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February 2017
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पतंग के कई अर्थ हैं। कनकौवा तो पतंग है ही, चिड़िया, शलभ, खेलने की गेंद, आग से निकली चिन्गारी भी पतंग कहलाती है। क्या आप बता सकते हैं की इनमें वह कौन सी बात है जो इन्हें पतंग बनाती है ? उत्तर है, ये सभी किसी न किसी रूप में उड़ने वाली चीजें हैं। पतंग उडाई जाती है, चिड़िया उड़ती है, शलभ, या कहें, पतंगा, भी चिराग के इर्द गिर्द उड़ता रहता है, आग से चिंगारियां उड़ती हैं। वस्तुत: संस्कृत में उड़ने का भाव दर्शानेवाली मूल क्रिया “पत” है। पतंग में ‘पत’ है, पतंगा (शलभ) में ‘पत’ है। चिड़िया शब्द में ‘पत’ भले न हो पर वह उड़ती है, अत: ‘पतंग’ कहलाती है। टप्पा लगाने से खेलने की गेंद कुछ देर के लिए हवा में विचरती (उड़ती) है। आग से तो चिंगारियां उड़ती ही हैं। ये भी आग की पतंगें हैं।

पत से ही पत्र बना है। पत्र का अर्थ है, पाती या पत्ती। चिड़िया के पंख को भी पत्र कहते हैं। दरअसल देवनागरी के ‘प’ वर्ण का मतलब ही पत्ता या/और वायु से होता है। ज़ाहिर है इन दोनों के मेल से ही उड़ने की प्रक्रिया पूरी होती है। चिड़िया के पास पंख हैं तो वह हवा में उड़ने लगती है। वायु के लिए ‘प’ से आरम्भ होने वाला शब्द, “पवन” है।

पतंग है तो पतंगबाज़ भी हैं और पतंगबाजी भी है। पतंगबाज़ अपनी अपनी पतंगें हवा में ‘बढाते’ हैं और अपनी पतंग की डोरी से रगड़ कर, दूसरे की पतंग की डोरी ‘काटते’ हैं। पतंग-बढ़ाना और पतंग-काटना पतंगबाजी का हुनर है, जिसे सीखना पड़ता है।

घनानंद कहते हैं, ‘गोरे तन पहिरि पतंगी सारी, झमक झमक गावै गारी”। कहने की आवश्यकता नहीं, यहाँ ‘पतंगी’ का अर्थ रंग-बिरंगी से है। पतंग हवा में लहराती है। और पतंगी साड़ी भी पहन कर लहराई न जाए, क्या ऐसा संभव है?

‘पत’ पत्ते को कहते हैं। लेकिन पत शब्द लाज और प्रतिष्ठा के लिए भी इस्तेमाल होता है। “मोरी पत राखो भगवान”। पत रखना लाज या प्रतिष्ठा की रक्षा करना है। पत उतारना प्रतिष्ठा को भंग करना है। स्वयं अपनी प्रतिष्ठा को नाश करने वाला इंसान ‘पतखोवन’ कहलाता है। हिन्दी भाषा में ‘पत’ का समातगत रूप भी देखा जा सकता है। पत्तों के झड़ने के मौसम को पतझर या पतझड़ कहते हैं। पतझड़ में पत्ते पेड़ों से गिरकर हवा में उड़ने लगते हैं। दिलचस्प बात यह है कि ‘पत’ में उड़ने का भाव भी है और गिरने का भाव भी है।

संस्कृत में गिरते हुए या नीचे आते हुए को ‘पतत’ कहते है। ‘पतन’ ऊपर से नीचे आना है। गिरना है, च्युत होना है। पतनशील, पतानोमुख, शब्द, व्यक्ति के पतन की ओर उसका स्वभाव और प्रवृत्त को दर्शाते हैं। वह कहावत है न, कुछ भी कर लीजिए पर पतनाला(रा) तो यहीं गिरेगा। इसमे केवल धमकी ही नहीं है। एक तथ्यात्मक बात भी कही गई है – नाले का पानी तो नीचे की तरफ ही बहेगा।

झंडे को ‘पताका’ भी कहते हैं। पताका हवा में लहराती है। ख़ास मौकों पर नीचे उतार भी ली जाती है। किसी की पताका उड़ना उसकी ख्याति होना है और उसकी पताका गिरना उसकी पराजय या हार है।

डा. रामविलास शर्मा के अनुसार द्रविण और फारसी भाषाओं में ‘त’ के स्थान पर ‘र’ का उच्चारण होता है। ‘त’ के स्थान पर ‘र’ फारसी और उर्दू में भी आ गया और इससे कई शब्द निर्मित हुए। पक्षी के लिए ‘परिंदा’ और पंख के लिए ‘पर’ बना। परवाना, परवेज़, परवाज़ आदि शब्द भी इसी के उदाहरण हैं।

-सुरेन्द्र वर्मा ( ९६२१२२२७७८ )

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

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दसवाँ अध्याय

                  
 
  [ओशो कृष्ण को विश्व-मनोविज्ञान का पिता कहते हैं. कृष्ण अर्जुन से जब कुछ कह रहे होते हैं तब उसकी मनस्थिति को भी पढ़ रहे होते हैं. उन्हें लगता है अर्जुन को उनकी बातों को समझने में कुछ कठिनाई हो रही है. वह कहते हैं- अर्जुन! फिर भी तू मेरे इस श्रेष्ठ वचन को सुन. मेरे मन में तेरा हित करने की बलवती इच्छा है. तू यह जान ले कि से इस संसार की प्रत्येक वस्तु मेरी ही विभूति है.] 
 
                           श्री भगवान ने कहा
     महाबाहु! फिर भी  तू सुन इस मेरे  परम बचन को 
     कहूंगा  तेरी  हित-इच्छा  से तुझ  अतिशय  प्रेमी से ।1।
     नहीं  जानते  हैं महर्षि  सुर  लीला से प्रकटन  मेरा
     क्योंकि आदि कारण  मैं ही सब देवों  महर्षियों का ।2।
     जो जानता  अनादि  अजन्मा लोक-महेश्वर  मुझको
     मर्त्यों में  वह ज्ञानवान   होता  प्रमुक्त  सब अघ से ।3।
     निश्चय-बुद्धि  ज्ञान  अमूढ़ता सत्य क्षमा  मन-निग्रह 
     सुख दुख  उद्भव-नाश भयाभय  सर्वेंद्रिय-संयम भी ।4।
     यश  अपयश  संतोष  अहिंसा  दान  तपस्या समता
     होते  ये  उत्पन्न  भाव   नाना  प्रकार  के  मुझसे ।5।
     सात महर्षि  चार पहले के सनकादिक   मनु  चौदह
     मुझमें निष्ठ  मेरे मन-जन्मे  जिनकी लोक-प्रजा यह ।6।
     इस  विभूति  योग को मेरी  जो भी तत्व से  जाने
     होता युक्त  अकंप भक्ति से संशय नहीं तनिक भी ।7।
     मैं ही कारण  जगदोद्भव का जग-चेष्टा मुझसे ही
     ऐसा  मान  बुद्धिमान  जन  भजें  मुझे  श्रद्धा से ।8।
     लगा  प्राण  चित्त  मुझमें वे  मुझे जनाते परस्पर 
     कहते  मेरे गुण  प्रभाव को  तुष्ट मुझ  में रमते ।9।  
     नित्य लगे  मुझमें उनको जो  मुझे प्रेम  से भजते
     तत्वरूप  योग  देता मैं  मुझे प्राप्त  हों  जिससे ।10।
     उनपर  कृपा हेतु उनके  ही आत्मभाव  में स्थित 
     तत्वज्ञान-दीप  से करता नष्ट अज्ञान-तम  उनका ।11।       

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अर्जुन के प्रश्नों की झड़ी निःशेष नहीं हो रही. वह कहते हैं, हे कृष्ण! तू जो भी कह रहे हो मैं सब सत्य मान रहा हूँ, तेरे अमृत वचन को सुनकर मुझे तृप्ति नहीं मिल रही. किंतु यह समझ में नहीं आता कि तेरा चिंतन कर किस तरह मैं तुझे जानूँ, किन किन भावों में तू मेरे लिए चिंतन योग्य है?                                      
 
                             अर्जुन ने कहा                                                                                    
     परम  ब्रह्म  तू परम धाम व तू  पवित्र परम हो
     दिव्य सनातन  पुरुष  अजन्मा आदिदेव सर्वव्यापी ।12।
 
     यही सर्वऋषि  नारद देवल असित व्यास कहते हैं
     और स्वयं  तू भी कहते  हो मेरे प्रति  अपने को ।13।
     केशव! जो  कहते तू मुझसे सत्य मानता  सबको
     नहीं  जानते  प्रकटन तेरा देव  न दानव भगवन! ।14।
     स्वयं जानते  पुरुषोत्तम! तू  अपने को अपने  से
     देवदेव!  भूतेश!  जगत्पति!  भूतों के भावन! तू ।15।
     दिव्यविभूतियों के अपनी उन पूर्णकथन में सक्षम
     जिनसे व्याप्तकिए स्थित तू इस सम्पूर्ण जगत को ।16।
     किस प्रकार जानूँ योगेश्वर! तुझे नित्य चिंतन कर
     भगवन! तू किनकिन भावों में चिंतनयोग्य मेरे से ।17।
     फिर कह सविस्तार योग  व विभूतियॉ  तू अपनी
     तेरे अमृतबचन को  सुन हो  तृप्ति  नहीं जनार्दन! ।18।
 
भगवान ने अर्जुन को अपनी विभूतियॉ बताईं.
 
                     श्री भगवान ने कहा
     अब मैं कहूँगा प्रधानता से दिव्य  विभूतियॉ अपनी 
     मेरी  विभूतियों का है कुरुश्रेष्ठ! अंतहीन  विस्तार ।19।                                      
     गुडाकेश! मैं सभी प्राणि के आदि मध्य अंत में हूँ
     और आत्मा अंतः स्थित  सभी  प्राणियों  की  मैं ।20।
     मैं वामन अदिति-पुत्रों में  किरण-सूर्य प्रभ पद में
     मैं मरुतों  का तेज  चंद्रमा  अधिपति  नक्षत्रों का ।21।
     वेदों  में  मैं  सामवेद  मैं  इंद्र   देवतागण   में 
     मन हूं सभी  इंद्रियों  में  चेतना सभी प्राणियों में ।22।
      यक्ष  राक्षसों में  कुबेर मैं  शंकर रुद्न एकादश में 
     वसुओं  में पावक मैं ही  मैं मेरु शिखर-पर्वतों में ।23।
     पुरोहितों में मुख्य  वृहस्पति जान पार्थ! तू मुझको
     मैं  स्कंद  सेनापतियों   में  जलाशयों  में  सागर ।24।
     महर्षियों में भृगु मैं  ही  मैं अक्षर ॐ वाणियों में
     स्थावरों में  तुंग  हिमालय  मैं जपयज्ञ   सुयज्ञों  में ।25।
     मैं  पीपल हूँ  सब वृक्षों में व  देवर्षियों में नारद
     सुष्ठु  चित्ररथ गंघर्वों में  सिद्धों में मैं मुनि कपिल ।26।
     अश्वों में उच्चैःश्रवा जो प्रकट सुधा संग निधि से
     श्रेष्ठ गजों में ऐरावत नर-नृप को मान  विभूति मेरी ।27।
     मैं ही वज्र  आयुधों में  हूँ कामधेनु  मैं गौओं  में
     प्रजनन में कंदर्प  और हूँ सर्पों  में  वासुकि मैं ही ।28।
     नागों में मैं शेषनाग मैं नायक वरुण जलचरों का  
     मैं अर्यमा पितर लोगों में मैं यमराज  शासकों  में ।29।
     दैत्यों में  प्रह्लाद और मैं  काल गणनकर्ताओं में
     पशुओं में मैं ही मृगेंद्र हूं  मैं हूँ गरुड़ पक्षियों  में ।30।
     पवन पवित करनेवालों में  शस्त्रधारियों में मैं राम
     मगर  जलजंतुओं  में  मैं  पूत जाह्नवी नदियों में ।31।
     इस सम्पूर्ण  सर्ग के अर्जुन! आदि मध्य अंत में मैं 
     विद्याओं  में ब्रह्मविद्या  मैं  वाद वादकर्तागण का ।32।
     मैं  अकार अक्षरों में  हूँ  द्वंद्व समास  समासों में
     मैं  हूँ  अक्षय काल  सर्वतोमुख  धाता भी मैं ही ।33।
     मैं हूं  मृत्यु  सर्वनाशी  मैं ही भविष्य का उद्भव  
     कीर्ति  धैर्य स्मृति मेधा श्री  वाणी क्षमा स्त्रियों में ।34।
     वृहत्साम  गेय गीतों  में  छंद  गायत्री  छंदों  में
     मासों  में मैं मार्गशीर्ष हूँ ऋतु वसंत मैं ऋतुओं में ।35।
     छलियों में  मैं जुआ  तेज हूं  मैं तेजस्वी  जन में  
     जेताओं की जीत व्रती-निश्चय सत्व सात्विकों का ।36।
     वृष्णिवंश में  वासुदेव मैं धीर पांडवों में  अर्जुन
     मुनियों में हूं व्यास और मैं  शुक्राचार्य सुकवि में ।37।
     दमनशील की दण्डनीति  मैं नीति जीतकामी  की 
     मैं हूँ मौन गुह्य भावों में मैं ही  ज्ञान ज्ञानियों में ।38।
     अर्जुन! सर्व प्राणियों का जो बीज बीज मैं ही हूं
     ऐसा नहीं भूत कोई चर अचर रहित जो  मुझसे ।39।
     मेरी  दिव्य  विभूतियों  का   अंत नहीं  परंतप! 
     यह विभूति  विस्तार कहा जो जान बहुत थोड़ा है ।40।
     जो जो सत्व हैं जुड़े विभूति से शोभा से व बल से
     समझो  सब  उत्पन्न  हुए  वे  तेज-अंश  से  मेरे ।41।
      अथवा बहुत जानने से है  तुझे अर्थ क्या अर्जुन!
      मैं अपने एक ही अंश से जगत व्याप्त कर स्थित ।42।


              विभूतियोग नाम का दसवॉ अध्याय समाप्त
 
 
 

                                  ग्यारहवाँ अध्याय  

 
 
  [ अर्जुन ने कृष्ण से प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश की बातें सुनीं और कृष्ण के अक्षय महात्म्य को भी सुना तो उनके मन में उनके विश्वरूप को देखने की इच्छा जाग उठी. अपनी इच्छा उन्होंने कृष्ण के सामने रखी. कृष्ण ने उन्हें अपना विश्वरूप दिखलाया. संजय ने उस विश्वरूप को दिव्यदृष्टि से और अर्जुन ने अनुभूति में प्रत्यक्ष देखा. अर्जुन इस विश्वरूप को देखकर घबड़ा-से गए. कृष्ण ने उन्हें समझाया-अर्जुन! तू घबड़ा मत. तू तो केवल निमित्तमात्र है. तू युद्ध कर. शत्रुओं को तू ही जीतेगा.
    विवेकानन्द के तूफ्फानी प्रश्न, च्क्या ईश्वर है?’’ के प्रत्युत्तर में परमहंस रामकृष्ण ने उनके कंधे पर अपने पैर का अंगूठा रख दिया. वह तत्क्षण ध्यानस्थ हो गए. उनकी वह अतींद्रिय अंतरानुभूति कदाचित अर्जुन के विश्वरूप दर्शन जैसी थी.]
 
 
                              अर्जुन ने कहा
       मुझपर करने  हेतु  अनुग्रह परम गुह्य अध्यात्मपरक
     तूने  कहे जो  वचन  हो गया  नष्ट  मोह यह मेरा ।1।
     क्योंकि सुना  है कमलनेत्र! उत्पत्ति नाश  भूतों का 
     सविस्तार  तुझसे  मैंने  अक्षय   महात्म्य  भी  तेरा ।2।
     पुरुषोत्तम!  कहते  तू निज को  जैसा  है  ऐसा ही
     मैं  चाहता   देखना   तेरा   ईश-रूप   परमेश्वर! ।3।
     प्रभो! रूप  ऐश्वर  तेरा  यदि  मानो देख सकॅू  मैं
     अपने उस  अव्यय स्वरूप को  मुझे दिखा योगेश्वर! ।4।
 
                       श्री भगवान ने कहा
     देख  पार्थ!  सैकड़ों   हजारों  रूपों  को अब  मेरे  
     दिव्य  अनेक  तरह के नाना  आकृतियों   वर्णों के ।5।
     देख  रुद्न वसु आदित्यों को मरुतों  अश्विनियों को
     और देख  आश्चर्य अनेक जो  भारत!  पूर्व न देखे ।6।
     अभी  देख  एकस्थ  देह में  मेरी  जग  सचराचर
     और  देखना  चाहो  जो भी देख गुडाकेश! उसको ।7।
     पर तू निज प्राकृत  ऑखों  से मुझे न देख  सकेगा
     दिव्यचक्षु  देता   मैं   तुझको  देख  मेरा योगैश्वर ।8।
 
अर्जुन की प्रार्थना पर भगवान ने उन्हें अपना विश्वरूप दिखाया. वह रूप अद्भुत था.
 
                        संजय ने कहा
     ऐसा कह हे राजन! फिर  उन महायोगेश्वर  हरि ने
     दिखलाया  अर्जुन को अपने दिव्य रुप   ऐश्वर को ।9।
     उसमें  थे अनेक मुख ऑखें  अद्भुत बहु दर्शन थे 
     दिव्य अनेक आभरण  कर में दिव्य उठाए  आयुध ।10।
     दिव्य गंध के लेप लगे थे  दिव्य  वस्त्र स्रक धारे
     और  अनंतरूप  विस्मयमय   देव  सर्वतोमुख  थे ।11।
     सहस सूर्य उग जायॅ साथ यदि  युक्त प्रभाऍ सारी
     दिव्य महात्मा की प्रकांति से समता रखे  कदाचित ।12।
     उस क्षण उस  देवाधिदेव के एक जगह तन-स्थित
     अर्जुन ने  नाना  भागों  में  देखा बँटा  जगत को ।13।
     तब  विस्मय से  देख धनंजय  हुआ हर्ष-रोमांचित
     शिर से कर  प्रणाम देव को  हाथ जोड़ यों बोले ।14।
 
भगवान के उस अंतहीन विश्वरूप को देख अर्जुन कुछ क्षण अवाक रह गए. फिर हाथ जोड़कर प्रार्थना के स्वर में अपनी धारणा के अनुरूप उस विराट रूप को शब्द देने लगे. पर वर्णन मेंअपने को असमर्थ पा घबडा गए. पूछा- हे भगवन! आप कौन है? बताऍ. 
     
                   अर्जुन ने कहा
       देख रहा मैं देह में तेरी देव! सभी  देवों  को
       और दीख पड़ते विशेष समुदाय प्राणियों के हैं
       कमलासन पर विराजमान हैं ब्रह्मा व शिवशंकर
       और दिव्य सर्पों को सब ऋषियों को देख रहा हूँ ।15।
       नाना उदर बाहु मुख ऑखें विश्वेश्वर! तेरे  हैं
       सभी ओर से तुझ अनंतरूपी  को देख रहा मैं 
        नहीं दीखता आदि तेरा  न अंत तेरा  ही दीखे
       विश्वरूप हे! कहीं  मध्य  का पता नहीं है तेरे ।16।
       देख रहा हूँ मुकुट चक्र व धारण किए गदा हो 
       दीप्तिमान  सब ओर हो रही तेज राशि है  तेरी
       सभी ओर से अप्रमेय  तू दृष्ट्य कठिनता से हो
       अग्निसदृश  देदीप्यमान  तू सूर्य-कांति  वाले हो।17।
           तुम्हीं  जानने  योग्य  परम अक्षर  हो
           और विश्व के  परम निधान हो तू ही
           तुम्हीं हो  रक्षक धर्म सनातन  के  भी 
           पुरुष  सनातन  अव्यय  मेरे  मत  में ।18।             
           आदि मध्य व अंतरहित  अतिप्रभ  तू
           अनतबाहु  शशि - भानुरूप   नेत्रोंयुत
           ज्वलित अग्निमुख  तू  प्रतेज से अपने
           देख  रहा  मैं  तुझे  तपाते  जग को ।19।
           स्वर्  पृथ्वी के बीच  व्योम फैला व
           सभी  दिशाएँ पूरित  एक  तुझी  से 
           देख  तेरे  इस उग्र  रूप को अद्भुत
           व्यथित हो रहे  तीनों लोक  महात्मन्! ।20।
      वे ही सब  समुदाय  देव के करें प्रवेश तुझी में
      कीर्तन करते  कई भयातुर  हाथ जोड़ कर तेरी
      सिद्धों महर्षियों के ये समुदाय‘स्वस्ति’यों कहकर
      स्तुति  करते   उत्तम  उत्तम   स्तोत्रों  से  तेरी ।21।
      सब आदित्य रुद्न सब वसु व विश्वेदेव मरुद्गण
      पितरों का समुदाय उष्मपा  यक्ष साध्यगण राक्षस
      सिद्धों का समुदाय  अश्विनीद्वय गंधर्व सभी ही
      देख रहे हैं निर्निमेष  तुझको सब  चकित हुए से ।22।  
 
      महाबाहु! तेरा महान यह  रूप अनेक मुखों  का
      बहुनेत्रों, बहु बाहु, उरू बहु व अनेक चरणों का
      बहु उदरों विकराल  बहुत दाढ़ोंमय  रूप भयंकर
      लोक विकल है देख स्वयं ही मैं अत्यंत विकल हूं ।23।
      नभ को छूते  दीप्तिमान तू  विविध  वर्ण तेरे हैं 
      आनन  फैला  हुआ  दीप्तिमय नेत्र  बड़े हैं  तेरे
      रूप  देख  तेरा यह  विष्णो! डरा हुआ अंतः में
      छूट  गया है  धैर्य मेरा व  मन की शांति  गई है ।24।
      दाढ़ों से  विकराल हो रहे  तेरे भयद  मुखों  को
      प्रलयअग्नि-सा देख भयानक मुझे कौंध से उसकी
      सूझ  रही  हैं  नहीं  दिशाएँ  समाधान  नहीं  ह्रै
      जगन्निवास!  देवाधिदेव  हे!  हो प्रसन्न तू मुझपर ।25।
      ये  वे ही हैं  सब के सब  धृतराष्ट्र-पुत्र युद्धार्थी
      पृथ्वीपालों  के  अनेक  समुदायों  के संग होकर 
      और कर्ण भीष्म  द्नोण  भी  तीव्र  वेग से बढ़ते
      मुख्य मुख्य  योद्धाओं के संग प्रखर हमारे दल के ।26।              
      सब प्रवेश  कर रहे तीव्रता से अति खिंचे हुए से
      तेरे भयद मुखों में  जो विकराल  दाढ़  वाले  हैं   
      कई एक अति चूर्ण सिरों के साथ  चीथड़े से हो 
      तेरे  दाँतों  के  अंतर  में   दिखते  फंसे  हुए हैं ।27।
       जैसे जल-प्रवाह बहुतेरे नदियों के बह बह के                                                     
       जाते चले दौड़ते गति से सागर ओर मचल के
       वैसे  ही  नरलोक-वीर कर रहे प्रवेश तेजी से   
       सभी ओर से दीप्तिमान  तेरे इन खुले मुखों में ।28।
       ज्वलित अग्नि में मोहग्रस्त हो जैसे दौड़  पतिंगे  
       अपना ही विनाश करने को त्वर प्रविष्ट होते हैं 
       वैसे  ही कर रहे प्रवेश  ये लोग  बड़े वेगों से
       निज को ही विनष्ट करने को तेरे बड़े मुखों में ।29।
       ग्रसते हुए सर्वलोकों को अपने ज्वलित मुखों से
       सभी ओर से  चाट रहे हो बार बार  रसना से
       विष्णो! उग्र  प्रभा यह तेरी तप्त तेज के द्वारा
       सारे जग को चतुर्व्याप्त कर तपायमान करती है ।30।
       बता  कृपाकर मुझे कौन तू  उग्र रूप वाले हो
       देवश्रेष्ठ! नत नमन तुझे  है तू प्रसन्न हो जाओ       
       मैं जानना चाहता तुझको कौन आदि  पुरुष तू
       नहीं जानता भलीभाँति  मैं क्या प्रवृत्ति  है तेरी ।31।
 
भगवान ने अर्जुन से कहा-मैं बढ़ा हुआ महाकाल हूं. मैं इन सब युद्धवीरों को मार चुका हूं     
 
                  श्री भगवान ने कहा
       बढ़ा हुआ मैं महाकाल हूँ नाशक सबलोकों का
       आया हूँ  संहार हेतु  इस समय यहाँ इन सबके                           
       जो विपक्ष में स्थित योद्धा  खड़े युद्ध  लड़ने को
       तू न लड़ो  तो भी ये सारे  यहाँ न बचने वाले ।32। 
       अतः उठो तू प्राप्त करो यश जीत शत्रुओं को इन
       भोगो वह समृद्ध  राज्य  संपन्न धान्य व धन से             
       ये मारे जा चुके सभी हैं  मुझ द्वारा पहले  ही
       बस  निमित्त मात्र  बन जाओ वीर सव्यसाची तू ।33।
            द्नोण जयद्नथ  कर्ण भीष्म  व अन्य शूरवीरों को
       हते  हुए  मेरे द्वारा  ये  उन्हें  युद्ध  में  मारो
       थोड़ी भी तू व्यथा करो मत युद्ध करो निर्भय हो
       निःसंशय तू जीतोगे  इस कड़े  युद्ध में अरि को ।34।
 
भगवान के उस महाकाल रूप को देख अर्जुन घबरा गए. उन्होंने उनका फिर वही चतुर्भुज रूप देखना चाहा.
 
                      संजय ने कहा
           केशव के इस  कहे वचन को सुनकर 
           कर जोड़े  कर नमन  सकंप  किरीटी
           भीत हुआ भी नमस्कार कर  फिर वह
                          बोले अति  गद्गद  वाणी  केशव से ।35।                        
 
                         अर्जुन ने कहा
           हृषीकेश!  तेरे   लीला   कीर्तन  से
           जग  होता  हर्षित    पाता रागों को
           भाग रहे राक्षस  दिक  में इससे  डर
           करते हैं  प्रणाम  सिद्धगण  समुचित  ।36।
           क्यों न  करें  वंदना  महात्मन!  तेरी 
           गुरुओं के  गुरु  आदिकर्तृ  ब्रह्मा के 
           जगन्निवास!  देवेश! असत! व सत् तू 
           उनसे पर जो  कुछ भी है हो वह  भी ।37।
           आदि देव  तू  पुरुष पुरातन  तू  ही
           जग के  परम  निधान और ज्ञाता भी      
           तुम्हीं  ज्ञेय हो  परम धाम  भी हो तू
           जगत  व्याप्त  है  तुझ अनंतरूपी  से ।38।
 
           वरुण चंद्र यम वायु अग्नि तू ही  हो
           तुम्हीं प्रजापति  ब्रह्मा  ब्रह्म-पिता भी
           नमस्कार  है तुझे  हजारों  बार नमन
           बार  बार  है  नमन  प्रणाम  नमस्ते ।39।        
           नमन  अग्र  से  पीछे  से  सर्वात्मन!   
           सभी ओर  से  नमस्कार है  तुझको
           हे  अनंत  सामर्थ्य  पराक्रम   वाले   
           सबको रखा समेट अतः तू सब कुछ ।40।
           सखा मान हे यादव! कृष्ण! सखा हे!
           जो भी  मैंने तुझे  कहा  हो हठ से
           नहीं  जानते  हुए  प्रभाव  को  तेरे      
           कभी प्रेम से या  प्रमाद  में पड़ कर ।41।          
           हुआ  कभी हो  तिरस्कार हँसी  में 
           शय्यासन भोजन  विहार  में  मुझसे
           अच्युत!  सखा समक्ष, अकेले में या
           क्षमा  करो  तू-अप्रमेय   उन  सबको ।42।
           पिता तुम्हीं इस लोक चराचर  के हो
           पूजनीय हो  व  गुरुओं  के गुरु भी           
           तुझ समान है नहीं  त्रिलोक में कोई  
           अन्य हो सके  अधिक कोई भी कैसे ।43।
           स्तुति करने योग्य अतः तुझ-प्रभु को
           करता  हूँ  प्रणिपात  प्रमन को  तेरे              
           पिता पुत्र के पति पत्नी मित मित के
           सहते  ज्यों  अपराध  सहो  तू  मेरे ।44।    
           पूर्व  न देखा रूप  देख वह  हर्षित  
           व्यथित हो रहा मन  भी मेरा भय से         
           मुझे  दिखाओ  देवरूप  पिछला वह
           जगन्निवास! देवेश! प्रमन हो मुझ पर ।45।
           वैसे  ही   मैं  तुझे   देखना  चाहूँ
           चक्र  हाथ में  गदा- मुकुट  के धारी
           सहसवाहु!  हे विश्वमूर्ति!  हो जाओ
           उसी  चतुर्भुज   रूप   मनोहारी  में ।46।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                      
 
भगवान ने उन्हें अपना पूर्व का चतुर्भुज रूप दिखा उनके भय को दूर किया.
 
                   श्री भगवान ने कहा
           मैं  प्रसन्न हो  योगशक्ति  से अपनी  
           सबका  आदि  अनंत  परम तेजोमय 
              तुझे  दिखाया  विश्वरूप निज अर्जुन!
           तेरे  सिवा न देखा  पूर्व  किसी  ने ।47।
           कुरुप्रवीर!  यह  रूप  लोक में मेरा
           दिख सकता न  तेरे सिवा किसी को                        
           न ही वेद के पाठ न यज्ञ  दानों  से     
           न ही  क्रिया   न उग्र  तपस्या  से ही ।48। 
           व्यथित न हो न हो विमूढ़ तनिक भी
           उग्र  रूप  यह  देख  मेरा  तू ऐसा
 
                     संजय ने कहा
           इस प्रकार कह वासुदेव ने  फिर तब
           अर्जुन  को निज रूप  दिखाया वैसा
           सौम्यरूप    हो  पुनः  महत आत्मा ने
           धैर्य  बँधाया  भीत  हुए  अर्जुन को ।50।
 
                    अर्जुन ने कहा
     तेरे सौम्य मनुष्यरूप  को देख जनार्दन!  इस क्षण
     स्थिरचित्त  हुआ मैं  पाया  स्वाभाविक  स्थिति को ।51।
                           
                  श्री भगवान ने कहा
     दुर्लभ  है  दर्शन  इसका जो रूप मेरा यह देखा
     इसे  देखने  को रहते  हैं  देव  सदा  लालायित ।52।
     देखा  है  जैसा  मुझको  न  देख  सकेगा वैसा
     वेदों से  तप से  दानों से  और न  यज्ञ-पूजा से ।53।   
     यों  अनन्य भक्ति  से ही मैं  ज्ञेय  तत्वतः अर्जुन          
     और  देखने  में  प्रवेश करने में  शक्य  परंतप! ।54।
     पांडव!  मेरे  भक्त परायण  कर्म करे  मेरे हित 
     अनासक्त  निर्वैर  प्राणियों  से वे  प्राप्त मुझे  हों ।55।


          विश्वरूपदर्शन नाम का ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त                    
 
 
                                  

बारहवाँ अध्याय


 
  [कृष्ण ने अपने पूर्व के वचनों में दो तरह की उपासनाओं की चर्चा की है. एक में    कर्मयोग की सिद्धि के लिए अक्षर (निर्गुण) की और दूसरे में समबुद्धि से युक्त हो परमेश्वर में बुद्धि अर्पण कर सभी कर्म करने को कहा है अर्थात सगुण की उपासना करने को कहा है. अर्जुन कृष्ण से जानना चाहते हैं कि इन दोनों योगों को जाननेवालों में उत्तम  कौन है. उत्तर में कृष्ण उन्हें विस्तार से बताते हैं कि मुझमें मन लगाकर सदा युक्तचित्त हो जो परमश्रद्धा से मेरी उपासना करते हैं वे उत्तम योगी हैं. अक्षर में आसक्तचित्त साधकों को योग साधना में क्लेश अधिक होता हैं. क्योंकि आसक्ति के कारण उनमें देहाभिमान की मात्रा होती है]
 
                             अर्जुन ने कहा
     यों लग हैं जो नित्य उपासते  तुझ-साकार सगुण को     
     औ  निर्गुण  अक्षर  उपासते  कौन योगविद  उत्तम ।1।
 
                       श्री भगवान ने कहा
      मुझमें मन को लगा नित्यरत  भक्त परम श्रद्धा से                     
      उपासते  हैं मुझे जो  उनको  सर्वश्रेष्ठ  यति मानॅू ।2।
      जो अविनाशी  निराकार अदृष्ट्य  और  अचल व
      मन से  परे  सर्वव्यापी  ध्रुव  निर्विकार  को पूजे ।3।
     वे  इंद्रिय-संयमी  पुरुष सब प्राणि-हितों में प्रेमल
     सभी जगह  सम-बुद्धि  वर्तते  मुझे  प्राप्त होते हैं ।4।
     अक्षर में आसक्तचित्त  को कष्ट अधिक साधन में
     देहमानियों को अव्यक्त-गति  कठिनाई से  मिलती ।5।     
     अर्पित कर सब कर्म  मुझे जो होकर  मेरे परायण 
     उपासते  हैं ध्यान  लगाकर  एकभक्ति से  मुझको ।6।
     मुझमें चित्त किए उनका मैं पार्थ! मृत्युजग-निधि से
     करता  हूं उद्धार  पूर्णतः बिना  बिलंब  किए  ही ।7।
     स्थापित कर मन मुझमें कर बुद्धि प्रविष्ट मुझमें ही
     इसके  बाद  निवास  करेगा  तू मुझमें  निःसंशय ।8।
     कर न सके यदि दृढ़ स्थिर तू मुझमें अपने मन को
     इच्छा कर  अभ्यासयोग  से  मुझे धनंजय पाने की ।9।
     यदि  अभ्यास में भी अशक्त हो मेरे कर्मपरायण 
     मेरे लिए कर्म करके भी  प्राप्त सिद्धि को  होगा ।10।
     मेरे आश्रित  हुआ इसे भी करने में अशक्त पाते
     वश करके इंद्रिय-मन को तू कर्मफलेच्छा  त्यागो ।11।
     श्रेष्ठ अभ्यास  शास्त्रज्ञान से ध्यान ज्ञान से उत्तम
     श्रेष्ठ फलेच्छा-त्याग ध्यान से त्याग शांति देता है ।12।
     अद्वेषी जीवों प्रति  करुणा भरा  मित्रवत सबसे 
     क्षमाशील सुख-दुख में सम व ममताहीन अनहमी ।13।
     दृढ़निश्चय संतुष्ट सदा  वश किए देह को योगी
     अर्पित किए बुद्धिमन मुझमें भक्त मेरा मुझे प्यारा ।14।
     जो उद्विग्न नहीं प्राणी से प्राणि उद्विग्न न जिससे
     भय उद्वेग हर्ष ईर्ष्या से  जो अलिप्त प्रिय मुझको ।15।
     जो  शुचि दक्ष अपेक्षा दुख से मुक्त  पक्षपाती न
     त्यागी सब कर्मारंभों का भक्त मेरा  मुझको प्रिय ।16।
     जो न  कभी द्वेष करता  न हर्ष  शोक इच्छा ही
     त्यागा जो शुभअशुभ कर्मफल भक्तिमान  प्रिय मेरे ।17।
     जो सम शत्रु मित्र में व मानापमान सुख-दुख  में
     अनु-प्रतिकूल द्वंद्व में सम व जो आसक्तिरहित हो ।18।
     जो समझे स्तुतिनिंदा सम मननशील तुष्ट कुछ में
     स्थिरमति जो अनिकेत वे भक्तिमान प्रिय मुझको ।19।
     श्रद्धायुक्त परायण मुझमें जो इस धर्म्य अमृत का 
     जैसा कहा करें वैसा ही  वे हैं प्रिय अत्यंत  मुझे ।20।


             भक्तियोग नाम का बारहवाँ अध्याय समाप्त 
 

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हिन्दी साहित्य में आजकल व्यंग्य का कारोबार तेज़ी से चल रहा है। लगभग हर निबंध, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि, में व्यंग्य के छींटे देखे जा सकते हैं। इतना ही नहीं, आज तो व्यंग्य को हिन्दी साहित्य की एक विधा के रूप में भी स्वीकृति मिल गई है।

लेकिन इस समय मेरा मंतव्य शब्द, ‘व्यंग्य’ के विभिन्न सन्धानों, अर्थों और उसके अन्य मिलते-जुलते शब्दों से ‘एलाइंस’, मेल और मित्रता, की खोज करना है। संस्कृत भाषा में जो भी व्यंजनावृत्ति द्वारा बोधित या संकेतित हो, वही व्यंग्य है। जहां गूढार्थ है, संकेतितार्थ है, वहां व्यंग्य है। इस प्रकार ‘व्यंग्य’ और ‘व्यंजना’ का एक प्रकार से चोली-दामन का एक व्यापक सम्बन्ध है। लेकिन आज के नव- लेखन में व्यंग्य उन स्थितियों पर जिन्हें परम्पागत ‘कलात्मक’ रूप से साहित्य-विश्लेषण तथा निरूपण की परिधि में नहीं लाया जा सकता, विडम्बित कर स्पष्ट करना हो गया है। विडम्बित करना, नक़ल उतार कर चिढाना है। “रिडीक्यूल” करना है। स्थितियां आज इतनी विसंगत हो गईं हैं कि उनपर कटाक्ष करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचता। व्यंग्य इस तरह आज तंज़ कसना, कटाक्ष करना, चिढाना, उपहास करना, हंसी उड़ाना, बनकर रह गया है। यह यदि प्रत्यक्षत: न कर, संकेत द्वारा, “व्यंजनात्मक” रूप से किया जाए तो सोने में सुहागा है। ज़ाहिर है, व्यंग्य ने अभी व्यंजना का दामन छोड़ा नहीं है। व्यंजनावृत्ति व्यंग्यपूर्ण भाषा-शैली ही है।

व्यंग्य की मित्रता जहां एक और ‘व्यंजना’ से है, वहीं दूसरी और वह ‘विडम्बना’ से भी जुडा हुआ है। जो उपहास का विषय है, वह विडम्बना है। विडंबनाओं की नक़ल उतारकर, उनकी “पैरोडी” बना कर, हम उनका उपहास करते हैं। सभी विसंगत, अंतर्विरोधी स्थितियां, ‘विडंबनाएं’ कही जा सकती हैं।

कटाक्ष करना, चिढाना, उपहास करना, हंसी उड़ाना – ये सभी वयंग्य के ही रूप हैं। इनमें थोड़ा थोड़ा अर्थ का अंतर भले ही हो, इनमें पारिवारिक साम्यता है। उर्दू का एक शब्द है – तंज़। हिन्दी में अधिक्तर इसे, ‘ज़’ पर नुख्ता हटा कर ‘तंज’ लिखा जाता है। तंज़ का अर्थ ‘कटाक्ष’ के बहुत निकट है। ताना मारना तंज़ कसना है व्यंग्यकार को ‘तंजनिगार’ कहा गया है। जो व्यंग्य पूर्ण हो वह तंजिय: है। हिन्दी ने तंज को तो अपनी भाषा में आत्मसात कर ही लिया है, तंजनिगार और तंजिया भी उसके लिए गेगाने नहीं रहे हैं|। वयंग्य के लिए आजकल हिन्दी में अंग्रेज़ी के आयरनी, सर्काज्म, सैटायर, और विट ( irony, sarcasm, satire, wit) जैसे शब्द भी इस्तेमाल किए जाने लगे हैं। इनके अर्थ में भी थोड़ा थोड़ा अंतर अवश्य है किन्तु एक पारिवारिक साम्यता है।

प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी ‘व्यंग्य’ को ‘व्यंग’ कहना अधिक पसंद करते थे। उच्चारण में उन्हें यह सरल लगता था। संस्कृत में जो शरीर-हीन है, विकलांग है, लंगडा है, वह “व्यंग” है। व्यंगिता विकलांगता है। विवाह के लिए जब लड़की देखने जाते हैं तो मराठी में कहा जाता है, ‘लड़की अव्यंग’ है। अर्थात, लड़की में कोई शारीरिक दोष नहीं है। मराठी भाषा में ताना या ‘आइरनी’ को भी ‘व्यंग’ ही कहा जाता है। शरद जोशी पर स्पष्ट ही मराठी प्रभाव था जो वे हिन्दी में भी व्यंग्य को ‘व्यंग’ कहा करते थे।

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डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८) १०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

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हम लोग बेंगलोर से एर्नाकुलम जा रहे थे । ट्रेन थी, बेंगलोर-एर्नाकुलम एक्स्प्रैस । एसी-थ्री का रिजर्वेशन था। रात के दस बज चुके थे । ट्रेन अपनी रफ़्तार से गंतव्य की ओर बढ़ रही थी। सभी यात्री भोजन आदि से निवृत्त होकर अपने-अपने बर्थ पर लेट चुके थे। मेरी लोअर बर्थ थी। मैंने भी पैर तान दिए और कोई पत्रिका लेकर नींद की आराधना करने लगा। मेरे ऊपर वाली दोनों बर्थ पर दो युवतियां सफ़र कर रही थीं। दोनों ने साथ बैठकर भोजन किया था। उनकी बातों से लग रहा था कि वे दोनों सहेलियां हैं। साथही यह भी कि उनके कुछ साथी दूसरी बोगी में सफ़र कर रहे हैं। मिडिल-बर्थ पर जो थी उसका नाम नैना था और ऊपर वाली बर्थ पर थी, उसका पूर्वा। भोजन के बाद पूर्वा ने कहा, "सुन नैना, मैं दो दिन से सोई नहीं हूं। आज की रात खूब सोना है मुझे। कल से फ़िर नौकरी का चक्कर शुरू हो जाएगा। इसलिए ऐसा कर। ये मेरा टिकट भी तू रख ले । टी. टी. वगैरह आया तो दिखा देना। मैं अब उठनेवाली नहीं। "

"तो जाओ न ऊपर और सो जाओ तानकर। सुबह छह बजे आएगा एर्नाकुलम। तब तक की फ़ुर्सत । वैसे भी, ऊपर के बर्थवाले को एक सुविधा रहती है। वह कितनी भी देर तक सोए, उसे कोई यह कहने नहीं आता कि भैया अब उठ भी जाओ, हमें बैठना है।"

और वे दोनों सो गईं अपनी-अपनी बर्थ पर। थोड़ी देर बाद बत्ती बंद करके मैंने भी कंबल ओढ़ लिया।

करीब साढ़े-ग्यारह बजे, एक यात्री पूर्वा के सामने वाली बर्थ से नीचे उतरा। उतरते वक्त उसने अपना पैर सीधे मेरे हाथ पर रख दिया था इसलिए मेरी नींद खुल गई। हम लोग सोए तब वह बर्थ खाली थी। शायद बादमें एलॉट कर दी गई। यात्री टॉयलेट की ओर गया और लौटकर पुन: अपनी बर्थ पर चढ़ने का प्रयास करने लगा । लेकिन वह चढ़ नहीं पा रहा था। उसकी आयु अधिक नहीं थी। हां, कुछ मोटा जरूर था । लेकिन वह खूब शराब पिए हुए है यह समझते देर नहीं लगी। मेरी सामनेवाली लोअर और मिडिल-बर्थ पर सोए दोनों सीनिअर सिटिजन-यात्री जाग चुके थे। उन्होंने उस लड़खड़ाते यात्री को बताया कि ऊपर किसतरह चढ़ना है। किसीप्रकार वह यात्री ऊपर चढ़ पाया। नैना और पूर्वा भी जाग चुकी हैं यह मेरे ध्यान में आ चुका था लेकिन किसी के कुछ कहने का प्रश्न ही नहीं था। थोड़ी देर में सबकुछ पूर्ववत हो गया।

बारह-साढ़ेबारह बजे पूर्वा की आवाज से मेरी नींद खुली। वह उस शराबी यात्री को अंग्रेजी में डांट रही थी। पल भर बाद उस यात्री को नीचे उतरकर फ़िर टॉयलेट की ओर जाते हुए देखा मैंने। मैं समझ गया कि अबकी नीचे उतरते वक्त उसने पूर्वा को भी डिस्टर्ब किया होगा।

इस बार ऊपर चढ़ते वक्त वह फ़िर लड़खड़ाया। बड़ी मुश्किल से चढ़ पाया।

कुछ समय बाद मेरी फ़िर नींद खुल गई। पड़े-पड़े ही मैंने देखा, पूर्वा उस यात्री को डांट रही है। अबकी उसके तेवर कुछ अधिक तीखे थे। यात्री अपनी बर्थपर उठकर बैठ गया था। पूर्वा ने अपना सिर कुहनी पर रखा था और ...। वह जिस प्रकार से बात कर रही थी उससे लग रहा था कि यात्री ने कुछ बदतमीजी की है। पता नहीं, जानबूझकर या शराब के नशे में नीचे उतरते-चढ़ते अनजाने में ऐसा हो गया ! यात्री ने पूर्वा से कुछ कहा जो मैं समझ नहीं पाया लेकिन सुनकर पूर्वा तड़ाक से नीचे उतर गई। उसने अपनी चप्पल पहनी और तेजी से बोगी के दरवाजे की ओर बढ़ गई। पहले एक दिशा में फ़िर दूसरी ओर जाते देखा मैंने। यात्री अपनी बैग सिरहाने लेकर लेटा ही था कि पूर्वा अटेंडेंट को लेकर उपस्थित हो गई। उसने अंगरेजी में यात्री की शिकायत करते हुए कहा कि उसने बदतमीजी की है और उसे अन्यत्र शिफ़्ट किया जाए। अबतक नैना उठकर बैठ गई थी और मैं भी। हम दोनों ने भी पूर्वा के सूर में सूर मिलाते हुए कहा कि वह यात्री शराब पिए हुए है, बार-बार नीचे उतरता है और हम लोगों को काफ़ी देर से डिस्टर्ब कर रहा है। अटेंडेंट ने यात्री से कुछ बात की। यात्री भी कुछ कहने लगा। शायद दोनों कन्नड़ या मलयालम में बात कर रहे थे इसलिए हम लोग उनका वार्त्तालाप समझ नहीं पाए।

"मैडम, यू प्लीज वेट फ़ॉर सम टाइम। आई विल कॉल द टीटी...।" कहकर अटेंडेंट चला गया। यात्री अपनी बर्थ पर लेटा रहा जबकि पूर्वा नीचे मेरी बर्थ पर एक कोने में बैठी रही।

कुछ ही देर में, अटेंडेंट टी. टी. को लेकर उपस्थित हो गया। टी. टी. ने पूर्वा की शिकायत सुनी। वह यात्री से उसी की भाषा में कुछ बात करने लगा। जवाब में, यात्री उससे बहस कर रहा है इतना ही मैं जान पाया।

" प्लीज, इसे कहीं शिफ़्ट कर दीजिए। इससे हम सबलोग परेशान हैं।" -मैंने सोचा, एक धक्का अपन भी लगा दो ताकि बला टल जाए।

"तुम अपना सामान लेकर मेरे साथ आओ। तुम्हारी कहीं और व्यवस्था कर देता हूं।" –टी. टी. ने फ़ैसला-सा सुनाते हुए यात्री से कहा।

यात्री इतनी जल्दी मान जाएगा, ऐसा नहीं लगा था लेकिन अटेंडेंट ने उसकी बैग उठा ली और उसका हाथ पकड़कर चलने लगा। पीछे-पीछे टी. टी. भी। जाते-जाते वह पूर्वा की ओर देखकर , " सॉरी मैडम..." और मेरी ओर देखकर, " नाउ यू कैन स्लीप पीसफ़ुली" कहना न भूला।

सब लोग अपनी-अपनी बर्थ पर नींदिया रानी के आगोश में पहुंच चुके थे। मेरी परेशानी यह है कि एक बार नींद खुल जाए तो दोबारा बड़ी मुश्किल से आ पाती है।

आधा-पौन घंटे बाद फ़िर टी. टी. आ गया। पूर्वा को आवाज देते हुए कहने लगा,

"सॉरी मैडम,... यह छोटा-सा फ़ॉर्म है। मैंने भर दिया है। आप केवल दस्तखत कर दीजिए।" टी. टी. ने बत्ती जला दी थी।

“किस चीज का फ़ॉर्म है ये!”- पर्स में से चष्मा निकालते हुए पूर्वा ने जानना चाहा।

"दिस इज द फ़ॉर्म ऑफ़ कम्प्लेंट फ़्रॉम द पैसेंजर । ...फ़ार द सेक आफ़ अर सेफ़ गार्ड । इफ़ ही लाजेज्‌ कम्प्लेंट अगेंस्ट मी...।"

" आपने उसे कहां शिफ़्ट कर दिया?" मेरी उत्सुकता जाग गई थी।

" फ़ॉर द टाइम-बीइंग मैंने उसे अटेंडेंट की बर्थ पर सोने के लिए कह दिया है। अटेंडेंट से कहा, आज के दिन वह फ़र्श पर एडजस्ट हो जाए। और कहीं तो जगह है नहीं।"

"पता नहीं वह क्यों इस प्रकार बिहेव कर रहा था?"

"सर, वह अपग्रेडेड पैसेंजर है। पिया हुआ तो है ही। अपग्रेडेशन में उसीका नंबर लगा तो हम लोग भी क्या करें। ...बहरहाल, आप लोगों को परेशानी हुई इसलिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।"

पूर्वा ने फ़ार्म पढ़कर दस्तखत कर दिए। टी.टी. चला गया। बत्ती बुझा दी गई।

कुछ देर बाद टी. टी. अपने साथ एक गणवेशधारी व्यक्ति को लेकर आया। उसके गणवेशपर लगे हुए तमगों से लग रहा था कि वह टी.टी. का कोई वरिष्ठ अधिकारी हैं। टी. टी. ने पूर्वा को आवाज दी- "एक्सक्यूज मी मैम....। ही इज इनचार्ज आफ़ एसी कोच । ही जस्ट वाण्टस्‌ टू कन्फ़र्म योर कम्प्लेंट...।"

इनचार्ज ने पूर्वा से पांच-सात सवाल पूछे और "थैंक्स्‌ ..." कहकर दोनों चले गए।

जैसे-तैसे नींद लगी ही थी कुछ आवाज आयी । एक यात्री दोनों हाथों में सामान लेकर हमारे कूपे में आया था। उसने सामान नीचे रखा और मोबाइल की टॉर्च से बर्थ-नंबर्स पढ़ने लगा। मेरे सामनेवाली बर्थ पर लेटे यात्री ने पूछा, " मे आई हेल्प यू जंटलमैन...।"

"मैं फ़ॉर्टी-सिक्स ढूंढ रहा हूं । वह मुझे एलॉट हुई है...।"

" सबसे ऊपरवाली, जो खाली है, वही है फ़ॉर्टी -सिक्स...।"

" जी, थैंक्स...। थोड़ी मेहरबानी करेंगे अंकल...! मेरा कुछ और सामान दरवाजे के पास पड़ा है। मैं दो मिनट में लेकर आता हूं। तबतक जरा-सा ध्यान रखेंगे मेरे इस सामान पर !"

" ओ के...नो प्रोब्लेम...।" सुनकर आगंतुक सामान लेने चला गया।

मैं आंखें मूंदकर आहट लेने लगा कि एकबारगी वह यात्री सामान लेकर आ जाएं और अपनी बर्थ पर व्यवस्थित हो जाएं तो मैं सो जाऊं।

यात्री आया। उसके पास जरूरत से ज्यादा सामान था। हमारी बर्थ के नीचे इतने सामान के लिए कदापि जगह न थी। उसे अपना सामान जमाने के लिए काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी। उसके इस प्रयास में पूर्वा और नैना का सामान इधर-उधर हो गया था । वे उठीं । उनकी बैग्ज्‌ जहां खिसका दी गई थीं, उन्होंने वहीं चेन लगा दीं । मैंने घड़ी देखी। चार बज रहे थे। सोचा, अब भी कुछ समय नींद ली जा सकती है।

कुछ देर बाद मैंने देखा, टी. टी. और वह शराबी यात्री दोनों पूर्वा को जगाने का प्रयास कर रहे थे। "एक्सक्यूज मी...एक्सक्यूज मी मैडम...।" पूर्वा उठकर बैठ गई।

" मैडम, ही वान्टस्‌ टू एपोलोगाइज...। कहता है, जो कुछ हुआ उसके लिए माफ़ कर दीजिए। उसे अलूवा में उतरना है। उसका स्टेशन आ रहा है। "

"ठीक है न, आपका जो प्रोसिजर होगा उसके अनुसार कीजिए। मुझे कोई आपत्ति नहीं है...ओ के!"

" मैडम, ये आपका कम्प्लेंट वापस ले लीजिए। " टी. टी. ने प्रोफ़ार्मा वापिस करते हुए कहा।

" ओ के, एनी थिंग मोर..!"

" नो मैडम, थैंक्स्‌... बस, कम्प्लेंट वापिस लिया करके यहां दस्तखत कर दीजिए।"-एक नोट-बुक सामने करते हुए टी. टी. ने कहा।

पूर्वा ने नोट-बुक में हस्ताक्षर कर दिए।

थोड़ी देर बाद हम सब का स्टेशन आनेवाला था। पूर्वा का एक साथी हमारे कूपे में आकर सामान की चेन खोलने लगा। पूर्वा ने उसे रात का सारा वृत्तांत सुनाकर अंत में कहा, " जानते हो, सारी रात सो नहीं पायी मैं।"

"अरे यार, इससे तो अच्छा था, मुझसे आकर कहती अपनी परेशानी। बाजूवाली बोगी में ही तो था मैं। तुम वहां सो जाती। मैं यहां चला आता। कोई डिस्टर्बनस्‌ नहीं । रातभर मस्त सोया मैं। यहां निपट लेता मैं उस शराबी से । जरूरत पड़ती तो स्साले को दो लगा भी देता।"

सुनकर पूर्वा को पता नहीं कैसा लगा लेकिन मुझे आज भी लग रहा है कि पूर्वा को वैसा ही करना चाहिए था। अगर वह वैसा करती तो न केवल उसकी और मेरी बल्कि उस कूपे के बाकी यात्रियों की भी वह रात नींद के लिए मोहताज न होती। ❒❒

 

-भगवान वैद्य ‘प्रखर’

30 गुरुछाया कालोनी, साईंनगर, अमरावती-444607

 

E-mail: vaidyabhagwan23@gmail.com

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              जीवन एक  ऐसा सागर है जिसमें आनंद का अथाह जल भी है और शोर मचाती पीड़ा की लहरें भी। जीवन रूपी पुष्प दुख की धरा पर ही खिलकर सौरभ बिखेरता है । साहित्य विविध रूपों में मानव जीवन को प्रभावित करता आया है और भविष्य में भी करता रहेगा ।  कहा जा सकता है  कि  साहित्य और मानव जीवन का संबंध बिंब प्रतिबिंब के  रूप में सामने आता है । मानव जीवन की  घटनाओं,गतिविधियों ,आशा दुराशा का  समग्र ब्यौरा विस्तृत फलक  पर प्रस्तुत करने की साहित्यिक  विधा का नाम है : उपन्यास । उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद के  शब्दों में  ‘‘मैं उपन्यास को मानव चरित्र का चित्रमात्र समझता हूँ । मानव चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके  रहस्यों को खोलना ही  उपन्यास का मूल तत्त्व है ।’’

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वर्तमान पीढ़ी के  युवा व्यंग्यकारों में श्री शशिकांत सिंह ‘शशि’ ने अपने नाम से नहीं अपितु काव्य कर्म से प्रसिद्धि पाई है । लेखन में उनके  तेवर काव्य व्यक्तित्व के  शोभावर्धक  जेवर है । चाहे आम आदमी हो या खास, नेता  हो या अभिनेता , योगी हो या भोगी । सभी की तह में जाकर व्याप्त विसंगतियों , बुराइयों आदि को अपनी लेखनी की नोंक  पर रखा है । इनकी कलम जीवन की जटिलताओं से , सामाजिक  विषमताओं से, प्रशासन और राजनीति की कुटिलताओं से दो दो हाथ करती हुई दिखाई देती है ।

‘प्रजातंत्र का प्रेत’ इनका पहला प्रकाशित उपन्यास है । औपन्यासिक  तत्त्वों जैसे - पात्र. विषयवस्तु, संवाद एवं चरित्रचित्रण ,देशकाल एवं वातावरण.शैली एवं उद्देश्य के  आधार पर यह  एक  संपूर्ण कृति है । उपन्यास की कथावस्तु मंत्री  हीराबाबू  के  इर्द गिर्द घूमती है । यही उपन्यास का केंद्रीय पात्र है ।कथोपकथन के  माध्यम से विषयवस्तु का विस्तार होता है । उपन्यास को पढ़ते समय सारी घटनाएँ मस्तिष्क  पटल पर सजीव हो उठती है ,पाठक  मानो पाठक  न होकर कोई भोक्ता हो ।

वर्तमान राजनीति की उठापटक ,गुंडागर्दी, बाहुबल से वोट प्राप्ति ,झूठे आश्वासन ,नेताओं की दलबदलू नीति,जाति धर्म के  नाम पर चुनाव लड़ना इत्यादि समस्याओं के  लिए न केवल राजनेता जिम्मेदार है अपितु वर्तमान समाज का ढांचा इसके  लिए पूर्णतया जिम्मेदार है । क्योंकि  नेता भी समाज का एक  हिस्सा है । व्यक्ति और समाज एक  दूसरे के  पूरक  है । व्यक्ति के  बहुआयामी व्यक्तित्व के  निर्माण के  लिए माता पिता, परिवार , पड़ोस ,संगे संबंधी ,समाज और वो समस्त परिवेश भूमिका निभाता है जिसके  संपर्क में उसका संवर्धन होता है । परिवार और समाज व्यक्तित्व निर्माण के  लिए एक  तरह से हवा- पानी, खाद का काम करता है ।

‘प्रजातंत्र का प्रेत’ व्यंग्य उपन्यास में राजनीति की विसंगतियों को केंद्र में रखकर प्रकारांतर से सामाजिक मूल्यों के  विघटन और लुप्त होती मानवीय संवेदना के  प्रति लेखक  चिंतित है । उपन्यास में हीराबाबू भारतीय राजनेता की भूमिका में है । नेताजी के  मरने के  बाद चित्रगुप्त के  द्वारा उनके  कर्मों का लेखा जोखा प्रस्तुत किया जाता है । भूलोक  के  नेता को देवलोक  में देवताओं के  समक्ष पेश किया जाता है । धरती पर किए गए कर्मों के  आधार पर उनको स्वर्ग या नरक  में भेजने पर विचार विमर्श होता है । यहीं से उपन्यास की कथा पूर्वदीप्ति शैली में आगे बढ़ती है ।

नेता जी की पारिवारिक  ,शैक्षिक  एवं सामाजिक  पृष्ठभूमि से लेखक  पाठकों को अवगत कराता चलता है ।

पिताजी दौलतदास के  पास दौलत की कोई कमी नहीं है । हीराबाबू विद्यार्थी जीवन में धनबल से शिक्षा का बल प्राप्त करते है । दौलतदास के  लिए बेटे की शिक्षा उनकी सामाजिक  प्रतिष्ठा और गौरव का प्रतीक  है । इसलिए पिता द्वारा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष बेटे के  गलत कामों पर पर्दा डाला जाता है । अति संपन्नता और अति विपन्नता दोनों मनुष्य के  नैतिक  पतन का कारण होती है । हीराबाबू अति संपन्नता के  शिकार हुए । शिक्षक  मिश्रा जी ने हीराबाबू को सही रास्ता दिखाने का प्रयास किया । बदले में शिक्षक  को नौकरी से निकलवा दिया गया । इस प्रकार हीराबाबू स्कूल से कॉलेज ,जेल से बेल की हवा खाते हुए आधुनिक  भारतीय राजनेता की सारी योग्यता प्राप्त कर चुके थे । जो कुछ नहीं कर सकता ,वो देश तो चला ही सकता है । इस ध्येय वाक्य को ध्यान  में रखकर  हीराबाबू ने कलियुग की कामधेनु समझी जाने वाली राजनीति  में प्रवेश किया ।

अपने दो साथियों बंदूक  सिंह और बकरीवाला के  सहयोग से उन्होंने राजनीति में अपने सितारे बुलंद किए । बलंत्रयम् (धन बल , बाहुबल एवं आत्मबल ) जिसके  पास हो भला उसे कौन हरा सकता है,? कोई नहीं । परंतु राजनीति में आत्मबल का उपयोग आत्म सम्मान को दाँव पर लगा कर ही किया जा सकता है । स्वयं लेखक  के   शब्दों में ‘‘बकरी वाला का धन,हीराबाबु का मन और बंदूक सिंह का गन । धन मन गन जब जुरे तो अधिनायक  तो बनना ही था’’ (पृ.सं.३८ )

आज भी धर्म जाति और संप्रदाय के  नाम पर चुनाव लड़े और जीते जाते है । धर्म की आड़ में और जाति के  कंधों पर सवार होकर किस तरह आम जनता को गुमराह किया जाता है, इसका उदाहरण देखिए ‘‘जाति और धर्म,जनता को बरगलाने के  यही दो नुस्खे हैं । इन्हीं के  आधार पर राजनीति खड़ी करो ।’’ (पृ.सं ६९)

आज मीडिया भी अपनी विश्वसनीयता और निष्पक्षता खोती जा रही हैं । दबाव और प्रभाव में आकर ही सूचनाएँ प्रसारित की जा रही है । जनहित और आम आदमी की समस्याओं को हाशिये में धकेल दिया गया है । पत्रकार जलज सिंह ‘निर्जल’ के  शब्दों में ‘‘दास का कर्तव्य है कि  स्वामी की इच्छा को ही आदेश माने .हीरा चालीसा कितना लोकप्रिय हुआ था । जन जन का कंठाहार बन गया था ।’’ (पृ.सं.९७)

चित्रगुप्त के  समक्ष नेताजी की सुनवाई होती है । हीराबाबू के  द्वारा सभा में अपने माता पिता, गुरु आदि को बुलाया जाता है और अपने कर्मों के  लिए इन सभी को दोषी ठहराया जाता है ।

स्वयं हीराबाबू के  शब्दों में ‘‘बच्चा कानों  से नहीं आंखों से भी सीखता है ।’’ इस पर एक  लंबी बहस चलती है । अंत में कोई निर्णय न कर पाने की स्थिति में चित्रगुप्त द्वारा मंत्री हीराबाबू को प्रेत बना दिया दिया जाता है । आज लोकतांत्रिक  मूल्यों एवं मानवीय मूल्यों का जो पतन हो रहा है ,उसके  लिए क्या हीराबाबू जैसे लोग ही जिम्मेदार है या फिर पूरी सामाजिक  व्यवस्था ? हमारी सामाजिक  की  बुनियाद कमजोर क्यों होती जा रही है ?  एक  व्यक्ति क्या समाज पर हावी होता जा रहा  है ? इन सभी प्रश्नों के  उत्तर के  लिए हमें आत्मावलोकन एवं आत्मविश्लेषण की पुनः आवश्यकता आन पड़ी है  ।जरूरत है हमें अपने अंदर झांकने की ,कि  कहीं हमारे भीतर भी कोई प्रेत तो नहीं छिपा । अंत में चित्रगुप्त के  इन शब्दों से उपन्यास की इतिश्री होती है ‘‘तुम्हें मुक्ति तब ही मिलेगी जब जनता में इतनी जागृति आ जाए कि  वह नेताओं का चयन गुण दोष के  आधार पर करने लगे । तब तक  के  लिए भटकते रहो ।’’(पृ.सं. १७४)

                  बहरहाल ,रचना के  प्राणतत्त्वावलोकन एवं हृदयंगम के  लिए सुधी पाठक एवं विद्वद्जन इन पंक्तियों को आधारभूत माने तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए  -

                यस्यास्ति वितं स नरः कुलीन , स पंडितः स श्रुतवान गुणज्ञः ।

                स एव वक्ता स च दर्शनीय ,सर्वे गुणाः कांचनमाश्रयन्ते  ।।

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     आलोच्य कृति :  प्रेजातंत्र का प्रेत

     लेखक  : शशिकांत सिंह ‘शशि’

     प्रकाशक : अमन प्रकाशन

    मूल्य : १७५ पेपर बैक

कमलेश ‘कमल’

                                                                                                    (हिंदी शिक्षक)

                                                                                                   मु.पो. भगवतगढ

                                                                                        जिलाःसवाईमाधोपुर राजस्थान

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हमारा सांस्कृतिक पर्व-गणगौर तीज

श्रीमती शारदा नरेन्द्र मेहता

(एम.. संस्कृत विशारद)

गणगौर पर्व का प्रारम्भ होली दहन पूर्णिमा के दूसरे दिन से प्रारम्भ होता है। विवाहित महिलाओं को सौभाग्य प्रदान करने वाला तथा अविवाहित कन्याओं को उत्तम वर प्राप्ति का आशीर्वाद देने वाला है। इस पर्व पर गण (शिव) गौर (पार्वती) का पूजन किया जाता है। इन्हें ईसर-गौर भी कहा जाता है। इसका समापन चैत्र शुक्ल तृतीया को होता है। कुछ घरों में यह परम्परा है कि होली की राख से कंकड उठाकर होली के दूसरे दिन से इस व्रत का प्रारम्भ करते हैं। इस दिन जवारे बोए जाते हैं। प्रतिदिन इसे सींचा जाता है-

म्हारा हरिया जवारा हो राज, लंबा तीखा सरस बद्या।

ईसर जी रा बाया हो राज, गौरा देवी सींच लिया।।

प्रतिपदा से गणगौर तीज के एक दिन पूर्व तक प्रतिदिन चल समारोह निकाला जाता है। महिलाएँ और कन्याएँ सिर पर कलश रखकर उसमें फूल पाती सजाकर रखती है और चल समारोह आगे बढ़ता है। दो कन्याओं को वर-वधू के परिधान पहिनाकर जुलुस में सम्मिलित किया जाता है। सभी महिलाएँ मनोरंजन करते हुए गणगौर गीत गाती है-

खेलन दो गणगौर आलीजा म्हने पूजन दो गणगौर

म्हारी सहेलियाँ जोवे बाट कि खेलन दो गणगौर।

मालवा प्रान्त में घरों में पाटिये पर लाल कपड़ा बिछा कर उसमें कलश में थोड़ा जल भर आम के पत्ते, फूल रख कर पूजन के लिये स्थापित किया जाता है। गणगौर की प्रतीक स्वरूप शिव-पार्वती की मूर्ति रख पूजन के लिये स्थापित किया जाता है। सास ननद को वायना देने का भी कुछ घरों में रिवाज है। कंकू, मेंहदी व काजल की सोलह-सोलह टिकियाँ दीवार पर लगाई जाती है। सुहाग सामग्री अर्पित कर पूजन आरती की जाती है।

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राजस्थान में गणगौर पर्व का अत्यधिक महत्व है। वहाँ का यह पर्व विदेशों में भी प्रसिद्ध है। विदेशी सैलानी प्रतिवर्ष इस पर्व में सम्मिलित होते हैं। निमाड़, मालवा तथा गुजरात में भी प्रकारान्तर से यह पर्व मनाया जाता है। तीज के दिन महिलाएँ उपवास रखती हैं। पीतल या लकड़ी का मुखौटा जो गौरी का प्रतीक होता है उसे लकड़ी की कुर्सीनुमा चैकी पर रखा जाता है। उसे सुन्दर वस्त्राभूषण से सजाया जाता है। विभिन्न सौभाग्य सामग्री से उसका पूजन किया जाता है। आटे में हल्दी डालकर दूध से गूँथ कर प्यारे-प्यारे सुन्दर गहने बड़ी तन्मयता से महिलाएँ बनाती हंै और श्रद्धा भक्ति से गौर को पूजन के समय अर्पित करती है-

टीकी बाई गौरा ने सोहे तो

ईसर जी बैठ धड़ाय......

नैवेद्य में मीठी वस्तु, शकर पारे व मठरी का विशेष महत्व होता है। चैकी पर बैठी हुई गणगौर का चल समारोह बैण्ड-बाजे के साथ किसी बगीचे में जलाशय के समीप पहुँचता है। वहाँ भी गणगौर की पूजन आरती होती है। गणगौर को पानी पिलाया जाता है, झाले देते हैं, पान बीड़ा खिलाया जाता है, नृत्य गान करते हैं, इस प्रकार यह पर्व पूर्ण होता है। प्रौढ़ महिलाएँ गणगौर व्रत की कथा सुनाती है। हर क्षेत्र की कथाएँ विविधता पूर्ण हैं। यह दन्तकथा भी समाज में अत्यधिक प्रचलित है-

एक बार शिव पार्वती अपनी प्रजा का दुःख दर्द दूर करने की इच्छा से पृथ्वी पर आये। उन्हें रास्ते में एक घोड़ी दिखाई दी। वह प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी। पार्वती शिवजी से बोली महाराज घोड़ी बैचेन क्यों है? शिवजी बोले देवि! इसे बच्चा हो रहा है। पार्वतीजी बोली महाराज ऐसा कष्ट है तो मेरे लिए आप गाँठ बाँध लो। शिवजी ने कहा फिर गाँठ नहीं खुलेगी। दोनों आगे बढ़ने लगे। चलते-चलते एक शहर में आये। वहाँ सुनसान था। लोगों के चेहरे पर उदासी थी। पूछने पर ज्ञात हुआ कि गर्भवती रानी प्रसव पीड़ा से परेशान है तो पार्वतीजी बोली कि मेरे लिए तो आप गाँठ बाँध लो।

शिवजी बोले सोच लो पार्वती यह दूसरी गाँठ है। फिर शिव पार्वती आगे बढ़े। वहाँ उन्हें एक गर्भिणी गाय मिली। वह भी प्रसव पीड़ा से दुःखी थी। शिवजी ने बताया इसे भी बच्चा होने वाला है। पार्वती जी बोली आप मेरे लिये तो गाँठ बाँध ही लो। शिवजी ने पार्वती को सावधान किया और कहा पार्वती सोच समझ लो। यह बाँधी हुई गाँठ खुलेगी नहीं। पार्वती नहीं मानी। समय बीत गया। शिव पार्वती वापस अपने धाम जाने लगे। रास्ते में उन्हें वही घोड़ी दिखी जो अपने बच्चे के साथ घूम रही थी। वही शहर भी मार्ग में आया। शहरवासी खुश थे। चारों ओर प्रसन्नता थी। पूछने पर ज्ञात हुआ कि रानी को बेटा हुआ है। आगे चलने पर उन्हें वही गाय माता दिखी जो अपने बछड़े को प्यार कर रही थी। इन सभी के मातृत्व को देखकर पार्वती जी उदास हो गई। शिवजी ने कहा पार्वती हम तो गाँठ बाँध चुके हैं। समय बीतता रहा। एक दिन पार्वतीजी ने उबटन लगाया। उबटन छुड़ाने पर उन्होंने उस उबटन का एक पुतला बनाया और उसे द्वार पर रख कर कहा कि मैं स्नान करने जा रही हूँ। किसी को अन्दर न आने देना। कुछ समय पश्चात् शिवजी आये। बालक ने विरोध किया तो उन्होंने उसका सिर काट दिया और अन्दर चले गये। पार्वती को जब यह घटना ज्ञात हुई तो उन्होंने शिवजी को बतलाया कि वह तो हमारा मानस पुत्र था। उसे जीवित कीजिये।

शिवजी ने अपने गणों से कहा कि ऐसे बच्चे का सिर काट कर लाओ, जिसकी माँ शिशु की तरफ पीठ कर के सोई हो। गणों ने देखा कि सभी जगह माताएँ अपने बच्चे की ओर मुँह कर के सोई थीं। केवल एक हथिनी अपने बच्चे की ओर पीठ कर के सोई थी। गणों ने उसके बच्चे का सिर काट दिया और ले आये। शिवजी ने उस बालक को हाथी के बच्चे का सिर लगा दिया। पार्वती जी बोली यह तो विचित्र आकृति है। शिवजी ने कहा कि आज से इसका नाम गणेश हुआ। सभी स्थानों में सर्वप्रथम इसका मांगलिक पूजन किया जावेगा। यह हमारे लिए बड़े आनन्द की बात है। जैसे पार्वती को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई उसी प्रकार उनके भक्तों को पुत्र प्राप्ति होवे यही हमारी ईसर-गौर से प्रार्थना है।

कथा समाप्ति के बाद महिलाएँ पूजन-आरती कर एवं नैवेद्य लगाकर व्रत का समापन करती हैं।

 

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श्रीमती शारदा नरेन्द्र मेहता

एम.ए. संस्कृत विशारद

103 ए व्यास नगर, ऋषिनगर विस्तार

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माँग का सिन्दूर और उसकी उपयोगिता

श्रीमती शारदा नरेन्द्र मेहता

(एम.ए. संस्कृत विशारद)

माँग में सिन्दूर लगाने की प्रथा अति प्राचीन है । सौभाग्यवती महिलाओं के सोलह श्रृंगार में से एक श्रृंगार माथे पर माँग में सिन्दूर लगाना भी है। हमारे समाज में वैदिक रीति की विवाह पद्धति में मंडप में कन्यादान विधि संपन्न होने के बाद वर, वधू की माँग में सिन्दूर लगाता है तथा उसे मंगल सूत्र पहनाता है। इसके पश्चात कन्या अखण्ड सौभाग्यवती कहलाती है ।

 

सिन्दूर भारतीय समाज में पूजन-सामग्री का एक प्रमुख घटक है । देवी पूजन में माँ पार्वती, माँ दुर्गा के नौ रूप, माँ सीता तथा अन्य भक्ति स्वरूपा माताओं के पूजन में सिन्दूर का अपना एक विशेष महत्व है । देवी पूजन में सिन्दूर सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। आज भी नवविवाहिता अपनी मांग के अंदर सिंदूर बड़ी कुशलता पूर्वक लगाती है । सिन्दूर लगाने की प्रथा दक्षिण भारत की अपेक्षा उत्तर भारत में अधिक प्रचलित है । सिन्दूर माँ लक्ष्मी का भी प्रतीक है । इसीलिये गृह-लक्ष्मी इसका प्रयोग सहर्ष करती है ।

कतिपय वृद्ध माताओं का कथन हैं कि यदि महिलाएँ बालों के बीचों बीच माँग में सिन्दूर सजाती है तो यह उनके पतियों के लिए दीर्घ एवं स्वस्थ आयु का प्रतीक होता है । यदि सिन्दूर मध्य में न लगाकर दायें-बायें तिरछी ओर लगाया जाता है तो ऐसी मान्यता है कि उन महिलाओं के पति का जीवन बाधाओं से भरा रहता है । नौकरी, व्यवसाय आदि में भी स्थिरता का अभाव दिखलाई देता है ।

सिन्दूर महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है । विवाह के पश्चात कन्या की जीवन-शैली, पारिवारिक वातावरण तथा उसकी दिनचर्या आदि सब कुछ बदल जाता है । ऐसे में पारिवारिक परिवर्तन भी तनाव का कारण बन जाता है । दोनों परिवारों के सदस्यों के स्नेह सिंचित व्यवहार से वातावरण को मधुर बनाया जा सकता है । सिन्दूर का प्रयोग तनाव को दूर करने में औषधि का काम करता है । सिन्दूर में पारा नामक तत्व पाया जाता है । पारा आयुर्वेद में एक औषधि के रूप में प्रसिद्ध है। सिन्दूर लगाने वाले स्थान पर एक महत्वपूर्ण ग्रंथि स्थित है जिसे ब्रह्मरन्ध्र ग्रंथि कहा जाता है । यह एक संवेदनशील ग्रंथि होती है । सिन्दूर में पारा होता है। इस ग्रंथि के सम्पर्क में आने से महिलाओं का तनाव कम होता है। विवाह पश्चात् तनाव जनित रोगों से बचने में सिन्दूर की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। तुलसी कृत श्रीरामचरितमानस में सीता विवाह का वर्णन करते हुए तुलसीदासजी कहते है :-

प्रभुदित मुनिन्ह भॉवरी फेरीं। नेत्र सहित सब रीति निबेरी ।।

राम सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहि न जाति बिधि केहीं ।।

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड दोहा 324-1-4

मुनि ने आनन्द पूर्वक भाँवरे फिराई और नेग सहित सब रीतियों को पूरा किया। श्रीरामचन्द्रजी ने सीता की मांग में सिन्दूर लगाया। यह शोभा किसी प्रकार कही नहीं जा सकती

श्रीराम भक्त हनुमान् के बारे में एक कथा प्रचलित है कि एक समय हनुमान जी ने सीताजी को मांग में सिन्दूर लगाते हुए देख लिया । श्रीहनुमान् जी ने उत्सुकता वघ् सीता माता से इसका कारण पूछा ! सीता माता ने उन्हें बतलाया कि वे भगवान श्रीरामजी की दीर्घायु के लिए मांग में सिन्दूर लगाती हैं । बस फिर क्या था ? हनुमान् जी ने सोचा कि क्यों न वे अपना सम्पूर्ण शरीर सिन्दूर से रंग ले ताकि मेरे स्वामी दीर्घायु हो जावें । उन्होंने अपना सम्पूर्ण शरीर सिन्दूर से तेल लगाकर रंग लिया । तभी से आज तक परमप्रिय रामभक्त हनुमान जी को सिन्दूर का चोला चढ़ाया जाता है ।(कल्याण हनुमान् अंक पृष्ठ 319 गीता प्रेस गोरखपुर)

सिन्दूर का पौधा राजस्थान ,मध्यप्रदेश, तथा छत्तीसगढ़ आदि स्थानों पर पाया जाता है। पौधे में फलियाँ लगती हैं और फलियों से निकलने वाले दानों से ही सिन्दूर का निर्माण होता है । माँ कामाख्यादेवी के मंदिर में मिलने वाले सिन्दूर का भी बहुत महत्व है । ऐसा कहा जाता है कि वहॉ पर कुछ विशेष प्रकार के पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े प्राप्त होते है जिन्हें पीसकर सिन्दूर बनाया जाता है । वहॉ भक्तों को भी यही सिन्दूर दिया जाता है ।

वर्तमान समय में सिन्दूर की शुद्धता लुप्तप्राय है । प्रत्येक वस्तु में मिलावट है । नकली सिन्दूर स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकता है । चिकित्सकों का कथन है कि इसका उपयोग करने से नेत्रज्योति कम हो सकती है । असमय बाल सफेद होने की संभावना भी रहती है । चर्म रोग भी हो सकता है । खुजली आदि घातक व्याधियों से महिलाएं ग्रसित हो सकती हैं । कई चिकित्सक भी सिन्दूर का उपयोग न करने की सलाह देते हैं । कई महिलाओं कंकू, रोली, या तरल गंध का उपयोग सिन्दूर के स्थान पर करने लगी हैं ।

भारतीय समाज में यह परम्परा रही है कि सिन्दूर एक विवाहिता के लिए सौभाग्य का प्रतीक है । प्रत्येक विवाहिता को उसे अवश्य लगाना चाहिए चाहे वह कंकू रोली या द्रव रूप में ही क्यों न हो। परंतु इन सबके साथ ही यह भी आवश्यक है कि अपने जीवन साथी के साथ सद्व्यवहार,चारित्रिक गुण, मैत्री पूर्ण व्यवहार, अपने परिवार के प्रति प्रेम,दया, सेवा तथा सहानुभूति के साथ ही अपने पति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने पर भी अपने पति की आयु वृद्धि में सहायक हो सकती है । कन्या के जीवन में विवाह के पश्चात आने वाले तनाव को केवल सिन्दूर लगाने से ही दूर नहीं किया जा सकता वरन् दोनों पक्षों द्वारा नव वर-वधु को पर्याप्त स्नेह देकर उन्हें अपने नये सगे संबंधियों के प्रति मार्गदर्शन देकर जीवन को सुखी बनाया जा सकता है । परिवार में सुख समृद्धि और शांति केवल माँग में सिन्दूर लगाने से ही नहीं आती अपितु उसके लिए मधुर व्यवहार भी आवश्यक है ।

श्रीमती शारदा नरेन्द्र मेहता

एम.ए. संस्कृत विशारद

103ए व्यास नगर, ऋषिनगर विस्तार उज्जैन (म.प्र.)456010

0734.2510708 9406660280

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रेहान,रेहान खान कॉलेज का मोस्ट पॉपुलर (कई बार फेल होने के कारण) डैशिंग,चार्मिंग, बिंदास और कूल बंदा। एक अजीब सी मस्ती हमेशा उस पर छाई रहती है। हमेशा हँसना, मुस्कुराना,शरारतें करना और गैंग के साथ क्लास बंक कर मटरगस्ती करना ही उसका शगल।नई जनरेशन को पूरी तरह रिप्रेजेंट करता है रेहान।

एक दिन रेहान और उसकी गैंग क्लास बंक कर कॉलेज कैम्पस में डेरा जमाए थे।तभी हंसी की आवाज ने सबका ध्यान खींचा। निगाहें हँसने वाली की तरफ मुड़ गई। ये अविका थी, बिलकुल रेहान की तरह अल्हड़ ,मस्त,कूल और बिंदास। "ये लड़की कौन है",रेहान ने अपने गूगल दोस्त से पूछा। "अविका,फर्स्ट ईयर,न्यू एडमीशन,अपने ही शहर से,ट्राय मत मारना,बिलकुल भाव नहीं देती है ,काफी खतरनाक है, फिर उसके भाई भी है पूरे के पूरे साँड़, एक ही बार में काम तमाम कर दें,"गूगल ने रिप्लाय किया। "वाह मेरे गूगल सब पहले से ही रेडी।अब तो इससे मिलना ही पड़ेगा।इसकी पसंद नापसन्द,डिश ,कलर,बेस्ट फ्रेंड,अंकल,आंटी, पड़ोसी, पैट ,आई मीन पूरी कुंडली चाहिए मुझे,"रेहान ने गूगल के सिर पर धौल जमाते हुए कहा। अगले दिन जैसे ही अविका ने कॉलेज में एंट्री मारी रेहान उसके सामने,कलाई पकड़ थोड़ा सा टशन दिखाते हुए बोला,"हाय ब्यूटीफुल व्हाट्सएप्प"। अविका च्यूइंगगम का बबल उसके मुंह पर फोड़ आगे बढ़ गई,जिसे वह काफी देर से बनाने की कोशिश कर रही थी। रेहान चेहरे से च्यूइंगगम साफ करते हुए अपना सा फेस लिए खड़ा रह गया। "मैंने कहा था ट्राय मत मार ,अब भुगत",गूगल ने चेहरे से च्यूइंगगम हटाने में रेहान की हेल्प करते हुए कहा। "बड़े-बड़े कॉलेजों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं, गूगल"रेहान ने एक धौल जमाते हुए फ़िल्मी स्टाइल में कहा। रेहान ने अभी तक हार नहीं मानी थी,वह डेली हाय ब्यूटीफुल ,व्हाट्सएप्प कहे बिना नहीं मानता और अविका कभी दोनों पैरों के बीच में घुटने से तो कभी पेट में पंच से जबाब दे ही जाती।हाँ पर उसने अभी तक मुँह से जबाब नहीं दिया था। रेहान दर्द में आधा झुका मुस्कुराता रह जाता लेकिन फिर भी दोनों में से किसी का रूटीन नहीं बदला ।न रेहान ने पूछना छोड़ा और न अविका ने जबाब देना। फिर एक दिन "हाय ब्यूटीफुल ,व्हाट्सएप्प",रेहान के इतना कहने के बाद अविका उसे कई दिनों तक बिल्कुल नहीं दिखी ।

उस दिन अविका के भाई भी कॉलेज आये हुए थे।रेहान का अविका का हाथ पकड़ कर उससे इतना कहने के बाद उसकी इतनी पिटाई हुई कि कई दिनों बाद जब उसके चेहरे की स्वेलिंग कम हुई तो आंखें खुली,तब पता चला कि हाथ पैरों में कई जगह प्लास्टर लगा है। फाइनली आज उसे अविका नजर आ ही गई।"हाय हैंडसम, व्हाट्सएप्प,"अविका ने शरारत भरे लहजे में कहा। "और सब ठीक -ठाक मियाँ"। "जी बेगम सब ठीक -ठाक,"रेहान ने मुस्कुराते हुए जबाब दिया। इतना सुनते ही रेहान के लिए लाए फूल उसके सीने पर जोर से फेंक और उसके प्लास्टर बंधे पैर को बेड पर धड़ाम से पटक अविका चली गई ।पर रेहान अब भी मुस्कुरा रहा है।यही तो अविका को सबसे ज्यादा चिढ़ाता है। दोनों में इसी बात का टशन है कि कौन पहले बंद करे। लेकिन दोनों में से कोई भी झुकने के लिए रेडी नहीं है।

उधर रेहान के दोस्त को ये समझ नहीं आ रहा है कि रेहान अविका के भाइयों की F.R.I क्यों नहीं करा रहा है। उसके कुछ करने पर ही अविका के भाइयों को सबक सिखाया जा सकता है। रेहान है कि " बड़े -बड़े देशों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं," के पीछे पड़ा है। पता नहीं उसने DDLJ इतनी क्यों देखी है। "अरे यार अब रिश्तेदारी में किसी को तो एडजस्ट करना ही पड़ेगा । साले हैं मेरे,बेगम के भाई हैं, थोड़ा एडजस्टमेंट तो चलता है। वैसे भी ग़ांधी के देश के वासी हैं, अहिंसा परमोधर्म,"रेहान ने बेड पर पड़े पड़े ही एक्टिंग करते हुए कहा।

इस सबके बाद भी अविका और रेहान का टशन जारी है। अविका रोजाना हॉस्पिटल आती है, रेहान के लिए फ्लावर लिए और उसके टूटे हाथ -पैरों को थोड़ा और दुखाने। लेकिन रेहान भी गुरु है।अपनी धुन का पक्का ।"और बेगम व्हाट्सएप्प"उसका नया स्लोगन,जिसे कहे बिना वह नहीं मानता और उसके टूटे हाथ-पैरों को पटके बिना अविका। दोनों ही जिद्दी न उसका मुस्कुराना बंद हुआ और न ही अविका का फ्लावर ला उसके सीने पर जोर पटकना।

ऐसे ही कई दिन बीत गए । एक दिन अविका रेहान से मिलने आई।पर उसके चेहरे पर न हंसी है और न ही शरारत । न उसने फूल रेहान के सीने पर फेंके न ही उसके प्लास्टर चढ़े हाथ -पैरों को इधर- उधर पटका । बस फूल रखकर चली गई। रेहान ने आवाज लगाई,"सब ठीक तो है बेगम"। पर अविका बिना जबाब दिए ही चली गई।

रेहान ने गूगल को बुलाया। "जल्दी कर डॉक्टर बुला,प्लास्टर कटवा,कॉलेज जाना है, कुछ गड़बड़ है ,बेगम एकदम चुपचाप,तू सोच मैटर कितना बड़ा होगा,"रेहान कहते कहते बेड से उतर गया।

अविका आज कुछ ज्यादा ही खुश है। पता नहीं क्यों आज ये ईडियट इतना बुरा नहीं लग रहा ।पता नहीं क्यों मन कुछ गाने को हो रहा है। पता नहीं क्यों पर माहौल थोड़ा सा बदला बदला लग रहा है। " कुछ तो हुआ है ,कुछ हो गया है........."

रेहान को हॉस्पिटल में लगभग एक महीना होने को था। इसलिए अविका को पता नहीं क्या सूझा कि जागते ही सीधे हॉस्पिटल चली गई। रात के ही कपड़ों में।घर पर बस"अभी आती हूँ "बोल कर। "यार रेहान मुझे एक बात बता।तुझे ठीक हुए 10 दिन होने को आये लेकिन तू है कि हॉस्पिटल में डेरा जमाए बैठा है। सब बात से बेखबर,अपनी गैंग से अलग, अकेला सा,आखिर क्या बात है भाई जो तू इस हॉस्पिटल को छोड़ना नहीं चाह रहा है। किसी नर्स से तो सेटिंग नहीं हो गई है तेरी," गूगल ने जानना चाहा। "अरे वाह आज गूगल को भी जबाब चाहिए, गूगल फैल, हे भगवान ये क्या हुआ ?अब दुनियाँ का क्या होगा ? हम जैसों का क्या होगा " ? रेहान ने मजाक करते हुए कहा। "पता नहीं यार क्या है? क्यों है? बस है। उसका आना मुझे अच्छा लगता है। कम से कम इसी बहाने उस से दो बातें तो हो जाती है । ये नोंक-झोंक, उसका पैर पटकते हुए जाना,पेट पर पंच ,सब अच्छा लगता है। कभी कभी तो लगता है उसके लिए 10 दिन क्या पूरी जिंदगी हॉस्पिटल में गुजार दूँ" । " यू आर इन लव माय फ्रेंड, यू आर इन लव,"गूगल ने कहा। "कोई लव शव नहीं है वो तो हॉस्पिटल में नर्स अच्छी हैं", रेहान ने हँसते हुए कहा। उन दोनों की बात सुन अविका बिना रेहान से मिले ही वापस आ गई।

रेहान हॉस्पिटल से कॉलेज पंहुचा तो अविका उसे पहले जैसी ही मिली। " हाय हैंडसम व्हाट्सएप्प,"और रेहान के बिना पूछे ही जबाब दिया ,"ज्यादा शॉक्ड होने की जरुरत नहीं है। जब तुम 10 दिन एक्टिंग कर सकते हो तो क्या मैं 10 मिनट भी नहीं। आखिर बात तो बराबरी की है"। रेहान सरप्राइज्ड। "तुम्हारा फेस पढ़ना जानती हूँ। अब ज्यादा सरप्राइज होने की जरुरत नहीं है। वरना बहुत कुछ पढ़ लूँगी,"अविका ने शरारत से कहा। इस वाकये के बाद दोनों की दोस्ती हो गई। पर नोंक-झोंक में कही कोई कमी नहीं आई। न रेहान का मुंह चलाना बंद हुआ न अविका का हाथ पैर ।

"गूगल चल यार , लेट हो जायेंगे। आखिर अविका की शादी है,"रेहान ने 'अविका वेड्स विवेक' का कार्ड देख रहे गूगल से कहा।

"अविका जल्दी कर,रेहान आ गया", लवी ने आकर अविका से कहा।

दोनों के बीच न आंशू ,न गिले -शिकवे, न भाग जाने के आईडिया, न समाज से लड़ने की बेचैनी। बस एक ख़ामोशी ,सच्चे प्यार की भाषा, जो सब बोल गई। स्पर्श ने जिसे और गहराई दे दी। देर तक दोनों एक दूसरे को बाँहों में भरे खड़े रहे। दिल कुछ इस तरह से धड़कने लगे मानो धड़कनें एकाकार हो इश्क की गवाही दे रही हों। फिर अविका चली आई"तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊँगी,नहीं जी पाऊँगी"बस इतना सा कहकर। कमरे तक आते -आते आँखों के सब्र का बांध टूट गया। आँसुओं की बाढ़ में पुरानी यादें दिल के किनारों पर ठोकर देने लगी..............कैसे दिन थे वे जब वह रेहान के बिना रह नहीं पाती थी। बस दोनों एक दूसरे के साथ हमेशा कैंपस में धमा -चौकड़ी और मटरगस्ती करते रहते थे। कॉलेज के बंटी-बबली थे दोनों। हाँ बस चोरी नहीं करते थे उनकी तरह। अविका के दिन की शुरूआत रेहान के फोन से और रात उसके गुड़ नाइट मेसेज से होती।कोई भी दिन ऐसा नहीं होता जब दोनों न मिल पाएं। डेली मिलने के बाद भी फ़ोन पर घंटों बात होती । रेहान नाम का सूरज अविका के घर में 24 घंटे उदीयमान रहता। अविका अगर एक दिन भी रेहान से न मिल पाए तो पूरे दिन चिड़चिड़ी बनी रहती । एक बार रेहान उसे बिना बताये शहर से बाहर चला गया ,वो भी पूरे दो दिन के लिए। न कोई फोन ,न s.m.s, और तो और फोन भी नॉट रिचेबल। हद थी यार। अविका की सांसें तो जैसे रुक सी गई। न किसी से कुछ कहते बने न सुनते। दो दिन तक जान हलक में अटकी रही। रेहान के वापस आने पर इतना लड़ी थी रेहान से कि बड़ी मिन्नतों से मना पाया था बेचारा। पूरे कॉलेज के सामने घुटनों पर बैठ कान पकड़ के सॉरी बोला था बेचारे ने।(ये सोचते ही अविका के आंसुओं से भीगे चेहरे पर हलकी सी मुस्कान आ गई) अविका ने उसे खड़े होने का इशारा किया और एक जोरदार तमाचा उसके गाल पर रशीद कर रोते हुए उसके गले लग गई। उस दिन पहली बार उसे एहसास हुआ रेहान से प्यार का। "पिछले दो दिनों से मेरा दिल बैठा जा रहा था। क्या हालत थी मेरी तुम्हे पता भी है। तुम लड़के न कभी नहीं समझते । बता के नहीं जा सकते थे। एसटीडी से कॉल कर लेते। एक s.m.s  भी नहीं "। रेहान उसे चुप करने की कोशिश लगातार सॉरी बोले जा रहा था ।उस दिन दोनों ने जाना कि उनके बीच में जो वह दोस्ती से बहुत ज्यादा था। वह केवल   'आई लव यू 'से भी बहुत आगे तक था। ये शायद इश्क था जो हर 3 महीने में बदलने वाले बी. एफ. और जी.एफ. के प्यार से अलग था। ये घुटनों पर बैठ 'आई लव यू' बोलने वाला नहीं बल्कि बिना बोले सब समझ जाने वाला प्यार था। ये 'बंटी-बबली' का लव नहीं ,ये तो 'राम-लीला'और 'बाजीराव-मस्तानी' का इश्क था।

बंटी -बबली का लव एक दम कूल और बिंदास । पर अविका और रेहान का इश्क परिवार और समाज के बंधनों में बंधा हुआ है बिलकुल वैसे ही जैसे 'राम -लीला' और 'बाजीराव-मस्तानी' का बंधा हुआ था

"ये वही लड़का था न",अविका के भाई ने गुस्से से पूछा ।" साले की हिम्मत तो देखो , भरे कैफे में प्रपोज़ कर रहा था। पहली पिटाई तो याद ही नहीं रही। खैर अबकी बार ऐसी की है कि जिंदगी भर नहीं भूलेगा "। भैया अब भी गुस्सा में थे। "पापा वह रेहान है। बहुत अच्छा लड़का है। मेरी ही कॉलेज में पढ़ता है। बहुत चाहता है मुझे। आपको एक बार उससे मिलना चाहिए। प्लीज एक मौका तो दो",अविका ने रोते हुए कहा। " तू तो कुछ बोल ही मत, शादी के लिए झट से रेडी हो गई थी। एक मुसलमान से शादी, मुसलमान की तरफदारी, शर्म नहीं आती तुझे। इस घर में रहते हुए तूने मुसलमान से दोस्ती भी कैसे की",भैया ने कहा।  "मुसलमान है, तो? इंसान नहीं है क्या ?खून का रंग लाल नहीं है क्या? पापा प्लीज एक बार उससे मिलो तो सही । बहुत खुश रखेगा मुझे । बहुत प्यार करता है मुझसे और मैं भी खुद से भी ज्यादा", अविका ने अपने पापा के हाथ को पकड़कर रिक़्वेस्ट करते हुए कहा। अविका के पापा ने कुछ नहीं कहा बस अपना हाथ अविका के हाथों में से छुड़ा लिया। " आप सभी कान खोल कर सुन लो बहुत प्यार करती हूँ उससे । शादी करुँगी तो बस उसी से और एक बात और भइया अपने भाड़े के टट्टुओं से कह देना अगली बार रेहान से हाथ भी लगाया तो हाथ तोड़ के रख दूँगी । पति है मेरा, होने वाला," अविका गुस्से में कहती हुई हॉस्पिटल चली गई। बाकी सब वही खड़े रह गए। अविका के पापा जो सब कुछ सुन रहे थे , उनके चेहरे पर तनाव साफ था । साथ ही हिंदी फिल्मों के विलेन की तरह एक हलकी सी भयानक मुस्कान भी। कुछ दिनों में रेहान हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हो गया। सब कुछ पहले जैसा ही लग रहा था। घर पर भी सब शांत ही था । पर शायद किसी बड़े तूफान से पहले की शांति । फिर एक दिन शांत पानी में कंकड़ फेंक ही दिया। " कल तैयार रहना, विवेक और उसकी फैमिली तुम्हें देखने आ रही है। विवेक अच्छा लड़का है। अच्छा खासा कमाता है। रेपुटेटेड फैमिली से है। तुम्हें खुश रखेगा। रही बात रेहान की तो वह प्यार नहीं अट्रैक्शन है जो कुछ दिनों में अपने आप ही समाप्त हो जाएगा। इसलिए रेहान को भूल विवेक पर फोकस करो। वैसे भी मुझे कोई नाटक नहीं चाहिए", अविका के पापा ने समझाते हुए सख्त लहजे में कहा। अविका इसका मतलब जानती थी लेकिन फिर भी" पापा आप जानते हैं मैं रेहान से प्यार करती हूँ सिर्फ और सिर्फ रेहान से ,तो फिर शादी विवेक से कैसे"। " बहुत सुन ली तुम्हारी, बकवास । हमारे घर की लड़की और एक मुसलमान से शादी ? हिंदुओं में औरतों ने बेटे पैदा करना बंद नहीं कर दिया है, अभी बाँझ नहीं हुई है हमारे धर्म की औरतें। और तुम पर जो इश्क का भूत सवार है, दो दिन भी नहीं लगेंगे इसे उतरने में । जब जिंदगी की सच्चाई से सामना होगा तब किसी का इश्क काम नहीं आएगा । और अगर लवमैरिज करके इतिहास में नाम लिखवाने की इतनी ही इच्छा है तो किसी अपने धर्म के लड़के से करो ,"अविका के पापा ने गुस्से में कहा। " प्यार कोई पिज़्ज़ा नहीं है कि k.f.c. का नहीं मिला तो दूसरा ले लो,"अविका ने उतने ही गुस्से में जबाब दिया । अविका के पापा का गुस्सा सातवें आसमान को छू गया। उनके एक तमाचे से अविका पलंग पर जा गिरी। "बहुत लाडली हो इसीलिए इतनी हिम्मत कर सकी हो............क्या तुम्हें रेहान जिन्दा अच्छा नहीं लग रहा है,"  बस इतना कह अविका के पापा बाहर चले गए। और पीछे रह गई अविका अपनी सिसकियों के साथ। वह इतनी कमजोर नहीं थी लेकिन वह जानती थी रेहान के लिए अपने प्यार को। वह जानती थी पापा और उनकी अप्रोच को। वह जानती थी उनकी पावर को। वह जानती थी उनके सिद्धान्त और उसूलों को। वह जानती थी उसूलों से बाहर जाने वालों के हश्र को। वह जानती थी उसूलों को बनाये रखने के पागलपन को।

विवेक और अविका की सगाई हो गई और अगले महीने शादी। इन सब घटनाओं ने अविका को एक जिन्दा लाश बना दिया । एक हंसती खिलखिलाती, बिंदास लड़की बिल्कुल चुप, गुमसुम। न कोई इच्छा, न आशा । कॉलेज तो कब का छोड़ दिया। जो 24 घंटे एफ बी,ट्विटर,व्हाट्सएप्प पर ऑनलाइन रहती आज उसका वहाँ अकॉउंट तक नहीं । न कोई कॉल लेना न किसी मैसेज का जबाब देना । एक बार तो सोचा सुसाइड कर ले पर फिर रेहान की सोच इरादा बदल लिया । कुछ खास डिसीजन ले लवी के साथ कॉलेज पहुँच गई अपने पहले अवतार में । वहाँ भी रेहान को इग्नोर करती रही। कुछ देर तो रेहान झेलता रहा लेकिन आख़िरकार वह फट पड़ा। "आखिर ऐसी क्या बात हो गई जो इतने दिन से नाराज हो,व्हाट्सएप्प,एफबी,ट्विटर, जी मेल सभी जगह से गायब। न कॉल अटेंड कर रही हो ,न मैसेज का रिप्लाय कर रही हो । यहाँ तक गूगल से तो बात कर सकती हो पर मुझसे नहीं, आखिर ऐसा क्या हो गया है," रेहान गुस्से में अविका के कन्धों को जोर से हिलाते हुए बोला । अविका ने खुद को रेहान की गिरफ्त से बाहर निकाला और उस से मुंह फेर खड़ी हो पहले से रटी बातें कहने लगी," देखो रेहान हम दोनों काफी दिनों से साथ थे पर मुझे कुछ दिनों से रिलाइज हुआ कि मैं तुम्हारे साथ खुश नहीं हूँ । हम दोनों कभी भी लाइफपार्टनर नहीं हो सकते । तुम में बचपना भरा पड़ा है और मुझे मेच्योर लड़के पसंद हैं। कुछ दिन पहले मेरी मुलाकात विवेक से हुई और पहली ही नजर में उसे दिल दे बैठी । अब तो उसके बिना एक एक पल मुश्किल लगता है । वैसे इंतजार लंबा नहीं है अगले ही महीने शादी है हमारी । तुम आओगे तो मुझे अच्छा लगेगा", । रेहान की तरफ देखे बिना ही अविका वहाँ से चली गई। नहीं देख सकती थी रेहान को टूटते हुए। कितना मुश्किल था ये सब उसके लिए। काश वह कह पाती कि उसके बिना एक एक पल मुश्किल है। काश इस इंतजार का भी कभी एन्ड होता। पता नहीं इन सच्चे प्रेमियों के बीच में क्या होता है । आँखों से देखी और कानों से सुनी बात पर भी यकीन नहीं करते । ऐसा ही था अविका और रेहान के बीच , रेहान का दिल अविका की किसी भी बात को सच मानने के लिए तैयार ही नहीं था। आखिर उसने सच्चाई पता कर ही ली और हजारों खतरे लेते हुए पहुँच गया अविका के कमरे में। "मैं सब जानता हूँ अविका, तुम्हें और झूठ बोलने की जरुरत नहीं है। हम कहीं दूर चले जायेंगे, बहुत दूर । नहीं रहना ऐसे समाज में जहाँ प्यार को ही न समझ सके कोई ,"रेहान ने अविका का हाथ पकडे हुए कहा। इस छुअन में कुछ ऐसा था कि अविका और नाटक न कर सकी और रोते हुए रेहान के गले लग गई । काफी देर रोने के बाद जब वह नार्मल हुई तो उसने पूरी बात रेहान को कह सुनाई। "काश ऐसा हो सकता रेहान। काश हम भाग सकते। पापा की मुस्लिमों से नफरत मेरे लिए प्यार से कई गुना ज्यादा है। हम दुनियाँ के किसी भी कोने में क्यों न छुप जायें वह हमें खोज ही लेंगे। वो हमें नहीं छोड़ेंगे। इसलिए हमारा अलग रहना ही बेहतर है। अलग रह कर अपने प्यार को तो जिन्दा रख पाएंगे"। इतना कह कर अविका सिसकियाँ लेने लगी क्योंकि वह जानती थी लास्ट की लाइन के पीछे का दर्द और झूठ। दोनों काफी देर तक सिर से सिर लगाये एक दूसरे को तसल्ली देते रहे । लेकिन आँखों से आंसू बहना बंद ही नहीं हुए। "अगर अल्लाह को यही मंजूर है तो यही सही । तुम्हारी शादी में शामिल होने जरूर आऊंगा," रेहान इतना कहकर चला गया ।

"अविका,अविका .... ओपन द डोर,"लवी कमरे के गेट को थपथपाए जा रही है।लवी की आवाज सुन अविका प्रेजेंट में लौट आई। उसने आँशु पोंछ गेट खोल दिया । लवी की साँस भूली हुई है। "अविका तुझे नीचे चलना चाहिए," और अविका का आंसर जाने बिना ही उसे हाथ पकड़ नीचे खींच ले गई । यह रेहान था,जो पापा को कन्वेंस करने की कोशिश कर रहा था। अविका दौड़ती हुई रेहान के पास पहुँच गई। "रेहान तुम पागल हो गए हो क्या ? यहाँ क्या कर रहे हो ?जाओ यहाँ से जल्दी, गो........,"एकदम घबराई और बदहवास जोर से चिल्लाई। अविका के पापा और उसके भाइयों को यह नागवार गुजरा । सभी रेहान की तरफ लपके। अविका बिजली सी फुर्ती से रेहान के आगे अपनी कनपटी पर रिवॉल्वर रखे खड़ी हो चिल्लाई," अगर किसी ने एक कदम भी आगे बढ़ाया तो मैं खुद को यही ख़त्म कर लूँगी , रुक जाओ सभी । रेहान तुम जाओ यहाँ से । किसी अच्छी सी सेफ जगह पर चले जाना । हमारा साथ यही तक था "।रेहान ने भी अपने कपड़ों में छिपी रिवॉल्वर निकाल ली। "नहीं अविका , मैं नहीं जा सकता । तुम्हारे बिना जीने की तो मैं सोच भी नहीं सकता। सोचा था तुम्हारी बिदाई के बाद खुद को ख़त्म कर लूँगा । पर अब तो पहले ही आर -पार की कंडीशन बन गई है"। " पापा ,शायद आप इस प्यार को समझ पाते। शायद उसूलों के लिए आपका जूनून कम हो पाता। शायद खून के लाल रंग को आप समझ पाते। सोचा था रेहान के जाने के बाद सब ख़त्म करूँ ,पर अब तो सब बिगड़ गया,"अविका बोली। दोनों जानते थे यहाँ से बचकर जाना नामुमकिन है। ऑनर किलिंग यहाँ भी तय है। दोनों ने एक दूसरे का हाथ थाम लिया। "आप लोगों के हाथों मरने से अच्छा है एक दूसरे के हाथों ही मर जायें",दोनों चिल्लाये। "हमारी एक एक साँस पर एक दूसरे का हक़ है सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे का"। फिर दो गोलियाँ चली , एक दूसरे के लिए और सब ख़त्म। दोनों की लाशें अब भी एक दूसरे का हाथ थामे हैं मानो जिद्द कर रही हों अपने इश्क को मुकम्मल करने की ।

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