शनिवार, 2 दिसंबर 2017

व्यंग्य // साहित्य के प्रधान सेवक // अमित शर्मा (CA)

साहित्य के प्रधान सेवक

snip_20171118141053

मिश्रा जी साहित्य के प्रधान सेवक है। साहित्य सेवा का यह बीड़ा उन्होंने 55 किलो ग्राम श्रेणी में ही उठा लिया था ज़ब वो युवावस्था की दहलीज़ पर एक पैर पर खड़े थे। मिश्रा जी ने यह ज़िम्मेदारी साहित्य के बिना कहे ही अपने कंधों और शरीर के हर अंग पर ले रखी है। साहित्यिक चौकीदारी का यह पद, मिश्रा जी बिना किसी पारिश्रमिक के, श्रमिक की तरह, कब्जाए हुए हैं।

साहित्य के इतिहासकार, साहित्यिक चौकीदारी की सूनी माँग और सूनी गोद भरने का श्रेय मिश्रा जी को ही देते हैं। मिश्रा जी बचपन से ही सफ़ल और धनी साहित्यकार बनना चाहते थे लेकिन किस्मत और प्रतिभा दोनों ने साझा सरकार बना कर मिश्रा जी को धोखा दिया और मिश्रा जी के साहित्यकार बनने के सपने पर केंट आरो का पानी फेर दिया। विडंबना रही कि किस्मत और प्रतिभा की यह साझा बेईमानी भी मिश्रा जी को अपनी साहित्यिक डुगडुगी बजाने से नहीं रोक सकी।

शुरुआत में साहित्य बहुत ही आशा भरी निगाहों से मिश्रा जी की और निहार रहा था लेकिन अब मिश्रा जी की हेराफेरी से हार कर उसने अपनी आँखें फेर ली है। साहित्य और साहित्यकारों पर मिश्रा जी का प्रकोप मौसमी बीमारियों की तरह बेवफा नहीं होता है बल्कि "लवेरिया" की तरह सदाबहार होता है।

साहित्य की चौकीदारी करने के कर्म का मर्म अच्छी तरह से मिश्रा जी को कंठस्थ है और वे अक्सर उसी में ध्यानस्थ रहते हैं। कविता , व्यंग्य , गीत, ग़ज़ल, कहानी आदि साहित्यिक विधाओं पर मिश्रा जी दयालु और निरपेक्ष भाव से अपनी वक्र दृष्टि का वज्रपात बारी बारी से नियमित रूप से करते हैं। मिश्रा जी मन में सोचते है कि उनकी वक्र दृष्टि , सुदर्शन चक्र बनकर खुद का समय और रचनाकारों के साहित्यिक पाप अच्छे से काट रही है। किसी भी साहित्यिक विधा से मिश्रा जी कोई इरादतन भेदभाव नहीं बरतते हैं। वे सबका साथ सबका विकास की तर्ज़ पर सभी रचनाओं के रचनाकारों के मुखमंडल पर साहित्य को कलंकित और दूषित करने का आरोप मल कर हल्के होते हैं। किसी भी विधा का लेखक अपने को लेखक मानने की भूल नहीं कर सकता ज़ब तक कि मिश्रा जी उसे लेखक मानने की भूल ना कर दे। "कवि, व्यंग्यकार, कथाकार चाहे सब पर हो भारी,  है सब मिश्रा ताड़ना के अधिकारी।" साहित्य के क्षेत्र में मिश्रा जी पहले अपेक्षा के शिकार हुए, फिर उपेक्षा के शिकार हुए लेकिन फिर भी मिश्रा जी अपने शिकार करना नहीं छोड़ा।

साहित्य के क्षेत्र में नवागंतुकों की रचनाओं को मिश्रा जी की विशेष कुदृष्टि का लाभ मिलता है। नवागंतुकों की रचनाओं को मिश्रा जी को पढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती है, वो उन्हें सूंघ कर ही उन्हें रिजेक्ट कर देते हैं। किसी नए रचनाकार की रचना अगर कतिपय कारणों से मिश्रा जी का कोपभाजन का शिकार होने से रह जाए तो यह रचनाकार के लिए बड़ा साहित्यिक अपशकुन माना जाता है। किसी भी साहित्य पिपासु के लिए अपनी रचनाओं पर मिश्रा जी की लानत के हस्ताक्षर होना अच्छी  "साहित्यिक बोहनी" माना जाता है। अगर रचनाकार ज़्यादा लक्की हो तो तो उन्हें बिना माँगे ही मिश्रा जी की लानत हाथ लग जाती है जिसे वे जीवन भर पैरो में आने से बचाकर उसका सम्मान करते हैं। साहित्य की सीमारेखा भले ही किसी बिंदु पर जाकर समाप्त हो जाती हो लेकिन साहित्य के भीतर मिश्रा जी, किसी सीमा या रेखा के मोहताज नहीं है। सभी रचनाओं तक उनकी वैध-अवैध पहुँच है जो कि मिश्रा जी को बिना कटघरे में रखे उनके साहित्य प्रेम की गवाही देता है।

मिश्रा जी कभी कभी समय और कलम निकाल कर खुद भी लिख लेते हैं। वे सतर्क लेखक है, लिखते वक़्त ही नहीं बल्कि लिखने के बाद भी उनकी सतकर्ता अपने पूरे "तांड़वात्मक शबाब" पर रहती है, जिसे नियंत्रित करने के लिए कभी कभी उनके शुभचिंतकों को आपातकालीन परिस्थितियों में भरे गले और खाली दिमाग से साहित्यिक देवी-देवताओं का आह्वान भी करना पड़ता है। लिखने के  बाद मिश्रा जी की एक आँख लाइक की संख्या पर तो दूसरी मोबाइल के बैटरी परसेंटेज पर रहती है। मिश्रा जी स्वभाव से अच्छे बंदे है लेकिन साहित्यिक सतर्कता ने उनकी साहित्यिक चेतना को जबरन बंदी बना रखा है।

केवल लेखक ही नहीं बल्कि एक पाठक के तौर पर भी मिश्रा जी साहित्यिक सतर्कता को नहीं बख्शते हैं। दुर्घटनावश वे एक सतर्क और सजग पाठक भी हैं, हर स्क्रीन शॉट में बैटरी परसेंटेज भी पढ़ डालते हैं। वे अध्ययन में रूचि और धैर्य दोनों रखते है, अभी तक अपनी सभी महिला मित्रों के इनबॉक्स वार्तालाप के स्क्रीन शॉट्स चाव और ध्यान से पढ़ चुके हैं। वे वार्तालाप से प्रेमालाप की तरफ़ गमन करने में विश्वास रखते है ताकि साहित्यिक आवागमन में सुविधा रहे।

मिश्रा जी, साहित्यिक चौकीदारी को एक विशेषज्ञ कर्म और कांड मानते और मनवाते हैं इसीलिए साहित्यिक सूत्रों को पूरा भरोसा है कि मिश्रा जी ने भले ही अपने जीवन में कुछ अच्छे से ना लिखा हो लेकिन अपनी साहित्यिक चौकीदारी की वसीयत वो ज़रूर अच्छे से अपनी तरह ही किसी योग्य व्यक्ति के नाम लिखेंगे।

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------