रवि श्रोत्रिय की कविताएँ


1. पथ बदलना तिमिर से डर है कहाँ की वीरता
पथ बदलना तिमिर से डर है कहाँ की वीरता।
ले मशालें जब चलोगे ख़त्म होगी तब निशा।।
ज्ञान से ही ख़त्म हो सकती ज़हाँ की अंधता।
शस्य जब मिलता उदर को ख़त्म तब होती क्षुदा।।
जीव छोटे और निरह रहते बनों के बीच में।
आत्म रक्षा वो करे संघर्षशील जिजिविषा।।
गिरी जहाँ ना दूब उगती, साधनों की अल्पता।
जन जीयें स्वाभिमान से सर किये ऊंचा सदा।।
नाविकों को हैं डराती लहरें जलधि मध्य में।
हो निडर निर्भीक वो पतवार न फिर छोड़ता।।
जब व्यर्थ शांति प्रयास होते युद्ध सम्मुख दीखता।
रणभूमि में तब वीर डटते विजय पाने को सदा।।
कितने उदाहरण दूं मैं तुमको यश, प्रतिष्ठा, मान के।
साहस तेरा, जिससे भिड़े उस क्षण को अंतिम मान के।।
यश यहाँ मिलता नहीं है भेंट में, उपकार में।
उठ दिखा जौहर यहाँ मिलती तभी है सफलता।।
है संदेसा सिर्फ वो ही जो दिया श्री कृष्ण ने।
कर्म कर माधव ने ये ही सार गीता में लिखा।।
रवि श्रोत्रिय 14-Jan-2018

2. वो भी क्या दिन थे
एक दौर था जो मेहमाँ के आने से खुश होते थे हम,
झोला पकड़ना, जूते छुपाना, कसमें देना, रोकने को सब करते थे हम,
अजीबो गरीब जोश और अपनायत थी, उस जिद में,
हक़ लेने और हक़ देने की जोर अजमायिस थी, उस जिद में,
तालीम से तरक्की का सफ़र कुछ इस तरह हुआ,
स्कूलों से सिर्फ किताबी ज्ञान ही मयस्सर हुआ,
मोहल्ले के जिगरी दोस्तों का वो सिर्फ जान पहचान वालों में बदलना,
यही है इस युग की उपलब्धि, अकेले जीना और अकेले मरना,
ऐ काश खुदा तू फिर से हमें एक सामाजिक प्राणी बना दे,
इस भागती जिंदगी से थोड़े दिन का तो रज़ा दे।।
रवि श्रोत्रिय 13-Jan-2018


3. है अकिंचन सी खड़ी ये जिंदगी
है अकिंचन सी खड़ी ये जिंदगी,
ख़त्म है अब मांगने की चाह भी।
अब प्रतीक्षा है मिलन की बस बची,
कब से है तैयार चलने को रथी।।
तोड़कर अब बंधनो को मुक्त हूँ,
मुक्ति लेकर स्वयं की आसक्त हूँ।
अब मनुज ना जान मुझको भक्त हूँ,
मोह माया सब से अब मैं रिक्त हूँ।।
धर्म मेरा बस बचा अब बंदगी।
है अकिंचन जिंदगी।।
अब तलक जो भी किया निज उदर के हित,
कष्ट देना और सहना था जो उचित।
अब नहीं बंधन ये मुझको रोक सकते,
सही दिशि से हो गया मैं आज परिचित।।
छोड़ दी मैंने ज़हाँ की गन्दगी।
है अकिंचन सी जिंदगी।।
रवि श्रोत्रिय 09-Jan-2018

4. पता ही ना चला
किस मोड़ पर ज़हीर बेरास्ता हो गया, पता ही ना चला,
दिलकश दोस्ती का कब ये अँज़ामे हस्र हुआ, पता ही ना चला,
और अब ये आलम है कि बे कस हूँ, गम ज़दा हूँ और आशुफ़्ता भी,
महफ़िलों से निकलकर, शमशानों भटकता हूँ, कब से, पता ही ना चला।।
जम्हूरियत में कब से ईमान बिकने लगे, पता ही ना चला,
गधे कब से कुर्सियों पे बैठने लगे, पता ही ना चला,
और अब ये आलम है कि धर्म के, जाति के, क्षेत्र और भाषा के नाम पर हमें कोई भी लड़ा सकता है,
हम बुद्धिजीवी से इमोशनल फूल्स बन गये, कब से, पता ही ना चला।।
रवि श्रोत्रिय 05-Jan-2018


5. शोषण
सदियों से होता आया है इस दुनिया में ये शोषण,
एक नहीं कई जिम्मेदार है, हर कोई करता है पोषण,
जिसकी जितनी क्षमता उतना अत्याचारी में हिस्सा,
हर कोई भोगी शोषण का है, सबके जीवन का किस्सा,
शक्ति में अंतर है कारण, शोषण का आधार यही,
शक्ति संतुलन से हो सकता,शोषण का माहौल सही,
सब शोषित हैं सब शोषक हैं, कोई ज्यादा कोई कम,
ताकतवर बनकर दिखलाते हम केवल दीनों को दम,
जब तक रहे शक्ति से वंचित, शोषित मंडल में शामिल,
जब उनको है शक्ति मिलती, शोषण करते वो सब मिल,
शोषित बन जाये ताकतवर,  शोषित के हित नम्र बने,
कर कोशिश उनके हित में वो मानवता का परिचय दें,
जीवन के इस चक्कर में, पर अक्सर उल्टा होता है,
जिनको मिलती ताकत वो फिर सबका शोषण करता है,
शोषण का सम्बन्ध नहीं है वर्ग विशेष व्यवस्था से,
जब भी शक्ति संचयन होता अधिक मनुज की जरूरत से,
तब वो प्रकट हुआ करता है हानि देकर दूजे को,
हीन दीन को शक्ति देना, शक्ति संतुलन करने को,
इस युग में आधार शक्ति का केवल आर्थिक बना हुआ,
सामाजिक पिछड़ापन अब, अर्थतंत्र से दूर हुआ,
शोषित अब केवल गरीब हैं, चाहें किसी वर्ग से हों,
आर्थिक लाभ मिले अब ऐसे जिससे अंतर मिटते हों,
शोषक शोषित मिट जाएंगे,जिस दिन ये हो जायेगा,
मिलकर रहना सीखेंगे, कोई ना आँख दिखायेगा ।
रवि श्रोत्रिय 04-Jan-2018

6. चाह की पराकाष्ठा

चाह करौ निज चाह से जब खुद को भूलौ मन चाह में लागौ,
तब कछु नाय असंभव है, प्रभु चाह तेरी से तोय मिलावौ,
काठ का पात्र लै बैठ रैदास, दर्शन गंगा के तहँ करावौं,
नन्द को छोड़ बसे मथुरा जी,गोपियन प्रेम में फरक ना आवौ,
अमी परिवर्तित होय हलाहल मीरा को जब पान करावौं,
प्रकटहि प्रभु स्तम्भ मध्य जब निशिचर दैत्य प्रह्लाद डरावौं,
फसि गजराज पुकारैं प्रभु को, मार ग्राह गजराज बचावौ,
चाह त्याग जब चाह लगी तब लीला श्याम की जान ना पावौ।।
रवि श्रोत्रिय 18-Jan-2018

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