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March 2017
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(प्रस्तुत निबन्ध लेखक द्वारा वरिष्ठ वर्ग में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नागरी लिपि परिषद नई दिल्ली द्वारा आयोजित प्रतियोगिता -95 -96 हेतु लिखा गया व पुरस्कृत हुआ)

नागरी लिपि के उद्भव और विकास को जानने के लिए यह आवश्यक है, कि हम पूर्ववर्ती साहित्य को देखें। प्राचीन काल के साहित्यिक ग्रन्थों वैदिक और बौद्ध साहित्य को देखने से स्पष्ट होता है, कि भारत में लेखन कला का प्रचार चौथी शताब्दी ई0 पू0 से बहुत पहले उपलब्ध था; जब कि इसके विपरीत योरोपीय लोगों का मानना है कि भारतीयों ने चौथी, आठवीं या दसवीं शती ई0 पू0 में लेखन कला का ज्ञान प्राप्त किया। जो कि मेरी दृष्टि में नितान्त सारहीन ,खोखला तथा भारतीयों को सांस्कृतिक दृष्टि से निम्न स्तर का प्रमाणित करने का षडयंत्र है।

नागरी लिपि का प्रयोग उत्तर भारत में 10 वीं शताब्दी से पाया जाता है। तो वहीं दक्षिण भारत में इसका प्रयोग 8 वीं श्ाती में ही विद्यमान था। जहां इसका नाम नंदिनागरी था। उत्तर और दक्षिण भारत के लिपि सम्बन्धी प्रयोग देखने के बाद यह तो स्पष्ट ही है ; कि 10 वीं शताब्दी में देवनागरी नाम प्रचलन मे था। दसवीं शताब्दी से आज तक देवनागरी की वर्णमाला मे पर्याप्त विकास हुआ। इसका स्वरूप शनैः -शनै : सुन्दर से सुन्दर तर अक्षरों के रूप में बदलता गया। जहां तक शिलालेख ,ताम्रपत्र, अभिलेख आदि का सम्बन्ध है तो इस काल में लिखे गए राजस्थान, संयुक्त प्रान्त, बिहार, मध्य भारत तथा मध्यप्रान्त के सभी लेख देवनागरी लिपि में ही पाये जाते है।जिनसे देवनागरी के उद्भव व विकास के क्षेत्र में सामग्री जुटाने हेतु पर्याप्त बल मिलता है।देवनागरी लिपि के विकास व प्रारम्भिकी स्थिति पर कुछ निष्कर्ष सामने आते हैं। जैसा कि दसवीं शताब्दी की नागरी में कुटिल लिपि की भांति अक्षरों का सिर चौड़ाई सदृश्ा और दो भांगों में विभाजित होता था। किन्तु ग्यारहवीं शती की नागरी लिपि वर्तमान देवनागरी से मिलती -जुलती है। बारहवीं शताब्दी आते -आते यह पूर्णतया आज की वर्तमान वैज्ञानिक लिपि देवनागरी हो जाती है अर्थात् आधुनिक समय की देवनागरी लिपि आज से नौ सौ साल पहले की नागरी लिपि का ही परिष्कृत रूप है। जिसने समय व परिस्थितियों के साथ स्वंय को बदला है। सभी से अनुकूलन कर सामंजस्य स्थापित किया है। देवनागरी ,नागरी की दसवीं शताब्दी से आज तक की विकास यात्रा पर डॉ0 गौरी शंकर हीराचन्द ओझा जी ने पर्याप्त प्रकाश डाला है। उनके अनुसार-'' ईसा की दसवीं शताब्दी की उत्तरी भारत की नागरी लिपि में कुटिल लिपि की नाई अ, आ, प, म, य, श् औ स् का सिर दो अंशों में विभाजित मिलता है, किन्तु ग्यारहवीं शताब्दी मे यह दोनों अंश मिलकर सिर की लकीरें बन जाती हैं और प्रत्येक अक्षर का सिर उतना लम्बा रहता है जितनी कि अक्षर की चौड़ाई होती है।ग्यारहवीं शताब्दी की नागरी लिपि वर्तमान नागरी लिपि से मिलती -जुलती है और बारहवीं शताब्दी से लगाातार आज तक नागरी लिपि बहुधा एक ही रूप मे चली आती है। '' ( भारतीय प्राचीन लिपि माला पृष्ठ संख्या- 69-70)

अन्य सार्थक पहलुओं के साथ देवनागरी लिपि के विकास मे अंकों की भूमिका भी अत्यन्त महत्वपूर्ण रही है, जिनका विकास क्रमिक रूप से हुआ है जो अंक -1 सातवीं और आठवीं शताब्दी तक पड़ी रेखा (-) के रूप मे लिखा जाता था। वही परिष्कृत होकर दसवीं शताब्दी आते -आते सीधी (।) खड़ी रेखा में लिखा जाने लगा। इसी भांति 2 और 3 की भी स्थिति हुई; जो आगे चलकर आज के इन वर्तमान रूप एवं स्वरूपों को प्राप्त हुए।

देवनागरी के नामकरण के सम्बन्ध में विद्वानों में पर्याप्त मत भेद रहा है। देवनागरी अथवा नागरी लिपि नाम क्यों पड़ा ? इस पर विभिन्न विद्वानों ने अपने -अपने विचार व्यक्त किये है। एक किन्तु ठोस सर्वमान्य मत कोई प्रस्तुत नहीं कर सका है। फिर भी हम प्रत्येक पर क्रमश्ाः प्रकाश डालने का प्रयास करेंगे-

1-कुछ विद्वान इसका सम्बन्ध नागर ब्राह्मणों से लगाते हैं, जो कि गुजरात में अधिक संख्या में हैं तथा वे इसका प्रयोग करते थे। इसी लिए यह लिपि देवनागरी कही जाने लगी।

2-एक दूसरे मत के अनुसार नागरी अर्थात् नगरों में प्रचलित होने के कारण नागरी कहलायी। नागरी से पूर्व 'देव' शब्द देवताओं का वाची है और इसी आधार पर इसे देवनागरी कहा जाता है।

3-इस मत के अनुसार - तान्त्रिक मन्त्रों में बनने वाले कुछ चिन्ह देवनगर कहलाते थे जिनसे मिलते -जुलते होने से इसका नाम लिपि से जुड़ गया और यह लिपि देवनागरी हो गयी।

4-आइ0 एम0 शास्त्री जी के विचारानुसार - ''देवताओं की मूर्तियां बनने के पूर्व सांकेतिक चिन्हों द्वारा उनकी पूजा होती थी। ये चिन्ह कई त्रिकोण तथा चक्रों आदि से बने हुए मंत्र थे; जो देव नगर कहलाता था के मध्य लिख जाते थे। देवनगर के मध्य लिखे जाने के कारण अनेक प्रकार के सांकेतिक चिन्ह कालान्तर में उन -उन नामों के पहले अक्षर माने जाने लगे और देवनगर के मध्य में उनका स्थान होने से उनका नाम देवनागरी हुआ।''

5- ललित विस्तार में संकेतित '' नाग'' लिपि नागरी है। 'नाग' से नागरी होना सरल है का उल्लेख मिलता है। जिसका तीव्र विरोध करते हुए डा0 एल0डी0 वार्नेट ने कहा है-''कि 'नागलिपि' का नागरी लिपि से कोई सम्बन्ध नहीं है।''

6-काशी (वाराणसी) का दूसरा नाम देवनगर है। यहां प्रचलित होने के कारण देवनागरी स्पष्ट शब्दों में यही देवनागरी है।

7-डॉ0 धीरेन्द्र वर्मा के अनुसार -मध्य युग में स्थापत्य की एक शैली नागर थी। उसमें चतुर्भुज आकृतियां होती थीं। इन चर्तुमुखी आकृतियों के कारण ही इसे देवनागरी कहा गया।

उपयुक्त सभी मत देखने से स्पष्ट होता है, कि सभी परस्पर विरोधी हैं तथा एक -दूसरे से अत्यन्त दूर जान पड़ते हैं। नागरी शब्द नागर से निर्मित हुआ है जिसका अर्थ है -नगर का अर्थात् सभ्य, शिष्ट और शिक्षित। वस्तुतः जिस लिपि में सभ्य, शिष्ट, सुसंस्कृत और परिष्कृत रुचि वाले व्यक्यिों द्वारा साहित्य रचा और लिखा गया ।वही नागरी लिपि कहलायी और कालान्तर में अपने विकास के आयामों का स्पर्श करती हुई देवनागरी लिपि के रूप में जानी जाने जगी ।

देश व समाज में होने वाले सांस्कृतिक ,राजनीतिक व नैतिक परिवर्तनों सें भाषा व लिपि अछूती रह जाए ऐसा तो संभव ही नहीे है। देवनागरी लिपि पर भी देश की परिवर्तित परिस्थितियों, सांस्कृतिक आक्रमणों ,राजनीतिक अस्थिरता, सामाजिक, धा`िर्मिक आन्दोलनों का पर्याप्त प्रभाव पड़ा। देवनागरी लिपि विभिन्न भाषाओं और उनके प्रभावों से प्रभावित हुए बिना न रह सकी।देवनागरी को सर्वाधिक प्रभावित किया है फारसी ने। क्योंकि भारत भूमि फारसी के प्रभाव में निरन्तर आठ सौ वर्षौं तक रही है। यही वह समय भी था। जब नागरी विकास के सोपान चढ़ रही थी और ऐसी स्थिति में अधिक प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। जिसके परिणाम स्वरूप देवनागरी में जिह्नामूलीय ध्वनियां क, ख, ग,फ, आदि विकसित हुईं। डॉ0 भोलानाथ तिवारी के अनुसार-'' नागरी में नुक्ते या बिन्दु का प्रयोग निश्चित रूप से फारसी का प्रभाव हैं मध्य युग में कुछ लोग य, प दोनों को य जैसा और व, ब को व लिखने लगे थे। फारसी के बाद यदि किसी भाषा या संस्कृति ने सर्वाधिक प्रभावित किया है; तो वह अंग्रेजी ही रही है। जिसके प्रभाव वश देवनागरी लिपि में अनेक परिवर्तन हुए। परिणामत : आज भी यदि कोई अंग्रेजी पढ़ा-लिखा देवनागरी में लिखता है, तो वह अंग्रेजी की ही भांति बिना लेखनी उठाये लिखता चला जाता है। अंग्रेजी ने हमारे विराम चिन्हों ,उद्धरण चिन्हों, अल्प -अर्द्ध विराम आदि को भी प्रभावित किया है। यदि हम पूर्ण विराम को छोड़ दे तो लगभग सभी पर अंग्रेजी का प्रभाव परिलक्षित होता है। कुछ विद्वजन तो ऐसे भी देखे जा सकते हैं जो आज तक पूर्ण विराम के लिए पाई (। ) का प्रयोग न कर केवल (ं ∙) बिन्दु का उपयाग करते हैं बल्कि यह दुर्भाग्य अथवा लिपि के भाग्य की बिडम्बना ही कही जाएगी। कि आज भी कुछ हिन्दी पत्रिकाएं पूर्र्ण विराम के लिए मात्र बिन्द ु(∙) को ही मान्यता देती हैं। अंग्रेजी प्रभाव के सन्दर्भ में डॉ0 भोलानाथ तिवारी का मत है कि-'' भाषा के प्रति जागरूकता के कारण कभी-कभी ह्नस्व ए ,ओ के द्योतन के लिए अब ऐं , ओं का प्रयोग भी होने लगा है।''

बंगला लिपि का देवनागरी के विकास पर कोई विशेष प्रभाव न पड़ सका। हाँ डॉ0 मनमोहन गौतम का मत अवश्य इस सम्बन्ध मे उदधृत करना चाहेंगे। उनके अनुसार- ''अक्षरों की गोलाई पर बंगला का प्रभाव अवश्य दिखलाई पड़ता है। चौकोर लिखे जाने वाले अक्षर अब गोलाई में लिखे जाने लगे हैं।''

मराठी ने भी देवनागरी लिपि को प्रभावित करने में कोई कृपणता नहीं की। बल्कि इसके प्रभाववश एक ही वर्ण दो -दो रूपों में प्रचलित हुआ है। उदाहरणार्थ -न्न्र -अ, भ - झ आदि।

गुजराती लिपि ने भी देवनागरी को प्रभावित किया है। चूँकि गुजराती लिपि शिरोरेखा विहीन लिपि है। इस कारण परिणामतः आज भी अनेक विद्वान शिरोरेखा के बिना ही लिखते चले जाते हैं। जिनमें से अधिसंख्य गुजराती साहित्य से प्रभावित ही हैं।

देवनागरी लिपि की विशेषताओं पर यदि हम दृष्टि डालें तो पाते हैं ,कि यह आज की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है। जिसकी सर्व प्रिय विशेषता है - जैसा लिखना वैसा पढ़ना। इसमें अंग्रेजी अथवा उर्दू की भॉति लिखा कुछ और पढ़ा जाता कुछ नहीं ; बल्कि इसकी ध्वनियां इतनी पूर्ण व सशक्त हैं, कि इसमें जो जैसा लिखा जाता है वैसा ही बोलकर पढ़ने की अपूर्व क्षमता है। इसके उच्चारण स्थान मुख, तालु , मूर्धा, दन्त्य और ओष्ठ में विभाजित है। जिस क्रम में उच्चारण के स्थान हैं। ठीक वही क्रम स्वर व व्यंजन के विभाजन का भी है। इसमें स्वर -व्यंजनों की तरह एक ही वर्ण को कई -कई ध्वनियों के रूपों में प्रयोग नहीं किया जाता है, बल्कि प्रत्येक ध्वनि के लिए एक अलग वर्ण है। संसार की किसी भी भाषा -लिपि में स्वरों की मात्राएं भी निश्चित नहीं हैं। लेकिन देवनागरी लिपि के स्वरों की मात्रायें भी निश्चित की गई हैं। यह ध्वनि प्रधान लिपि है। वर्णों का क्रम उच्चारण स्थानों के आधार पर क्रमबद्ध किया गया है।प्रत्येक उच्चारण स्थान की ध्वनि भिन्न होती है। किसी भी ध्वनि के लिए हमें किसी प्रकार की न्यूनता का आभास नहीं होता है। तुलनात्मक दृष्टि से भी देखें तो देवनागरी लिपि अति उत्तम है।अंग्र्रेजी और उर्दू की भॉति वर्ण संकेतों की अल्पता नहीं है। कुँवर को कुनवर ,जेर जेबर, पेश का अभाव जैसी समस्यायें भी नहीं हैं। बल्कि इसमे मात्राओं का निश्चित विधान मिलता है। ह्नस्व और दीर्घ की मात्राएं भी निश्चित हैं।

निष्कर्षत : नागरी के नाम से आरम्भ की गई अपनी यात्रा के अनेक पड़ावों ,भाषायी प्रभावों मत - मतान्तरों आदि को अपने में आत्मसात करती हुई देवनागरी अपने विकास के उच्चतम शिखर की ओर बढ़ रही है। जिसमे उसकी सरलता, बोधगम्यता ,उच्चारण की शुद्धता, वैज्ञानिकता ध्वनि लिपि की विशेषता पर्याप्त योग देकर नूतन आयामों को स्पर्श कराने में सहयोग कर रही है। आशा है कि लिपि देवनागरी अपने लक्ष्य तक की यात्रा बड़ी सुगमता से पूर्ण कर लेगी।

शशांक मिश्र भारती संपादक - देवसुधा, हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर - 242401 उ.प्र. दूरवाणी :-09410985048/09634624150

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फिल्म के निर्माण की अनेक महत्त्वपूर्ण कड़ियों में से अहं कड़ी हैं - संवाद। संवाद सृजन प्रक्रिया के साथ जुड़नेवाली कला है। संवादों के माध्यम से कहानी को कथात्मक रूप से संवादात्मक और नाटकीय रूप प्राप्त होता है, जिसका उपयोग अभिनय के दौरान होता है। फिल्मों की व्यावसायिक और कलात्मक सफलता भी तस्वीरों की सूक्ष्मताओं और संवाद के आकर्षक होने पर निर्भर होती है। न केवल भारत में बल्कि विश्व सिनेमा में आरंभिक फिल्में अवाक (बिना आवाज) की थी। इन्हें सवाक (वाणी के साथ, आवाज के साथ) होने में काफी समय लगा। हालांकि सिनेमा के निर्माताओं की मंशा इन्हें आवाज के साथ प्रदर्शित करने की थी परंतु तकनीकी कमजोरियां और कमियों के चलते यह संभव नहीं हो सका। धीरे-धीरे दर्शकों का और सारी दुनिया का सिनेमा के प्रति आकर्षण उसमें नई-नई खोजों से इजाफा करते गया और फिल्में सवाक बनी और आगे चलकर रंगीन भी हो गई। चित्रों के माध्यम से प्रकट होनेवाली कथा-पटकथा संवाद के जुड़ते ही मानो लोगों के मुंह-जुबानी बात करने लगी। लोग पहले से अधिक उत्कटता के साथ फिल्मों से जुड़ने लगे और विश्वभर में सिनेमा का कारोबार दिन दुनी रात चौगुनी प्रगति करने लगा। फिल्मों के लिए चुनी कहानी को पटकथा में रूपांतरित करने के लिए और पटकथा को संवादों में ढालने के लिए आलग-अलग व्यक्तियों की नियुक्तियां होने लगी। इसमें माहिर लोग पात्रों के माध्यम से अपने संवाद कहने लगे और आगे चलकर यहीं संवाद लोगों के दिलों-दिमाग की बात भी करने लगे। संवादों का फिल्मों के साथ जुड़ते ही फिल्में सार्थक रूप में जीवंत होने की ओर और एक कदम उठा चुकी।

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1. फिल्मी संवाद के प्रकार

फिल्मी संवादों को असगर वज़ाहत जी ने चार वर्गों में विभाजित किया है। उन्होंने कहा है कि "संवादों के माध्यम से न केवल साधारण बातचीत होती है बल्कि भावनाओं और विचारों को भी व्यक्त किया जाता है। परिस्थिति और घटनाओं का ब्योरा दिया जाता है, टिप्पणियां की जाती हैं। संवादों का बहुआयामी स्वरूप उसके प्रकार निर्धारित करने पर बाध्य करता है। संवाद के विविध प्रयोगों के आधार पर संवाद को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है – (1) सामान्य जानकारी देने या लेनेवाले संवाद, (2) औपचारिक कार्य-व्यापार की सूचना देनेवाले संवाद, (3) विचार व्यक्त करनेवाले संवाद और (4) भावनाएं व्यक्त करनेवाले संवाद।" (पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका, पृ. 72)

अ. सामान्य जानकारी देने या लेनेवाले संवाद – सामान्य जानकारी देनेवाले संवाद सीधे-साधे और सरल होते हैं। इनके माध्यम से केवल जानकारी और सूचनाएं प्राप्त होती है। इसकी भाषा और भाषा में निहित अर्थ दर्शकों की समझ में आसानी से आता है। इसमें कोई अतिरिक्त भाव नहीं होता है। इन संवादों में कोई चमत्कार और टेढ़ापन भी नहीं होता है। कोशिश यह होती है कि दर्शक पात्रों की भाषा को आसानी समझे और भ्रांति पैदा न हो।

आ. भावनाएं व्यक्त करनेवाले संवाद – मनुष्य के स्थायी भाव ग्यारह प्रकार के हैं और इनके साथ जुड़कर आनेवाले विभाव, अनुभाव और संचारी भावों की संख्या भी अधिक हैं। अर्थात् विभाव, अनुभाव और संचारी भाव स्थायी भावों को ताकद प्रदान करते हैं और इन भावों को बड़ी सार्थकता के साथ फिल्मी संवादों में इस्तेमाल किया जाता है। फिल्मों में संवादों के माध्यम से मनोभावों को प्रकट करना कठिन और जटिल कार्य है। हर कहानी और पटकथा में यह भाव सर्वत्र बिखरे पड़े होते हैं और उनको बड़ी सादगी के साथ क्रम से सजाना होता है। संवाद लेखक के लिए चुनौती यह होती है कि सभी फिल्मों मे कम-अधिक मात्रा में यहीं भाव होते हैं तो अभिव्यक्ति करते वक्त कौनसे शब्दों और वाक्यों को चुना जाए। इतनी सारी फिल्में बन रही हैं और उनमें वहीं भाव प्रकट हो रहे हैं तो पुनरावृत्ति होने की संभावनाएं होती है। उससे बचने के लिए भावानुरूप शब्दों का चुनाव और संवाद लेखन कौशल का कार्य माना जाता है।

इ. विचार व्यक्त करनेवाले संवाद – विचार प्रकट करना जटिल कार्य है और इसकी भाषा आमतौर पर परिष्कृत होती है। फिल्मों में अगर परिष्कृत भाषा का प्रयोग किया जाए तो साधारण दर्शक की समझ में नहीं आएगी। अतः संवाद लेखक की यह जिम्मेदारी है कि परिष्कृत भाषा को थोड़ा नरम करते हुए दर्शकों को समझनेवाली भाषा के शब्दों को चुने और फिल्मी विषय तथा प्रसंग के भाषागत नीति-नियम की भी हानी न हो पाए। संवाद लेखक को ऐसे शब्दों का चुनाव करना पड़ता है जो पारिभाषिक न होते हुए भी विचार को व्यक्त करने में सक्षम हो।

ई. औपचारिक कार्य-व्यापार की सूचना देनेवाले संवाद – फिल्मों में कई औपचारिक प्रसंग आ जाते हैं जहां संवाद लेखक के लिए समतोल बनाने की आवश्यकता होती है। अदालती भाषा, पुलिस कार्य प्रणाली की भाषा, सरकारी कार्यालयों की भाषा आदि औपचारिक संवादों की श्रेणी में आते हैं और इन संवादों में संवाद लेखक को ऐसी भाषा के निकट पहुंचना पड़ता है। फिल्मों में ऐसी भाषा का इस्तेमाल अगर हो जाए तो फिल्में यथार्थ के अधिक निकट पहुंच जाती है। तीन घंटे तक दर्शक के दिलों-दिमाग पर अगर राज करना है तो कसे हुए संवादों की आवश्यकता है।

2. फिल्मी संवाद की भाषा

संवाद के प्रकारों के भीतर संवाद की भाषा कैसी होनी चाहिए इस पर चर्चा हो चुकी है उसी चर्चा को यहां आगे बढ़ाया जा सकता है। संवादों की भाषा हमेशा गतिशील होती है और उसका गतिशील होना कहानी के हित में होता है, परंतु संवाद लेखक के लिए इस भाषा को गतिशील रखना एक प्रकार की चुनौती होती है। फिल्मों में आनेवाले पात्र हमारे आस-पास उपलब्ध होते हैं या यूं कहे कि मानवी जीवन की ही कहानियां फिल्मों में होती हैं, तो उसमें भाषाई प्रयोग भी उन पात्रों के अनुकूल ही होता है। संवादों की भाषा सबके लिए संप्रेषणीय होनी चाहिए क्योंकि फिल्में और धारावाहिकों को व्यापक जनसमुदाय देखता है और इस जनसमुदाय को वह समझ में आनी चाहिए। भाषा में सुगमता और सर्वग्राह्यता भी आवश्यक है। संवादों की स्वाभाविक भाषा लेखक की नहीं तो पात्रों की होती है। फिल्मी संवाद की भाषा को निम्म आकृति के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है।

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सामान्य जानकारी देने या लेनेवाले संवाद, औपचारिक कार्य-व्यापार की सूचना देनेवाले संवाद, विचार व्यक्त करनेवाले संवाद और भावनाएं व्यक्त करनेवाले संवाद यह चार संवादों के प्रमुख प्रकार हैं और इन प्रकारों के अनुरूप फिल्मों की भाषा बनती है। संवादों के प्रकारों में इसका विश्लेषण हो चुका है, अतः पुनरावृत्ति को रोकने के लिए यहां पर उसकी चर्चा नहीं कर रहे हैं। यहां जो अन्य बातें हैं उस पर संक्षेप में चर्चा कर सकते हैं जिसके भीतर भाव प्रधान संवाद और अन्य भाषाई प्रयोगवाले संवाद फिल्मों में सौंदर्य निर्माण करने का कार्य करते हैं।

फिल्मों में भावनाएं होती हैं और मनुष्य के ग्यारह प्रकार के स्थायी भाव – प्रेम (रति), उत्साह, हास, शोक, क्रोध, भय, घृणा (जुगुप्सा), विस्मय, निर्वेद (शम), श्रद्धा और वत्सलता का फिल्मों में अंकन होता है। इन भावों के अनुकूल शब्दों का चुनाव अत्यंत आवश्यक होता है। इन भावों के प्रकटीकरण के लिए संवाद लेखक अभिधा, लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्ति का इस्तेमाल करते हुए संवाद लेखन करता है। व्यंजना शब्द शक्ति के भीतर अलंकारिक भाषा का भी उपयोग होता है। परंतु इन सारी विशेषताओं को संवाद की भाषा के साथ जोड़ते वक्त इस बात का ध्यान रहे कि संवाद स्वाभाविक, सरल और पात्रानुकूल बने। अतिशयता और अतिरंजितता विषय को खतरा पैदा कर सकती है।

· प्रतीक – "संवाद की भाषा में प्रतीक का प्रयोग अभिव्यक्ति के स्तर को बहुत ऊपर उठा देता है। किसी भाव या विचार को बहुत प्रभावशाली ढंग से बताने के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं। प्रतीक आमतौर पर जनसाधारण में प्रचलित हैं और उनका संवाद में प्रयोग बहुत सरलता से पूरा संदेश प्रेषित कर देता है। मुख्य रूप से प्रतीक की विशेषताएं ये हैं कि वह अप्रस्तुत को प्रस्तुत कर देते हैं। मन में तुरंत किस भावना का संचार होता है। प्रतीक प्रायः अपने देश की संस्कृति, सभ्यता और इतिहास से प्रेरित होते हैं। प्रतीक बनने की प्रक्रिया लगातार जारी रहती है। प्रतीक के प्रयोग से न केवल वाक्य में नयापन आता है बल्कि उसका प्रभाव बढ़ जाता है।" (पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका, पृ. 86-87)

उदा. मेरे दोस्त के घर में महाभारत शुरू है। एक भाई भीम की तरह कौरव सेना पर टूट पड़ा है। यहां पर महाभारत, भीम, कौरव सेना आदि भाषाई प्रयोग प्रतीक है।

· बिंब – फिल्में देखी जाती है अर्थात् वह दृश्य माध्यम है। फिल्मों में दृश्य स्वरूप में बिंबों को चित्रित किया जाता है। फिल्मों में यह अत्यंत प्रभावी प्रयोग है। बिल्कुल कम शब्दों में फिल्मी संवाद के भीतर बिंबों की सहायता से ताकत आ जाती है। फिल्मों में जहां दृश्य बिंब बनाना संभव नहीं वहां शब्द बिंबों की मदत ली जाती है। इसके कारण भावनाएं अधिक प्रभावशाली बन जाती है, संवादों में ताजगी और जीवंतता आती है।

उदा. खेत में काम करने के बाद अगर परिवार के सदस्य थक चुके हैं तो होनेवाले संवाद की भाषा में बिंबों का इस्तेमाल किया जाए तो इस प्रकार संवाद बनेगा – "मैं आज चुर-चुर हो गया हूं। क्या मेरे माता-पिता भी इसी प्रकार चुर-चुर हो गए होंगे। आज जैसे लग रहा है सारा शरीर चक्की में डालकर पिसा गया हो। क्या मां भी ऐसा ही महसूस कर रही होगी।"

· मुहावरा और लोकोक्ति (कहावत) - "भाषा में मुहावरों के माध्यम से सटीक और प्रभावी अभिव्यक्ति होती है। किसी प्रसंग या अभिव्यक्ति विशेष के संबंध में शताब्दियों से संचित अनुभव मुहावरों के रूप में स्थापित हो गए हैं। मुहावरों के माध्यम से न केवल सटीक बात कही जाती है बल्कि मुहावरे ऐसे बिंब भी बनाते हैं जो श्रोता को सरलता से गहराई तक ले जाते हैं। बोल-चाल की भाषा में मुहावरों का इस्तेमाल अक्सर किया जाता है। मुहावरे संवाद की भाव प्रधान भाषा में बहुत उपयोगी साबित होते हैं। लेकिन यह देखना आवश्यक है कि मुहावरा पूरे प्रसंग में सटीक बैठता हो और सिनेमा का दर्शक समुदाय उसे अच्छी तरह समझता हो। संवादों में मुहावरों का प्रयोग बहुत सोच-समझकर उचित स्थान पर ही करना चाहिए। मुहावरों की तरह लोकोक्तियां भी शताब्दियों से बोल-चाल की भाषा का हिस्सा हैं। लोकोक्तियां जीवन के कार्य व्यापार से संबंधित अनुभव आधारित अभिव्यक्तियां हैं, जो प्रायः सर्वमान्य हैं। मतलब यह कि उनके द्वारा व्यक्त किया गया मत प्रायः स्वीकार किया जाता है। मुहावरा कुछ शब्दों का समूह माना जाता है, जो एक साथ मिलकर अभिव्यक्त होते हैं। मुहावरों का सीधा अर्थ न होकर कोई और लक्षित अर्थ होता है। मुहावरें जब वाक्य में प्रयोग किए जाते हैं तब शब्दों को नया आयाम मिलता है। मुहावरों के शब्दों को समान्यतः बदला नहीं जाता क्योंकि ऐसा करने से उनका प्रभाव नष्ट होता है। लोकोक्तियां प्रायः वाक्य जैसी होती है। उनमें कोई अनुभव जनित सच्चाई छिपी होती है। लोकोक्तियां छोटी होती हैं। भाषा सरल होती है। इनमें लोकजीवन के तत्त्व भी होते हैं। लोकोक्तियों का प्रयोग वाक्य में नहीं किया जाता, इन्हें उदाहरण के तौर पर कहां जाता है।" (पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका, पृ. 88)

उदा. उंगलियों पर नचाना (मुहावरा) – किसी को पूरी तरह अपने काबू में कर लेना। फिल्मों में कोई पात्र दूसरे पात्र के दिमाग और मन पर हांवी हो गया हो तो इस मुहावरे का इस्तेमाल हो सकता है।

तलवे चाटना (मुहावरा) – बहुत खुशामद करना, चापलुसी करना। फिल्मों में कोई पात्र अपने लाभ के लिए या भय से दूसरे पात्र की बहुत खुशामद कर रहा है, चापलुसी कर रहा है तो इस मुहावरे का इस्तेमाल हो सकता है।

अकल बड़ी की भैंस (लोकोक्ति) – बुद्धिमानी सबसे बड़ी ताकत है। बुद्धि और ताकत के इस्तेमाल से कोई काम किया जा रहा है और उस प्रसंग में सफलता बुद्धि के बल मिल जाए तो इस लोकोक्ति का इस्तेमाल होता है।

आम के आम गुठलियों के दाम (लोकोक्ति) – किसी काम से दोहरा फायदा होना। पर्यावरणीय संदेश देनेवाली फिल्म में पेडों को लगाने का आवाहन किया है और ऐसी स्थितियों में लोगों ने ऐसे पेड़ लगाए जो पर्यावरणीय संरक्षण करते हैं और फल भी देते हैं तो यहां पर इस लोकोक्ति का उपयोग हो सकता है।

सारांश

प्रारंभिक फिल्में अवाक थी। उनके साथ कोई संवाद नहीं था। चित्रों और अभिनय के माध्यम से फिल्म के कहानी को समझना पड़ता था। परंतु जैसे ही फिल्मों के साथ संवाद जुड़े तो सिनेमाघरों में तहलका मचने लगा। लोगों के दिलों-दिमाग की बातें संवादों के माध्यम से पर्दे पर साकार होने लगी। संवादों के जुड़ने से सिनेमा पहले से ज्यादा जीवंत हो गया। कहानीकार, पटकथा लेखक और संवाद लेखक की त्रयी सिनेमा को और अधिक प्रभावशाली बनाने में कामयाब हो गई। हालांकि संवादों का अस्तित्व हमारे कहानियों में पहले से मौजूद था अड़चन थी उसे तकनीकी तौर पर फिल्मों के साथ जुड़ने की। संवाद जब तकनीकी तौर पर सिनेमा से जुड़े तब अभिनय, चित्र और सिनेमा भी सार्थक बन गया। पात्रों के बीच चलनेवाले संवाद मनुष्य के विविध भावों को और मनोदशाओं को पर्दे पर सफलता के साथ प्रदर्शित करने में सफल हो गए हैं।

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. कथा, पटकथा, संवाद – हूबनाथ, अनभै प्रकाशन, मुंबई, 2011.

2. पटकथा लेखन एक परिचय – मनोहर श्याम जोशी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2000, आवृत्ति 2008.

3. पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका – असगर वज़ाहत, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, छात्र संस्करण 2015.

4. मानक विशाल हिंदी शब्दकोश (हिंदी-हिंदी) – (सं.) डॉ. शिवप्रसाद भारद्वाज शास्त्री, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, परिवर्द्धित संस्करण, 2001.

5. सिनेमा : कल, आज, कल – विनोद भारद्वाज, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2006.

6. हिंदी साहित्य कोश भाग 1, पारिभाषिक शब्दावली – (प्र. सं.) धीरेंद्र वर्मा, ज्ञानमंड़ल लि. वाराणसी, तृतीय संस्करण, 1985.

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डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र).

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

मयंक घेदिया की कलाकृति

हुये रिटायर जोब से, अब पूरा आराम   
बीवी से लो मिल गये, बर्तन घीसू काम

रिटायर हैं ऑफिस की, दौड़ गई अब छूट
चक्कर सैन्ट्रल-लिंक के, घिसते जाते बूट

ऐलारम टिन टिन करे, गुस्सा ऐसा आय
एक हथोड़ा मार कर, कचरे में हो बाय

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चांद सितारे सो गये, पक्षी को विश्राम
नर मूरख है जाग कर, सपने में भी काम

जमी आसमाँ सो रहे, पृथ्वी ऊंघे खूब
खर्राटे भरती हवा नर क्यों जाता ऊब

दस घंटा ऑफिस रहे, लेपटॉप ले साथ
करो वर्क घर से अलग, मैनेजर है नाथ

बोर हुआ है उद्यमी, खालीपना उबाय
सुस्त बड़े आराम से, कुर्सी पर ले चाय

मन की वृत्ति शान्त है, करे जुगाली  गाय  
नर ठूँसता फास्ट फूड   जल्द निवाला खाय

झर झर झरना, सो रहा   बगुला आँखें मींच
नर सोता तकिया लिये खर्राटों के बीच

ढांढस बँधी-पगार से, मस्ती का बीज बोय
पेंशन में टेंशन बहुत, जल्दी खाली होय।
 

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हरिहर झा

जन्म स्थान: बांसवाड़ा ( राजस्थान )

प्रकाशित कृतियाँ:  "भीग गया मन", और “Agony churns my heart”। मेलबर्न पोयेट्स एसोसियेशन द्वारा द्विभाषी काव्यसंग्रह “Hidden Treasure” में तथा गेलेक्सी पब्लिकेशन द्वारा “Boundaries of the Heart” में कविता प्रकाशित हुई।
सरिता में लेख व वेब-दुनिया, साहित्य-कुंज, पूर्वाभास, काव्यालय , परिकल्पना, अनुभूति़, हिन्दीनेस्ट, कृत्या़ (हिन्दी व अँगरेजी), काव्यालय आदि में कवितायें प्रकाशित हुई। ’इंटरनेशनल लाइब्रेरी इन पोयट्री’ ने दो कविताओं को “Sound of Poetry” कविता की एलबम में शामिल किया। स्वयं की हिन्दी कविताओं पर दो संगीतबद्ध एलबम निकले।

लेखन: सृजनगाथा के स्तंभलेखक की हैसियत से आस्ट्रेलिया की संस्कृति और इतिहास पर लिखने के अलावा जोन हॉवर्ड, केरी पेकर, बुकर एवार्ड के विजेता पीटर केरी आदि कईं प्रसिद्ध व्यक्तियों पर आलेख लिखे तथा यहाँ के जाने माने भारतवंशियों के साक्षात्कार लिये। आपने ’हिन्द-युग्म’ के लिये रचनात्मक सहयोग दिया। शेक्सपियर के सोनेट का अनुवाद भी किया। काव्यसंग्रह में - देशान्तर, गुलदस्ता,बूमरैंग, अंग अंग में अनंग, मृत्युंजय, नवगीत-२०१३, VerbalArts(GJPP Author Press).

 

सम्मान: अँगरेजी कविताओं पर boloji द्वारा सम्मान और ’इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ़ पोयट्स’ (लास वेगास) तथा ’इंटरनेशनल लाइब्रेरी इन पोयट्री’ द्वारा एवार्ड मिले । हिन्दी व अँगरेजी कविताओं के योगदान के लिये भारतीय प्रौढ़ संघ (NRISA) ने इस वर्ष आपको “Community Service Award” प्रदान किया। साथ ही आपको परिकल्पना हिन्दी भूषण सम्मान (2013) भी मिला। 2015 में अनहद कृति द्वारा काव्य-प्रतिष्ठा-सम्मान मिला।[

 

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यह कोई नई बात नही है कि शब्दों में अथाह ऊर्जा होती है. गर हम गौर करें तो पाएगें कि हमारा सम्पूर्ण जीवन ही उस तरफ प्रवाहित होता है, जिस तरफ की अधिक ऊर्जा हमारे अन्दर सन्चित होती है. हाँ यह जरूर है कि वह सकारात्मक ऊर्जा भी हो सकती है और नकारात्मक ऊर्जा भी. यदि हमारे अन्दर सकारात्मक ऊर्जा अधिक है तो हम स्वतः हर रोज कुछ न कुछ नया सीखते समझते हुए आगे बढ़ते जाते हैं और इसके विपरीत यदि हमारे अन्दर नकारात्मक ऊर्जा अधिक है तो हम दिन प्रतिदिन वक्त की उठा-पटक से परेशान होकर अवनति की ओर बढ़ते जाते हैं. वास्तविकता तो यह है कि हम अधिकतर लोग इस मनोवैज्ञानिक सच को भलीभाँति समझ ही नही पातें हैं और सिर्फ अपनी किस्मत को कोसते हुए जिन्दगी को जैसे तैसे व्यतीत करते रहते हैं.

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अच्छा, व्यवहारिक तौर पर जरा विचारिए. यह शब्द ही है जो जोड़ भी सकता है और तोड़ भी, अपना भी बना सकता है और अपनों को दूर भी कर सकता है, बहुत कुछ दिला भी सकता है और गवाँ भी सकता है. परन्तु एक अहम सवाल यह है कि ये शब्द आते कहाँ से हैं ? सवाल बिल्कुल वाज़िब है. आप शायद यह महसूस किए होंगे कि जैसा हमारा अन्तःकरण होता है ठीक वैसा ही हम बाह्य आचरण भी करते हैं. यानी हम सीधे तौर पर यह कहें कि हमारे शब्द हमारे अन्तःकरण की ही अभिव्यक्ति हैं. सन्त कबीर दास जी ने बिल्कुल ठीक कहा था - एक शब्द सुखरास है, एक शब्द दुखरास. एक शब्द बन्धन करै, एक करै गलफाँस. यानी आपके शब्द आपको सुख, दुःख, बन्धन और मुक्ति सब कुछ दिला सकते हैं.

शब्दों के सम्बंध में कई महान विचारकों के मत् निम्न है-

1- कन्फ्यूशियस : शब्दों को नाप तौल कर बोलें, जिससे तुम्हारी सज्जनता टपके.

2- ऋषि नैषध : मितं च सार वाचो हि वाग्मिता, अर्थात् थोड़ा और सारयुक्त बोलना ही पाण्ड़ित्य है.

3- जे कृष्णमूर्ति : कम बोलो, तब बोलो जब यह विश्वास हो जाए कि जो बोलने जा रहे हो, उससे सत्य, न्याय और नम्रता का नाश नही होगा.

4- संत तिरूवल्लुवर : जो लोग बिना सोचे विचारे बोलते है, वे उस मूर्ख व्यक्ति की तरह होते हैं, जो फलों से लदे वृक्ष से पके फलों को छोड़कर कच्चे फलों को तोड़ते रहते हैं.

5- आचार्य चाणक्य : वाणी की पवित्रता ही सच्चा धर्म है.

जरा गौर कीजिए, श्री कृष्ण ने महाभारत में बिना अस्त्र-शस्त्र लिए ही अपने शब्दों के बल पर पूरे युद्ध को अपने हिसाब से चलाते गए. इतना ही नहीं, हम यह कह सकते हैं कि महाभारत का युद्ध ही पूर्णतया शब्दों पर केन्द्रित था. गर श्री कृष्ण जी ने अपने शब्द ऊर्जा का प्रवाह इस प्रकार न किया होता तो रणभूमि में होकर भी अर्जुन शायद अपना अस्त्र शस्त्र रखकर मैदान छोड़कर हट जाते. जब एक युद्ध में शब्दों की इतनी बड़ी महत्ता हो सकती है तो हमारे व्यक्तिगत जीवन में निश्चित रूप से शब्दों का बहुत बड़ा योगदान होता है, बस इसे समझने की आवश्यकता है.

विशेष ध्यातव्य है कि जीवन का एक चक्र होता है. सकारात्मकता हमें अग्रसित करती है और साथ ही साथ सबको आकर्षित भी करती है. सकारात्मक शब्द, सकारात्मक विचारों से उत्पन्न होते हैं. सकारात्मक विचार हमारे सकारात्मक वातावरण और संस्कार से मिलते हैं. सकारात्मक वातावरण हमारे सत्कर्मों से बनते हैं. शब्द ही सत्कर्म की प्रेरणा होते हैं. कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि अपनी एक नई दुनिया बनाइए, उसी में व्यस्त रहिए, मस्त रहिए, अच्छे बुरे रहनुमा तमाम मिलते जाएगें, कारवाँ बढ़ता जाएगा. अन्ततः आप एक महानता के पथिक बन जाएगें और आपके पद्चिन्हों का दुनियाँ अनुसरण करेगी.

खैर यह जरूर है कि आज की आपाधापी भरी जिन्दगी में हमें संयमित एवं सकारात्मक वातावरण रखना थोड़ा मुस्किल सा हो गया है. अत्याधुनिकता के चलन में जहाँ देखो वहाँ अश्लीलता, फूहड़पन, द्विअर्थी संवाद और बेशर्में लोगों का कुनबा दिखाई देता है. पर क्या यह सच नही कि ऐसे लोग कहीं न कहीं मानसिक अस्थिरता एवं अशान्ति में जी रहे हैं ?. मै यह बिल्कुल नही कह रही हूँ कि आप आधुनिकता को मत अपनाइए, अपनाइए पर जरा सम्भल कर, आधुनिकता के दलदल में कहीं आपके पैर फिसल न जाए, जिससे आप दुबारा सम्भलने के काबिल ही न रह जाएँ. अच्छाइयों का आत्मसात् कीजिए, मानव हित में कार्य कीजिए, सतत् चलते जाइए. सुशब्दों के गीत गाते जाइए, यही एक अच्छा इंसान बनने का सूत्र भी है.

गर हम गौर करें तो शब्दों की ऊर्जा और महानता को आसानी से समझ सकते हैं. दुनियाँ के तकरीबन प्रत्येक धर्म भिन्न भिन्न भाषाओं में कुछ न कुछ मंत्र संजोये हुए हैं. शब्दों के संयोग से बना मंत्र अपने अन्दर अथाह ऊर्जा संचित किए रहता है, यानी जब उनका उच्चारण किया जाता है तब उनसे एक सकारात्मक ऊर्जा निकलती है जोकि किए जा रहे निमित्त संकल्प को लाभ पहुँचाती है. आपके दिमाक में यह प्रश्न भी उठ रहा होगा कि यदि हम मंत्रों के शब्दों में बदलाव या उलटफेर कर दें तो क्या होगा ?. शंका बिल्कुल वाजिब़ है. एक बात तो यह साफ है कि दुनियाँ के प्रत्येक जड़ चेतन स्वयं में अद्वितीय हैं, यानी उनके जैसा दूसरा कोई नहीं है. सबकी अपनी अपनी महत्ता है. ठीक इसी प्रकार शब्द भी अपने अन्दर अद्वितीय ऊर्जा का भण्ड़ार रखते हैं. यदि आप मंत्रों के शब्दों में बदलाव या उलटफेर कर देंगे तो निश्चित रूप से उसकी ऊर्जा में बदलाव आ जाएगा.

यकीनन् यह हमें मानना ही होगा कि हम सब कुछ विशेष कार्य के निमित्त जन्में हैं. जीवन को व्यसनों, कुविचारों और अन्धकार में बिताने से तो ठीक ही है कि अपने मनो-मस्तिष्क एवं शब्दों को पवित्र रखें. हाँ कुछ लोग आज यह जरूर बोलते हैं कि अब इमानदारी का जमाना नहीं रहा. वह शायद आज यह भूल चुके हैं कि दुनियाँ को चलाने वाला सर्वशक्तिमान पहले भी वही था और आज भी वही है. आप गलतफहमियों में मत पड़िए. अपने शब्दों को तराशिए, तोलिए फिर बोलिए. परिणाम आपको स्वतः दिख जाएगा. वह पल दूर नहीं, जब आप महानता के मुसाफिर बन जाएंगें. बस इतना जरूर कीजिए कि आप महानता को धन, सम्पत्ति, वैभव या यश से मत आकिए. महानता का सही मतलब तो यह है कि आपकी अपनी एक दुनियाँ होगी, उस दुनियाँ के आप ही पथ प्रदर्शक होंगे, आपके पद्चिन्हों पर चलने वाले लोगों की एक लम्बी फेहरिस्त होगी. आप नेक काम करते जाएंगें और सत्कर्मों का कारवाँ आगे बढ़ता जाएगा. यही सच्ची महानता होगी. इसलिए आप शब्दों की महत्ता समझकर उसको तोलिए, मोलिए फिर बोलिए.

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परिचय -

"अन्तू, प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश की निवासिनी शालिनी तिवारी स्वतंत्र लेखिका हैं । पानी, प्रकृति एवं समसामयिक मसलों पर स्वतंत्र लेखन के साथ साथ वर्षो से मूल्यपरक शिक्षा हेतु विशेष अभियान का संचालन भी करती है । लेखिका द्वारा समाज के अन्तिम जन के बेहतरीकरण एवं जन जागरूकता के लिए हर सम्भव प्रयास सतत् जारी है ।"

सम्पर्क - shalinitiwari1129@gmail.com

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वह धारा ही क्या जिसमें पवाह न हो। धारा एक धार है। किसी भी द्रव्य पदार्थ का बहाव है। सबसे पहले तो जल-धारा ही है, और इस जल-धारा के भी कितने ही रूप हैं। नदी या सरिता है। नाले हैं, नालियां हैं। सभी में पानी की धारा बहती है – कभी रुक-रुक कर, कभी तेज़ी से अविरल धारा बहती है। नदी की धारा में नावें बहती हैं। मंझधार आकर, जहां पानी की धारा (का बहाव) बहुत तेज़ होती है नाव आगे बढाने में बड़ी सावधानी बरतने पड़ती है, कहीं डूब ही न जाए !

वर्षा भी तो जल-धारा ही है। कभी थोड़ी थोड़ी रुक रुक कर होती है तो कभी हमें वर्षा की ‘अविरल धार’ का सामना करना पड़ता है। ओलों का लगातार गिरना भी ‘ओलों की धार’ है। जमा किया हुआ वर्षा का जल बड़ा गुणकारी होता है। संस्कृत भाषा में इसे भी ‘धारा’ ही कहते हैं। ‘समुद्री जल-धारा’ तो अथाह है। तभी तो इसमें ज्वार-भाटे आते हैं।

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कभी गहरी चोट लग जाती है तो ‘खून की धार’ बहने लगती है। कभी इंसान बहुत दुखी होता है तो ‘आंसुओं की धार’ बहती है। बिजली का नंगा तार यदि आप छू लें तो वह करंट मारे बिना नहीं रहता। आखिर उसमें ‘बिजली की धारा’ जो बह रही है।

“तेल देखो तेल की धार देखो”। तेल की धार यदि बंध जाए तो वह एक लकीर सी बना देती है जिसमें बहाव का पता ही नही चलता। हमारे अविचल, अविछिन्न ध्यान की उपमा तेल की धार से ही दी गई है। न जाने ऐसी कितनी चीजें हैं कि जो तरल पदार्थ नहीं हैं लेकिन प्रकारांतर से उनकी भी धार की हम कल्पना कर लेते हैं। दूर-दर्शन और रेडियो पर प्राय: “धारावाहिक” नाटक प्रसारित होते रहते हैं। नाटक एक ही होता है किन्तु वह किश्तों में दिखाया जाता है, अत: धारावाहिक। इसी तरह पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली कई रचनाएं किश्तों में प्रकाशित होती हैं, वे भी ‘धारावाहिक’ कहलाती हैं। और तो और नियम और ‘संविधान की धाराएं’ भी होती हैं। नियमावली और संविधान तो एक ही होता है लेकिन उसमें अंकित अनुच्छेदों में अलग अलग बातें कही गईं हैं। ये सभी संविधान या किसी भी नियमावली की धाराएं हैं। अपराधियों को किसी न किसी धारा में ही गिरफ्तार किया जाता है।

‘विचार-धाराएं’ भी तो होती हैं। पूंजीवादी विचारधारा, साम्यवादी विचारधारा, गांधीवादी विचारधारा, इत्यादि। ये विचार-धाराएं बेशक समय समय पर बदलती तो रहती हैं, लेकिन ये अपने मुख्य विचार या आदर्श को नहीं छोड़तीं। जो विचार धाराएं स्वयं को समयानुकूल ढाल नहीं पातीं, वे केवल “वाद” होकर रह जाती हैं। अपने शास्त्रीय महत्त्व तक ही सीमित हो जाती हैं। ‘वाक् धारा’ भी होती है कुछ लोग ‘धारा-प्रवाह’ भाषण करते हैं। पर कुछ का वाक्-प्रवाह धारा प्रवाह नहीं होता।

समाज में जो भी प्रचलित है, ‘समाज की धारा’ का अंग है। तमाम व्यक्ति इस ‘धारा में (बिना सोचे समझे) बह जाते और उसका उपयोग करते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो यदि प्रचलित धारा को ठीक नहीं समझते ‘धारा के विरुद्ध’ खड़े हो जाते हैं। समाज की धारा यदि कुछ लोगों के लिए आक्रामक होती है तो वे लोग ‘धारा से बचाव’ का उपाय ढूँढ़ने लगते हैं। “धारा में बह जाना”, “धारा के विरुद्ध खड़े हो जाना” या “धारा से बचाव करना” – यही वे तीन प्रतिक्रियाएं हैं जो किसी भी धारा के प्रति अपनाई जाती हैं। जब पानी की धार बरसती है तो या तो हम उसका ‘उपयोग’ कर उसमें नहाने लगते हैं, या उसके ‘खिलाफ’ छाता लेकर खड़े हो जाते हैं अथवा घर में घुस कर अपना ‘बचाव’ करते हैं।

‘धारा’ कहें या ‘धार’ कोई ख़ास अंतर नहीं है। लेकिन धार शब्द किसी वस्तु के किनारे की तीक्षता के लिए भी इस्तेमाल होता है – जैसे चाकू या तलवार या ब्लेड की धार। जब इन चीजों की धार कुंठित हो जाती है, धार दुबारा ‘चढ़ाई’ जाती है। एक नट तनी हुई रस्सी की ‘धार पर चल’ लेता है। कुछ लोग ‘धारा-पथ’ अपनाते हुए सदैव लीक पर ही चलते रहते हैं। होली में लोग पिचकारियों से रंगों की धार ‘फेंकते’ और ‘मारते’ हैं। भाषा में धार का उपयोग कई तरह से किया जाता है। अवसरानुसार धार चढ़ाई जाती है, धार तेज़ की जाती है, फेंकी जाती है, मारी जाती है। इत्यादि।

--डा, सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -१

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जिस देश में इतिहास लेखन के प्रति विशेष उत्साह दिखाई पड़ता है, समझा जाना चाहिए कि उस देश में इतिहास के नव-निर्माण की ऐतिहासिक चेतना विद्यमान है। हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन के संदर्भ में भी यह बात उतनी ही सच है। हिन्दी के विद्वानों एवं साहित्यकारों ने अपने इस ऐतिहासिक दायित्व का पूरी ईमानदारी से निर्वाह किया है और वे आज भी साहित्य का नया इतिहास लिखने की दिशा में प्रयत्नशील हैं। यद्यपि डॉ.बच्चन सिंह ने अपनी कृति ''हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास'' में स्वीकार किया है कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के इतिहास को छोड़कर कोई दूसरा इतिहास नहीं लिखा जा सकता तथापि यह उल्लेख्य है कि स्वतंत्रता के पश्चात साहित्य इतिहास लेखन के प्रति नई चेतना जागृत हुई है। फलत: भारतीय एवं विशेषत: हिन्दी साहित्य का इतिहास लेखन किस प्रकार किया जाये इस पर भी बहस जारी रही। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के पश्चात हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन में उन्हीं विचार बिन्दुओं की आवृत्ति हुई है जिनका उल्लेख स्थूल या सूक्ष्म रूप में उन इतिहासों में हुआ था, फिर भी यह बात कम महत्वपूर्ण नहीं है कि हिन्दी के नवीन इतिहास दर्शन और हिन्दी साहित्य के ऐतिहासिक आख्यान को लेकर विद्वानों ने कोई शिथिलता नहीं बरती। साहित्य का इतिहास लेखन कई दृष्टियों से सम्पन्न हुआ है जिसमें हिन्दी में रचे जा रहे साहित्य के अंतरंग तत्वों को उद्धाटित किया गया है।

हिन्दी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की समस्याओं पर विचार करने से पूर्व उस समृध्द परंपरा पर दृष्टिपात कर लेना समीचीन होगा जिसके आधार पर ही पुनर्लेखन पर पुनर्विचार संभव है। साहित्य का इतिहास लिखने की परंपरा का सूत्रपात तब हुआ था जब जीवन के विविध क्षेत्रों में इतिहास निर्माण की ललक स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही थी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी का इतिहास इस बात का साक्षी है कि अपने युग के राष्ट्रीय आंदोलन के समानांतर ही उन्होंने हिन्दी साहित्य के वैभव से पाठकों का परिचय कराया। शुक्ल जी ने तत्कालीन रचनात्मक साहित्य की ऐतिहासिक क्रांति व नवीन सृजनात्मक प्रवृत्तियों को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया। यही कारण है कि उनका प्रयास सही अर्थों में इतिहास बना।

हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन को यदि आरंभिक, मध्य व आधुनिक काल में विभाजित कर विचार किया जाए तो स्पष्ट होता है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास अत्यंत विस्तृत व प्राचीन है। उसे शब्दबध्द करने का प्रश् अधिक महत्वपूर्ण था। आरंभिक काल में मात्र कवियों के सूची संग्रह को इतिहास रूप में प्रस्तुत कर दिया गया। भक्तमाल आदि ग्रंथों में यदि भक्त कवियों का विवरण दिया भी गया तो धार्मिक दृष्टिकोण तथा श्रध्दातिरेक की अभिव्यक्ति के अतिरिक्त उसकी और कुछ उपलब्धि नहीं रही।

19वीं सदी में ही हिन्दी भाषा और साहित्य दोनों के विकास की रूप रेखा स्पष्ट करने के प्रयास होने लगे। प्रारंभ में निबंधों में भाषा और साहित्य का मूल्यांकन किया गया जिसे एक अर्थ में साहित्य के इतिहास की प्रस्तुति के रूप में भी स्वीकार किया गया। डॉ. रूपचंद पारीक, गार्सा-द-तासी के ग्रंथ को हिन्दी साहित्य का प्रथम इतिहास मानते हैं। उन्होंने लिखा है-''हिन्दी साहित्य का पहला इतिहास लेखक गार्सा-द-तासी हैं, इसमें संदेह नहीं है। परंतु डॉ. किशोरीलाल गुप्त का मंतव्य है- ''तासी ने अपने ग्रंथ को हिन्दुई और हिन्दुस्तानी साहित्य का इतिहास'' कहा है, पर यह इतिहास नहीं हैं, क्योंकि इसमें न तो कवियों का विवरण काल क्रमानुसार दिया गया है, न काल विभाग किया गया है और अब काल विभाग ही नहीं है तो प्रवृत्ति निरूपण की आशा ही कैसे की जा सकती है। वैसे तासी और सरोज को हिन्दी साहित्य का प्रथम और द्वितीय इतिहास मानने वालों की संख्या अल्प नहीं है परंतु डॉ. गुप्त का विचार है कि ग्रियर्सन का ''द माडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान'' हिन्दी साहित्य का प्रथम इतिहास है। डॉ. रामकुमार वर्मा ने इसके विपरीत अनुसंधानात्मक प्रवृत्ति की दृष्टि से तासी के प्रयास को अधिक महत्वपूर्ण निरूपित किया है।

प्रथम इतिहास लेखन के प्रश् को यहां अधिक विस्तार न देते हुए यह लिखना ही उपयुक्त होगा कि पाश्चात्य और प्राच्य विद्वानों ने हिन्दी के इतिहास लेखन के आरंभिक काल में प्रशंसनीय भूमिका निभाई है। शिवसिंह सरोज साहित्य इतिहास लेखन के अनन्य सूत्र हैं। हिन्दी के वे पहले विद्वान हैं जिन्होंने हिन्दी साहित्य की परंपरा के सातत्य पर समदृष्टि डाली है। अनन्तर मिश्र बंधुओं ने साहित्यिक इतिहास तथा राजनीतिक परिस्थितियों के पारस्परिक संबंधों का दर्शन कराया। डॉ. सुमन राजे के शब्दों में-''काल विभाजन की दृष्टि से भी विश्वबंधु विनोद प्रगति की दिशा में बढ़ता दिखाई देता है।''

आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य का प्रथम व्यवस्थित इतिहास लिख एक नये युग का समारंभ किया। उन्होंने लोकमंगल व लोक धर्म की कसौटी पर कवियों और कवि-कर्म की परख की और लोक चेतना की दृष्टि से उनके साहित्यिक अवदान की समीक्षा की। यहीं से काल विभाजन और साहित्य इतिहास के नामकरण की सुदृढ़ परंपरा का आरंभ हुआ। इस युग में डॉ. श्याम सुन्दर दास, रमाशंकर शुक्ल 'रसाल', सूर्यकांत शास्त्री, अयोध्या सिंह उपाध्याय, डॉ. रामकुमार वर्मा, राजनाथ शर्मा प्रभृति विद्वानों ने हिन्दी साहित्य के इतिहास विषयक ग्रंथों का प्रणयन कर स्तुत्य योगदान दिया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने शुक्ल युग के इतिहास लेखन के अभावों का गहराई से अध्ययन किया और हिन्दी साहित्य की भूमिका (1940 ई.), हिन्दी साहित्य का आदिकाल (1952 ई.) और हिन्दी साहित्य; उद्भव और विकास (1955 ई.) आदि ग्रंथ लिखकर उस अभाव की पूर्ति की। काल विभाजन में उन्होंने कोई विशेष परिवर्तन नहीं किया। शैली की समग्रता उनकी अलग विशेषता है।

वर्तमान युग में आचार्य द्विवेदी के अतिरिक्त साहित्येतिहास लेखन में अन्य प्रयास भी हुए परंतु इस दिशा में विकास को अपेक्षित गति नहीं मिल पाई। वैसे डॉ. गणपति चंद्र गुप्त, डॉ. रामखेलावन पांडेय के अतिरिक्त डॉ. लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय, डॉ. कृष्णलाल, भोलानाथ तथा डॉ. शिवकुमार की कृतियों के अतिरिक्त काशी नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी द्वारा प्रकाशित हिन्दी साहित्य का इतिहास एवं डॉ नगेन्द्र के संपादन में प्रकाशित हिन्दी साहित्य का इतिहास आधुनिक युग की उल्लेखनीय उपलब्धियां हैं। हरमहेन्द्र सिंह बेदी ने भी हिन्दी साहित्येतिहास दर्शन की भूमिका लिखकर साहित्य के इतिहास और उसके प्रति दार्शनिक दृष्टि को नये ढंग से रेखांकित किया है। आरंभिक काल से लेकर आधुनिक व आज की भाषा में आधुनिकोत्तर काल तक साहित्य इतिहास लेखकों के नाम तो शताधिक गिनाये जा सकते हैं परंतु इस आलेख का मूल प्रश् आज भी जीवंत है कि साहित्येतिहास के पुनर्लेखन की समस्याएं क्या हैं?

ज्ञातव्य है कि साहित्य का इतिहास लिखते समय राष्ट्र के जन-जीवन में उदित होने वाली विचार धाराओं और आंदोलनों का विस्तृत विवेचन अपेक्षित होता है, क्योंकि बिना उनको समझे साहित्य के तत्कालीन रूपों और उनके विकास को समझना असंभव है। कोई भी विचार धारा अकस्मात उदित नहीं होती, उसके बीज सम-सामयिक समाज-व्यवस्था में ही छिपे रहते हैं, अत: कहना न होगा कि सम-सामयिक समाज के विस्तृत परिदृश्य की समझ जिस इतिहासकार में अधिक होगी, उसका साहित्येतिहास भी उतना व्यापक और प्रामाणिक होगा। वह भ्रांत धारणाओं से उतना ही मुक्त रहेगा तथा साहित्य के विकास के विभिन्न चरणों के विशेषण व अंकन में उसकी बुध्दि सारग्राहिणी भी होगी। कहा जा सकता है कि साहित्येतिहास के पुनर्लेखन की पहली समस्या है, इतिहास विषयक सम्यक जानकारी का अभाव और इस दिशा में इतिहासकार का उपेक्षा भाव !

आज कितने ऐसे इतिहास लेखक या समीक्षक हैं जिन्होंने पुराने व नये इतिहासकारों को सही ढंग से पढ़ा है? विवेचन के दौरान मात्र सामग्री - संचयन के स्थान पर अपने मत को प्रमाणों व तर्कों से परिपुष्ट किया है? सच तो यह है कि इतिहास लिखने और ऐतिहासिक सोच का धनी होने में बड़ा अंतर है। किसी भी भाषा का साहित्येतिहास उस भाषा के संपूर्ण साहित्य के मूल्यांकन का सार होता है। अत: साहित्येतिहास-लेखन से पहले पूरे साहित्य का मनोयोग पूर्वक अध्ययन अपेक्षित होता है। परंतु, यह कार्य समय-साध्य व श्रम साध्य होने के कारण, साहित्येतहासकार आलोचनात्मक ग्रंथों के आधार पर उच्च स्तरीय कृतियों का चयन करता है, किन्तु उनमें भी आलोचकों की पक्षपात पूर्ण दृष्टि को न समझने अथवा उन्हें सवर्ांगपूर्ण मान लेने के कारण पुनर्लेखन का कार्य मात्र पुनरावृत्ति बनकर रह जाता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि इतिहास लेखक साहित्य की विकास-यात्रा के प्रत्येक चरण की गहन पड़ताल करें और उनमें पूर्वाग्रहों, संकीर्णताओं तथा स्वार्थबध्द किंवा भीरू स्थापनाओं का अनावरण करें। अत: मेरी दृष्टि में साहित्य इतिहास के पुनर्लेखन से पूर्व यह पुनर्विचार कर लेने में कोई बुराई नहीं है कि 'इतिहास' के नाम पर 'अतिहास' का नया अध्याय तो प्रारंभ नहीं किया जा रहा है, वरना ऐसा क्यों हैं कि आज भी शुक्ल जी, द्विवेदी जी जैसे समर्थ साहित्येतिहास लेखकों जैसा इतिहास बोध व उनके जैसी इतिहास-दृष्टि दुर्लभ नहीं तो खोज का विषय तो है ही।

प्रस्तुत संदर्भ में डॉ. नामवर सिंह का कथन द्रष्टव्य है-''यदि हिन्दी का आज जीवन्त साहित्य है तो निश्चय ही उसके सामान्तर जीवंत साहित्य-बोध भी है-चाहे इस साहित्य-बोध से युक्त शिक्षित समुदाय जितना छोटा हो और प्रबुध्द समुदाय के बीच आज का साहित्य ही नहीं, बल्कि अतीत में उन साहित्यकारों की कृतियां भी जीवित हैं, जिन्हें वह आज भी प्रासंगिक समझता है। कहना न होगा कि आज साहित्यिक प्रतिमान संरक्षक यही समुदाय है, जिसमें परंपरा-बोध जीवित है, जिसमें अतीत की जीवन्त स्मृति के साथ ही परिवर्तनशील वर्तमान के प्रति सतत जागरूकता भी है। संश्ािष्ट सम-सामयिक-बोध को परिभाषित और संगठित करना ही साहित्य का प्रतिमान भी है और साहित्य का इतिहास भी। इससे भिन्न प्रतिमान के नाम पर जो सिध्दांत पेश किए जाते हैं वे निर्जीव रूढ़ि होते हैं और इससे भिन्न जो इतिहास लिखा जाता है, वह सूची पत्र है।'' कहा जा सकता है कि इसी परंपरा-बोध एवं सम-सामयिक-बोध में संगठन की जीवंतता का अभाव, साहित्येतिहास लेखन व लेखक दोनों के समक्ष बड़ी चुनौती है।

मात्र पारिभाषिक शब्दों के प्रयोग, वर्तुल शब्दावली, कपोल कल्पित बातों और अनिश्चित अर्थ वाले शब्दों के प्रयोग से न तो कोई बड़ा आलोचक हो सकता है और न ही साहित्य का मूर्धन्य इतिहास लेखक। वह आत्म-मुग्धता से ग्रस्त होकर स्वयं को चाहे इतिहासकार घोषित कर दे अथवा विवेचनात्मक या आलोचनात्मक इतिहासकार होने का मिथ्या दंभ भरे किन्तु इससे साहित्य इतिहास के पुनर्लेखन की समस्या का कोई समाधान नहीं हो सकता।

दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि ऐतिहासिक परप्रेक्ष्य का ध्यान रखते हुए जो इतिहास लिखा जायेगा उसमें सम-सामयिक-बोध के साथ-ही-साथ साहित्य व साहित्यिक सोच का सहज अंतर्भाव होगा, उसे विवेचनात्मक अराजकता, एकांगी दृष्टिकोण से दूर रखा जा सकेगा और पुनर्लेखन के नाम पर पुनर्मूल्यांकन के एकांकी व आग्रही प्रयासों से इतिहास को एक हद तक मुक्त रखा जा सकेगा। यहां यह स्पष्ट कर देना भी अपरिहार्य है कि इतिहास लेखक के लिए परंपरा-बोध जरूरी है, परंतु परंपरा के नाम पर मात्र सूचना-धार्मिता निभाना इतिहास बोध सम्पन्न हो जाने का प्रणाण पत्र नहीं है।

अतीत में की गई व्याख्याओं व अनुसंधानों का सर्वोत्तम ऐतिहासिक महत्व इस बात में है कि उससे नवीन सम-सामयिक दृष्टि मिल सके, नया इतिहास रचा जा सके। इसके विपरीत सिर्फ कल की सामग्रियों, तथ्यों, तिथियों एवं विवरणों को यथावत् प्रस्तुत करके उसमें कुछ नया जोड़ देने से कोई साहित्येतिहास लेखक नहीं हो जाता। दरअसल साहित्येतिहास लेखक, इतिहास निर्माता भी होता है। यह कार्य वही कर सकता है जो कल और आज दोनों में गहरी दिलचस्पी तो रखता है किन्तु, बीते हुए कल को अपने इतिहास में 'अति' से बचाकर रखता है तथा आने वाले 'कल' के अंकन को दृष्टिपथ में रखकर 'आज' का इतिहास लिखता है। इस अर्थ में वह स्वयं एक समर्थ आलोचक भी होता है।

साहित्येतिहास के लेखक के समक्ष सामान्यत: काल व युग, काल-विभाजन, काल-नामकरण, इतिहास लेखन का केन्द्र, स्थानानुपात, रचयिता के व्यक्तित्व वर्णन का परिसीमन तथा समीक्षा के मानदंड, स्वरूप आदि की समस्याएं प्रस्तुत होती हैं। इन समस्याओं में से काल-विभाजन व नामकरण जैसे बिन्दुओं पर अनेक शोध हुए हैं और शुक्ल जी के बाद यद्यपि उनके काल-विभाजन तथा दृष्टिकोण को पर्याप्त आदर दिया गया तथापि बदलते युग व परिवेश के संदर्भ में नामकरण व काल-चिंता की एक परंपरा ही चल पड़ी। फिर भी, साहित्येतिहास में ये दो समस्याएं आज के संदर्भ में अत्यंत चिंतनीय नहीं हैं। आज सब तरफ मनुष्य की अस्मिता और उसके भविष्य का प्रश् मुंह बाये खड़ा है। फलत: साहित्य और समीक्षा से लेकर इतिहास लेखन तक, काल से भी परे मनुष्य के अस्तित्व और मानवीय मूल्यों के संरक्षण पर सर्वाधिक जोर दिया जा रहा है। यही कारण है कि इतिहास लेखक की दृष्टि अपने समय के साथ अधिक न्यास करने पर केन्द्रित है। शिव कुमार शर्मा के शब्दों में शब्दों में-''काल-विभाजन सभ्य मानव के इतिहास को समझने का महत्वपूर्ण प्रयत्न है।''

साहित्यक के इतिहास में काल क्रमानुसार, साहित्य कृति के आधार पर या युग इतिहास को ध्यान में रखकर काल विभाजन की परंपरा रही है। परंतु ध्यान दिया जाना चाहिए की जनता की जिन प्रवृत्तियों के अनुसार हमारे साहित्यिक स्वरूप में जो परिवर्तन आये हैं, जिन-जिन प्रभावों की प्ररेणा से भिन्न-भिन्न शाखाएं फूटती रही हैं, उन सबके सम्यक निरूपण और उनकी दृष्टि से किये हुए सुसंगत काल-विभाजन के बिना साहित्य का सच्चा अध्ययन संभव नहीं है।अत: साहित्य के इतिहास लेखन में काल से लेकर युग बोध तक, परंपरा बोध से लेकर इतिहास बोध तक, सामाजिक चेतना से लेकर साहित्यिक वैशिष्टय तक, समान प्रकृति से लेकर अनन्य प्रवृत्ति तक वर्गीकृत अध्ययन कर साहित्य का इतिहासकार यदि संपूर्ण साहित्य का समवेत अनुशीलन करे तो तय समझिये कि उससे साहित्य व इतिहास तथा प्रकारान्तर में मनुष्य व मानवता का भला ही होगा।

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प्रवक्ता, हिंदी विभाग, शासकीय दिग्विजय

स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय, राजनांदगांव

छत्तीसगढ़, मो. 93010-54300

शहर एक दम डरा हुआ था। हर कोई संदेह और आशंका से एक दूसरे को देख रहा था। अंधेरा घिरने के बाद गलियों में पलने वाला खौफ दिन के उजाले पर भी हावी हो गया था। डर से ज्यादा शहर के लोग इस बात पर शर्मिंदा थे कि चूहों के कारण उन्हें ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा था। लोगों को हैरत इस बात पर थी कि शहर में किस्म-किस्म के अपराधियों ने भी कभी पड़ोसियों पर संदेह करने की नौबत पैदा नहीं की थी। लोग अंधेरे से डरते थे और इस हौसले से मुसीबतों का सामना कर जाते थे कि आवाज लगाने पर उनकी मदद में कई लोग दौड़ पड़ेंगे। लेकिन यहां स्थिति उलट हो गई थी। तीन चूहों की मौत ने पूरे शहर को दो गुटों में बांट दिया था। एक गुट में वे थे जो चूहों की मौत का मातम मना रहे थे तो दूसरे गुट में वे थे जिनकी नजर में चूहे तुच्छ जीव थे।

शहर की इस हालत से हर कोई परेशान था। बड़े-बड़े तोंद वाले सेठ से लेकर भिक्षाटन पर दिन गुजारने वाले तक पर हालत की मार पड़ रही थी। तीन दिनों से शहर का कारोबार ठप पड़ा था और लोग घरों में दुबके हुए थे। सड़कों पर फौजियों की बूट बजती थी और सायरन बजाती गाड़ियां गुजरती थी। स्कूल-कालेज उदास थे। जहां बच्चों की शरारतें और चुहल हुआ करते थे उन क्लासों में बाहर से बुलाए गए पुलिसवालों या फौजियों का डेरा लगा हुआ था। थोड़ी देर के लिए राहत मिलने पर शहर में अफरा-तफरी मचती और उसी दौरान तरह-तरह की अफवाहें सुनने को मिलती और फिर तनाव पैदा हो जाता और लोग घरों में दुबक जाते। देश के सभी प्रचार माध्यमों में शहर की चर्चा हो रही थी। वहां जो कुछ हो रहा था उसे बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया सुनाया और पढ़ाया जा रहा था। शांति की अपील कुछ इस अंदाज में हो रही थी कि अभी कुछ और दिन इसी तरह लगे रहो ताकि हमें खबर मिलती रहे।

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यह सारा कुछ खादी भंडार के बरामदे में बैठने वाले दर्जी मुर्शीद भाई के हाथों तीन चूहों के मारे जाने के बाद से शुरू हुआ था। चूहों से मुर्शीद भाई तो बाद में परेशान हुए। सबसे पहले चूहों ने खादी भंडार के मैनेजरों की नींद हराम करनी शुरू की थी। पिछले कई सालों से चूहों ने खादी भंडार में आतंक का राज कायम कर रखा था।

चूहे कुछ भी नहीं छोड़ते थे। खादी भंडार में आए ग्रामोद्योग की बनी हर वस्तु को उपभोग योग्य नहीं रहने देना उनका लक्ष्य बन चुका था। सब कुछ कुतर डालते थे। वैसे भी खादी महंगी हो गई थी उस पर भी कुतरा हुआ सामान कौन खरीदता?

चूहों का आतंक कोई एकाएक पैदा नहीं हुआ था। लोग बताते हैं कि आजादी की आहट के साथ ही खादी भंडार में चूहे घुस आए थे। जब बंटा हुआ देश सरकार का स्वरूप तय कर रहा था और महात्मा गांधी सांप्रदायिक हिंसा से आहत हो कर उपवास रख रहे थे, उन्हीं दिनों चूहों ने खादी भंडार में घुसपैठ कर लिया था। मगर इस बात का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं था कि देश के बंटवारे के साथ चूहे खादी भंडार में घुसे या उससे पहले से वहां मौजूद थे। कुछेक खोजी किस्म के लोगों का यहां तक कहना है कि खादी भंडार में चूहे तभी घुस आए जब यह लगने लगा था कि देश अब आजाद हो जाएगा। खादी भंडार से जुड़े लोग कहते हैं कि शुरू में चूहे खूब धमाचौकड़ी मचाते थे। कभी कर्मचारियों की टांग के नीचे से निकल जाते कभी सूत का हिसाब करने आई महिलाओं की साड़ी में लटक कर झूला झूलते थे। तब वे कोई नुकसान नहीं कर रहे थे। किसी ने यह नहीं सोचा था कि एक दिन यही चूहे खादी भंडार के खलनायक के रूप में देश-दुनिया में चर्चा का विषय बन जाएंगे। यह भी अनुमान नहीं था कि ये देश की राजनीति पर भी असर डालेंगे।

जब आजाद देश के प्रधानमंत्री के रूप में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने शपथ ली, तब चूहों ने नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया। आजाद देश की सरकार ने विकास की रूपरेखा रखते हुए पंचवर्षीय योजना बनाई। बड़े-बड़े उद्योग लगा कर देश का विकास करने की योजना। नदियों को बांधने की योजना समेत और न जाने कितने सपने देश ने देखे। उसी समय एक दिन चूहों ने खादी भंडार में जमा सभी सूत और कपास की पूनिया कुतर डाली।

इस नुकसान से बिलबिलाए तत्कालीन मैनेजर भैरव बाबू ने त्राहिमाम संदेश भेजा था। भैरव बाबू ने अपनी दुविधा साफ तौर पर जाहिर की थी। चूंकि महात्मा गांधी के सिद्धांत के मूल में अहिंसा को सर्वोपरि स्थान दिया गया है इसलिए चूहों को मारा नहीं जा रहा है और इनसे होने वाले नुकसान के कारण इन्हें छोड़ा भी नहीं जा सकता। उन्होंने अपनी रिपोर्ट भेजते हुए ऊपर वालों से चूहों से निजात का अहिंसक उपाय बताने का आग्रह किया था। मैनेजर पद से हटने तक भैरव बाबू ऊपर से आने वाले जवाब का इंतजार ही करते रहे और बड़े आहत मन से पहले खादी भंडार से और फिर दुनिया से विदा हो गए।

भैरव बाबू एकदम सिद्धांतवादी थे। दसवीं जमात तक पढ़े भैरव बाबू गांधी आश्रम में भर्ती होने से पहले सतानतन संगीत मंडली में थे। वहां जाने का भी अपना कारण था। उनके बारे में जो बातें कही जाती है उसके मुताबिक वह किसी विजातीय लडक़ी से प्रेम करते थे। कथित ऊंची जाति के भैरव बाबू का दिल अपने ही मजदूर की बेटी पर आ गया था। उनके रिश्ते के किस्से उनके गांव-टोले में खूब उछले। किस्सों तक तो परिवार को कोई आपत्ति नहीं हुई, लेकिन जब भैरव बाबू एक अच्छा प्रेमी बनने पर अमादा हुए तो परिवार के साथ-साथ पूरी बिरादरी उनके खिलाफ खड़ी हो गई। भैरव बाबू को उनकी प्रेमिका से अलग कर दिया गया और वह वियोगी हो गए।

इस घटना के बाद भैरव बाबू ने परिवार को त्याग दिया और साधु हो गए। कंठ अच्छा था इसलिए सनातन संगीत मंडली में भर्ती हो गए।

गांधी आश्रम में उनके आने की भी कहानी है। एक बार जब भैरव बाबू भजन गा रहे थे तब बेसुध श्रोताओं की भीड़ इतनी जमा हो गई कि रास्ता अवरुद्ध हो गया था।

उसी समय एक अंग्रेज साहब की बग्गी वहां से गुजर रही थी और साहब को इस तरह रास्ता रोकने पर गुस्सा आ गया था। साहब ने और उनके हिंदुस्तानी कोचवान ने वहां खड़े लोगों की धुनाई शुरू कर दी। भैरव बाबू हतप्रभ रह गए। वहां पचासों लोग खड़े थे। सभी पिट रहे थे। कहीं से कोई प्रतिकार नहीं था। साहब ने भैरव बाबू को भी नहीं बख्शा। उनपर भी चाबुक बरसा दिया। बस उसी चाबुक ने भैरव बाबू को विद्रोही बना दिया। भैरव बाबू ने साहब का चाबुक छीन लिया और पिल गए। लोग भी पलट गए। साहब को मैदान छोड़ कर भागना पड़ा।

इस घटना के बाद भैरव बाबू को जेल जाना पड़ा था। उनके खिलाफ राजद्रोह का आरोप लगा था। तीन चार साल तक मुकदमा-पेशी का नाटक झेलने के बाद उन्हें छोड़ दिया गया। जेल में रहने के दौरान भैरव बाबू सुराजियों के संगत में आ गए और बाहर आने के बाद उनकी जमात में शामिल हो गए। उस समय गांधी जी का बड़ा जोर था। भैरव बाबू का अभिवादन बदल गया। अब वह जय सियाराम की जगह जय हिंद बोलने लगे थे। सनातनी भजन की जगह आजादी का सपना दिखाने वाले तराने गाने लगे। भैरव बाबू गांधी विचार प्रचार मंडली के प्रमुख कार्यकर्ता बन गए।

भगवा छोड़ कर खादी अपनाने वाले भैरव बाबू अकेले नहीं थे। उनके जैसे कई और थे जिन्होंने खादी की ताकत महसूस की थी। कई जमींदार घराने के लडक़े अंग्रेजी सत्ता के अपमानजनक व्यवहार से आहत हो कर सुराजी बने थे। कई महंत कांग्रेस के कार्यकर्ता बन गए थे। यह वह समय था जब जनता खादी पहनने वाले पर सबसे ज्यादा भरोसा कर रही थी। आजादी का सपना देखने वाले लोगों को ऐसे सुराजी राम की वानरी सेना नजर आ रही थी जो राक्षस रूपी अंग्रेजों की सत्ता से लोहा ले रही थी। और गांधीजी! उन्हें तो जनता अवतार मान रही थी।

उन्हीं दिनों बिहार के इस ऐतिहासिक खादी भंडार की नींव महात्मा गांधी ने रखी थी। जब यह तैयार हो गया तो राजेंद्र प्रसाद ने इसका उद्घाटन किया था। आजादी के संघर्ष के दौरान इलाके के लोगों में आत्मनिर्भरता का बोध कराने से लेकर खादी के प्रति जागरूकता पैदा करने में इसका विशेष योगदान रहा। तब कोटे में कपड़े मिलते थे। आठ हाथ की साड़ी के लिए बिना खाए-पिए दिन भर लाइन में खड़ा रहना पड़ता था। जमींदारों के घरों में रेशमी वस्त्र तक आसानी से मुहैया हो जाते थे, लेकिन किसानों के पास धोती इतनी ही होती थी सभी भाई एक साथ स्नान नहीं कर सकते थे। एक के स्नान के बाद गीली धोती सूखने तक दूसरे को इंतजार करना पड़ता था।

कपड़ों की कमी ने कई परिवारों को एकसूत्र में पिरो रखा था। अलग होने के बाद सबसे बड़ी समस्या कपड़ा जुटाना था। अलग होने के लिए सबसे बड़ी जरूरत थी कि खादी भंडार के चूहे औरत स्नान करने के बाद साड़ी बदल सकें और पुरुष धोती।

ऐसे वक्त में खादी भंडार ने उन लोगों को चरखा थमाया था। सूत कातो अपने लायक कपड़ा खुद बनाओ। कपड़े की तंगी और घर के मालिक की उपेक्षा से परेशान लोगों को अपनी हर बीमारी का इलाज चरखे में नजर आया था। महात्मा गांधी की जय। हमें अपमान और जिल्लत की जिंदगी से निजात दिलाने के लिए क्या यंत्र थमाया! व्यक्तिगत स्तर की गुलामी से लेकर औपनैवेशिक साम्राज्य तक से मुक्ति का हथियार चरखा बन गया। लोगों ने चरखा को हाथों-हाथ लिया और स्वाधीन होने के अभियान में जुट गए। उस समय के लोग बताते थे कि खादी भंडार बनाने में लोगों ने जिस तरह योगदान दिया था उससे लगता था मानो देश की आजादी की ही नहीं जिंदगी की आजादी की जंग लड़ी जा रही थी।

आज खादी भंडार का शो रूम दीनहीन अवस्था में खड़ा है। स्थापना के समय से लेकर आजादी मिलने तक वह शान से खड़ा था। तब चरखा और ग्रामोद्योग का प्रशिक्षण देने के लिए जगह कम पड़ती थी। यह शहर तब कस्बा हुआ करता था। कस्बे के बाहर एक पूरा गांव बसाया गया था। स्वराज ग्राम जहां कताई, बुनाई, रंगाई से लेकर चरखा समेत हाथों से श्रम सहयोगी उपकरण बनाने तक का प्रशिक्षण दिया जाता था। खादी भंडार और स्वराज ग्राम को खड़ा करना कोई आसान काम नहीं था।

तकली पर सूतली कातने का काम तो इलाके के लोग जानते थे, लेकिन उस तकली को चरखे में फिट कर पहले से महीन सूत काता जा सकता है, इसकी जानकारी लोगों को नहीं थी। इलाके में अंग्रेजों के आने से पहले सूत कातने और कपड़े बुनने का हुनर एक जाति जानती थी। जब अंग्रेज आए तब उनका संकट शुरू हुआ। कुछ तो विलायत के बने कपड़े की भेंट चढ़ गए और कुछ को अंग्रेजों के टैक्स के आगे दम तोड़ना पड़ गया। जब बाजार ही नहीं रहा तो फिर हुनर कैसे जिंदा रहे? चूंकि जाति समाज के हाशिए पर थी इसलिए उनके संकट को सामाजिक संकट नहीं माना गया। कपड़ा बुनने वाली उस जाति का ज्ञान संचित रखने का कोई उपाय नहीं तालाश गया।

धीरे-धीरे स्थिति ऐसी हो गई कि जिनके बनाए कपड़े की धाक दूर देश तक थी वे कपास की पूनिया बनाने का काम तक भूल गए। गांधी आश्रम से आए सुराजियों ने लोगों को न केवल कपास की पूनिया बनाना सिखाया, बल्कि चरखे की मदद से सूत कातने से लेकर करघे पर कपड़ा बुनने तक का अभ्यास कराया। एक बार फिर इस इलाके का कपड़ा खादी के नाम से देश में मशहूर हो गया। लेकिन इस बार जाति-धर्म से ऊपर उठकर पूरा समाज इस उपलब्धि में शामिल था।

स्वराज ग्राम के देशरत्न सभागार में कभी खूब चहल पहल रहा करती थी। साहित्य और राजनीतिक विचारधारा से जुड़े सवालों पर परिचर्चाएं हुआ करती थीं। तब शहर के पढ़े लिखे लोग विद्वान वक्ताओं को सुनने जमा हुआ करते थे। अब सभागार की कुर्सियां पड़ी-पड़ी टूट रही थीं। लोगों का आना कम होने से चूहों को आसानी हो गई और उन्होंने वहां भी कब्जा जमा लिया। क्या फर्श और क्या मंच हर जगह उनके बिल बन गए थे। सभागार के भीतर जितने भी महापुरुषों के तैलचित्र लगे थे सभी पर चूहों ने मुंह साफ कर लिया था। केवल महात्मा गांधी के चित्र को ही चूहों ने छोड़ दिया था या फिर यह कहिए कि बख्श दिया था। वह भी इसलिए कि खादी भंडार की चरी खाने के बाद वही तस्वीर फारिग होने के लिए उनकी सबसे मुफीद जगह थी।

दूसरी पंचवर्षीय योजना आने के साथ ही चूहों के हमले तेज हो गए। खादी पर निर्भरता घटती जा रही थी इसलिए चूहों से हो रहे नुकसान पर खादी भंडार से ज्यादा और कोई आहत नहीं था। नई पंचवर्षीय योजना की घोषणा के बाद चूहों ने चरखे की डोरियों काटनी शुरू कर दी। हालत यह हो गई कि लोगों के पास डोरियों की कमी पड़ गई और घरों का चरखा रुक गया। सूत कातने की जगह चरखा बच्चों का खिलौना बन गया। फिर एक समय ऐसा भी आया कि चरखा घरों से लुप्त ही हो गया।

सरकार में तब ज्यादातर लोग गांधी टोपी पहनने वाले होते थे। अधिकांश नेता ऐसे थे जिन्होंने गांधी को देखा था और उनकी आस्था अब तक कायम थी। ऐसे आस्थावान लोगों को शांत रखने के लिए सरकार ने सहयोग समितियों को बढ़ावा देने की रस्म अदायगी के साथ-साथ केंद्रीय स्तर से लेकर निचले स्तर तक खादी बोर्डों का गठन कर दिया था। खादी भंडार के चूहों को जाने खादी से क्या दुश्मनी थी कि जहां भी खादी और सहकार जैसे शब्द जुड़े होते वे वहां अपना करतब दिखाने पहुंच जाते। मसलन हर सहयोग समिति और बोर्ड में उन्होंने घुसपैठ कर लिया था। ऐसा लग रहा था कि बड़े उद्योगों की राह में खादी और सहयोग समितियां रोड़ा बन सकती थीं, जिन्हें खत्म करने का जिम्मा चूहों को सौंप दिया गया था। वे ग्रामोद्योग की हर वस्तु को निशाना बनाने लगे। अलबत्ता तब तक उन्होंने खादी के कुर्ते पजामे और टोपी को दांत तो दूर पूंछ तक नहीं लगाया था।

आजादी मिलने के बाद स्वराज ग्राम से सबसे पहले वह उत्साह गायब हो गया जो आजादी मिलने पहले हुआ करता था। पहले स्वराज ग्राम का एक ही नारा था जय हिंद। आजादी मिलने के बाद कई नारे लगने लगे। समस्या और अभाव से जूझ रहे लोग नारों में बंटने लगे। उनके नेता अलग-अलग हो गए और नेताओं की जाति के हिसाब से लोग अलग हुए। हर जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों को संदेह की दृष्टि से देखने लगे। हालत यह हो गई कि नेता का कद उसकी जातिगत संख्या बल और उसमें उसकी पैठ से तय होने लगा। राजनीति में आए इस बदलाव ने खादी भंडार और स्वराज ग्राम को छिन्न-भिन्न कर दिया। जहां लोग अपनी दुर्दशा को खत्म करने के लिए तत्पर रहते थे वहां अब नफा नुकसान की चर्चा होने लगी थी। आहिस्ता-आहिस्ता खादी भंडार, स्वराज ग्राम लोगों के एजैंडे से गायब होता चला गया।

जैसे-जैसे देश विकास कर रहा था चूहों का आतंक बढ़ रहा था। चूहों ने देश के विकास के साथ तारतम्य सा स्थापित कर लिया था। जितने बड़े उद्योगों की स्थापना होती जा रही थी खादी भंडार के चूहों का सितम उतना ही बढ़ रहा था। उनकी संख्या भी उतनी ही तेज गति से बढ़ रही थी। जब तक लोगों का भरोसा खादी में कायम रहा राजनीति में वह खाल छिपाने के काम आती रही। पर धीरे-धीरे वह भरोसा भी उठने लगा था। खादी से लोगों का भरोसा उठने का भी कारण था। पहले नेता जातियों में बंटे, फिर पार्टियां जातियों की हो गई। जातियों के हीरो बंदूक लिए नेताजी की खादी के पीछे छिपने लगे और उनके दम पर सरकारें बनने बिगड़ने लगी। फिर ऐसा दौर आया जब जातियों के हीरो ही नेता बनने लगे। नेताओं की वादाखिलाफी और अफसरों की मक्कारी से परेशान लोग ऐसे हीरो को दुख-दर्द का तारनहार मान लिया। हीरो भी खादी पहनने लगे। जेल से चुनाव लड़ना और पोस्टर पर हथकड़ी वाली तस्वीर के सहारे वोट मांगने की प्रथा चल पड़ी। ऐसे तारनहारों के सितम गौण हो गए और जातिगत अहंकार सर्वोपरि हो गई। विचारधारा गौण हो गई। समाज में वैचारिक संवाद खत्म हो गया। यही वह समय था जब लोगों का भरोसा खादी से उठ गया। फिर ऐसा समय आया जब खादी पहनने वाले को जनता धूर्त और मक्कार समझने लगी। राजनीतिक पार्टियों के नेता और कार्यकर्ता को छोड़ कुछ शौकिया लोग ही खादी लपेटने लगे। आम आदमी अधनंगा ही रहा, पैसे वाले फैशन के गुलाम हो गए। खादी भंडार फालतू की जगह हो गई।

आजादी के बाद शहर भी देश के विकास के साथ-साथ कदम ताल मिलाए हुए था। शहर में बड़े पैमाने पर बदलाव आ गया था। शुरू में नगरपालिका मिट्टी के तेल के दिए वाले लैंप पोस्टों से गलियों को रोशन करती थी। जब बिजली आई तो ढिबरी वाले लैंप पोस्ट की जगह बल्ब आ गए, फिर ट्यूब लाइट और वैपर लाइट लग गए।

शहर में जब रोशनी बढ़ी तब लोगों ने चैन की सांस ली थी कि अब रात के अंधेरे में सेंधमारी की घटनाओं से उन्हें मुक्ति मिल जाएगी। लोगों को सेंधमारी से तो मुक्ति मिल गई, मगर रोशनी में यहां तक कि दिन के उजाले में लूट खसोट बढ़ गई।

शहर के एक चौराहे पर महात्मा गांधी की प्रतिमा लगी थी जिस पर दिन भर कौए बैठ कर कांय-कांय करते और प्रतिमा पर अपना रंग चढ़ाते थे। रात को वह प्रतिमा गंजेडिय़ों के ओट लेने की जगह बनती थी। किसी गांधीवादी से महात्मा की दुर्दशा नहीं देखी गई और उसने उनके लिए छतरी का इंतजाम करा दिया। गांधीजी कौए से रंगीन होने से तो बच गए, लेकिन गांजे के धुएं से रात भर परेशान होते रहे। बिजली से शहर की हातल में बदलाव आया था। अंधेरी घुप्प गलियों में टिमटिमाती ढिबरी की जगह अब बल्ब की चकमक फैली थी। ऐसे में महात्माजी को अंधेरे में कैसे रखा जाता उनकी छतरी पर भी एक बल्ब टांग दिया गया। वे भी रोशनी में नहाने लगे।

सालों से ऊंघने वाला कस्बा फैलने लगा था और नगरपालिका से महापालिका बन गया। अब उसके विकास कार्यों की योजना बनाने से लेकर उसकी देखरेख के लिए विकास प्राधिकरण भी बन गया। इतने सालों में काफी कुछ बदल गया। स्वराज ग्राम बड़े शहर में एक पता भर रह गया और उसके परिसर में स्थानीय भाषा में कहें तो भंख लोटने लगा। वहां स्वावलंबन का पाठ सीखने जाने वाले लोगों की संख्या पहले कम हुई और बाद में खत्म। अब उसके सामने एक बड़ा सा शापिंग मॉल खड़ा है जहां महंगी विदेशी कारों की कतारें देर रात तक लगी रहती हैं। तरह-तरह के फैशन का बोझ ढोती देवियों और सज्जनों की भीड़ रहती है। मॉल बनाने वाले नायक जी स्वराज ग्राम को शहर का कोढ़ कहते हैं। उनका वश चले तो वह इसे ढहाने में तनिक भी देरी न करें, लेकिन उनकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा वह शिलालेख है जिस पर महात्मा गांधी और राजेंद्र प्रसाद का नाम खुदा है। नायकजी को दुख है कि उनके मॉल का पता स्वराज ग्राम के सामने लिखा जाता है। वे सपना देखते थे कि एक दिन स्वराज ग्राम का पता होगा ‘नायकजी के मॉल के सामने।’

कपास, सूत और चरखे के बाद चूहों ने गांधी साहित्य को निशाना बनाया। गांधीवादी विचारधारा से जुड़े जो भी साहित्य खादी भंडार में आते रातों-रात चूहे उसे कुतर कर रद्दी में बदल देते थे। चूहों ने न जाने कैसे यह भेद जान लिया था कि किसी व्यवस्था को खत्म करने के लिए विचार पर हमला जरूरी है। विचार को अप्रसांगिक करार देकर, फालतू और प्रलाप कह कर हत्या नहीं की जा सकती है। उसे खत्म करने के लिए लोगों को उससे काटना जरूरी होता है। पुस्तकों को ज्ञान का कोश समझने की मानसिकता की जगह उसे धर्म का आदेश मनवाना जरूरी होता है। तमाम ग्रंथों की जो हालत देश में हो चुकी थी उसी तरह जब तक गांधी की विचारधारा का हाल न किया जाए तब तक इसके पुनर्जीवित होने का खतरा है। बस क्या था चूहों ने गांधी साहित्य को निशाना बनाना शुरू कर दिया। वैसे भी अब गांधीवादी साहित्य पढ़ने और समझने के लिए नहीं खरीदा जा रहा था। संपन्न लोग दिखावे के लिए और खुद को बुद्धिजीवी घोषित करने वाले लोग अपनी आलमारी में सजाने के लिए उसे खरीदने लगे थे। चूहे की साजिश में लोग और व्यवस्था स्वत: ही शामिल हो गई थी।

देश का विकास हो रहा था और दुनिया के भूगोल पर एक नए देश का सृजन कर चीन की लड़ाई से उपजे पराजय बोध से विजेता के गर्व तक का सफर देश तय कर चुका था। समय के इस अंतराल में कई घटनाएं घट चुकी थी। खादी भंडार के कई मैनेजर बदल चुके थे, लेकिन उसकी हालत में कोई बदलाव नहीं आया था। कई सरकारें आई और गईं पर चूहों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा था। वे इतने चालाक थे कि जब कभी थोड़ा शोर होता और जांच समिति बैठती उसके नतीजे को वे गटक जाते थे या फिर किसी बड़ी घटना का शोर उनके कारनामे को दबा देता था। चुनावी नारा ‘युद्ध में विजय’, ‘गरीबी हटाओ’ से होता हुआ ‘भ्रष्टाचार मिटाओ’ तक पहुंच गया था। उल्टी दिशा में व्यवस्था चलाने की मुहिम छेड़ने वाली राजनीतिक पार्टी को राष्ट्रीयकरण का झुनझुना थमा कर सत्ता मंत्रमुग्ध कर चुकी थी और उनके सत्ता में आने की परिस्थिति का निर्माण होने तक मौजूदा सत्ता खुद के कायम रहने की गारंटी ले चुकी थी। वैकल्पिक विरोध को कुंद कर सत्ता निश्चिंत हो चुकी थी, इसलिए हमराही विरोधियों की उसे परवाह नहीं थी। हमराही विरोधी भ्रष्टाचार हटाओ का नारा लगाते हुए सड़कों पर उतर सन्नाटा तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। हड़तालें होने लगीं थीं। छात्र कक्षाओं का बहिष्कार कर रहे थे। इनसे निपटने के लिए सत्ता ने आपातकाल लगा दिया। नारों में उलझे ज्यादातर लोग इस बात से कोई मतलब नहीं रख रहे थे कि देश पर कौन सा काल शासन कर रहा है। यदि नसबंदी का जोर नहीं होता तो उस आंदोलन का दम निकल जाता। जनसंख्या विस्फोट से निपटने के लिए शुरू की गई इस मुहिम को ही उस समय हथियार की तरह इस्तेमाल कर लिया गया। एक अफवाह ने धर्मभीरू जनता की नजर में सत्ता को अपराधी घोषित कर दिया। उस समय कहा गया था कि एक साधु की जबरिया नसबंदी कर दी गई। साधु की मौत आपरेशन टेबल पर हो गई।

उस साधु ने मरते-मरते यह श्राप दिया है कि जो भी सत्ता का साथ देगा वह नर्क में जाएगा। यह सत्ता कलियुग का प्रतीक है अतः इसका खात्मा जरूरी है। इस बात पर भरोसा करने के लिए लोगों को ठाकुर बाडिय़ों में रखी पोथियों में साधु बाबा के केश ढूंढने की सलाह दी गई थी। कई पोथियों में पके हुए लंबे केश मिल गए। जिन ठाकुर बाडिय़ों में केश मिले वहां भगवान का वास माना गया और वहां के लोगों ने इसलिए आंदोलन में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया कि वे पवित्र हैं और ईश्वर के आदेश का पालन उन्हें ही करना है। जहां केश नहीं मिले वहां के लोग बुझे मन से, इस डर से आंदोलन में शरीक हुए कि कहीं नर्क न जाना पड़ जाय। धीमी गति से चलता आंदोलन तेज हो गया और विरोध की लहर क्रांति बन गई। यही क्रांति आगे चल कर संपूर्ण क्रांति कहलाई। यहीं से भारतीय राजनीति में साधुओं का बोलबाला शुरू हो गया। साधु भी दल में शामिल होने लगे जो आगे चल कर नेपथ्य से सरकार चलाने लगे।

साधुओं की इच्छा से जनता ने सरकार बदल दिया था। क्रांति सफल हो गई थी और कई बंदूकछाप लोग सीधे राजनीति में कूद पड़े थे। ऐसे बंदूक छाप लोगों को सत्ता का मारा हुआ कह कर राजनीति में अपना लिया गया था। बदली हुई सत्ता झक्क खादी लपेट नेता और भगवा खादीधारी के बेमेल जमावड़े का सुमेल था। सत्ता के बदलाव ने देश में आशा की एक नई किरण दिखाई थी। लोगों के साथ-साथ खादी भंडार के भी दिन बहुरने की उम्मीद जगी थी। कई विदेशी कंपनियों की दुकान बंद करने की कोशिशों ने खादी भंडार के चूहों में खौफ भर दिया था। थोड़े दिनों तक वे सहमे से रहे फिर जैसे ही उन्हें लगा कि बदली हुई सत्ता व्यवस्था में किसी किस्म का बदलाव नहीं करने जा रही, वे निर्द्वंद्व हो गए। चूहों ने फिर से अपना खेल शुरू कर दिया। बदली हुई सत्ता ज्यादा दिनों तक टिकी नहीं रह सकी और बेमेल गठजोड़ का सुमेल खंडखंड हो कर बिखर गया। पहले सरकार गिरी और फिर भगवा और जाति-धर्म के हिसाब से कई रंगों की झंडियों वाली पार्टियों में लोग बिखर गए। जिस दिन संपूर्ण क्रांति का बाजा बजा उस दिन खादी भंडार के चूहों ने जम कर जश्न मनाया।

इसके बाद देश में तेजी से बदलाव हुए। हर कोई अपना चोला बदलने लगा। जितनी तेजी से नेता पार्टी बदलने लगे उतनी तेजी से रेडलाइट एरिया में ग्राहक भी नहीं बदलते थे। आगे चल कर नेताओं की छत्रछाया में हथियार उठाए घूमने वाले लोग खादी पहन नेता बनने लगे और मोहमाया त्याग भगवा बाना धारण करने वाले साधु-संन्यासी नेताओं की भाषा बोलने लगे। सरकार बनाने में ऐसे लोगों की भूमिका बढ़ती गई। जातियों और संप्रदाय में बंटे लोग जिन्हें चुन रहे थे वे हर समस्या के मूल में व्यवस्था को कम एक दूसरी जातियों, संप्रदायों को दोष देने में लिप्त होने लगे। दबी जुबान से कही गई बातें नारों में बदल जाती थी और छोटी-छोटी बातों पर बड़े-बड़े झगड़े होने लगे। कुनबों के नेता धनी होने लगे और घोटाले के आरोप दूसरी जाति की साजिश कह कर खारिज किए जाने लगे। इतिहास की घटना वर्तमान पर हावी होने लगी थी और कुछ पुराने मकानों की नींव में धर्म की जय-पराजय के सबूत तलाशे जाने लगे। जीर्ण भवन संप्रदायों, मतों के स्वाभिमान के प्रतीक बनने लगे।

ऐसे ही क्रांतिकारी समय में खादी भंडार में हुई एक क्रांति ने चूहों की समस्या को राष्ट्रीय समस्या बना दिया। हुआ यह कि खादी भंडार के सामने जमाने से बैठने वाले मुर्शीद भाई ने अपना नुकसान होने पर गुस्से में एक दिन घुमा कर एक पटका दे मारा जिससे तीन चूहे एक ही चोट में परलोक सिधार गए। उन दिनों शहर की हवा कुछ ठीक नहीं थी। स्वराज ग्राम के समीप मॉल बनाने वाले नायक जी उन दिनों साधुओं की पार्टी के कर्ताधर्ता बने हुए थे। खादी भंडार और स्वराज ग्राम के खिलाफ हाथ लगे इस तुक्के को वे जाया नहीं होने देना चाहते थे। चूहों की हत्या मुद्दा बन गया। मुर्शीद भाई करीब तीस साल से खादी भंडार के सामने बैठ रहे थे। एक कत्तिन से लगाई के कारण दर्जी का काम सीखा था। ऐसे मनोयोग से कपड़े सिलते थे कि उसमें जान आ जाती थी। क्या हिंदू, क्या मुसलमान, सभी उनके हुनर के कायल थे। उनके जीवन का एक ही दर्द था कि जिसके लिए वे दर्जी बने वह उन्हें नहीं मिल सकी।

इश्क की राह में मजहब पहाड़ बन कर खड़ा हो गया था। चट्टान होता तो लांघ लेते पर पहाड़ का क्या करें? मन मार लिया और खुद को हुनर में ऐसा झोंक लिया कि कम उम्र में ही अपने उस्ताद से बढ़िया कुर्ता, मिर्जई सिलने का फन हासिल कर लिया था। पूरे इलाके में कुर्ता सिलने में मुर्शीद भाई का कोई मुकाबला नहीं कर सकता था। एक जमाना था संपन्न लोगों की मिर्जई सिलने के लिए उनकी खुशामद होती थी। अब तो सिर्फ शादियों के मौसम में वे पेट का जुगाड़ कर रहे थे। बदलते समय और रेडीमेड फैशन ने उनके जैसे कई हुनरमंदों की हालत पतली कर दी थी। छोटे कारीगर खत्म हो रहे थे, बड़े स्तर की कारीगरी जगह ले रही थी। ऐसे में जब मुर्शीद भाई के एक पुराने कस्टमर के कपड़े पर जब चूहों ने मुंह मारने की कोशिश की तब उनका गुस्सा फूट पड़ा था। चूहे उनकी पेट पर लात मारने की फिराक में थे और पेट पर लात कोई क्यों सहे?

मुर्शीद भाई शायद ऐसा नहीं करते। उन्होंने तीसरी-चौथी जमात में बहादुर दर्जी की कहानी पढ़ी थी। मक्खियों से परेशान होने पर उस दर्जी ने एक चोट में तीन मक्खियां मारी थी और अपनी पेटी पर लिख लिया था ‘एक चोट में तीन।’ उस दर्जी ने इसी स्लोगन के सहारे राक्षस को पराजित कर दिया था। मुर्शीद भाई को सपने में अक्सर वह दर्जी परेशान किया करता था। सपने में बार-बार उन्हें चूहों से हारने के लिए कोसता था। बस एक दिन मुर्शीद भाई को ताव आ गया और उन्होंने पटका चला दिया। बहादुर दर्जी की तरह मुर्शीद भाई ने भी एक स्लोगन लिखा ‘गांधीजी के तीन बंदर, बहादुर दर्जी ने मारी तीन मक्खियां, मुर्शीद ने मारे तीन चूहे।’ चूहों की तुलना बंदर और मक्खियों से कर दी। यहीं मुर्शीद भाई गलती कर गए।

मुर्शीद भाई के हाथों चूहे मारे जाने के बाद दो काम हुए। एक तो खादी भंडार के तत्कालीन मैनेजर देवनाथजी ने अहिंसा के पुजारी के घर में हिंसा होने का पश्चाताप किया और साधु पार्टी ने इस घटना पर शोक मनाया। देवनाथजी ने खादी भंडार के सामने एक दिन का उपवास रख अहिंसक कार्य के लिए गांधीजी से क्षमा याचना की।

मुर्शीद भाई को खादी भंडार आने से मना कर दिया। नायकजी को बैठे-बैठे एक मुद्दा मिला था। वे इसे जोरशोर से उछाल रहे थे। मारे गए तीनों चूहों को धर्म का सिपाही बताते हुए साधु पार्टी ने उसे मलेच्छ के हाथों शहीद करार दे दिया। साधु पार्टी ने चूहों को भगवान गणेश की सवारी बताते हुए धर्म में उनके महत्व को प्रचारित किया। तीनों चूहों को धर्म का त्रिगुण बताते हुए तय हुआ कि जन सहयोग से उनकी याद में स्वराज ग्राम के सामने एक स्मारक बनवाया जाएगा।

मुर्शीद भाई को हटा कर देवनाथ बाबू भी नहीं बच पाए। वैसे देवनाथ बाबू की छवि कठोर गांधीवादी की थी, लेकिन हकीकत कुछ और ही था। खादी भंडार में वे तब दाखिल हुए थे जब चूहों का वहां साम्राज्य कायम हो गया था। खादी भंडार के जानकार बताते हैं कि मैनेजर बनने से पहले देवनाथ बाबू का घर साधारण था, लेकिन दो साल बाद ही पक्का घर बन गया था। वे खादी पहनते थे और गांधी टोपी भी लगाते थे। मैनेजर बनने के बाद उन्होंने कई फैसले लिए थे। बुनाई के पुराने करघे से लेकर कई और पुराने उपकरण यह कह कर नीलाम कर दिए कि इनकी जगह नए लगाए जाएंगे। पुराने तो चले गए, नए आए ही नहीं। बुनाई समेत सभी कार्य ठप पड़ चुके थे इसलिए किसी ने कभी पूछा भी नहीं कि नए आएंगे कब? मुर्शीद भाई ने जो कांड किया था उससे बचने के लिए उन्होंने उनकी बलि तो ले ली थी, फिर भी बोर्ड की जांच की आंच से नहीं बच सके। बस इतना ही हुआ कि उन्हें जाना पड़ा। वे घोटालों से कैसे बचे यह भी एक राज है। कुछ लोग बताते हैं कि जांच करने आए लोगों को खादी भंडार का शहद बेहद पसंद था। शहद की मिठास में देवनाथ बाबू का नीलामी घोटाला घुल गया था। देवनाथ बाबू को हटा कर केशव बाबू को खादी भंडार की कमान सौंप दी गई।

केशव बाबू पहले ऐसे मैनेजर थे जिनका इससे पहले खादी भंडार से कोई रिश्ता नहीं रहा था। एक तरह से उन्हें खादी भंडार पर थोप दिया गया था। क्यों और कैसे इसका जवाब सत्ताधारी दल से उनका संबंध था। कमाल के आदमी थे। मैट्रिक फेल थे। जानवरों और आदमी की एक साथ डाक्टरी करते थे। उनका जलवा ऐसा था कि जिसे चाहते जिंदा कर देते जिसे चाहते मौत के मुंह में ढकेल देते। हकीमी से जो धन जमा किया था उसे ब्याज पर देते थे और जो भी ब्याज देने में आनाकानी करता था या तो वह बीमार हो कर उनके पास पहुंचता था या फिर उसके ढोर डांगर बीमार हो जाते थे। इतना सबकुछ होने के बावजूद केशव बाबू साइकिल पर चलते थे। वे दुनिया में दो जीवों से ही डरते थे। एक तो उनकी पत्नी रमावती थी जिसके डर से लोग बताते हैं कि उनका मूत निकल जाता है और कुत्ते जिन्हें देख कर उन्हें सांप सूंघ जाता है। रमावती का तो खैर उनके पास कोई इलाज नहीं था, लेकिन कुत्तों से निपटने के लिए वे हमेशा डंडा साथ रखते हैं।

पत्नी से डरने की वजह का केशव बाबू ने कभी खुलासा नहीं किया। तरह-तरह के किस्से इस वजह के एवज में सुनाए जाते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि सुहाग रात को ही रमावती ने एक फटका जमा दिया था और केशव बाबू की नाक बहने लगी थी। कुछ लोग बताते हैं कि केशव बाबू का दिल अपनी साली पर आ गया था। एक बार होली में साली के साथ कुछ ऐसा-वैसा करने की कोशिश की तो रमावती ने जो होली खेली कि उसके बाद से वे डरने लगे। चाहे जो भी कारण हो, केशव बाबू के पास रमावती के खौफ से निजात पाने का कोई उपाय नहीं था। कुत्तों से तो वे तब से डर रहे थे जब स्कूल में पढ़ाई के दौरान उनके चचेरे भाई को कुत्ते ने काट लिया था। सरकारी अस्पताल तक सूई लगवाने में भाई के साथ वे भी जाते थे। वहां कंपाउंडर कुछ इस तरह सूई लगाता था जैसे वह आदमी को नहीं कुत्ते को सूई लगा रहा हो।

एक मोटे से सिरिंज में कंपाउंडर दवा भरता और फिर खड़े-खड़े मरीज के पेट में इतनी जोर से सूई भोंक देता कि मरीज जोर से चिल्ला उठता था। ऐसा करने के बाद कंपाउंडर के चेहरे पर एक संतोष का भाव उभरता था। यह दृश्य केशव बाबू के कोमल मन पर कुछ इस कदर चस्पां हुआ कि वे कुत्ते से डरने लगे। हर कुत्ता उन्हें अस्पताल का कंपाउंडर और उसके हाथ में पकड़ी हुई मोटी सिरिंज नजर आने लगा। फिर कुत्तों से निपटने के लिए उन्होंने डंडा रखना शुरू किया। कुत्ता नजर आते ही उनका डंडा तब तक नहीं थमता था जब तक कुत्ता केंकें करता पतली गली नहीं पकड़ लेता था।

मुर्शीद भाई हक्का-बक्का थे। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि आखिर नुकसान पहुंचाने वाले चूहों के प्रति हमदर्दी दिखाते हुए उन्हें क्यों निकाला गया। वे इस बात से आहत थे कि उनके हाथों चूहों के मारे जाने पर लोगों ने इतना हल्ला क्यों मचाया। शहर में जो कुछ हुआ उससे बेहद खिन्न मुर्शीद भाई की समझ में यह नहीं आ रहा था कि जब समाज की एक जाति के आहार में चूहे भी शामिल है तो उनके हाथ मारे गए चूहे खास कैसे हो गए? मुर्शीद भाई ने मन ही मन कहा, ‘वाह किसी के लिए काम, हम वही करें तो बदनाम।’

हंगामे ने चूहों को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा के केंद्र में ला दिया था। चूहों ने मुर्शीद भाई का रोजगार छीन लिया, और साधु पार्टी को जनाधार दे दिया था। वैसे भी साधु पार्टी को खादी भंडार से क्या मतलब? साधु तो डिजाइनर चोगा पहन रहे थे। भगवा रंग के रेशमी लिबास में लोगों को सहज जीवन जीने का उपदेश दे रहे थे। भव्य और आलीशान भवन जिन्हें वे आश्रम कहते थे वहीं उनका डेरा था। उनके लिए स्वराज ग्राम जैसे आश्रम की न तो कोई उपयोगिता थी और न ही उसके दर्द का कोई महत्व। चूहों की मौत पर मचे हो-हल्ला से शहर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा के केंद्र में आ गया। फिर शहर में जाने कैसे गड़बड़ी फैल गई और चूहे मुद्दा बन गए। कई दिनों तक चूहों पर समचारों में चर्चा होती रही। इन सबके बीच खादी भंडार और गांधी कहीं चर्चा में नहीं थे। पाठकों-दर्शकों को समाचार माध्यमों से किस्म-किस्म की जानकारी दी जाती रही। कितने तरह के चूहे होते हैं? उनका मुख्य भोजन क्या होता है? एक विशेषज्ञ ने बताया कि पूर्वोत्तर के राज्यों में जब बांस पर फूल लगते हैं तो चूहों की संख्या बढ़ जाती है। उन्होंने यह भी बताया कि चूहों के लिए बांस के फल के बीज वियाग्रा का काम करते हैं जिन्हें खा कर वे अपनी यौन शक्ति बढ़ाते हैं। एक विशेषज्ञ ने बिहार की एक जाति के भोजन में चूहों के शामिल होने का मिथकीय अर्थ समझाया किस तरह एक महर्षि ने त्याग की पराकाष्ठा साबित करते हुए खेतों में फसलों का बचा हुआ हिस्सा जमा कर उससे जीवन चलाने का संकल्प लिया और किस तरह फसलों के दानों की तलाश में उनके वंशज चूहों के बिल तक पहुंचे और फिर दाने के साथ-साथ चूहों को भी खाना शुरू कर दिया। ऐसी बेसुरी चर्चाएं तब तक जारी रहीं जब तक कि केंद्र की सरकार ने विपक्ष की मांग के आगे झुकते हुए चूहा आयोग का गठन नहीं कर दिया।

खादी भंडार के चूहों को कभी किसी ने नोटिस में नहीं लिया था। सभी उसके नुकसान से वाकिफ थे पर इस पर चर्चा करना मुनासिब नहीं समझते थे। संसद में ढेर सारे मुद्दे थे जिनसे सर खपाई करते हुए पांच साल बीत जाते और फिर चुनाव आ जाता था। कई दशकों से यही ढर्रा कायम था। इस बार मामला अलग था। सत्ता में साधु समर्थक बैठे थे और साधु आंदोलित थे सो इस पर चर्चा तो होनी ही थी। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री केवल बात ही नहीं कहते थे, उसका मतलब भी समझाते थे। वे बातों को घुमा-फिराकर कहने के फन के उस्ताद थे। उनकी बातों का जाल ऐसा था जिसमें जनता उलझी हुई थी और उनसे वैचारिक रूप से असहमति रखने वाले सहयोगी उनकी अदाओं पर फिदा थे। संसद में अब डिजायनर कुर्ताधारियों की संख्या बढ गई थी और फैशन को बढ़ावा देने वाले कई अभिनेता सांसद और मंत्री बन चुके थे। चूहों के मारे जाने का मुद्दा एक ऐसे ही डिजायनर कुर्ताधारी सांसद ने उठाते हुए कहा कि देश में इस प्रकार से जीव हिंसा की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। खास तौर पर उस देश में तो नहीं जहां गाय को माता मान कर पूजा जाता है।

सांसद के इतना कहते ही विपक्षी खेमे में बैठे उल्टी दिशा पार्टी के सांसद भडक़ उठे और इसे एक समुदाय विशेष के खिलाफ साजिश करार दे दिया। उल्टी दिशा पार्टी के सांसदों ने समवेत स्वर में शेम-शेम कहना शुरू कर दिया और सदन में हंगामा होने लगा। सभा अध्यक्ष कभी मेमिया कर तो कभी गुस्सा दिखा कर सांसदों को शांत करने की कोशिश करने लगे। जब बात नहीं बनी तो एक घंटे का ब्रेक यह कहते हुए दे दिया गया कि इस मुद्दे पर आपस में चर्चा कर लीजिए। हर किसी को अपनी बात रखने का अधिकार है। एक घंटे बाद जब सभा बहाल हुई तो समुदाय विशेष के हितैषी होने का दावा करने वाली एकरंगा टोपी पार्टी समेत सत्ता विरोधी सभी पार्टी के नेता प्रदर्शन में कूद पड़े। उल्टी दिशा पार्टी के नेताओं को बल मिल गया और हंगामा तेज हो गया। एक रंगा टोपी पार्टी के एक बंदूक छाप सांसद और भगवा पार्टी के एक साधु सांसद के बीच हाथापाई की नौबत आ गई। उस समय सभा अध्यक्ष आसन पर नहीं थे और आसंदी अध्यक्ष के चेहरे पर हवाई उड़ने लगी, क्योंकि देश के कई राज्यों की विधानसभाओं में जूतम पैजार से लेकर माइक उखाड़ सर फोड़ प्रदर्शन हो चुके थे। आसंदी का भाग्य अच्छा था इसलिए उस दिन बात यहीं तक रह गई और सभा अध्यक्ष ने सदन में उत्पन्न स्थिति को देखते हुए कह दिया कि यदि यही हाल रहा तो देश की सबसे बड़ी पंचायत के सम्मान को बचाए रखना बेहद मुश्किल होगा। उन्होंने कार्यमंत्रणा समिति की बैठक में इस स्थिति का हल निकालने का आदेश देकर सभी दलों के नेताओं की बैठक बुलाने के लिए कह दिया। कार्यमंत्रणा समिति की बैठक में शामिल नेताओं ने माना कि राजनीति में मूल्यों का पतन हो चुका है। सभी पार्टियां इस बात से सहमत थी कि संसद में जो कुछ हुआ वह अशोभनीय था। नेताओं ने अध्यक्ष से कहा कि इस मुद्दे पर हर पार्टी को बोलने के लिए पूरा समय दिया जाए। फिर तय हुआ कि हर पार्टी के नेता को एक निश्चित समय सीमा में अपनी बात रखनी होगी। सदस्यों की भावना से अवगत होने के बाद सभा अध्यक्ष संतुष्ट हो गए और उन्होंने आगे कार्यवाही जारी रखने का फैसला लिया।

सदन के बहाल होने के बाद बहस शुरू हुई, लेकिन टोका-टाकी के बीच कोई भी अपनी बात पूरी तरह से नहीं कह पा रहा था। विपक्ष के नेता के आरोप लगाते ही सत्ता पक्ष से हंगामा होता और सत्ताधारियों के आरोप पर विपक्ष नारे लगाने लग जाता। सिर्फ इसी बात का संतोष था कि सांसद अपनी जगह पर खड़े हो कर नारे लगा रहे थे, माइक नहीं उखाड़ रहे थे, जूते नहीं फेंक रहे थे।

संसद में बहस भी बेजोड़ अंदाज में हो रहा था। हर दिन बहस खादी भंडार के चूहों और उससे होने वाले नुकसान से शुरू होती थी और फिर भटक कर पशुओं के प्रति क्रूरता से लेकर सत्ताधारियों की सांप्रदायिक सोच पर अटक जाती थी। यह स्थिति तब तक जारी रही जब तक कि उल्टी पार्टी के एक मजदूर नेता ने इस मुद्दे पर अपनी बात नहीं रखी। बंगाल से चुनकर पहुंचे मजदूर नेता ने चूहों का संबंध महात्मा गांधी की हत्या से जोड़ते हुए कह दिया कि देश को पंगू बनाने के लिए एक साजिश के तहत गांधी की हत्या की गई और उनके खादी भंडार में चूहे छोड़ दिए गए। यह सबकुछ इसलिए किया गया ताकि जनता स्वावलंबी न हो सके और निजी कंपनियों को बाजार मिल सके। आज देश नीलाम हो रहा है, अमेरिका के सामने घुटने टेक रहा है। मजदूर नेता ने यह भी कह दिया कि हमको जानकारी मिली है कि ये जो चूहे खादी भंडार पर कब्जा जमाए हुए हैं उन्हें अमरीका से सीआईए ने स्पेशल मिशन पर भेजा था। उसका मकसद पहले तो बाजार के लिए सहकार को खत्म करना है फिर हमारी फूड सिक्योरिटी को निशाना बनाना है, ताकि आर्थिक संकट और जिंसों के अवमूल्यन का सामना कर रहे उनके किसानों के लिए भारत का बड़ा बाजार मुहैया हो सके।

इसीलिए हमारे किसानों को पपीता, फूल और केले जैसी फसल उगाने की सलाह दी जा रही है। जाहिर है चूहे फूल तो खाते नहीं, किसान भी इसी ओर आकर्षित हो जाएंगे और घाटा होने पर जहर खा कर मर जाएंगे। यही अब हो भी रहा है। मजदूर नेता के इतना कहते ही गांधी वध के लिए बदनाम किए जा रहे संगठन से सहानुभूति रखने वाली पार्टी के कई सांसद अपनी जगह से उछलने लगे। उल्टी पार्टी के नेताओं को द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का साथ देने वाला, चीन के साथ युद्ध में देश का विरोध करने वाला और आपातकाल में तत्कालीन सत्ताधारी के आंचल में छिपने वाला कह कर शेम-शेम के नारे लगाने लगे। सत्ता पक्ष के कई सांसदों ने मजदूर नेता के बयान की भारी निंदा की और उनकी पार्टी को विकास विरोधी बताते हुए विश्वव्यापी स्तर पर बन रहे आर्थिक संबंधों को समय की मांग बताया। बहस एक बार फिर पटरी से उतर गई थी और खादी भंडार के चूहों के सहारे भूमंडलीकरण, निजीकरण और विनिवेश पर निशाना साधा जाने लगा। बहस की दिशा फिर तब बदली जब सत्ता पक्ष के एक नेता ने सदन में रहस्योद्घाटन किया कि खादी भंडार में चूहे देश के बंटवारे के समय पड़ोसी मुल्क ने भेज दिए थे। इस रहस्योद्घाटन के साथ ही विपक्ष में बैठे समुदाय विशेष के हितैषी होने का दावा करने वाली पार्टियों के नेता बिलबिला उठे और सवाल दाग दिया ‘फिर मुर्शीद भाई तो देश का हीरो है। उसने तो दुश्मन के चूहों का नाश किया। आप तो उन्हीं चूहों को शहीद कह रहे हैं और धर्म का सिपाही बता कर स्मारक बनवा रहे हैं।’

अपने जवाब से विरोधियों के घेरे में फंसी सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष ने सांसद के बयान से खुद को यह कहते हुए अलग किया कि उनकी पार्टी अपने सदस्य के विचार से सहमति नहीं रखती है। रहस्योद्घाटन करने वाले सांसद को खूब कोसा गया। पार्टी फंस चुकी थी और इससे बचने का रास्ता तलाश रही थी। ऐसे संकट की घड़ी में उसे सभा अध्यक्ष ही तारनहार नजर आ रहे थे इसलिए संसदीयकार्य मंत्री चुपके से अकेले रात में सभा अध्यक्ष से मिल आए और इस मसले का एक ऐसा हल निकालने का आग्रह किया जिससे काम भी हो जाए और हंगामा भी खत्म हो जाए। सभा अध्यक्ष ने सत्ताधरियों की समस्या की गंभीरता को समझते हुए चूहा आयोग का गठन करने का आदेश सरकार को देते हुए बहस का पटाक्षेप कर दिया। आदेश देने से पहले अपने अध्यक्षीय संबोधन में सभा अध्यक्ष ने कहा, ‘कई दिनों से चली आ रही बहस में यह साफ नहीं हो पाया कि चूहे आखिर आए कहां से? कुछ सदस्यों ने इसे अमेरिका से आया हुआ बताया है तो कुछ ने चीन से या पाकिस्तान से। जब तक यह पता नहीं चल जाता कि आखिर ये चूहे किस देश से आए, तब तक उससे निपटने का उपाय पूरी तरह कारगर नहीं हो सकता। इसलिए सदन की नियमावली के अनुसार सरकार चूहों के मूल देश का पता लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन करे जो तीन माह के भीतर यह रिपोर्ट देगा कि आखिर चूहे कब, कैसे और कहां से आए? आयोग इन चूहों से निपटने के उपाय भी बताएगा।’

जिस समय संसद में चूहों पर बहस हो रही थी उसी समय शहर में चूहा स्मारक के लिए चंदा जोर-शोर से वसूला जा रहा था। सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल कायम करते हुए सत्ताधारी पार्टी के अल्पसंख्यक सेल के नेता ने भी इस अभियान में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। इतने पैसे जमा हो गए जिसमें नायकजी के मॉल से भी भव्य भवन बनाया जा सकता था। पत्थर की मूर्तियों के दूध पीने का चमत्कार देख चुके लोगों ने दिल खोल कर चंदे दिए। तय हुआ कि आयोग की रिपोर्ट जब आ जाएगी तब स्मारक आंदोलन को तेज किया जाएगा और खादी भंडार व स्वराज ग्राम को अन्यत्र शिफ्ट कर दिया जाएगा। उसकी जगह यहां भव्य चूहा मंदिर बनेगा।

तीन महीने के लिए गठित आयोग अपना काम तय समय में नहीं निबटा सकी और उसे पहले छह महीने फिर एक साल और आगे भी समय विस्तार दिया जाने लगा। आयोग के अध्यक्ष और सदस्य हवाई यात्राएं करते। देश के विभिन्न हिस्सों में जा कर जाने क्या कुछ जांचते रहे। बीच-बीच में खबरें आती रहती कि आज अरुणाचल प्रदेश के साथ लगती चीन सीमा के उन कमजोर बिंदुओं का आयोग ने निरीक्षण किया जहां से चूहों के घुस आने की प्रबल आशंका है। यही दौरा कभी राजस्थान में तो कभी पंजाब, जम्मू एवं कश्मीर तो कभी गुजरात में होते रहे। जब स्थल से जुड़ी सभी सीमाओं का दौरा हो चुका तब आयोग ने समुद्री सीमाओं का दौरा शुरू किया। इन सब में करीब सात साल बीत गए और तब तक एक मध्यावधि और एक आम चुनाव भी हो गए। केंद्र में सत्ता बदल गई और साधुओं से सहानुभूति रखने वाली पार्टी हार गई। चूंकि आयोग का गठन पिछली सरकार में हुआ था इसलिए सत्ता के नए सूत्रधार उसके नतीजे क्या होंगे इस पर उदासीन भाव प्रकट कर रहे थे। सत्ता खो चुकी पार्टियों के नेता यह कहने से नहीं चूक रहे थे कि आयोग के परिणाम को सत्ताधारी प्रभावित करेंगे। आयोग ने अपनी रिपोर्ट नहीं दी थी, लेकिन उस पर अविश्वास पहले से ही जताया जाने लगा था। इसी अविश्वास के माहौल में देश में खोजी पत्रकारिता के लिए विख्यात एक अखबार ने खबर दी कि आयोग की रिपोर्ट में यह पता नहीं चल पाया है कि चूहे आए कहां से?

खबर लीक होने पर आयोग के अध्यक्ष ने बेहद नाराजगी जताई और इसे आयोग के कामकाज में दखल करार दे दिया। इसके तुरंत बाद ही आनन-फानन में आयोग की रिपोर्ट भी आ गई। आयोग ने लिखा कि आजादी मिले आधी सदी गुजर जाने के बाद चूहों के मार्ग का पता कर पाना असंभव है। आयोग ने कहा कि चूंकि चूहों के पैर छोटे होते हैं और आयोग की जीव विशेषज्ञों के साथ हुई चर्चा में जो कुछ सामने आया उससे चूहों के मार्ग का पता नहीं लगाया जा सकता। विशेषज्ञों के मुताबिक चूहों का शरीर बेहद हल्का होता है और उनके पंजे छोटे होते हैं। ऐसे में उनके पदचिह्न बनते ही नहीं। रेत या धूल पर उनके पदचिह्न बने भी होंगे तो वे इतने सालों में मिट गए। आयोग ने खादी भंडार के शैतान चूहों से निपटने का काम देश की नामी गिरामी जांच एजेंसी सीबीआई को सौंपने का सुझाव दिया। इतने सालों में खादी भंडार की सत्ता कई बार बदल गई थी। स्मारक समिति के कर्ताधर्ता चंदे के पैसे से व्यापार कर धन्ना सेठ बन गए थे। लोग भूल गए थे कि चूहों का स्मारक बनाने के लिए उन्होंने कोई चंदा भी दिया था। देश में कई चमत्कार हो चुके थे। पेड़ बाबा, मोबाइल बाबा से लेकर रोटी बाबा तक के चमत्कार से लोग अभिभूत थे। कई सरकारी कंपनियां निजी हाथों में जा चुकी थी जिसके विरोध में उस शहर के लोग भी शामिल नहीं हुए जहां की संपत्ति निजी हाथों में सौंप दी गई थी। विरोध का कोई स्वर नहीं था हां कुछ लोग जिंदा साधुओं के चेले बन गए तो कुछ लोगों ने मरे हुए उन लोगों को गुरु मान लिया जिनके नाम के पहले संत लगा हुआ था। ऐसे गुरुओं की जाति अहम थी और विजातीय संतों को लोग खारिज कर रहे थे। लोग संतों की शिक्षा से ज्यादा इस बात पर ध्यान देने लगे कि किसने उनका अपमान किया है। हर कोई तख्त बना कर खुद को सर्वोपरि घोषित कर रहा था और समाज, सरकार और विचार पर अपना अंकुश लगा कर खुश हो रहा था।

सीबीआई ने अपने तय स्टाईल में खादी भंडार के चूहों के खिलाफ पर्चा दाखिल किया। विशेष कोर्ट से चूहों के अनाम लीडर के नाम से गैर जमानती वारंट हासिल कर सीबीआई ने जांच की दिशा में सबसे पहली बाधा पार कर ली। सीबीआई के तत्कालीन महानिदेशक बेहद कड़क पुलिस अफसर माने जाते थे। उनका सारा रौब उनकी मूंछों में था जिसे वे हमेशा ऊपर की ओर घड़ी के दस बज कर दस मिनट बजाने की स्टाइल में रखते थे। उन्हें हमेशा उन्हीं इलाकों में लगाए रखा जाता था जहां कोई भी अफसर जाने से कतराता था। उनकी कड़क छवि पर सिर्फ यही दाग था कि वे अपराधी को गिरफ्तार करने के बाद मुठभेड़ कर देते थे। न थाना न कोर्ट फैसला फटाफट।

यह अलग बात थी कि उन्होंने कभी बंदूकछाप नेताओं का कुछ नहीं बिगाड़ा। कई घोटालों की जांच में लिप्त एजेंसी के सिर पर इस नई मुसीबत का बोझ जब सरकार ने डाला तब महानिदेशक को बड़ी कोफ्त हुई थी। प्रेस ब्रीफिंग में महानिदेशक ने भारी रोष जताया था और इस बात के पूरे संकेत दिए थे कि पुलिस की जांच में सत्ता का दखल जिस तरह से बढ़ रहा है उससे एक दिन देश में थानों की जगह सीबीआई के दफ्तर खोलने होंगे। इन सब के बावजूद वे इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए कि आखिर उनकी एजेंसी ने आज तक नेताओं के खिलाफ लंबित भ्रष्टाचार के मामलों में प्रगति क्यों नहीं की? कई ऐसे मामले थे जिसमें जांच एजेंसी का रुख लचीला रहा। सत्ता से बाहर रहने तक नेता जांच एजेंसी के शिकंजे में रहते हैं और सत्ता में आते ही निकल कैसे जाते हैं? इन सवालों का जवाब देने की बजाय उन्होंने कहा एजेंसी की विश्वसनीयता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चूहों के खिलाफ जांच भी उसी को सौंपी गई है। यद्यपि वे यह नहीं जानते थे कि जनता इसे मामले पर लीपापोती का प्रयास मान रही थी।

करीब डेढ़ साल की मशक्कत के बाद भी चूहों के लीडर को सीबीआई दबोच नहीं सकी। वह जांच एजेंसी की निगाह में ही नहीं आया। सच पूछिए तो सीबीआई उसकी पहचान का भी खुलासा नहीं कर पाई। इस बीच कड़क महानिदेशक रिटायर हो गए और उनकी जगह दूरदर्शी अन्वेषक को महानिदेशक बना दिया गया था। कमान संभालते ही उन्होंने दो काम किए। पहला तो खादी भंडार का दौरा कर वहां जो भी घपले सामने आए थे उसके लिए मरे हुए मैनेजरों और चूहों के खिलाफ आरोप लगाते हुए विशेष कोर्ट में आरोप पत्र पेश कर दिया। दूसरा काम उन्होंने यह किया कि कोर्ट से चूहों पर काबू पाने और उन्हें गिरफ्तार कर कठघरे तक लाने के लिए अमेरिका से बिल्ली बुलाने की अनुमति ले ली। कोर्ट ने भी चूहों और मृत मैनेजरों की गैरहाजिरी पर कड़ा संज्ञान लेते हुए सीबीआई के पक्ष में एकतरफा वाद निपटारा करते हुए अमेरिका से बिल्ली लाने की अर्जी मंजूर कर ली। उस दिन सीबीआई के नए निदेशक ने इसे जांच एजेंसी की सबसे बड़ी कामयाबी करार देते हुए देश की राजधानी में भव्य प्रेस वार्ता का आयोजन किया जिसमें सभी अखबारों और चैनलों के संवाददाता शामिल हुए। खबरों में इसे जांच एजेंसी की बड़ी जीत बताया गया।

सीबीआई ने गेंद भारतीय विदेश मंत्रालय के पाले में फेंक दिया था। अब अमेरिका से जब तक बिल्ली नहीं आती तब तक सीबीआई से कोई यह सवाल नहीं पूछ सकता था कि आखिर खादी भंडार के चूहों का क्या हुआ? बड़ी सफाई से इस झंझट से पीछा सीबीआई ने छुड़ा लिया था। इस केस को अन साल्व कह कर जांच एजेंसी की क्षमता पर कोई भी सवाल खड़ा नहीं कर सकता था। सीबीआई की निगाह में यह केस हल हो चुका था बस दोषी को पकड़ने के लिए जिस तरह की बिल्ली की उसे दरकार थी वैसी बिल्ली देश में उपलब्ध नहीं थी। देश में तो सिर्फ स्निफर डॉग थे जो छोटे-मोटे अपराधियों को पकड़ सकते थे। लेकिन यह चूहों का मामला था। इसमें कुत्ते कहां कामयाब होते?

अमेरिका से बिल्ली कैसे आई यह एक रहस्य ही है। उस बिल्ली के लिए सरकार ने क्या किया यह क्लासीफाइड दस्तावेज है इसलिए आरटीआई से भी इसकी जानकारी कोई हासिल नहीं कर सकता। अमेरिकी बिल्ली देखने में ही बेहद खूंखार लगती थी। कहा गया था कि इसी बिल्ली ने अफगानिस्तान की लड़ाई में अमरीका के दुश्मनों की दूध की सप्लाई रोकने में अहम भूमिका निभाई थी। यह भी बताया गया कि यह बिल्ली जमीन के सात परतों के नीचे छिपे दुश्मनों को भी सूंघने की शक्ति रखती है।

उस बिल्ली को पूरे शानो-शौकत, ताम-झाम के साथ खादी भंडार तक लाया गया था। कई दिनों तक बिल्ली ने खादी भंडार और स्वराज ग्राम का जायजा लिया। वह कुछ और दिन वहां रुकती और चूहों पर धौंस पट्टी जमाती, लेकिन एक दिन एक नौजवान चूहे ने अपना कमाल कर दिखाया। हुआ यह कि वह नौजवान चूहा महात्माजी के तैल चित्र के पीछे फारिग हो रहा था कि बिल्ली वहां आ धमकी। बिल्ली का डील-डौल देख कर चूहे की पाद सटक गई। जान पर आई आफत देख कर वह भाग लेना चाहता था, लेकिन पांव जवाब दे गए थे। जैसे ही बिल्ली उसे दबोचने के लिए आगे बढ़ी न जाने कहां से उस नौजवान चूहे के शरीर में दम आ गया और उसने उछल कर बिल्ली की नाक को अपने मुंह में दबोच लिया। चूहे के तेज लंबे दांत में बिल्ली की नाक फंस गई थी और वह छटपटा रही थी। इसी छटपटाहट में उसकी नाक कट कर चूहे के मुंह में रह गई। दर्द से बिलबिलाती हुई बिल्ली खादी भंडार से भाग निकली।

कटी नाक लेकर बिल्ली अमेरिका विदा हो गई। इस घटना से विश्व बिरादरी में भारत की प्रतिष्ठा को भारी धक्का पहुंचा था। सरकार को इस बात का खतरा था कि अब कोई भी देश अपनी प्रशिक्षित बिल्ली को यहां भेजने पहले सौ बार सोचेगा। खादी भंडार के चूहों को ब्लैक लिस्टेड कर दिया गया। यह तय किया गया कि इन चूहों को खदेड़ने के लिए खादी भंडार का विनिवेश कर दिया जाएगा। उसकी परिसंपत्ति का मूल्यांकन कर लिया गया है। यह बताया गया है कि खादी भंडार का भवन ढहाने के अलावा चूहों से निजात पाने का कोई चारा नहीं है। खादी भंडार की जगह एक मॉल बनाया जाएगा जहां अमेरिकी उत्पादों की प्रमुखता से बिक्री की जाएगी। सरकार की इस घोषणा से चूहों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। वे अब और बे-खौफ हो गए हैं और महात्मा गांधी के सपनों को पूरी लगन से कुतर रहे हैं।

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नरेंद्र अनिकेत

जन्म : 12 अप्रैल 1967 ग्राम :- भगवानपुर कमला, समस्तीपुर बिहार।

बीआर अंबेदकर बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर।

कृतियां: विभिन्न समाचार पत्रों में समसामयिक विषयों पर आलेख।

कथादेश के युवा कहानीकारों पर केंद्रित अंक में कहानी अनंत यात्रा समेत अभी तक चार कहानियां प्रकाशित

संप्रति: दैनिक जागरण सेंट्रल डेस्क से संबद्ध

डी-210, सेक्टर 63, नोएडा, उत्तर प्रदेश  

मोबाइल : 09716320281, ई-मेल : naniketn@gmail.com

नरेंद्र अनिकेत

खबरें हथियार बनती हैं क्योंकि वे बनाई जाती हैं। खबरें सबक नहीं होतीं क्योंकि वे सिर्फ सूचनाएं भर होती हैं। खबरें इतिहास नहीं बनतीं। बन भी नहीं सकतीं, क्योंकि वे बदल जाती हैं। खबरें परेशान करती हैं क्योंकि उनके पीछे कुछ सच छिपाए जाते हैं। शारदा बाबू भी परेशान रहते हैं। अखबार पढ़े बगैर उन्हें चैन नहीं आता और पढऩे के बाद उनका दिमाग चैन से नहीं रहता। पिछले एक दशक से अखबार उन्हें भ्रम में डाले हुए हैं। वे छपी हुई खबरों में वे सच तलाशते हैं जिन्हें कभी दिया नहीं जाता है। वे तब और परेशान होते हैं जब एक खबर में ही कई बातें एक दूसरे को काटती हैं। उन्हें तब कोफ्त होती है जब खबर कुछ कहती है और बाद में सच कुछ और निकल आता है।

उम्र के जिस पड़ाव पर शारदा बाबू पहुंच चुके हैं वहां आ कर आदमी धार्मिक किताबें पढऩे लगता है, लेकिन उनका इस बात में भरोसा ही नहीं। उनके अखबार पढऩे की आदत को लेकर कई बार धर्मपत्नी से बतकही हो चुकी है। धर्मपत्नी कह-कह के थक चुकी कि अब थोड़ा धरम-करम भी कर लो परलोक सुधर जाएगा, लेकिन शारदा बाबू पर कोई असर नहीं। उनकी दिनचर्या से घरवाले बेहद परेशान रहते हैं। सवेरे उठ कर वे जबतक अखबार नहीं पढ़ लेते उनकी दिनचर्या शुरू नहीं होती। और दिनचर्या भी क्या? अखबार पढऩे के बाद जब तक उसमें लिखे संपादकीय पर अपने किसी दोस्त से चर्चा करते तबतक उन्हें शौच भी नहीं आता।

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खबरें परेशान करती हैं और शारदा बाबू उर्फ काकाजी आजकल बेहद परेशान हैं। अखबार बांचने के बावजूद काकाजी कन्फ्यूज हो गए हैं। दरअसल उनकी समस्या एक आम भारतीय के जैसी ही है। उन्हें यह समझ में नहीं आता कि अमेरिका, यूरोप में बैंक डूब गए तो उसका उनके देश से क्या लेनादेना? यहां का शेयर बाजार ढह गया तो उससे उनकी सेहत पर क्या असर पड़ेगा? इन सवालों का जवाब उन्हें अखबार में कहीं नहीं दिखता। पहला पन्ना कुछ और कह रहा होता है तो संपादकीय कुछ और। हद तो यह कि अंदर के खबरिया पृष्ठों से कुछ और ही संकेत उन्हें मिलते हैं।

जब उन्होंने अखबार पढऩा शुरू किया था तब ऐसा नहीं होता था। पूरे अखबार में वैचारिक तारतम्य रहता था। उस समय बड़ी घटना होने पर संपादक के नाम से पहले पृष्ठ पर संपादकीय आता था। उसे पढऩे के बाद कई सारे सवालों के जवाब उन्हें मिल जाते थे। वे अपनी मित्र मंडली में संपादकीय में बघारे गए ज्ञान को बांचा करते थे और उनकी मित्र मंडली उन्हें सर्वज्ञ मानती थी। कुछेक मित्र ऐसे भी थे जो बहस में हिस्सा लेते थे। अर्थात पाठ और विवेचना का मर्म उन्हें भी मालूम था। फिर धीरे-धीरे समय बदला और जाने कब अखबारों से वैसी धार खत्म हो गई। अब तो अखबार पढक़र वे किसी विषय पर बोलने से हिचकने लगे हैं।

बदलाव आहत करता है। इन सालों में जो बदलाव आए हैं उसमें लोगों में तर्क करने की क्षमता कम होना भी उन्हें सालता है। अब तो जिससे भी बात करो या तो शेयर बाजार पर या फिर टीवी पर चल रहे मेगा सीरियलों के आगे के एपीसोड पर अनुमान जाहिर करता मिलता है। गंभीर मुद्दा छेड़ते ही कुछ देर तक हां-हूं करने के बाद लोग कह देंगे देर हो रही है, चलता हूं। तब काकाजी आहत हो जाते हैं।

अखबार पढऩे की तमीज उन्होंने अपने पिता से सीखी। उनके पिता ने उन्हें बताया था कि एक अच्छा पाठक सबसे पहले संपादकीय पृष्ठ पढ़ता है, क्योंकि यह अखबार की अपनी आवाज और उसके विचारों का प्रतिनिधित्व करने वाला पन्ना होता है। इसे मूलमंत्र मान कर वे अब तक अखबार पढ़ रहे हैं। अखबारों में उन्हें मेगा सीरियलों की नायिकाओं से लेकर फिल्मों के कलाकारों के आंदरूनी संबंधों को जिस प्रमुखता से जगह दी जा रही है उससे कोफ्त होती है। उनके मन में सवाल उठता है कि ये कलाकार भी तो आम आदमी की ही तरह हैं। उनमें भी भावनाएं होंगी तो इसमें खबर क्या है? फिर उनके आपसी रिश्ते का बनना बिगडऩा खबर क्यों है?

काकाजी दकियानूसी विचार नहीं रखते। फिर भी मोहल्ले की खबरें उन्हें परेशान कर जाती हैं। अखबार में जिस रसीले अंदाज से फिल्मी हस्तियों की खबरें होती हैं उसी अंदाज की खबरें मोहल्ले में भी उड़ती रहती हैं। काकाजी अपने जमाने में कभी खबरों में नहीं रहे थे, लेकिन उनके दोनों बेटे न केवल खबरों में रहे, बल्कि छोटा तो मोहल्ले की खबरों की लीड भी बन चुका था। पड़ोस की एक लडक़ी के कारण वह कॉलेज में बुरी तरह पिटा था और कई दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहा। इस घटना के बाद काकाजी कई दिनों तक सिर झुकाए दफ्तर आते-जाते रहे। सहज होने में उन्हें काफी वक्त लगा था, लेकिन बेटा अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद ऐसे रह रहा था जैसे कुछ हुआ ही नहीं। यह हाल उनके बेटे का ही नहीं था, अन्य लडक़े-लड़कियां भी ऐसी खबरों को कुछ इसी अंदाज में ले रहे थे। उन्हेें यह बदलाव चकित और परेशान किए हुए था।

इन खबरों से परेशानी के आलाम में एक दिन काकाजी को अपनी शादी के बाद के दिन याद आ गए थे। गांव से शहर सिनेमा देखने के लिए किस तरह पत्नी से बीमारी का बहाना बनाने के लिए कहा था। उन दिनों बीमार होने पर इलाज के लिए औरतें शहर आती थीं सो पत्नी को बीमारी का बहाना बनाने के लिए राजी करना पड़ा था। यह उपाय उनके अनुभवी भाइयों ने सुझाया था। बाकी घरों की ही तरह उनके घर में भी पत्नी के बीमार होने की सूचना फैलने के बाद कोहराम मचा था। काकाजी की मां ने उनकी पत्नी के सात पुश्तों को न जाने कौन-कौन सी गालियां निकाली थीं। एक बीमार लडक़ी से पाला बंधवाने का उलाहना शादी की मध्यस्थता करने वाले को भी झेलना पड़ा था।

तब यही होता था। शादी के बाद शहर जाने के लिए औरतें बीमार हो जाया करती थीं। यह आजमाया हुआ उपाय सभी के लिए था। अनुभवी शादीशुदा भाई यह सलाह नव दंपती को देते थे। सभी को बीमारी का कारण पता होता था, पर लोग चुप्पी साधे रहते थे। नव दंपती को लगता था वे अपने बुजुर्गों को ठग रहे हैं। काकाजी को भी यही लगा था कि उन्होंने सभी को ठग लिया। उनकी शहरी प्रेम कहानी किश्तों में निकलती रही। फोटो की शक्ल में और देखी हुई फिल्म की कहानी सुनाने की शक्ल में। बहुत समय बाद काकाजी को ज्ञात हुआ बुजुर्गों को उन्होंने नहीं ठगा था। बदलते समय को बुजुर्गों ने चुप रह कर स्वीकार किया था। काकाजी भी मोहल्ले की खबरों पर चुप्पी साध चुके हैं। उनकी कोई टिप्पणी नहीं होती है। यह बदलाव है।

खबरें उलझाव पैदा करती हैं और काकाजी भी उलझ गए। मंदी की खबर को समझने में कई दिनों तक उधेड़बुन में रहे। काफी कुछ पढ़ा मगर कुछ अल्ले-पल्ले नहीं पड़ा। उनकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि आखिर यह आई कहां से? क्यों आई और किस रास्ते से आ गई। वे कभी-कभी सोचने लगते हर आतंकवादी हमले का दोष पड़ोसी देश पर मढऩे वाला हमारा देश और हर गड़बड़ी के लिए लादेन के सिर ठीकरा फोडऩे वाला अमेरिका इस मसले की जिम्मेदारी दूसरे पर लादने में इतनी देर क्यों कर रहा है? उनके मन में यह बात नहीं उठती, मगर उनके छोटे बेटे ने अपनी कंपनी में छंटनी की खबर सुनाते समय यह सनसनीखेज खुलासा कर गया कि इस सबके पीछे अलकायदा का हाथ है। तभी से काकाजी सोच में पड़े हुए हैं।

हर घटना की बारीकियों को देखने वाले काकाजी की अपनी मान्यताएं हैं। अपनी मान्यताओं को वे छिपाते भी रहते हैं क्योंकि उसे लेकर वे निंदा या उपहास का पात्र नहीं बनना चाहते। वे लादेन को दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी मानते हैं। काकाजी की नजर में लादेन एक ऐसा आदमी है जिसने अमेरिका को हिला कर रख दिया। वह लापता रह कर भी दुनिया के सबसे ताकतवर देश को चुनौती दे रहा है। लादेन की खबर पढ़ कर उनके मन ने कई बार कहा, कुछ भी हो आदमी तो मर्द है। हिला के रख दिया। यदि लादेन भारत विरोधी नहीं होता तो काकाजी उसे देश का सर्वोच्च सम्मान दिए जाने की वकालत करते।

अलकायदा का नाम सुनकर काकाजी यह तय नहीं कर पा रहे थे इस संगठन ने किस तरह मंदी को दुनिया के देशों में घुसेड़ दिया? एक अमूर्त चीज नश्तर की तरह मूर्त दुनिया को दुख दे रही है और उसका उपाय करते-करते दुनिया हार सी रही है। लादेन सच में महान है। उसके पास मूर्त और अमूर्त दोनों शक्तियां हैं। वह हिला सकता है। वह हिला रहा है। अमेरिका हिल रहा है और उसके साथ दुनिया हिल रही है। पड़ गया सेर को सवा सेर से पाला।

लादेन की तरह काकाजी सद्दाम के भी भक्त रहे। जब तक इराक ने घुटने नहीं टेके थे काकाजी को भरोसा था कि अमेरिका की ऐसी की तैसी हो जाएगी। बहस में वे जोरदार ढंग से कहते थे कि देखना सद्दाम उनका कैसा हाल करता है। तब अमेरिका के समर्थन में उतरने वाले लोग उनका उपहास उड़ाया करते थे। काकाजी इस बात से दुखी होते कि इराक पर अमेरिकी हमले को सिर्फ इसलिए जायज मान लिया जाए कि वहां रहने वाले अधिकांश मुस्लिम हैं? पर यथार्थ उनके सामने था और इसी सोच के साथ या तो लोग हमले का समर्थन कर रहे थे या विरोध कर रहे थे।

खबरें परेशान करती हैं क्योंकि उसके पीछे सच छुपाए जाते हैं। सद्दाम हार गया और पकड़ा भी गया। तब घातक हथियारों के बहाने एक देश को तबाह किए जाने का सच कहीं भी नहीं लिखा गया। इराक में न तो कोई हथियार मिला और न ही उसका खोल। और समाचार माध्यम यह सवाल उठाने की जगह सद्दाम के महल दिखाते रहे। उसके पालतू शेरों की खुराक का ब्योरा और उसके हालात की कहानी लिखते रहे, सुनाते रहे। काकाजी उस दिन खूब रोए थे जिस दिन सद्दाम को फांसी पर चढ़ाया गया था। अमेरिका और उसके मित्र राष्ट्रों के लिए जाने कितनी बददुआएं दी थी। कुछ दिनों तक काकाजी को ईश्वर के अस्तित्व से भरोसा उठा रहा और वे यह मानते रहे कि भगवान भी धनी और सबल के साथ हैं। धीरे-धीरे वे सामान्य हुए थे।

तब काकाजी ने मान लिया कि इतिहास की तरह खबरें भी विजेताओं की हुआ करती हैं। जीतने वाला अपने हिसाब से खबरों को पेश करता है। वह खबरों को भी हथियार बनाता है। गोया हर खबर पर भरोसा नहीं किया जा सकता। फिर अपने पिता की सिखाई तमीज से आगे जा कर काकाजी ने एक और बात जोड़ लिया कि खबरें पढ़ कर उसकी सच्चाई को समझना जरूरी है तभी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। तभी से काकाजी किसी भी खबर की बारीकियों में जाने लगे हैं। खबरों के पीछे सच तलाशने की आदत सी हो गई है।

अब काकाजी मंदी पर सवाल उठाने लगे हैं। यह स्थिति क्यों पैदा हुई? पिछली गलतियों को दोहराया कैसे गया? उनके सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है। छोटू ने एक रात खाने के समय खुलासा किया कि कंपनियों की हालत खराब हो रही है। मुनाफा घट गया है और शेयर बाजार डूब गया है। तरह-तरह की डरावनी खबरें जो काकाजी दिन में पढ़ा करते थे रात में छोटू उन्हें सुना गया। काकाजी कुढ़ गए और कहा पढ़ते तो हो नहीं बस सुनके आते हो खबरें सुनाते हो। यह तो बताओ यह सब हुआ कैसे? एक दिन इसी सवाल का जवाब छोटू दे गया, अलकायदा।

काकाजी को याद आया कि जब शेयर बाजार आसमान छू रहा था तब एक खबर आई थी कि इसमें देश के भगोड़े आतंकवादियों का पैसा लग रहा है। वैसे काकाजी ने कभी भी शेयर बाजार में पैसे नहीं लगाए, लेकिन जब यह पढ़ा तो शेयर बाजार में पैसे लगाने वालों के प्रति उनके मन में पहले से पल रही घृणा और बढ़ गई। इससे पहले वे घोटालों और उससे बर्बाद हुए लोगों की दास्तां पढक़र आहत हो चुके थे। इस बार यह जानकर उन्हें धक्का लगा कि लाभ लेने का लालच पाले लोगों की जेब से पैसा निकालने के लिए कंपनियों ने फर्जी मुनाफा दिखाया और एक दिन ढह गईं। लोगों का पैसा डूब गया और घाटा नहीं सह पाने वाले कई लोगों ने आत्महत्या कर ली। काकाजी ऐसी खबरें पढ़ कर बेहद दुखी होते।

काकाजी को तब यह समझ में आ गया था कि लोगों की जेब तराशी करने के लिए कंपनियों ने अखबारों का किस तरह इस्तेमाल किया। मुनाफा कमाने का लालच बहुत धीरे से लोगों को दिया गया और शेयर कारोबार को बढ़ावा देने वाले लेख और समाचार प्रकाशित कराए गए। एक ऐसा माहौल तैयार किया गया जिसमें छोटी कमाई वाले लोग फंसे। काकाजी इस बात से दुखी थे कि सरकारी बैंकों से ज्यादा ब्याज देने का वादा कर करोड़ों रुपए लेकर चंपत होने वाली चिटफंड कंपनियों के कारनामे झेल चुके लोग शेयर बाजार के नाम पर होने वाली लूट को नहीं समझ सके। उछलने से डूबने तक में अंडरवल्र्ड का हाथ होने की खबर ने ही उन्हें परेशान किया। वे यह तय नहीं कर पा रहे कि आखिर दोनों में सच क्या है?

मंदी से पहले काकाजी एक खबर पर उलझे थे। असल में खबरों का उलझाव उस खबर के साथ ही शुरू हुआ। वह खबर थी दुनिया ग्लोबल विलेज हो रही है ऐसे में देश को अलग-थलग नहीं रखा जा सकता। काकाजी कई दिनों तक इन सवालों में डूबते उतराते रहे कि उस विलेज का हेड कौन होगा? कभी किसी भारतीय को हेड बनने का मौका मिलेगा? और अगर मिल गया तो क्या उस पद का नाम हिंदी के अनुसार विश्व ग्राम प्रधान या वैश्विक मुखियाजी हो जाएगा? उस समय ग्लोबल विलेज के समर्थक एक नेता के बयान से कई दिनों तक काकाजी सोच में पड़े रहे। नेताजी ने कहा था, दूरियां सिमट रही हैं। ऐसे में हम अगर अलग रहे तो बहुत दूर हो जाएंगे। नेताजी के बयान का मर्म समझते हुए अखबारों में लेख छपे और बयान के खिलाफ प्रदर्शन की खबरें भी छपीं। काकाजी कन्फुजिया गए? यदि संपादक सही हैं तो खबर का मतलब क्या है? और यदि विरोध में दम है तो लेख का आशय क्या है?

इस मुद्दे पर काकाजी का कन्फ्यूजन तब और बढ़ गया जब एक दिन खबर आई की नीम के औषधीय गुणों को अमेरिका की एक कंपनी ने पेटेंट करा लिया है। इस खबर के मर्म को काकाजी नहीं समझ पाए, लेकिन उनकी मित्र मंडली के ही एक सदस्य ने उनका ज्ञान वद्र्धन किया कि अब यदि कोई नीम का दवा के रूप में इस्तेमाल करता है तो उसे अमेरिका की उस कंपनी को टैक्स देना होगा। काकाजी हिल गए। आगे उन्हें हिलाने वाली और भी खबरें आती गई। हल्दी, बासमती और न जाने क्या-क्या सबकुछ विदेशी कंपनियों के कब्जे में जा रही थी। तब वे अखबारों से बहुत दुखी हो गए थे। इस अंधेरगर्दी पर लोगों का नजरिया साफ करने की बजाय अखबार सौंदर्य प्रतियोगिताओं के परिणाम छापने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाने में जुटे रहे।

उन दिनों काकाजी को एक बात पर आश्चर्य हुआ था कि आखिर अचानक भारत की लड़कियां कैसे खूबसूरत हो गईं? उनके इस सवाल का जवाब उनका अखबार नहीं दे रहा था। पहले पन्ने पर गली मोहल्लों से लेकर विभिन्न देशों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली सौंदर्य प्रतियोगिताओं में चुनी जाने वाली लड़कियों की मोहक मुस्कान वाली तस्वीर छपी होती थी। तब संपादकीय पृष्ठ पर इन प्रतियोगिताओं में चुनी गई लड़कियों को देश की उपलब्धि बताने वाले लेख होते थे। चुनी गई लड़कियों की तस्वीर देख कर काकाजी के मन में कई बार संदेह पैदा हुआ कि इन प्रतियोगिताओं के जजों को कहीं मोतियाबिंद तो नहीं था? जजों का सौंदर्यबोध भी उन्हें भ्रम में डल रहा था। उनके संदेह के कारण थे। चुनी गई लड़कियों से कहीं ज्यादा सुंदर लड़कियां उन्हें दिखती थी जिनके सामने सौंदर्य प्रतियोगिताओं में सफल लड़कियां फीकी पड़ जाएं।

काकाजी ने एक दिन अकेले में पत्नी को एक सुंदरी की तस्वीर दिखाते हुए कहा, ये दुनिया की सबसे खूबसूरत लडक़ी की तस्वीर है। पत्नी ने तस्वीर देखी और मुस्करा कर पूछा इस उम्र में फोटो निहार कर क्या मिलेगा। मुस्कराने से काकाजी भी नहीं बच पाए। फिर कहा नहीं निहार नहीं रहा हूं। देख रही हो इससे से सुंदर अपने जमाने में तुम थी। तब ये प्रतियोगिता नहीं होती थी वरना तुम्हें कोई पराजित नहीं करपाता। उम्र की ढलान पर खड़ी पत्नी का चेहरा लाल हो गया था और वह सिर्फ इतना ही कह सकी थी, हटिए आप भी.....। मगर काकाजी को के मन में सौंदर्य और सौंदर्यबोध का सवाल उछलता ही रहा। वे यह तय नहीं कर पा रहे थे कि आखिर इन सुंदरियों से ज्यादा सुंदर लड़कियां विजेता क्यों नहीं होती हैं।

इस मुद्दे पर उनका भ्रम बना रह जाता। एक दिन मित्रमंडली में यही मुद्दा छिड़ा और काकाजी के एक मित्र ने भ्रम दूर किया था। देखो शारदा यह बाजार का जमाना है। बाजार जिसे सुंदर कहे वही सुंदर है, बाकी या तो औसत या कुरूप। बाजार जिसे सच कहे वही सच बाकी सब झूठ। काकाजी यह नहीं समझ पाए कि आखिर यह कैसे हो सकता है कि किसी और के कहे पर किसी को सुंदर मान ले? किसी झूठ को सच मान ले? लेकिन, यह सच था और हो रहा था।

बाद के दिनों में एक घटना ने देश को हिला कर रख दिया और आखिर में छपी एक खबर ने काकाजी को परेशान कर दिया। कारगिल में पड़ोसी मुल्क के सैनिकों ने आतंकवादियों के वेश में डेरा जमा लिया था। उन्हें खदेडऩे के लिए देश में एक ज्वार उठा था जिसे देख कर काकाजी को संतोष हुआ था कि अभी भी कुछ बुरा नहीं हुआ है। देश जिंदा है और देशभक्ति भी। मगर हो हल्ला खत्म होने के बाद एक खबर आई जिसने काकाजी को परेशान कर दिया। आखिर बोफोर्स तोप ने अपनी काबलियत साबित कर दी। उस युद्ध में जिस विषम परिस्थितियों का सामना भारतीय सेना को करना पड़ा उससे बोफोर्स ने ही उबारा था। इस खबर ने काकाजी के मन में एक सवाल पैदा कर दिया कहीं यह युद्ध उस तोप की परीक्षा के लिए भारत पर थोपा तो नहीं गया? इसके बाद तो काकाजी के मन में हर आतंकवादी हमले और धमाकों को लेकर सवाल पैदा होने लगे।

बाद के दिनों में खबरें बदलती रहीं। कभी आतंकवादी हमले हुए नहीं कि एक पखवारे तक देशभक्ति की लहर अखबारों में समाई रहती और इससे उबरते ही शेयर बाजार और खुशनुमा माहौल का प्रचार होने लगता। हकीकत छिपाई जा रही थी, झूठ परोसा जा रहा था। संक्षेप में किसानों की आत्महत्या और प्रमुखता वाली खबरों में देश का विदेशी मुद्रा भंडार नई ऊंचाइयों पर होता था। उन्हीं दिनों अखबारों और टीवी पर एक विज्ञापन आया था इंडिया शाइनिंग। खबरों में फील गुड फैक्टर की चर्चा जोर-शोर से हो रही थी। सत्ताधारी पार्टी के नेता और मंत्री सीना तान कर बयान दे रहे थे।

शुरू-शुरू में काकाजी बेहद खुश हुए। चलो देर से ही सही देश चमका तो। लेकिन दूसरे ही पल वे बड़े उदास हुए यह चमक आई भी तो अंग्रेजी में। बाद के दिनों में काकाजी को अखबार के माध्यम से पता चला कि यह शाइनिंग तो बस अखबार तक ही रही। असल में देश की कई मुनाफा कमाने वाली कंपनियां नीलाम हो गईं और कई तो घाटे में दम तोड़ गए। घोटालों से आहत शेयर बाजार में फील गुड का बाजा बज गया और सत्ता जाते ही सत्ताधारी दल की शानिंग पर पर्दा पड़ गया। हालांकि काकाजी की सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। वे पहले की तरह ही अखबार पढ़ते रहे। फर्क सिर्फ इतना ही हुआ कि वे अब अखबार से अर्जित ज्ञान के आधार पर किसी भी मुद्दे पर राय देने से बचने लगे।

अब मंदी को लेकर काकाजी की फिर वैसी ही हालत में आ गए हैं। कारण साफ है पहले पन्ने पर मोटे-मोटे अक्षरों में खबर छपी होती है मंदी की मार और नीचे एक एक खबर तैरती होती है निशरा में आशा। काकाजी तय नहीं कर पा रहे हैं कि दोनों में से सही क्या है? काकाजी के लिए अखबार अब कबीर के रहस्यवाद से भी ज्यादा रहस्य से भरा नजर आने लगा है। उन रहस्यों पर वे पार पाना चाहते हैं, लेकिन वह और उलझता जा रहा है।

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नरेंद्र अनिकेत

जन्म : 12 अप्रैल 1967 ग्राम:- भगवानपुर कमला,समस्तीपुर बिहार

शिक्षा : बीआर अंबेदकर बिहार विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर

कृतियां: विभिन्न समाचार पत्रों में समसामयिक विषयों पर आलेख।

कथादेश के युवा कहानिकारों पर केंद्रित अंक में कहानी अनंत यात्रा समेत अभी तक तीन कहानियां प्रकाशित

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

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