे। नटखट होने के प्रमुख तीन कारण थे - पहला बचपना दूसरे देवताओें से प्राप्त अत्यधिक बल तथा तीसरा रूद्र का अंश । इन तीन कारणों से वे बचपन में ऋषि-मुनियों के आसन पेड़ों पर टांग देते तो कभी उनके कमण्डल का जल भूमि पर गिरा देते । कभी ज्यादा शरारत करना हो तो उनकी लंगोटी भी फाड़ डालते थे । कई बार किसी ऋषि की गोद में जाकर बैठ जाते तो कभी खेल-खेल में उनकी जटा व दाढ़ी खींचकर -नोचकर भाग जाते । ऋषि -मुनियों के लिये उनके बल के आगे रोकना अत्यन्त ही कठिन था । सब ऋषि -मुनि विवश एवं लाचार रहते थे । धीरे धीरे वे बड़े हुए माता अंजना एवं पिता केसरी को उनके नटखट पन से चिंता तो थी दूसरी तरफ उनके विद्याध्ययन की समस्या भी उठ खड़ी हुई। हनुमान्जी में उम्र के बढ़ते हुए भी उनके खेल में कोई अंतर नही आया ।

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अंत में उनके माता पिता ने ऋषियों से प्रार्थना की कि आज सब मिलकर ऐसा करें कि हनुमान् नटखट पन त्याग कर एक अच्छा बालक बन जावे । ऋषियों ने बड़े सोच विचार कर यह निश्चित किया कि हनुमान् को अपने बल एवं शक्ति का वड़ा गर्व -धमण्ड है । यदि वह अपना बल भूल जाये तो इसमे सुधार हो सकता है। ऋषियों ने हनुमान को शाप दे दिया कि तुम अपने बल को भूल जाओ। जब कोई तुम्हे अपने बल को याद करावेगा तब तुम्हे अपने बल का ज्ञान होगा। हनुमान् ऋषियों से शापित होकर अपना बल भूल गये।

उनके माता-पिता ने हनुमान्जी को वेदाध्ययन के लिये सूर्य के पास भेज दिया वहाँ जाकर हनुमान् जी ने सारे वेद वेदांगों का गूढ़ अध्ययन किया । हनुमान्जी को अध्ययन तो क्या करना था वे तो साक्षात् शिव के स्वरूप ही थे किन्तु घर्म - सम्प्रदाय - परम्परा का निर्वाह एवं उसकी रक्षार्थ उन्होंने सम्पूर्ण शास्त्रों का , विद्याओं का अध्ययन कर अपने माता-पिता के पास लौट आये । सूर्यदेवता ने गुरू के रूप में उन्हें आशीर्वाद दिया वह जीवन पर्यन्त काम आया ।

श्रीराम , लक्ष्मण एवं हनुमान् की भेंट ऋष्यमूक में होने पर हनुमान्जी ने श्रीराम को अपना परिचय दिया है । वह वाल्मीकीय रामायण में अद्वितीय है, ऐसा श्रीराम ने लक्ष्मण को हनुमान्जी की योग्यता एवं विद्वत्ता का द्योतक बताया है -

नानृग्वेद विनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः।

नासामवेदविदुष : ष्षक्यमेवं विभषितुम्।।

नूनं व्याकरणं कृत्स्त्रतमनेन बहुधा श्रुतम् ।

बहु व्याहहरतानेन न किंचिदपषब्दितम् ।।

श्री.वा.रा.किष्किन्धा सर्ग 3-28-29

श्रीराम ने लक्ष्मण से हनुमान् के बारे में इस प्रकार कहा - जिसे ऋग्वेद की शिक्षा नहीं मिली ,जिसने यजुर्वेद का अभ्यास नहीं किया तथा जो सामवेद का विद्वान नहीं है वह इस प्रकार सुन्दर भाषा में वर्तालाप नहीं कर सकता निश्चय ही इन्होंने समूचे व्याकरण का कई बार स्वाध्याय किया है क्योंकि बहुत सी बातें बोल जाने पर भी इनके मुँह से कोई अशुद्धि नहीं निकली । श्रीराम ने हनुमान् की इतनी प्रशंसा उनके वार्तालाप के आधार पर की है हनुमान् ने शिक्षा दीक्षा सूर्य नारायण से प्राप्त की थी । सूर्यनारायण जैसे देवता जिसके गुरू हो ऐसे महान शिष्य की शिक्षा के बारे में कुछ भी कहने का साहस करना असंभव है। सूर्य के आचार्यत्व और उनके महान शिष्य की शिक्षा एवं अध्ययन आदि के बारे में कुछ भी कहना सूर्य को दीपक दिखलाने के समान है । हनुमान्जी के जीवन से हम जीवन के प्रत्येक क्षण -परिस्थिति की शिक्षा प्राप्त कर जीवन के मूल्य को सार्थक कर सकते है।

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डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति

.103 व्यास नगर, ऋषिनगर विस्तार उज्जैन (म.प्र.)पिनकोड- 456010

E-mail:drnarendrakmehta@gmail.com

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