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March 2017
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1.नारी शक्ति है....

पुराणों में पढ़ते आये हैं ..
नारी शक्ति है....
बुजुर्गों से सुनते आये हैं... नारी शक्ति है....
शक्ति है तभी देती है जन्म...
सींचती है अपने दूध से.. ..
रग रग में भरती है लहू...
फिर भी अबला और बेचारी है...
एक छोटी सी शक की चिंगारी....

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कर देती इसके दामन को तार तार.....
इस शक के आगे अहिल्या ; सीता भी हारी है.......
बहन बनकर ;माँ ;बनकर;बेटी
बनकर बीबी बनकर सब फर्ज निभाती है....
अपना जीवन अपने रिश्तों को सम्भालने में निकालती है....

तभी तो जीवनदेने वाले ने अपना अक्स उतारा है.....
पूजा करने के योग्य है....
फिर भी एक लड़की बोझ नजर आती है... ...
कोख में मौत की मजबूरी...
उसकी लाचारी है....
अब वक्त ने बदल ली है करवट...

ऩ तो वो अबला है ना ही बेचारी है....
आसमान से करती है बातें.....
उसने अंतरिक्ष में जगह बना ली है.....
जिसने उसके सतीत्व पर बुरी नज़र डाली है

उसने अपनी बरबादी लिखवा ली है....
दो घरों की लाज है...
दो कुलों को तारती है...
नारी से ही नर है... नारी से सृष्टि सारी है....

नारी शक्ति है... शक्ति ही नारी है.........
यह बात समझ में आयेगी...

पर तब आयेगी जब जीवनदायी नारी खत्म हो जायेगी....
अब भी वक्त है संभल जाओ...

उठो आगे बढ़ो...
नारी और इसके सम्मान को बचाओ...
नहीं तो ढूँढने से भी नारी नहीं मिल पायेगी....
नारी ना बची तो सारी सृष्टि नष्ट हो जायेगी...
नारी शक्ति है... शक्ति ही नारी है........
             रागिनी गर्ग

2.बस एक बार खुद से तू कर ले प्यार |

हौंसलों के पंख लिए उड़ने को बेकरार.....

पंख हैं बिंधे हुये परिवार के प्यार की सुई है आर -पार.....
बढ़ना चाहती है.. मंजिल को पाने के लिए...
पैर रूढ़ीवादिता और परम्परायें हैं जकड़े हुये....
क्या करेगी? कैसे मुकम्मल जहां पायेगी?
बिन पाँव और पंखों के चारदीवारी के पिंजरे में

हो कैद उसकी ख़्वाहिश भी मर जायेगी....
ख़्वाहिशों का घोंटकर गला कैसे खुश रह पायेगी..
नारी के आत्मसम्मान को अब खुद नारी ही बचायेगी.....
पीठ पछताने से हांसिल कुछ नहीं होगा....
अपना वजूद खुद तुझको ही ढूँढना होगा...
खुद पर कर यकींन तू ...

तुझे जहाँ मिलेगा....
मुकम्मल जमीं है तेरी ..

चाहे तो आसमान भी मिलेगा.............
क्यों वजूद भूल कर अपना...

तू खुद को मिटाती है?..........

क्यों तू भी नहीं जहाँ में किस्मत आजमाती है?.....
नहीं है तू किसी से कम..

यह समझना तुझ को ही होगा....

लुटाकर खुशियाँ अपनी हासिल कुछ नहीं होगा...
जीने का हक तुझको भी है...
तू जी ले ज़िन्दगी अपनी ..
खुद को भुलाकर....
तू कर रही है बन्दगी किसकी? ....
हक पाने का..

हक तुझको भी है मान मेरी बात..

आत्मा की बात सुन और उठा आवाज़ ...
तोड़कर बेड़ियां तुझको आगे को बढ़ना है.....
हर महिला दिवस पर सिर्फ आहें न भरना है....
खुशियाँ तेरे दामन में होंगी अपार...
बस एक बार... बस एक बार ..
.......खुद से तू कर ले प्यार
                    -Ragini Garg

3.दिन तय है ~
बच्चों से प्यार करने का दिन तय है ..
फिर रोज सितम ढाओ......
बच्चों के काम न करने का बाल श्रमिक दिन तय है..

फिर नन्हें हाथों से रोज काम कराओ... 
महिलाओं के सम्मान का दिन तय है..
फिर बेइज्जती पर उतर आओ....
नवरात्रों में कन्या पूजन के दिन तय हैं
फिर  बच्चियों को हवस का शिकार बनाओ...
माता -पिता का दिन तय है तोहफे ले लो.
.. फिर फोन से हटकर आपसे बात हो जाए तो शुक्र मनाओ.

मम्मी पापा सुनने को तरस जाओ...
शरा्द्ध के दिन तय हैं पण्डित को हल्वा पूरी रोज खिलाओ..

जब तक बुजुर्ग जिन्दा हैं उनको पानी को तरसाओ....
हिन्दी अपनाने का दिन तय है.....
फिर अंग्रेजी अपनाओ....
अपनी शादी में साड़ी लंहगा पहनना तय है........
फिर विदेशी कल्चर अपनाओ
शहीदों को नमन करने का दिन तय है
उसके बाद भूल जाओ.....
देशभक्ति दिखाने का दिन तय है..
फिर देश को भी बेच खाओ....
और तो और प्यार करने का दिन भी तय है...
फिर नफ़रत निभाओ.....
सब कुछ करने के लिये दिन तय है
उस दिन वो काम करो फिर हमेशा के लिए भूल जाओ....
वाह ;वाह ;वाह भारत क्या किस्मत पायी है
यहाँ कुछ भी करने के लिए दिन तय करके

बाकी के दिनों से पाबन्दी हटायी है...

सही मायनों में स्वतंत्रता की परिभाषा

भारत तूने ही अपनायी है


                  रागिनी गर्ग

4.यह जीवन रंगमंच है
        .............................
मौत ने ज़िन्दगी से कुछ यूँ कहा
ऐ ज़िंदगी एक बात बता
       तू सूरज का उजाला है
खिलता हुआ प्रसून है
      मैं काली अंधियारी रात
मेरे आगे बस शून्य है
     फिर तू क्यों करती है जफा
जबकी मैं हमेशा निभाती हूँ वफा
      तू छोड़ देती जीव को मझधार में
मैं साथ लेकर जाती शमशान में
ज़िंदगी बोली ऐ मौत बता
       इस में मेरी भी क्या है खता
सुबह का सूरज रात की गोद में छुप जाता है
        खिलता हुआ प्रसून मिट्टी में विलय हो जाता है

यह जीवन एक रंगमंच है
     यहाँ हर कोई अपना किरदार निभाता है
जो कुछ भी यहाँ होता है
      वो ऊपर बैठा नाटककार करवाता है
एक की साँस खत्म होती है
      तो दूजा नवजीवन पाता है
हर प्रभात में नया सूरज
       और नया प्रसून आता है।
क्यों करता है जीव साँसों से प्रीति?
        जबकि नहीं चलती यहाँ किसी की राजनीति
न ज़िंदगी हारी न मौत जीती
    जीवन - मरण, हार - जीत सब कुदरत की है रीति।

 

क्वार सुदी प्रतिपदा से नवमी तक पवित्र मन के साथ अत्यंत संयम से नवरात्र में रखे जाने वाले व्रत में माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है। प्रतिपदा के दिन प्रातः ही स्नानादि के उपरांत ‘दुर्गासप्तशती’ का पाठ नियमित रूप से हर दिन किया जाता है। वैष्णव लोग राम की मूर्ति स्थापित कर 9 दिन तक ‘रामचरित मानस’ का पाठ करते है। नवरात्र के दिनों में अनेक स्थानों पर रामलीला और श्रीकृष्णलीला का भी भव्य आयोजन होता है। माँ दुर्गा के मन्दिरों की भव्य सजावट की जाती है। इन मन्दिरों और लीला स्थलों पर भक्तजनों की भारी भीड़ रहती है।

क्वार सुदी अष्टमी को दुर्गाष्टमी का त्यौहार मनाया जाता है। इन दिन मंदिरों में भगवती दुर्गा को उबले हुए चने, हलुवा, पूड़ी, खीर आदि से भोग लगाकर प्रसाद का वितरण किया जाता है। इस दिन महाशक्ति को प्रसन्न करने के लिये हवन आदि भी किया जाता है। जहाँ इस शक्ति की अधिक मान्यता है वहाँ यह त्यौहार एक उत्सव का रूप धारण कर लेता है। इस दिन कन्या लाँगुराओं को भोजन कराया जाता है। शक्ति की ज्योति की जय-जयकार की जाती है।

माँ दुर्गा नारी की महाशक्ति की प्रतीक हैं। देवताओं पर जब-जब भी भीषण संकट आया, उनके सिंहासन डाँवाडोल हुए, आसुरी शक्तियों के सामने वे थर-थर काँपे, तब-तब माँ दुर्गा का एक नया शक्ति-रूप प्रकट हुआ। इस नारी-शक्ति रूप ने देवी महाकाली बनकर कैटभ और मधु नामक उन दो दैत्यों का संहार किया जो ब्रह्माजी की हत्या करना चाहते थे। इन दैत्यों ने भगवान विष्णु से 5000 साल युद्ध किया। अत्यंत कुशल रणनीति से माँ महाकाली ने इन दोनों दैत्यों का वध कर स्वर्गलोक में शान्ति स्थापित की। माँ दुर्गा ने देवी महालक्ष्मी का रूप उस समय धारण किया, जब महिषासुर नामक दैत्य समस्त पृथ्वीलोक के राजाओं को हराकर स्वर्गलोक पहुँच गया और उसके समक्ष युद्ध के दौरान देवता हारकर भागने लगे। यह देख माँ दुर्गा ने महालक्ष्मी का रूप धारण किया और महिषासुर को युद्ध में मौत के घाट उतारा। देवी महा सरस्वती का नारी शक्तिरूप तब सामने आया जब शुम्भ-निशुम्भ नामक अत्यंत बलशाली दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण किया और देवता स्वर्ग से भागकर विष्णु की स्तुति करने लगे। उस समय भगवान विष्णु के शरीर से एक ज्योति उत्पन्न हुई। इस ज्योति ने नारीरूप धारण कर शुम्भ-निशुम्भ, धूम्राक्ष, रक्तबीज, चण्डमुण्ड नामक सभी दैत्यों को मारकर देवताओं को पुनः स्वर्ग में स्थापित किया। देवी योगमाया के रूप में माँ दुर्गा उस समय प्रकट हुईं जब कंस नामक राक्षस पृथ्वी लोक में अत्याचार कर रहा था। देवी योग माया ने योग विद्या और महाविद्या बनकर श्रीकृष्ण का सहयोग करते हुए कंस के साथ-साथ चाणूर जैसी अनेक आसुरी शक्तियों को मौत के घाट उतारा। माँ दुर्गा ने पाँचवा नारीशक्ति रूप तब धारण किया जब वैप्रचिति नामक असुर के कुकर्मों से पूरी पृथ्वी व्याकुल थी। उस समय देवी रक्त दंतिका ने अवतार लिया और अपने दाँत गाड़कर वैप्रचिति और अन्य असुरों का रक्तपान कर उन्हें निर्जीव बना डाला। ठीक इसी प्रकार माँ दुर्गा ने शाकुम्भरी, देवी श्री दुर्गा, देवी भ्रामरी, देवी चण्डिका के रूप में नारी शक्ति का प्रयोग करते हुए सूखा के समय जल की वर्षा, दुर्गम नामक राक्षस का वध, सतीत्व को नष्ट करने वाले कामातुर राक्षस अरुण का वध, किया।

वर्तमान युग में भी माँ दुर्गा की नारी शक्ति चेतना के रूप समय-समय पर प्रकट होते रहे हैं। भारतीय नारियाँ अपने शौर्य, पराक्रम, वीरता और सतीत्व रक्षा के लिए पूरे संसार में प्रसिद्धि के शिखर पर रही हैं। एक नहीं अनेक नारियों ने सतीत्वरक्षा हेतु अग्नि शिखाओं का आलिंगन किया है। देश और जाति अथवा नारी सम्मान के लिये प्राणों को उत्सर्ग किया है। वीरागंना वीरमती, रानी दुर्गावती, महारानी कर्मवती, रानी कर्मवती, राजमाता जीजाब़ाई, येसुबाई, राजकुमारी रत्ना ने जहाँ क्रूर, अत्याचारी मुगलशासकों की तलवारों को धूल चटा दी, वहीं रानी लक्ष्मीबाई, वेलु नाचियार, भीमाबाई, रानी चेन्नम्मा, बेगम हजरत महल, पार्वती देवी, प्रीतिलता ने अंग्रेजी साम्राज्य को ध्वस्त करने के लिये तीर तलवार धारण कर यह सिद्ध कर दिया कि वे भी साक्षात दुर्गा हैं।

खनन माफियाओं पर नकेल कसने वाली दुर्गानागपाल, तालिबानियों को टक्कर देती मलाला युसुफ जई, मेरठ की रजिया सुल्तान और बलत्कृत दामिनी के पक्ष में जंतर-जंतर पर लाठियों के वार झेलती नारी शक्ति इसका ज्वलंत प्रमाण हैं कि समाज पर जब भी संकट के बादल छाये हैं, तब-तब नारीशक्ति का एक ज्योतिरूप अँधेरे को चीरता हुआ प्रकट हुआ है।

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सम्पर्क- 15/109, ईसानगर, अलीगढ़

मोबा.- 9634551630

कुछ कांग्रेस के पिट्टू इतिहासकार आज भी जोर-शोर से यह प्रचार करते हैं कि बिना खड्ग और बिना तलवार के स्वतंत्रता संग्राम में कूदने वाले कथित अहिंसा के पुजारियों के ‘आत्मसंयम, आत्मबल और स्वपीड़ा’ से भयभीत होकर आताताई और बर्बर अंग्रेज भारत को आजाद करने को मजबूर हुए। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की असली तस्वीर नहीं है। अगर आजादी सावरमती के संत के ‘ब्रहमचर्य के प्रयोगों’ के बूते आयी तो कांग्रेस उस काल के 1942 के जन आंदोलन को भारतीय जनमानस के सम्मुख क्यों नहीं लाती, जिसमें भले ही गांधी जी ने अहिंसात्मक आंदोलन किये जाने पर जोर दिया था, किंतु सरकारी दमन से विक्षिप्त और क्रुद्ध होकर कथित अहिंसा को नकारते हुए जनता ने अंग्रेजों के सरकारी 250 रेलवे स्टेशनों को नष्ट कर दिया। 600 डाकघरों को आग के हवाले किया। 3500 टेलीफोन और टेलीग्राम के तारों को काट दिया। 70 थानों को जलाकर राख किया। 85 सकारी भवनों को धूल-धूसरित कर डाला। 9 अगस्त 1942 से लेकर 31 दिसम्बर 1942 तक बौखलायी सरकार ने 940 स्वतंत्रता सेनानियों को गोलियों से भूनकर सदा के लिये संसार से विदा कर दिया। पुलिस और सेना की गोलियों की बौछार के बीच 1630 क्रान्तिवीर घायल हुए। 18000 सेनानियों को रक्षा कानून के अंतर्गत तो 60229 सेनानियों को हिंसा फैलाने और रक्तपात करने के आरोप में सलाखों के पीछे भेजा गया।

भारत छोड़ो आन्दोलन का यह क्रान्तिकारी स्वरूप गांधी जी की अहिंसा और उनकी ‘स्व पीड़न’ की नीति पर एक तमाचा था। इस तमाचे और अहिंसावादियों के तमाशे के बीच सिर उठाती कटु सच्चाई केवल यही बयान करती है कि भारतवर्ष गांधी जी की अहिंसा से नहीं, क्रान्ति की फैलती ज्वाला के कारण आजाद हुआ। इस तथ्य को ‘चर्चिल’ इग्लैंड की लोकसभा में इस प्रकार रखते हैं-‘‘कांग्रेस ने अब अहिंसा की उस नीति को, जिसे गांधी जी एक सिद्धांत के रूप में अपनाने पर जोर देते आ रहे थे, त्याग दिया है और क्रान्तिकारी आन्दोलन का रास्ता अपना लिया है।’’

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर यदि समग्र दृष्टि से सोचा-विचारा जाये तो यह तथ्य छुपा नहीं रह जाता है कि जो क्रान्ति की ज्वाला 1857 में भड़़की थी, उसे भड़काने में उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का महत्वपूर्ण योगदान है जो 1780 से ही सक्रिय थे। तत्समय एक विदेशी नागरिक ने कलकत्ता से देश का पहला अखबार ‘बंगाल गजट’ और ‘जनरल एडवाइजर’ जिसे ‘हीकीज गजट’ के नाम से भी पुकारा जाता है, में तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हैस्टिंग्ज और कम्पनी के अधिाकरियों की अनीति और मनमानी पर प्रहार किये थे। 1785 में ‘बंगाल जर्नल’, ‘द वर्ल्ड ’, ‘टेली ग्राफ’, ‘कलकत्ता गजट’ नामक समाचार पत्रों में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अफसरों की घूसखोरी, अन्य काले कारनामों के खिलाफ जमकर लिखा गया। 9 अप्रैल 1807 को आम सभाओं पर प्रतिबंध लगने के बाद क्रान्तिवीरों ने पर्चे छापकर बाँटे और क्रान्ति की आग धधकायी। भारतीय पत्रकारिता के पहले शहीद मौलवी मोहम्मद वकार ने फिरंगियों और उनकी सरकार के खिलाफ जमकर कलम चलायी।

स्वतंत्रता संग्राम के कलम के सिपाहियों में एक तरफ जहाँ लोकमान्य तिलक, विवेकानंद, भगत सिंह, गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रेमचंद, बालकृष्ट भट्ट, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बालमुकुन्द गुप्त, राजा रामपाल सिंह, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, यशपाल, मन्मथनाथ गुप्त, सावरकर, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जैसे अनेक पुरोधा हैं, वहीं तीर-तलवार लेकर अंग्रेजों का रक्त-सत्कार करने वालों में रानी लक्ष्मीबाई, मदनलाल धींगरा, खुदीराम बोस, तात्या तोपे, मंगल पांडेय, सूर्यसेन, दामोदर चाफेकर, बेगम हजरत महल आदि का नाम जगत विख्यात है। लाला लाजपतराय, विपिनचन्द्र पाल, स्वामी श्रद्धानंद, सुभाषचन्द्र बोस चन्द्रशेखरआजाद , भगत सिंह, सूर्यसेन, अशफाक़उल्ला, रामप्रसाद बिस्मिल आदि का जनभावनाओं को उभारकर अंगेजों के प्रति जबरदस्त विरोध-प्रदर्शन करना भी एक ऐसा क्रान्तिकारी हथियार रहा है, जिसके आगे अंगेज थर-थर कांप उठे।

क्रान्ति की भूमिका तैयार करने में कवियों-शायरों ने कविता को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करने का भी काम किया। स्वतंत्रता संग्राम का पैगाम जन-जन तक पहुँचाने में महीदुद्दीन सलीम, शौक किदवई, फैज, मजाज, कैफी आजमी, साहिर लुधिायानवी, बहादुरशाह जफर, तिलक चंद, गोपीनाथ, झम्मन, आनंद नारायण मुल्ला, जोश मलीहाबादी, सोहनलाल द्विवेदी, राम प्रसाद बिस्मिल, आदि का योगदान भी अविस्मरणीय है।

क्रान्ति की आग को घर-घर तक फैलाने या पहुँचाने के लिये ‘रोटियों’ का प्रयोग भले ही आश्चर्यजनक लगे किन्तु यह भी एक ऐसी सच्चाई है जिसका वर्णन इतिहास के पन्नों में दर्ज है। 1857 में एक तरफ जहाँ क्रान्तिकारियों की तलवारें चमकीं, बन्दूकें और तोपें गरजीं वहीं क्रान्ति की ज्वाला धधकाने के लिये और लोगों को अंग्रेजों के विरूद्ध संगठित करने के लिए गावं-गांव में ‘चपातियाँ’ भेजी गयीं। चपातियाँ म.प्र. के इन्दौर से निमाड़ में बाँटी गयीं। उत्तर भारत के अनेक जिलों जैसे मथुरा, अलीगढ़, एटा, मैनपुरी, बुलंदशहर, मेरठ आदि में ये चपातियाँ 1857 के जनवरी-फरवरी माह में बाँटी गयी। रोटियाँ बँटवाने का यह कार्य मद्रास में भी हुआ जिसके फलस्वरूप वैल्लौर में विप्लव हुआ। ये चपातियाँ कौन बनाता है और कहाँ से भेजी जाती हैं, इसका का पता अंगे्रजों के जासूस नहीं लगा पाये। चपातियों के माधयम से क्रान्ति का संदेश भेजने का ब्यौरा अंग्रेज अफसर थार्नाईल की डायरी के पृष्ट 2 व 3 पर दर्ज है।

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सम्पर्क- 15/109 ईसा नगर अलीगढ़। मो. 9634551630

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सरयू रामगंगा के संगम के ऊपर एक बहुत बड़ा और घना जंगल था। जहां अनेक प्रकार के जानवर रहते थे। आस-पास छोटी -मोटी बस्तियां थीं। कभी-कभी गीदड़, खरगोश, हिरन जैसे जानवर गांवों के आस- पास भी दिख जाते थे। सामान्यतः गरमियों में जानवरों को पानी पीने के लिए नदियों की ओर आना पड़ता था।

उत्पाती बन्दरों का तो कहना ही क्या ?जब भी अवसर देखा गांव पर धावा बोल दिया इस पेड़ से उस पेड़, फल-फूलों, पत्तों को नोचते- खाते और जंगल की ओर वापस चले जाते। कई बार इनके छोटे- छोटे बच्चे गांव वालों के कपड़े टांगने के लिए बंधे तारों पर पूरा सरकस दिखाते। डिशों को नचा- हिला सिने प्रेमियों का मजा खराब करते। कपड़े व अन्य सामान भी उठा ले जाते।

एक बार किसी बन्दर के हाथ एक शीशा लग गया। उसने सोचा इसे ले चलता हूं। उसने गांव- घरों में लोगों को उसके सामने खड़ा देखा था। जब उसने भी ऐसा किया तो उसे अपनी तस्वीर दिखाई दी। सोचा यह तो बड़ी अच्छी वस्तु है साथ रखनी चाहिए। इसके बाद वह अपनी सूरत बार- बार देखता हुआ वापस जंगल की ओर जाने लगा। तभी पीछे से दूसरे बन्दर ने झपट्टा मरकर शीशा छीन लिया और भाग खड़ा हुआ। इस छीना झपटी में वह शीशा कहां गिर गया पता ही न चला।

उस बन्दर को भी अगले दिन किसी जरुरी कार्य से दूसरे जंगल जाना पड़ गया।

इधर गिरा हुआ शीशा लोमड़ी को मिल गया। उसने देखा तो उसे अपनी तस्वीर दिखाई दी। सोचा वह तो चित्रकार बन गई है। उसने खरगोश को दिखाया। खरगोश बोला तेरी नहीं इसमें तो मेरी तस्वीर है। तब तक बिल्ली आ गई। उसने छीनकर देखा तो चहक उठी -चुप रहो तुम दोनों पागल हो। इसमें तो मेरी तस्वीर है। इस तरह से जंगल में एक दो तीन चार अनेक जानवर देख- देख कर अपनी तस्वीर बताने लगे। कुछ ने आंखें कमजोर होने की बात कही, किसी ने जादू का खेल बताया। कुछ दूर भागने की बात करने लगे।

झगड़ा बढ़ जाने पर जानवरों ने सोचा क्यों न इसे जंगल के राजा बाघसिंह के पास ले चला जाये। वह दूध का दूध और पानी का पानी कर देगा।

ऐसा सोचकर सभी जानवर बाघसिंह के पास जा पहुंचे। एक साथ इतने जानवरों को देखकर बाघराज चौंक पड़े। उन्होंने अनेक अच्छी- बुरी बातें सोच डालीं। कहीं पड़ोसी राजा ने आक्रमण तो नहीं कर दिया अथवा लोभवश मानव जंगल काटकर या शिकार कर हम सबको पकड़ने आ रहा है आदि- आदि।

सेनापति चीता सिंह ने बाघसिंह का ध्यान भंग किया और बोले - राजा साहब एक वस्तु हाथ लगी है। जिसमें चित्र बना है। आप देखकर बताइये किसकी है। ऐसा कहते हुए सेनापति ने वह शीशा महाराज के सामने रख दिया।

बाघसिंह ने देखा तो भड़क गये और कहा -मूर्खों इतना पता नहीं, इसमें तो मेरी तस्वीर है तुम लोगों की आंखों की जांच करवानी पड़ेगी।

चीता सिंह ने कहा -महाराज, इसमें तो अभी मेरी तस्वीर थी, इधर दीजिए, ऐसा कहकर सेनापति चीतासिंह ने अपने हाथ में लेना चाहा कि हड़बड़ाहट में शीशा जमीन पर गिरकर टूट गया। अब उसमें कई तस्वीरें दिख रही थीं। यह देखकर बाघ चीख पड़ा, साथियों इसमें तो मैं कई जगह पूरा का पूरा दिख रहा हूं । जरूर किसी भूत- प्रेत का चक्कर है।

ऐसा सुनते ही सभी जानवरों की आंखों में चिन्ता की रेखाएं दौड़ गईं। कुछ तो डर से चीखने- चिल्लाने लगे।

इधर वह बन्दर दूसरे जंगल से वापस आया। तो उसे जंगल में कोई दिखलाई न पड़ा, सोचा कहीं कोई संकट तो नहीं, पूरे जंगल में सन्नाटा छाया हुआ है। एक भी जानवर नहीं दिखता है।

बाघराज के पास चलना चाहिए। वहीं से पता चलेगा। कुछ दूर चलने के बाद चीखने- चिल्लाने की आवाजें सुनायी दीं। लगता है जरूर कोई मुसीबत आ गई है। ऐसे में ही मन में सोचता हुआ बन्दर दौड़ लगाते हुए जा रहा था।

उसने सीधे जाकर बाघ से पूछा-

महाराज क्या बात है ? सभी लोग इतना भयभीत क्यों हैं ?

क्या बताऊं -बन्दर जी, हम सब बड़े संकट में हैं। महाराज मुझे बताये तो आखिर बात क्या है बन्दर ने जानना चाहा, ऐसा सुनकर बाघसिंह ने जमीन पर पड़े शीशे को की ओर संकेत कर कहा - देखो ,वहां बने चित्र को देखो। अवश्य किसी भूत- प्रेत का साया है।

बन्दर ने जब जमीन पर पड़े शीशे के टुकड़ों को देखा, तो समझते देर न लगी। वह उन टुकड़ों को हाथ में लेकर बोला- महाराज इनसे भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। यह कोई भूत-प्रेत का साया नहीं है। न नहीं इसमें कोई चित्र है। यह तो शीशा है। इसमें देखने वाले की ही तस्वीर दिखती है।

तुम्हें कैसे पता ? बाघराज ने सन्देह व्यक्त करते हुए पूछा, महाराज मैं कभी -कभी गांवों में जाता हूं। वहां मनुष्यों को इसमें अपना चेहरा देखते हुए देखता हूं। यह शीशा मैं उन्हीं के घर से उठा के लाया था। पर दूसरे बन्दरों की छीना- झपटी में यह रास्ते में कहीं गिर गया था और इसी बीच मैं कहीं बाहर चला गया।

ऐसा सुनना था, कि सभी की जान में जान आई। मटकू बन्दर बोला- बाघराज यह ठीक कह रहा है। मैंने इसको शीशा लाते हुए देखा था।

ठीक है ऐसा कार्य दुबारा न करना। खाने- पीने की वस्तुओं पर हाथ साफ करने तक तो ठीक है पर सामान की चोरी से बचना। बाघराज ने परामर्श दिया।

उसके बाद सभी के चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। सभी खुशी- खुशी अपने घर लौट गये और आनन्द से रहने लगे। बन्दर तो जैसे हीरो बन गया था।

उपरोक्त बालकथा मेरा अपनी नितान्त मौलिक, स्वरचित व किसी भी अन्तरजाल पर अप्रकाशित हैं। अनेक पत्र -पत्रिकाओं में पूर्व प्रकाशित व प्रशंसित हैं ।

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शशांक मिश्र भारती संपादक - देवसुधा, हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर - 242401 उ.प्र. दूरवाणी :-09410985048/09634624150

अनैतिक काम

आज कल शहरों में मैं देखता हूँ कि लोग फ्लेटों में रहते हैं। कोई पांचवी मंजिल पर तो कोई दसवीं पर।

सिर्फ फ्लेट आपका है, छत आपकी नहीं। यदि छत पर घूमने का मानस बनाओ तो छत पर पहुंचने में ही नानी सपने याद आ जाएं। लिफ्ट से आप वहां पहुंच भी जाओ तो छत पर घूमने की जगह ही नहीं। बिल्कुल सटी हुई, आसपास रखी पानी की टंकियां। नीचे देख लो तो वही हार्ट अटेक हो जाए।

नरेन्द्र कोहली ने अपने व्यंग्य सार्थकता में लिखा है कि एक दिन किसी फ्लेट में एक ब्रेसियर उडकर नीचे आ पड़ी थी और चौकीदार अपनी ईमानदारी में उसे ले जाकर प्रत्येक फ्लेट में जाजाकर पूछता फिर रहा था, ‘मेम साहब! यह बनियान आपकी है?’

मेम साहब ब्रेसियर को देखती और चेहरे पर झूठमूठ क्रोधित होने का नाटक कर चौकीदार को घूरती और दरवाजा उसके मुंह पर बंद कर देती। फटाक! बदतमीज चौकीदार!

ब्रेसियर को हाथ में लिए महिलाओं से कोई ऐसे सवाल करता है?

थोड़ी देर में सारी महिलाएं बालकनियों पर खड़ी होकर चौकीदार को देख रही होती कि कौन ब्रेसियर को स्वीकार करता है।

जब चौकीदार नीचे मिसेज सिंह के पास पहुंचता है तो वे झपट कर ब्रेसियर छीन लेती हैं और दरवाजा बंद कर देती हैं। चौकीदार बंद दरवाजे को अपने दांत फैलाकर चिढ़ाता हुआ लौट आता है।

इस प्रकार की स्थिति से चौकीदार को बचाने के लिए मैंने फैसला कर लिया कि फ्लेट में नहीं रहना है। मकान में कोई सुविधा हो या न हो, लेकिन कपड़े सुखाने की पुख्ता व्यवस्था होनी ही चाहिए।

आजकल मैं जिस मौहल्ले में रहता हूँ वहां सभी लोग मेरी जैसी मानसिकता के दिखाई देते हैं। सबकी ग्राउण्ड फ्लोर बनी हुई है। अच्छी खासी खुली छत है। लोगों को बालकनियों में से ताकझांक करने की आदत नहीं है। इसलिए ऊपर मंजिलें नहीं बनाई। सभी ने अपनीअपनी छतों पर मुंडेर में लोहे के पाइप लगवा रखे हैं। पाइपों से तार बांध रखा है। तार पर औसतन सुखाने वाले कपड़ों की संख्या के हिसाब से हुक टांग रखे हैं। तारों व हुकों का उपयोग कपड़ों को सुखाने के लिए किया जाता है। वैसे कपड़े धोने से लेकर, छत पर लाकर तार पर टांगने और सूखने के बाद नीचे ले जाकर कपड़ों की तह करने तक काम मेरी पत्नी ही करती है। लेकिन कभीकभी इनमें से कुछेक या सारे काम मुझे भी करने पड़ जाते हैं।

एक दिन मेरी पत्नी बाजार गई थी। घर पर मैं अकेला था। आकाश में बादल छा रहे थे ऐसा लग रहा था, बारिश होने वाली है। मैंने सोचा, चलो छत से कपड़े ले ही आते हैं। कपड़े भीग जाएंगे तो दिक्कत हो जाएगी।

मैं छत पर चला गया। आसपास की छतों पर देखा, कोई मुझे अपनी पत्नी के कपड़े ले जाता नहीं देख ले। मैंने धीरेधीरे कपड़ों पर लगे हुकों को हटाना शुरू किया। जैसे ही मेरी पत्नी के कपड़ों पर से हुक हटाने को मेरा हाथ वहां तक पहुंचा कि पास की छत से पैरों की चाप सुनाई दी। मिस्टर वर्मा नीचे से छत पर धमधम करते आ रहे थे। उन्हें देखकर मैं सतर्क हो गया। कपड़ों को छोड़कर छत पर घूमने का स्वांग करने लगा।

मुझे देखकर, वे भी थोड़े सकपकाए। बोले, ‘आज छत पर कैसे घूम रहे हो?’

मैं बोला, ‘नीचे बैठेबैठे बोर हो रहा था। सोचा छत पर थोड़ा टहल लेते हैं। आप छत पर कैसे?’

‘मैं भी वैसे ही आ गया।’

अब छत पर वे भी टहलने लगे हैं। आसमान पर बादल इधर से उधर आ जा रहे थे। अंधेरा सा छाने लगा। नीचे किचन में चाय का पानी खौल रहा था। मुझे अपना काम करना था। मैं नीचे लौटने का नाटक करता हुआ सीढ़ियों के पास ओट में आकर खड़ा हो गया। वहां से मुझे वर्मा जी की छत साफसाफ दिख रही थी लेकिन वर्मा जी को मैं दिखाई नहीं दे रहा था।

मेरे छत से हटते ही वर्मा जी अपनी छत पर टंगे तार से कपड़ों पर लगे हुकों को हटाहटाकर कपड़ों को इकट्ठा करने लगे। उनकी सतर्क निगाहे मेरी छत की ओर दौड़ रही थी। ऐसा लग रहा था वे लोगों की निगाह से बचकर कोई अनैतिक काम कर रहे हैं। कपड़ों को समेटकर वे तेजी से नीचे की ओर दौड़े।

उनके जाते ही मैंने भी अपना काम शुरू कर दिया। शेष बचे कपड़ों से हुक हटाकर उन्हें जल्दीजल्दी हटाना शुरू कर दिया। पत्नी के कपड़ों को अपने कपड़ों के बीच में रखकर गठरी सी बना ली। अगर अब वर्मा जी मुझे कपड़ों को नीचे ले जाते देख भी लें तो उन्हें पता ही नहीं चल सकता कि मैं पत्नी के कपड़ों को ले जा रहा हूँ।

छत पर हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गई। वर्मा जी की सीढ़ियों से पुनः पदचाप सुनाई देने लगी। वर्मा जी छत पर आ गए। मैं अपना काम कर चुका था। वे मेरी ओर देख, मंदमंद मुस्काराने लगे। मैं भी उनकी ओर देखकर मुस्काराने लगा। जल्दबाजी में मिसेज वर्मा के अंतःवस्त्र वे छत पर ही छोड़ गए थे। मैंने एक निगाह उनकी छत पर डाली, एक निगाह अपनी छत पर डाली। कोई वस्त्र अपनी छत पर रह नहीं गया हो। बूंदाबांदी थोड़ी तेज हो गई। मिस्टर वर्मा कपड़े उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे। मैं छत से सीढ़ियों के पास ओट में आकर खड़ा हो गया। मिस्टर वर्मा ने तुरंत अपनी पत्नी के वस्त्रों को उठाया और तेजी से नीचे की ओर दौड़ा। मैं भी नीचे लौट आया। किचन में चाय का पानी खौल रहा था।

वर्मा जी बने गांधी जी

एक समाचार पढ़ा। सरकार की नीतियों की प्रशंसा की गई थी और प्रशंसा करने वाले थे, मिस्टर पुरुषोत्तम दास गांधी। समाचार के पास ही एक विज्ञापन था, जिसमें पुरुषोत्तम दास गांधी को उनके जन्मदिवस की हार्दिक बधाई दी गई थी। बधाई देने वालों के नाम मोहन, रोहन, सोहन, गोहन इत्यादि थे। नामों को पढ़कर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता था कि ये बधाई देने वाले कौन हैं और कहां रहते हैं। हाँ बधाई लेने वाले पुरुषोत्तमदास गांधी का पता अवश्य लिखा था। पता मेरे मोहल्ले का ही था। मेरे मकान से दोतीन मकान छोड़कर।

समाचार पढ़कर मेरा माथा ठनका। यह गांधी के खानदान का कौनसा नया अवतरण मेरे मोहल्ले में हो गया। वरना हिन्दुस्तान में जितने भी गांधी है उनकी संख्या अंगुलियों पर है। इसका नाम आज तक सुना नहीं।

गांधी नामधारियों से जानपहचान हो जाने मात्र से व्यक्ति फर्श से उठकर अर्श पर पहुंच जाता है, इसका मुझे मालूम था। मैं मोहल्ले के उस नएनए गांधी से मिलने अखबार में छपे पते पर चल दिया।

थोड़ा सा आगे बढ़ते ही तीसरे मकान के बाहर पुरुषोत्तमदास गांधी की नेम प्लेट लगी हुई थी। मैं चौंका, इस मकान पर पहले तो मिस्टर पी.डी. वर्मा की नेम प्लेट हुआ करती थी। आज अचानक नेम प्लेट पर पुरुषोत्तमदास गांधी। यह सब विचार करते हुए मैं स्वयं ही अपने आपको जवाब दे रहा था कि हो सकता है कि मिस्टर वर्मा ने, मिस्टर गांधी को यह मकान बेच दिया हो या मिस्टर गांधी इस मकान में किराए से रहने आए हो।

मैंने मकान के बाहर लगी कॉल वेल बजाई। मिस्टर वर्मा बाहर निकले। उनको देखकर मैं बोला, ‘वर्मा जी, मिस्टर गांधी यहीं रहते हैं।’ मेरी बात सुनकर वे मुस्कराए और मेरा हाथ पकड़कर अंदर ले गए। बोले, ‘यार, मैं ही मिस्टर गांधी हूँ। मैंने अपना सर नेम बदल दिया है। मुझे कल रात सपने में पता चला था कि मैं मोहनदास कर्मचंद के खानदान से हूँ।’

उसकी बात सुनकर मैं एक टक मिस्टर वर्मा के चेहरे की ओर देखने लगा। चेहरे पर मैं गांधी को ढूंढ रहा था। महात्मा गांधी नहीं तो देश की किसी भी पार्टी का कोई सा भी गांधी कहीं भी थोड़ा बहुत किसी कौने में चिपका सा मिल जाए। मैंने काफी गौर से उसके चेहरे को देखा। कहीं नहीं दिखा। चेहरा पूरी तरह वर्मा का दिख रहा था।

मिस्टर वर्मा ने गांधी जी के खादी पहनने के आह्वान पर आज बिल्कुल स्वच्छ, धवल, बेदाग, खद्दर के कुर्तेपायजामे पहन रखे थे। मैं कुर्ते के अंदर झांककर उसी तरह देखने लगा, जैसे किसी युवती के कपड़ों के अंदर लोगों की नजरें देखती है। मुझे वहां भी मिस्टर वर्मा की वही काली सी बदसूरत सी तोंद दिख रही थी। मैंने तोंद के अंदर भी देखने की कोशिश की लेकिन मुझे कहीं गांधी दिखाई नहीं दिया। बाहरभीतर सिर्फ वर्मा ही दिख रहा था। वर्मा ने नयानया खादी का पायजामा पहना था। शायद पायजामे का नाड़ा बांधने का अनुभव नहीं था और ना ही नाड़े की लम्बाई कितनी रखनी है इसके बारे में ही कोई तजुर्बा। नाड़ा नीचे घुटनों तक पहने कुर्ते से भी नहीं छिप रहा था।

मैंने वर्मा से कहा, ‘वर्मा जी, तुम्हे गांधी सर नेम नहीं लगाना चाहिए था। क्यों कि तुम्हे गांधी बनने का अनुभव नहीं है।’

वर्मा जी बोले, ‘ऐसी बात नहीं है। मैं सब सीख जाऊंगा। अनुभव कोई माँ के पेट से लेकर नहीं आता है। सबकुछ यहीं सीखने को मिलता है।’

‘लेकिन इस पायजामे के नाड़े को तो संभालो, यह बाहर निकल रहा है।’

वे बोले, ‘इसे मैंने जानबूझकर बाहर निकाला है। जब भी इसे खोलने की जरूरत हो तो तुरन्त नाड़े को पकड़कर सबसे पहले मैं खींच सकूं। इसलिए मैंने इसे बाहर तक लटका रखा है।’

‘इसको खोलने की कोई प्रतियोगिता होती है क्या?, जो तुमने यह व्यवस्था कर रखी है।’ मेरी बात सुनकर वे मुस्कराए और बोले, ‘प्रतियोगिता का तो मुझे पता नहीं लेकिन आगे बढ़ने के लिए यह बहुत आवश्यक है। मेरे राजनीतिक गुरु ने मुझे यह गुर दिया है।’

‘खैर छोड़ो, अच्छा यह बताओ, तुम पहले तो अपने नाम को संक्षेप में पी. डी. वर्मा लिखते थे और अब पुरुषोत्तमदास गांधी।

गांधी लगाने की बात तो समझ आती है लेकिन पुरुषोत्तमदास गांधी पूरा नाम लिखने का मतलब समझ नहीं आया।’

वे बोले, ‘इतना भी नहीं समझते, किसी भी संक्षेप में लिखे नाम के पीछे गांधी लिखा देखा है। सोनिया गांधी, राजीव गांधी, इंदिरा गांधी, संजय गांधी, मेनका गांधी, राहुल गांधी, वरुण गांधी, मोहनदास गांधी...। सभी अपना पूरा नाम लिखते थे और उसके पीछे गांधी लगाते थे। मैं भी उन्ही के पदचिन्हों पर चल रहा हूँ। तुम्हे पता है आज सुबह से कितने ही फोन आ गए और तुम भी तो इसी गांधी नाम के फेर में यहां आए हो।’

मैं बोला, ‘बिल्कुल ठीक कह रहे हो, मैं भी गांधी नामधारी से जानपहचान बढ़ाने आया था, मेरे पुलिस में कुछेक मुकदमें चल रहे हैं। ठेके मिलने में परेशानी आ रही है। सोचा, मोहल्ले के गांधी से जानपहचान कर लूं। सभी रूके काम पूरे हो जाएंगे।’

हम आपस में बात कर ही रहे थे कि बाहर से पुरुषोत्तमदास गांधी की जयजयकार की आवाज सुनाई देने लगी। मिस्टर वर्मा के साथ मैं भी बाहर निकला। उन्होंने वर्मा के गले में मालाएं डाल दी। मैं यह सोचता हुआ अपने घर की ओर लौटने लगा कि काश मुझे भी कोई ऐसा ही कोई सपना आता और मैं भी अपना सर नेम बदल लेता।

1-माँ के आँचल जैसी धूप

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सूरज की किरणें हैं फैली,

बिखर गई फूलों की थैली,

गरम-नरम यों हाथ फेरती,

माँ के आँचल जैसी है धूप।

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सबको अपने पास बुलाती,

जाड़े में है हमें लुभाती,

प्यार भरी मुस्कान निराली,

सब पर छाती मीठी धूप।

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नन्हें बच्चों की है साथी,

नहीं किसी से बैर दिखाती,

एक साथ है सब पर पड़ती,

सुन्दर बड़ी सुनहली धूप।

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जाड़े में सबको सुख देती,

सर्दी मिनटों में हर लेती,

इसी तरह सबके आँगन में,

हरदम रहे थिरकती धूप।

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2-सब ताने सो रहे रजाई

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सर्दी फिर से आई भाई,

निकले कम्बल और रजाई।

कपड़े पर कपड़े हैं पहने,

फिर भी सब पर ठण्डक छाई।।

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पूरी रात रहे सिसियाते,

सुबह-सबेरे नहीं नहाते।

आग जला कर बैठ तापते,

ठिठुर-ठिठुर कर समय बिताते।।

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आठ बजे तक अब है सोना,

मुन्नी-मुन्ना का ये कहना।

आज नहीं है पढ़ने जाना,

हमको बस लेटे ही रहना।।

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ऐसी ठण्डक अबकी आई,

सब पर अपनी धाक जमाई।

नहीं किसी को काम सूझता,

सब ताने सो रहे रजाई।।

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3- खुशी भरे दीवाली के दिन

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दीवाली में हँसते-गाते रहते हरदम बच्चे।

जेब भरी हो या खाली हो मस्त राम हैं सच्चे।।

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दस दिन पहले दीवाली , उनके सपनों में आती।

मजेदार रसगुल्ले खाते, सबके मन को भाती।।

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सजे हुए बाजारों से सब ढेर पटाखे लाते।

छोटे-बड़े सभी मिल करके बम को खूब दगाते।।

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छोटे बच्चे छुरछुरियों से अपना खेल रचाते।

फुर्र-फुर्र कर उसे जलाते, लेकर और घुमाते।।

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खुशी भरे दीवाली के दिन लगते सबसे अच्छे।

साथ अगर हों साथी ऐसे जो हों मन के सच्चे।।

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3- मदर टेरेसा

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सबसे अच्छी मदर टेरेसा,

ममता की थी मूरत।

जिसे देख सबको दिख जाती,

अपनी माँ की सूरत।।

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प्रेम, अहिंसा, त्याग, सफलता-

की छोटी-सी पुतली।

दीन-दुखी की सेवा करने,

अपने घर से निकली।।

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पूरी दुनिया में घूमी वह,

लेकर प्यार-दुलार।

जाति-पाँति का भेद न जाने,

करती सबसे प्यार।।

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नहीं रही अब मदर टेरेसा,

गई ईश के धाम।

हम बच्चों को करने हैं अब,

उनके अधूरे काम।।

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4-झूम रही हर डाली-डाली

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चलो पेड़ पर झूला झूलें,

धरती और गगन को छूलें।

झूले पर सब मिलकर बैठें,

मस्त मगन हो खुद को भूलें।।

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धरती पर फैली हरियाली,

झूम रही हर डाली-डाली।

ठण्डी हवा चले पुरवाई,

सबको सुख पहुँचाने वाली।।

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कोयल मीठे गीत सुनाए,

बच्चे मस्ती मौज मनाएँ।

बन्दर जैसे उछलें-कूदें,

डाल-डाल पर उधम मचाएँ।।

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सुबह अनोखी शाम निराली,

सुन्दर-सुन्दर भोली-भाली।

चहक रहे हैं जीव जन्तु सब,

फूल खिल गए डाली-डाली।।

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5-जादू वाला घोड़ा लाओ

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पापा-मम्मी मेला जाओ।

जादू वाला घोड़ा लाओ।।

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उड़े यहाँ से आसमान तक,

मुझे बिठा कर सैर कराए,

पंख लगे हों सोने जैसे,

नई दिशा में लेकर जाए,

जादू का ही खेल जहाँ हो,

वहाँ तलक हमको पहुँचाओ।

जादू वाला घोड़ा लाओ।।

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जगह जहाँ की हो मतवाली,

मेरे मन को भी भा जाए,

सोनपरी-सी छोटी बच्ची,

मझको अपने संग खिलाए,

चाँदी जैसा घोड़ा लाकर,

प्यार जता कर मन बहलाओ।

जादू वाला घोड़ा लाओ।।

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6-बुरा हो गया मेरा हाल

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सोते-सोते सपना देखूँ ,म्बर में तारों का जाल।

सूरज-चन्दा फँसे हैं जिसमें,

बाहर आने को बेहाल।।

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सूरज की ये देख के हालत,

मेरे मन में उठा सवाल।

कैसे इनकी जान बचाऊँ,

कैसे इनका काटूँ जाल।।

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जब मेरी कुछ समझ न आया,

तब पहुँचा मैं उनके पास।

हाल-खबर सब पूँछ-पाँछ कर,

कहा-'न होना कभी उदास।।

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यदि हिम्मत ही हार गए तो

कैसे छूटोगे तुम आज।

मैं आया हूँ मत घबराना,

अभी सोचता हूँ कुछ काज।।'

.

सोच-समझ कर हाथों से मैं,

लगा फाड़ने उनका जाल।

किन्तु फँस गया मैं भी उसमें,

बुरा हो गया मेरा हाल।।

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तड़प-तड़प कर मैं चिल्लाया,

मम्मी बोली मेरे लाल।

सोते से फिर मुझे जगाया,

प्यार जताकर चूमे गाल।।

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7-तितली रानी

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रोज सुबह जब सूरज उगता।

तितली रानी का मन खिलता।।

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फूल देखकर वह ललचाती।

गीत खुशी के दिनभर गाती।।

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रोज बगीचे में आ जाती।

सैर-सपाटा करके जाती।।

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इधर-उधर अकसर मँडराती।

दूर-दूर तक ये हो आती।।

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रंग-विरंगी प्यारी-प्यारी।

उड़ती फिरती क्यारी-क्यारी।।

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इन्हें देख कर बच्चे आते।

पीछे-पीछे दौड़ लगाते।।

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कोमल-कोमल पंख हिलाती।

कभी किसी के हाथ न आती।।

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झुण्ड बना कर संग में रहती।

दुश्मन से मिलकर है लड़ती।।

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8-पेड़ लगाएँ ऐसा

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पेड़ लगाएँ ऐसा।

झिलमिल तारों जैसा।।

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बिस्किट के हों पत्ते जिसमें,

टाफी के ही फल हों,

चुइंगम जैसा गोंद भी निकले,

शकरकन्द-सी जड़ हो,

डाल पकड़ कर अगर हिलाएँ,

टप-टप बरसे पैसा।

पेड़ लगाएँ ऐसा।।

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डाल तोड़ कर दूध निकालें,

फिर पूरा पी जाएँ,

मक्खन, बर्फी, दही जमा के,

हम बच्चे मिल खाएँ,

रात अँधेरे में चमके जो

लगे सितारों जैसा।

पेड़ लगाएँ ऐसा।।

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9-चोटी नहीं गुहाए गुड़िया

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मेरे पापा लाए गुड़िया।

मेरे मन को भाए गुड़िया।।

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आँखें उसकी हैं चमकीली,

थोड़ा-सा मुस्काए गुड़िया।

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काले-घने बाल हैं लम्बे,

चोटी नहीं गुहाए गुड़िया।

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नाम धरूँ क्या सोच न पाऊँ,

चावी से चल जाए गुड़िया।

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सूरत उसकी भोली-भाली,

मन को बहुत लुभाए गुड़िया।

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10-जब मुँह खोलो मीठा बोलो

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टाफी खाओ, बिस्किट खाओ,

विद्यालय में पढ़ने जाओ।

अपना काम स्वयं निपटाओ,

गीत खुशी के गाते जाओ।।

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खुश होकर ही सबसे बोलो,

नहीं प्यार में नफरत घोलो।

मिल-जुल कर ही काम करो सब

जब मुँह खोलो, मीठा बोलो।।

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रोज पढ़ो तुम इंग्लिश, हिन्दी,

गिटपिट-गिटपिट करके बोलो।

करो खूब अभ्यास गणित का,

नई सीख विज्ञान से ले लो।।

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टीचर की मत करो बुराई,

सदा बड़ों की इज्जत करना।

आपस में सब कभी न लड़ना,

प्रेम-भाव से मिल कर रहना।।

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लिखना-पढ़ना जो भी करना,

अपने मन में भरते रहना।

हरदम आगे कदम बढ़ाना,

कभी नहीं तुम पीछे हटना।।

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11-सबसे प्रेम करे सब कोई

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हम सब मिलकर घूमें जंगल,

घूम-घूम कर बनें सिकन्दर।

शेरों से हम यूँ लड़ जाएँ,

जैसे कोई हो वह बन्दर।।

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सारे जंगल में हम खेलें,

उछल-कूदकर करें झमेले।

साते-सोते सपने देखें,

पेड़ों पर हम झूला झूलें।।

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तोता-मैना सब आ जाएँ,

मीठे-मीठे गीत सुनाएँ।

गीतों में हो नई कहानी,

जिसको सुनकर धूम मचाएँ।।

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चील, साँप से करें दोस्ती,

जीवों पर हम दया दिखाएँ।

सबसे प्रेम करे सब कोई,

ऐसा ही कुछ करते जाएँ।।

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12-नहीं विदा करना गुड़िया को

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सलमा, श्वेता, रानी दौड़ो,

चूड़ी वाले से कुछ ले लो।

लाल, बैंगनी, नीली-पीली,

रंग-बिरंगे कंगन चुन लो।।

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छोटी-छोटी भी कुछ चूड़ी

लेकर गुड़िया को पहना दो।

एक घाँघरा रंग-बिरंगा,

छोटी-सी जूती भी ला दो।।

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गुड़िया की हो गई तयारी,

गुड्डे के कपड़े सिलवा दो।

अफसर जैसा सूट-बूट हो,

जूते-मोजे भी पहना दो।।

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शादी में अब देर न करना,

जल्दी से फेरे करवा दो।

फेरे हो गए, शादी हो गई,

अब गुड़िया को विदा करा दो।।

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नहीं विदा करना गुड़िया को,

श्वेता रोते-रोते बोली।

गुड़िया में ही जान है मेरी,

कैसी जी पाऊँ वह बोली।।

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13-कैसा होगा यह संसार

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लगा हो सोने का अम्बार।

कैसा होगा यह संसार।।

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न हो धरती, न हो अम्बर,

न हो जीवों का भण्डार,

न पंछी का कलरव गूँजे,

न बच्चों की रहे पुकार,

न सदियों तक सूरज निकले,

पैसों की हो लगी बजार।

कैसा होगा यह संसार।।

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रात चाँदनी, चाँदी बरसे,

मन उस तक जाने को तरसे,

तारे सब नीचे आ जाएँ,

और कबड्डी खेलें हमसे,

गुल्ली-डण्डा, कंचे खेलें,

नहीं किसी की हो फटकार।

कैसा होगा यह संसार।।

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देख के चूहा बिल्ली भागे,

कुत्ता देख के भागे शेर,

कछुआ ठुमक-ठुमक कर नाचे,

भालू खाए मीठे बेर,

हाथी पूँछ दबाकर भागे,

चींटी की यदि हो सरकार।

कैसा होगा यह संसार।।

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14-पेड़ लगाएँ

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क्यारी-क्यारी चलो सजाएँ।

बढ़िया-बढ़िया पेड़ लगाएँ।।

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कहीं टमाटर, कहीं पे बैंगनहीं लटकते मिर्चा,सहजन,

गेंदा, बेला और चमेली,

खिले डाल पर सुन्दर केली,

चलो गुलाबों को ले आएँ,

जो सारी बगिया महकाएँ।

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क्यारी-क्यारी चलो सजाएँ।

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चारों तरफ लगाएँ केले,

लौकी, कद्दू और करेले,

काँटेदार कैक्टस लाएँ,

क्रोटन के भी पेड़ लगाएँ,

गर्मी में शरबत की खातिर,

नींबू के पौधे लगवाएँ।

क्यारी-क्यारी चलो सजाएँ।।

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15-चन्दा मामा

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आओ बैठो पास हमारे।

मेरे चन्दा मामा प्यारे।

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रात अँधेरे में चम-चम-चम,

करते रहते हो उजियारे।

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रातों में हैं सब सो जाते,

कोई किसी को नहीं पुकारे।

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चन्दा मामा बनते राजा,

मंत्री होते हैं सब तारे।

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बच्चा-बच्चा यही पुकारे,

चन्दा मामा सबसे प्यारे।

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16-चिड़िया

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चीं-चीं करती आती चिड़िया।

मेरे मन को भाती चिड़िया।।

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मेरा मन करता मैं पकड़ूँ ,

फुर्र-फुर्र उड़ जाती चिड़िया।

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खिड़की पर ही बना घोसला,

देर रात सो जाती चिड़िया।

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दूर-दूर से दाना लाकर,

बच्चों तक पहुँचाती चिड़िया।

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जब घर पर कोई न होता,

बच्चों के संग आती चिड़िया।

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धीरे-धीरे उड़-उड़ कर खुद,

उड़ना उन्हें सिखाती चिड़िया।

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17-मुझको बच्चा ही रहने दो

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नन्हा-मुन्ना बच्चा हूँ मैं,

अपने दिल का सच्चा हूँ मैं।

कभी किसी का बुरा न मानूँ ,

बड़े-बड़ों से अच्छा हूँ मैं।।

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हे! भगवन तुम ऐसा कर दो,

मुझको बच्चा ही रहने दो।

कभी बड़ों-सा झूठ न बोलूँ ,

सच्चाई पर ही चलने दो।।

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मिल-जुल कर मैं रहना चाहूँ ,

सबको अपना कहना चाहूँ।

फूलों-सा मैं हर मौसम में,

हँसना और महकना चाहूँ।।

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ऊँच-नीच का भेद न जानूँ ,

हर मजहब को अपना मानूँ।

प्यार-मुहब्बत की हर भाषा,

कहना और समझना जानूँ।।

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18-हम दोनो

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हम दोनो हैं गुड्डे-गुडिया,

मम्मी कहतीं भैया-बिटिया।

मेरे सर की देख के टोपी,

दौड़े बिटिया बइँया-बइँया।।

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मेरी बहना बोल न पाती,

बात-बात में है तुतलाती।

पकड़ के उँगली धीरे-धीरे,

ठुमक-ठुमक कर कदम बढ़ाती।।

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पापा मुझको गोदी लेकर,

इधर-उधर हैं खूब डुलाते।

लेकिन फिर भी चुप न होता,

टाफी,बिस्किट ढ़ेर दिलाते।।

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मुझे देख कर गुड़िया आती,

छीन-छीन कर टाफी खाती।

पापा हँसते हा-हा-हा-हा,

मम्मी मंद-मंद मुस्काती।।

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19-इसी देश के लिए

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शाम-सबेरे सदा टहलना।

थोड़ी-सी कसरत भी करना।।

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सेहत अच्छी हो जाएगी।

दारा जैसी बन जाएगी।।

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सेहत अच्छी हो जाने पर।

बॉडी-बिल्डर बन जाने पर।।

नहीं किसी से झगड़ा करना,

प्रेम-भाव से मिलकर रहना।।

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कभी नहीं लालच में पड़ना।

मजबूरों की सेवा करना।।

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सेवा पर ही देश खड़ा है।

आजादी का बीज पड़ा है।।

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चन्द्रशेखर और भगत लड़े थे।

इसी देश के लिए मरे थे।।

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हम सबको उन-सा बनना है।

नाम वतन का फिर करना है।।

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20-एक समुन्दर

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एक रात सपने में मैंने,

देखा एक समुन्दर।

एक से बढ़कर एक मछलियाँ,

रहतीं उसके अन्दर।।

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छोटी-छोटी, प्यारी-प्यारी,

रंग-बिरंगी न्यारी।

तैरा करती पानी में वह,

मुझको लगतीं प्यारी।।

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मछली बन कर मैं भी तैरूँ,

ऐसा मन में आया।

कूद गया फिर पानी में मैं,

जी भर खूब नहाया।।

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उसी समय आ गया मगरमच्छ,

मुझको करने तंग।

बड़ी जोर से मैं चिल्लाया ,

घर भर हो गए दंग।।

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21-चलो-चलें लखनऊ

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चलो-चलें लखनऊ घूमने।

घूम-घूम कर मजा लूटने।।

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ये है शहर नवाबों वाला।

ऊँचे -ऊँचे ख्वाबों वाला।।

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चिड़िया-घर में शेर मिलेंगे।

हाथी, घोड़े, मोर दिखेंगे।।

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तोता-मैना, भालू-बन्दर।

सब होंगे पिंजड़े के अन्दर।।

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नाव चलाएँगे जी भर कर।

मस्ती-मौज करेंगे जमकर।।

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बच्चों वाली रेल निराली।

सबको सैर कराने वाली।।

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इसी शहर में है वो भइया।

जिसको कहते भूल-भुलइया।।

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जो भी उसके अन्दर जाए।

भूल-भूल कर चक्कर खाए।।

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22-एक कहानी मुझे सुनाओ

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एक कहानी मुझे सुनाओ।

बैठो मेरा दिल बहलाओ।।

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राजा की हो या रानी की,

बरखा की हो या पानी की,

सूरज कैसे आता-जाता,

चन्दा कैसे आँख चुराता,

तारों की हो नई कहानी,

नए राग में गाती जाओ।

एक कहानी मुझे सुनाओ।।

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आसमान क्यों दूर है हमसे,

धरती क्यों न मिली गगन से,

हरे-भरे क्यों पौधे रहते,

पशु-पक्षी हैं कैसे जीते,

इसकी कोई कथा सुनाओ,

इन सबकी तुम राज बताओ।

एक कहानी मुझे सुनाओ।।

.

 

 

22-मेरी दीदी

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फूलों जैसी प्यारी-प्यारी,

सारे जग से न्यारी-न्यारी।

मुझको सबसे अच्छी लगतीं,

मेरी दीदी बहुत दुलारी।।

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मुझको राजा भैया कहतीं,

सैर-सपाटा सदा करातीं।

मुझको भी तब अच्छा लगता,

जब वो हँसकर मुझे मनातीं।।

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रोज सबेरे जल्दी उठतीं,

और किताबों को हैं पढ़तीं।

मेरे संग वह खेल-तमाशा,

गुड़ियों से फिर शादी करतीं।।

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मुँह पर मेरे थूक लगा कर ,

छोटा-सा हैं चुम्बन लेतीं।

झूले पर मुझको बैठाकर,

दूध-बताशा भी हैं देतीं।।

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पूरी दुनिया में न ऐसी,

होगी लड़की दीदी जैसी।

मुझ पर हैं वो जान छिड़कतीं,

खूब चहकतीं चिड़ियों जैसी।।

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23-चलो चलें परदेश कमाएँ

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चलो चलें परदेश कमाएँ,

खूब ढ़ेर-सा पैसा लाएँ।

सालों-साल कमाकर पैसे,

गठरी लेकर वापस आएँ।।

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वापस आकर कार खरीदें,

मम्मी-पापा को बैठाएँ।

टी.वी. , पंखा, कूलर लाकर,

रोज चकाचक मौज मनाएँ।।

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छोटी बिटिया को बहलाएँ,

बात-बात पर उसे चिढ़ाएँ।

खेल-खिलौने हाथी-घोड़ा,

चावी वाली गुड़िया लाएँ।।

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अपनी तो है बात निराली,

सदा करूँगा मैं मनमानी।

नहीं किसी का कहना मानूँ ,

करता जाऊँगा शैतानी।।

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24. मैं भी एक दुल्हनिया लाऊँ

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मन करता है दूल्हा बनकर,

मैं भी एक दुल्हनिया लाऊँ।

घोड़े पर उसको बैठा कर,

जगह-जगह की सैर कराऊँ।।

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रोज खरीदूँ टुकली-बिन्दी,

गोटे वाली साड़ी लाऊँ।

झूठ-मूठ के जेवर लाकर,

उसके दिल को मैं बहलाऊँ।।

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अगर कभी गुस्सा हो जाए,

तो मैं उसको नाच दिखाऊँ।

बर्फी और जलेबी लाकर ,

उसको खूब खिलाता जाऊँ।।

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फिर भी न माने तो मैं भी,

गुस्सा होकर गाल फुलाऊँ।

दिखा-दिखा करके रसगुल्ले,

अपने मुँह में भरता जाऊँ।।

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25. बरखा रानी

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बरखा रानी आओ।

पानी तुम बरसाओ।।

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हम सब यहाँ नहाएँ,

झूम-झूम कर गाएँ,

पानी की धारा में,

सुन्दर नाव चलाएँ,

सबका मन हर्षाओ।

बरखा रानी आओ।।

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रोज तुम्हारी बाते,

करते आते-जाते,

बादल काले-काले,

देख-देख ललचाते,

अब तो मत तरसाओ।

बरखा रानी आओ।।

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26. मेरा देश

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कितना अच्छा प्यारा देश।

मेरा देश, तुम्हारा देश।।

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कहीं शहर है, कहीं है जंगल,

बहती रहतीं नदियाँ कल-कल,

यहाँ की मिट्टी है उपजाऊ,

सभी जगह होता है मंगल,

नानक, कृष्ण, मुहम्मद साहब,

ईसा का है प्यारा देश।

मेरा देश, तुम्हारा देश।।

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यहाँ का मौसम है अलबेला,

हरदम लगता रहता मेला,

दूर देश के लोगों का भी,

अकसर उमड़ा करता हेला,

ऊँचे पर्वत पहरा देते,

सारे जग से न्यारा देश।

मेरा देश, तुम्हारा देश।।

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27. प्यारा गाँव

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नीम की ठण्डी छाँव रे।

सबसे प्यारा गाँव रे।।

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नहर-ताल में रोज नहाते,

और झूलते पेड़ों पर,

गुल्ली-डण्डा, सैर-सपाटा,

मस्ती करते पेड़ों पर,

तोता, मैना, बुलबुल बोले,

बोले कौआ काँव रे।

सबसे प्यारा गाँव रे।।

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शहरों में हम बड़े हुए पर

बीता बचपन गाँव में,

हरी-भरी फसलें लहरातीं,

सच्चा जीवन गाँव में,

चुहलबाजियाँ होती घर-घर,

नदी किनारे नाव रे।

सबसे प्यारा गाँव रे।।

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28. मेरा मोती

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बड़ा बहादुर मेरा कुत्ता,

मोती उसका नाम।

मेरे संग वह दौड़ लगाता,

रोज सुबह व शाम।।

एक बार की बात पुरानी,

घोर अँधेरी रात।

लौट रहे थे दावत खाके,

चोर मिले थे सात।।

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मुझे दिखाया छूरी-कट्टा,

लूट लिया समान।

लेकिन मैंने हार न मानी,

बहुत बघारी शान।।

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चोरों ने फिर मुझे उठाया

और कहा-नादान।

अभी तुझे मैं पटकूँगा तो

निकल पड़ेगी जान।।

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चोरों की धमकी सुनकर मैं

नहीं पड़ा कमजोर।

मोती ने फिर झप्पा मारा

और दिया झकझोर।।

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सातों को घायल कर डाला

कोई बचा न चोर।

मैंने भी तब जल्दी-जल्दी

खूब मचाया शोर।।

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29. जंगल में है मंगल

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हरा- भरा है प्यारा जंगल।

सबसे सुन्दर न्यारा जंगल।।

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मोर नाचते सुन्दर-सुन्दर,

बड़े नकलची मामा बन्दर,

सदा फुदकती चिड़िया रानी,

चीं-चीं करके कहे कहानी,

कोयल मीठे गीत सुनाती,

गूँज रहा है सारा जंगल।

हरा-भरा है प्यारा जंगल।।

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शेर की चलती है मनमानी,

कोई करे न आना-कानी,

खरगोशों की बात निराली,

सुग्गा बोले डाली-डाली,

हिरन हमेशा दौड़ लगाता,

पूरे जंगल में है मंगल।

हरा-भरा है प्यारा जंगल।।

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30. ला दो वही सितारा

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चंदा माँगे, सूरज माँगे,

माँगे चाँद-सितारे।

प्यार करूँगी तुझे हमेशा,

सोजा राज-दुलारे।।

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नहीं और कुछ मुझको लेना,

ला दो वही सितारा।

रोज रात जो खूब चमकता

दिखता प्यारा-न्यारा।।

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नहीं उसे मैं दे सकती हूँ ,

ले लो गुड़िया प्यारी।

चाँद-सितारे कल ले लेना

मानो बात हमारी।।

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अच्छा अब मैं सो जाता हूँ ,

कल तुम देना तारा।

नहीं बहाना कोई करना,

न मानूँगा दुबारा।।

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31. शुरू पढ़ाई

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छुट्टी बीती शुरू पढ़ाई।

सब पर होगी बहुत कड़ाई।।

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नई किताबें पढ़ना होगा।

सबको आगे बढ़ना होगा।।

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खेल-कूद कम हो जाएँगे।

फुर्सत के दिन खो जाएँगे।।

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विद्यालय अब जाना होगा।

अपना ज्ञान बढ़ाना होगा।।

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32. प्यारी बहना

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प्यारी बहना भूल न जाना,

राखी का त्योहार सुहाना।

जनम-जनम का नाता है यह,

कभी इसे तुम नहीं भुलाना।।

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मुझको प्यारी, मेरी बहना,

नाचे सदा पहन कर गहना।

खेल-तमाशे गुड़ियों वाले,

नहीं किसी का माने कहना।।

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मम्मी-पापा जो हैं लाते,

बाँट-बराबर मिलकर खाते।

जब वह ठुमक-ठुमक चलती,

तब उसको सब पास बुलाते।।

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बाँध के नोटों वाली राखी,

माँगे मुझसे ढेरों पैसा।,

और न मैं जब पैसा देता,

तब वह कहती ऐसा-वैसा।।

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33. मम्मी का मैं राजदुलारा

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मम्मी मुझको सुबह जगातीं,

रोज बाग की सैर करातीं।

नहलातीं, कपड़े पहनातीं,

काला टीका रोज लगातीं।।

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पापा से मुझको डर लगता,

फिर भी प्यार बहुत हूँ करता।

जब पापा गुस्सा हो जाते,

तब मैं उनसे बात न करता।।

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मम्मी मेरी सीधी-साधी,

मीठी-मीठी बातें करतीं।

जीभर मैं शैतानी करता,

गुस्सा मुझ पर कभी न करतीं।।

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मम्मी-पापा दोनो अच्छे,

मैं उनकी आँखों का तारा।

पापा का हूँ अच्छा बेटा,

मम्मी का हूँ राजदुलारा।।

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34. मेरी मर्जी

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काश अगर ऐसा हो जाए।

मेरी मर्जी ही चल जाए।।

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दुनिया भर के चक्कर काटूँ ,

पंछी बन ऊपर उड़ जाऊँ,

चंदा को फुटबॉल बना लूँ ,

आसमान धरती पे लाऊँ,

ईश्वर भी मुझसे डर जाए।

काश अगर ऐसा हो जाए।।

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खूब दिखाऊँ जादू-टोना,

घर से भी गायब हो जाऊँ ,

लाल छड़ी मैं लेकर घूमूँ ,

बच्चों-बूढ़ों को बहलाऊँ ,

गली-गली में रौनक छाए।

काश अगर ऐसा हो जाए।।

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दिन में चाँद-सितारे देखूँ ,

रात उगे सूरज को पाऊँ ,

घर-स्कूल में डाँट पड़े न,

जब मर्जी हो पढ़ने जाऊँ ,

मिले वही सब जो मन भाए।

काश अगर ऐसा हो जाए।।

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रोज रात जो सपना देखूँ ,

दिन में उसको सच्चा पाऊँ ,

कभी-कभी जंगल में जाकर,

चीते को भी घास खिलाऊँ ,

मुझे देख हाथी डर जाए।

काश अगर ऐसा हो जाए।।

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35. नीम हँसा, पीपल मुस्काया

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सूरज लाल-लाल निकला है

जैसे कोई फूल खिला है।

ठण्डी-ठण्डी हवा सुगन्धित

लगता सब कुछ धुला-धुला है।।

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चिड़ियों ने पाँखें फैलाई

अहिस्ता से ली अँगड़ाई।

फूलों के कानों में आकर

भौंरों ने आवाज़ लगाई।।

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नीम हँसा, पीपल मुस्काया

झूम उठी तुलसी की काया।

दादी जी ने सुबह नहाकर

ठाकुर जी को भोग लगाया।।

.

पापा बहुत देर से जागे

फौरन ही दफ्तर को भागे।

गोलू बस्ता लेकर अपना

निकल पड़ा उनसे भी आगे।।

 

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36. बच्चों जैसे प्यारे फूल

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कितने सुन्दर प्यारे फूल।

हरदम हैं मुस्काते फूल।।

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लाल, बैंगनी, हरे, गुलाबी,

सबको खूब लुभाते फूल।

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खुशबू सदा लुटाते रहते,

रोज सुबह खिल जाते फूल।

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जाति-पाँति का का भेद न जानें,

बच्चों जैसे प्यारे फूल।

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झूम-झूम कर जैसे हमको ,

अपने पास बुलाते फूल।

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रोना नहीं सदा खुश रहना

हँसना हमें सिखाते फूल।।

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37. छुट्टी के दिन

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छुट्टी के दिन हैं मस्ताने,

झूम-झूम कर मौज मना लें।

पढ़ना-लिखना रोज-रोज का ,

छुट्टी में ही गप्प लड़ा लें।।

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नाना-नानी के घर जाकर,

रबड़ी, दूध मिठाई खा लें।

मामा को कंगाल बना के,

सेहत अपनी खूब बना लें।।

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बाग-बगीचों में भी खेलें,

पेड़ों पर झूला भी झूलें।

मन चाहे जो करें शरारत

छुट्टी के दिन मस्ती ले लें।।

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कुल्फी, बरफ, मलाई खाएँ,

कोकाकोला भी पी जाएँ।

बार-बार मन कहे हमारा,

छुट्टी के दिन कभी न जाएँ।।

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38. मिल-जुल कर ही चलती रेल

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खेलें-खेल बनाकर रेल।

भीड़-भड़क्का ठेलम्-ठेल।।

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रेल बनेगी लम्बी-चौड़ी,

स्टेशन पर पुआ पकौड़ी,

रेल चलाएँगे सब मिलकर,

एक साथ सब कदम मिलाकर,

कोई किसी को छोड़ न देना,

रेल का डिब्बा तोड़ न देना,

तेज चलाएँगे हम रेल।।

भीड़-भड़क्का ठेलम्-ठेल।।

.

चिन्टू , पप्पी, गोल्डी, आओ,

कमर पकड़ कर रेल बनाओ,

लल्लू भैया दीदी आएँ,

वे सबसे आगे लग जाएँ,

मिन्टू ,बच्चा, रिंकू जाओ,

तुम भी तो कुछ मदद कराओ,

मिल-जुल कर ही चलती रेल।

भीड़-भड़क्का ठेलम्-ठेल।।

.

झक-झक-झक-झक रेल चलेगी,

कहीं बीच में नहीं रूकेगी,

हिन्दू-मुस्लिम सिक्ख ईसार्ई,

खर्च करे जो आना-पाई,

उसको घर तक पहुँचाएगी,

मंजिल सबको मिल जाएगी,

बच्चों की यह प्यारी रेल।

भीड़-भीड़क्का ठेलम्-ठेल।।

 

.

39. घर-घर हँसी-ठिठोली है

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होली है भई होली है।

बुरा न मानो होली है।।

.

गली में रंगों की बौछार,

मचा हुआ है हा-हा कार,

पैन्ट, पजामे सभी रंगे हैं,

रंगों की चल रही फुहार,

छोटू , पप्पी, गुड़िया, पिंकू ,

सबने पुड़िया घोली है।

बुरा न मानो होली है।।

.

कोई काला भूत बना है,

और कोई है लालो-लाल,

पिचकारी से सबको रंगते,

खूब लगाते रंग-गुलाल,

सबको ही सब गले लगाते,

माथे चन्दन रोली है।

बुरा न मानो होली है।।

.

कोई कमरे में छुप जाता,

कोई छत पे है चढ़ जाता,

रंग देख के कोई भागे,

कोई उल्टा है दौड़ाता,

गलियों है में भागम्-भागी,

घर-घर हँसी-ठिठोली है।

बुरा न मानो होली है।।

.

39. ललचाया पर खा न पाया

.

clip_image054[4]

आज रात सपने में देखा,

पंख लगाकर उड़ता हूँ।

टिम-टिम चाँद-सितारों को मैं,

छूता और पकड़ता हूँ।।

.

तभी निकल कर एक परी ने,

मुझको अपने पास बुलाया।

फूलों के झिलमिल झूले पर,

मुझको काफी देर झुलाया।।

.

उड़न-खटोले पर बैठाकर,

परी लोक की सैर कराया।

फिर वह अपने महल ले गई,

पकवानों का थाल सजाया।।

.

लेकिन तभी आ गईं मम्मी,

हाथ पकड़ कर मुझे जगाया।

पकवानों का थाल खो गया,

ललचाया पर खा न पाया।।

.

40. सर्दी से सब जान बचाएँ

.

जाड़े का मौसम जब आए।

थर-थर-थर-थर बदन कँपाए।।

.

गरम रजाई कम्बल लाए,

स्वेटर और कोट पहनाए,

सर्दी से सब जान बचाएँ,

मफलर, टोप जल्द ही लाएँ,

आग बार कर हमे तपाए।

जाड़े का मौसम जब आए।

.

सबके दाँत कटाकट बोले,

ठण्डी अपना मुँह है खोले,

पानी देख दूर हो जाते,

छय-छय दिन तक नहीं नहाते,

पानी से तो सब घबराए।

जाड़े का मौसम जब आए।।

.

रात बड़ी, दिन छोटे रहते,

पंखे, कूलर कभी न चलते,

बिस्तर पर काफी मिल जाए,

और पकौड़ी भी आ जाए,

सर्दी सबको बहुत सताए।

जाड़े का मौसम जब आए।।

.

41. नए साल की नई कहानी

.

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बीत गया है साल पुराना,

नया साल फिर आया है।

नई उमंगे जागी मन में,

नया जोश फिर छाया है।।

.

बीती बातें छोड़-छाड़ कर,

नई डगर पर जाना है।

नए साल के साथ चलें हम,

आगे कदम बढ़ाना है।।

.

नए साल की नई कहानी,

नई तरह से आई है।

आशा की यह नई किरण बन,

नई रोशनी लाई है।।

.

सब सबको दे रहे मुबारक,

बच्चों के मन भाया है।

नई जिन्दगी शुरू करें फिर,

ऐसा मौका आया है।।

.

42. सबको नाच दिखाता है

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.

लेकर साँप सपेरा आता,

सबका मन बहलाता है।

फन के आगे हाथ दिखाता,

खुद को बहुत बचाता है।।

.

गाँव-गाँव में, शहर-शहर में,

अपनी बीन बजाता है।

नाग झूमता फन फैला कर,

सबको नाच दिखाता है।।

.

खेल देख कर सब खुश होते,

ताली जोर बजाते हैं।

खेल खतम होते ही दर्शक,

पैसे खूब लुटाते हैं।।

.

पैसे लेकर के सबसे वह

अपनी झोली भरता है।

खेल दिखाकर के सबको वह

अपने घर को चलता है।।

.

 

43. बिल्ली रानी

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.

बिल्ली रानी बड़ी सयानी,

दूध रोज पी जाती है।

आहत पाकर नौ दो ग्यारह,

पहले ही हो जाती है।।

.

बच्चे जब घर पर होते हैं

तब चुपके से आती है।

धीरे-धीरे पूँछ हिला कर

उनका मन बहलाती है।।

.

अपने बच्चों को लेकर,

जब बिल्ली रानी आती है।

दीदी अपने पास बुलाकर,

उनको दूध पिलाती है।।

.

इसे देख कर भगते चूहे,

जल्दी से छिप जाते हैं।

बिल्ली से बच गयी जान,

तो अपनी खैर मनाते हैं।।

.

44. गाँव घूमने जाएँगे

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.

मामा के घर जाएँगे,

छुट्टी वहीं बिताएँगे।

रबड़ी, दूध, मलाई खाकर,

सेहत खूब बनाएँगे।।

.

बगिया में हम जाएँगे,

आम तोड़कर खाएँगे।

रोज करेंगे धमा चौकड़ी

आफत बहुत मचाएँगे।।

.

नानी जी का हाथ पकड़ कर,

गाँव घूमने जाएँगे।

नाना हमको गोद उठाकर,

टाफी ढ़ेर खिलाएँगे।।

.

मामा साइकिल पर बैठाकर,

हमको सैर कराएँगे।

मस्ती-मौज करेंगे जमकर,

फिर वापस घर आएँगे।।

.

45. सबसे ही सबका नाता है

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.

सूरज दादा के आते ही,

अँधियारा सब मिट जाता है।

चका-चौंध दूधिया उजाला,

चारों ओर बिखर जाता है।।

.

सूरज की नन्हीं किरणों से ,

नई ताजगी भर जाती है।

फूल डालियों पर हँसते हैं,

कोयल कुहू-कहू गाती है।।

.

भेद-भाव की बात न जाने,

सबसे ही उसका नाता है।

सबके लिए रोशनी उसकी,

वह सबका जीवनदाता है।।

.

नहीं पराए सब अपने हैं,

सबसे ही सबका नाता है।

यही बात वह घूम-घूम कर

सब लोगों तक पहुँचाता है।।

.....................

जीवन-वृत्त

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.

नाम : राम नरेश 'उज्ज्वल'

पिता का नाम : श्री राम नरायन

विधा : कहानी, कविता, व्यंग्य, लेख, समीक्षा आदि

अनुभव : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगभग पाँच सौ

रचनाओं का प्रकाशन एवं आकाशवाणी से कविताओं का प्रसारण।

प्रकाशित पुस्तके : 1-'चोट्टा'(राज्य संसाधन केन्द्र,उ0प्र0

द्वारा पुरस्कृत)

2-'अपाहिज़'(भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार से पुरस्कृत)

3-'घुँघरू बोला'(राज्य संसाधन केन्द्र,उ0प्र0 द्वारा पुरस्कृत)

4-'लम्बरदार'

5-'ठिगनू की मूँछ'

6- 'बिरजू की मुस्कान'

7-'बिश्वास के बंधन'

8- 'जनसंख्या एवं पर्यावरण'

सम्प्रति : 'पैदावार' मासिक में उप सम्पादक के पद पर कार्यरत

सम्पर्क : उज्ज्वल सदन, मुंशी खेड़ा, पो0- अमौसी हवाई अड्डा, लखनऊ-226009

मोबाइल : 09616586495

-मेल :

ujjwal226009@gmail.com 

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