संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 2 : डॉक्टर प्रकृति // विकेश कुमार बडोला

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प्रविष्टि क्र. 2

विकेश कुमार बडोला

डॉक्टर प्रकृति

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उसने एक क्षण में ही निश्चित कर लिया कि अब वह भीड़ भरे शहर को छोड़ देगा। अभी तक न जाने कितनी विवशताएं थीं, जो शहर छोड़ कर जाने के उसके संकल्प में रोड़ा बनी हुई थीं। शहर में बीत रहा हर दिन उसे भावनात्मक रूप में निरंकुश बना रहा था। पता नहीं कौन सी आसुरी शक्ति थी, जो उसे तन-मन से दुर्जन बनाने पर तुली हुई थी। वह कितना चाहता था कि घर-समाज में सभी के साथ उठे-बैठे, तन-मन-धन से किसी जरूरतमंद की मदद करे। लेकिन जीविका के लिए घर से बाहर निकलते, भीड़ का हिस्सा होते ही उसे न जाने क्या काट खाता कि वह बेचैन हो उठता। भीड़, शहर और देश के तंत्र के विरुद्ध विद्रोही मानसिकता से बुरी तरह घिर जाया करता। इतनी बुरी तरह कि सिर दीवाल पर दे मारने की इच्छा ही उसमें शेष बची रहती।

अब तक तो वह जीविका से बंधे होने के कारण शहर में रुका हुआ था। जैसी भी थी लेकिन इस नौकरी पर उसके परिवार की जिंदगी टिकी हुई थी। वह परिवार के लिए ही उस शहर में विष के घूंट पिए जा रहा था। लेकिन नौकरी के जाते ही, उसकी समस्याएं अचानक पारिवारिक हो गईं। अभी तक वह अपनी सज्जन कल्पना से विपरीत शहरी समाज को देखकर ही जहर गटक रहा था, लेकिन अब तो उसके परिवार के सामने रोजी-रोटी का आसन्न संकट उभर आया था। मकान के किराए से लेकर रोजमर्रा की जरूरी चीजों की आमद कर्ज पर टिकी हुई थी। इस मुसीबत में भी मनुष्यों की भीड़ से पटा पड़ा शहर उसके लिए ऐसा व्यक्ति नहीं ढूंढ पाया, जो उसे ऐसी मरणासन्न हालत में केवल सूखी सांत्वना ही दे देता, उसकी पीठ पर अपनत्व के भाव से भरा हाथ ही रख देता।

कोई राह न मिली तो आखिर एक दिन उसने गृहस्थी का समान उठाया और परिवार सहित अपने गांव के नजदीक एक छोटे कस्बे में आ गया। वहां आकर उसे मालूम हुआ कि उसका मूल व्यक्तित्व क्या है। वहां उसे छोटी-मोटी नौकरी भी मिल गई। कस्बे का जीवन गांव की तरह ही था। वहां जाकर रोजमर्रा का खर्चा भी बहुत कम हो गया।

वहां का जीवन शहर से बिलकुल अलग प्रकृति की शांत-विश्रांत बांहों में पसरा हुआ था। वह भी दिन-प्रतिदिन शांत व संयत होने लगा। वह अपने मूल मानुषिक स्वरूप में लौटने लगा। शहर द्वारा दिए विष के दंश उसके भीतर से बाहर निकलने लगे। उसे लगने लगा कि प्रकृति की शरण में अकेले ध्यानमग्न होने पर कोई भी व्यक्ति साधारण नहीं होता। वह प्रकृति का ही एक चेतन अंश बन जाया करता है।

लेकिन ऐसा आजकल होता नहीं। व्यक्ति अधिकांश समय शहरी घर और कार्यालय की दीवारों के भीतर बंद रहता है। वह बाहर निकलता भी है तो भीड़ के साथ, भीड़ में मिल जाने, भीड़ के दुर्गुणों में लिप्त हो जाने के लिए। लोगों, उनके विवादों-कुतर्कों-मतभेदों-हिंसा जनित झगड़ों से सांसारिक दुर्गति उसे स्पष्ट दिखाई दे रही है। आश्चर्य कि भीड़ में लिप्त लोगों को अपना पतन महसूस नहीं होता। लोगों ने जैसे भीड़भाड़ के बीच अपने दुर्दांत पतन को अपनी दिनचर्या, जीवनचर्या और इन सबसे बढ़कर अपनी नियति मान लिया है। उन्हें इसी तरह की दुनिया में विकास करने, आगे बढ़ने, तरह-तरह के कंपीटीशन में फर्स्ट आने पर गर्व बोध हो रहा है।

ऐसी भीड़ का किसी के लिए क्या लाभ। भीड़ का लाभ देश, समाज और स्वयं भीड़ को तब मिलता, जब भीड़ में शामिल सभी लोग अपने विचारों से अपने को देखते, अपनी वैचारिक प्रक्रिया में वे आत्मप्रेरणा से समझ-बूझ रखने वाले संवेदनशील प्राणी बनते।

परंतु वह...., वह इन सबसे मर्माहत था। उसे इस सांसारिक भ्रम से चिढ़ होने लगी थी।

….भीड़ से दूर गांव के उस कस्बे में रहते हुए उसे जीवन से गहन प्रेम होने लगा। इस प्रेमानुभूति में उसे भीड़ द्वारा बसाई गई दुनिया अत्यंत कुरूप लगने लगी। उसे महसूस हुआ कि वह अब एकांत-शांत हो स्वयं से प्रेम करने लगा है। उसे स्वयं से प्रेम क्या हुआ, वह अचानक परिवार और कस्बे वालों के लिए देवपुरुष जैसा बन गया। सभी के दुख-सुख में उसका अपनत्व भाव हमेशा जाग्रत रहने लगा।

.....इस नए जीवन में वह संवेदना के इतने गहन तल पर पहुंच चुका था कि उसे अनिद्रा रोग ने घेर लिया। हालांकि एकांत, शांत रहने से, स्वयं से लगाव बढ़ते जाने से उसे सामान्यतः अनिद्रा से कोई शारीरिक समस्या नहीं थी। लेकिन एक दिन.....उस दिन के ढलने के बाद देर रात तक उसे नींद नहीं आई। वह तरह-तरह के विचारों के आंदोलन से अपने मस्तिष्क को पिसता हुआ महसूस करने लगा। उसे शहरों में मजबूरी से रह रहे अपने जैसे लोगों का खयाल आया। भीड़ में पिसती उनकी मानवीय भावनाओं से वह विचलित हो उठा। ऐसे विचारों पर नियंत्रण कर उन्हें थामने का आत्मोपाय सफल तो हुआ, पर उसका सिर दर्द से तपने लगा। किसी तरह रात्रि व्यतीत हुई...सुबह हुई, पर सुबह से लेकर शाम तक भी सिर दर्द ठीक न हुआ।

उस दिन सन्ध्या से पहले उसके शहर के ऊपर काले बादल घिर आए थे। भादों की ऋतु थी। वर्षा किसी पूर्वानुमान के बिना ही आ जाती थी। उस सन्ध्या में भी रिमझिम करती वर्षा बूंदों ने धरती, वृक्ष लताओं, पौधों सहित सब कुछ भिगो दिया था। वह घर पर अकेला ही था। घरवाले कहीं गए हुए थे। सिर दर्द विचित्र बेचैनी उत्पन्न करने लगा। वह उठा और सीधे छत पर चला गया। बूंद-बूंद गिरती वर्षा में भीगते हुए वायु का स्पंदन उसे अपनी श्वासों, त्वचा, मुख और शरीर के खुले अंगों के लिए अत्यंत अमृतमयी लगा।

वह सन्ध्याकाल उसके जीवन में अपरिमित प्राकृतिक आनन्द लेकर आया। बारिश की बूंदें भी धीरे-धीरे वायु के मद्दिम स्पर्श से भाप बन उड़ गईं। गगन में काले मेघों के आवरण जितनी तेजी से बने थे, उससे अधिक तीव्रता से बिगड़ने-बिखरने लगे। आंखों के देखते-देखते ही गगन ने रंगों का उत्सव मनाना शुरू कर दिया।

क्या कल्पनातीत रंग थे! जैसे रंग अग्नि में जलकर रंगीले धुंए से नभ की रूप सज्जा कर रहे थे। कुछ पल के लिए धुंधली छवि में इन्द्रधनुष भी पूर्व दिशा के दाईं ओर दिखाई पड़ा था। उत्तर दिशा से आरंभ हुई नभ की रंगोली पश्चिम और दक्षिण दिशा तक फैल गई। क्षण-क्षण बदलते रंगों के अतुल सौन्दर्य से छनकर जो सूर्य प्रकाश धरती पर बिखरता, उसमें धानी-हरियाली धरती आंखों को चुंधियाने वाली चमक से भर उठी। वर्षा ऋतु से सीले-गीले मानवजनित भवन, संरचनाएं सभी पावन उजाले में उसकी आंखों के लिए सुंदर हो उठे।

रात घिरने लगी। सन्ध्या के रात्रि में बदलते रहने से विभिन्न रंगी मेघ, नभ को जैसे अपने अद्वितीय रंगाकर्षण से विस्मयभूत कर देना चाहते थे। नीले, पीले, संतरी, लाल, गुलाबी, श्वेत-श्याम रंगों के परस्पर मिश्रण से जो श्रेष्ठ रंग-रूप मेघों का बन सकता था, उसी से दक्षिण-पश्चिम दिशा का आकाश संवरता रहा। दक्षिण-पश्चिम दिशा की सीमा पर, व्योम की ओर ऊपर अपने नुकीले कोनों को फैलाए अर्द्धचन्द्र प्रकट हो गया। रुई के स्वर्णरंगी फाहों जैसे पारदर्शी मेघों से ढका हुआ चन्द्रमा सन्ध्या और रात्रि के मिलन का सबसे अद्भुत संकेत था। ध्रुव तारा भी उससे कुछ नीचे टिमटिम करता दिखने लगा था। वर्षाजनित कीट-पतंगों, झींगुरों की कुर..कुर..कुर.. किर...किर...किर करती ध्वनियां परिवेश को प्रकृति के विचित्र-विचित्र अनुभवों से भर रही थीं।

सन्ध्या के अन्तिम क्षणों में दक्षिण-पश्चिम का आकाश जैसे संपूर्ण प्रकृति और इसके जीव-जंतुओं के लिए परम धाम बन गया। चाहे नभ के रंग हों, चन्द्रमा-ध्रुव सितारा हो, पवन के स्पंदन हों या फिर गगन विहार करते पक्षी हों.....सभी दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर जाने के लिए व्यग्र हो उठे। जैसे वहां नभ का विवाह हो रहा हो। जैसे सभी उधर जाने के लिए व्याकुल हों। जैसे वहां न जाकर सभी की श्वासें अटकने वाली हों।

उसने जीवन में पहली बार उस ढलती सन्ध्या बेला में नभ की दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर हजारों पक्षियों को एक साथ उड़ते हुए देखा। कितना अद्भुत दृश्य था वह! प्रकृति के हर संभव रंग से सजता-संवरता नभ का वह भाग, जिस पर अनगिन पखेरू उड़ान भर रहे थे,उसके जैसे मानवों के लिए साक्षात ’स्वर्ग उद्यान’ के रूप में प्रस्तुत था। उस दिशा में कुछ दूर तक तो पखेरू उड़ते हुए दिखते रहे। फिर आंखों से ओझल होते रहे। वह आश्चर्यचकित हो सोचता रहा कि इतने पखेरू उसी रात्रि-सन्ध्या बेला में उस दिशा की ओर उड़ रहे हैं या वह पहली बार यह सब देख व अनुभव कर रहा है!

वह उत्तर-पूर्व दिशा से उड़कर दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर उड़ कर जाने वाले अन्तिम पक्षी को देखता रहा। संपूर्ण नभ ने रात्रि की घनी नीलिमा ओढ़ ली थी। अर्द्धचन्द्रमा और ध्रुव तारे उसे अपने रजत प्रकाश से आत्मविभोर करने लगे। पूरा नभ ही सितारों की रजत टिमटिम से भर गया। रात्रि का प्रथम प्रहर समाप्त होनेवाला था।

.....तभी उसे उसकी पत्नी ने कंधे से खींचकर हिलाया तो उसे आभास हुआ कि वह सिर दर्द से मुक्ति के लिए प्रकृति की शरणागत था। उसने गणना की कि प्रकृति के उपक्रम पर ध्यानस्थ हुए उसे साढ़े चार घण्टे व्यतीत हो चुके थे। उसका सिर अब दर्द से पूरी तरह मुक्त था। नभ की रंगोली, पखेरुओं की उड़ान, चन्द्रमा-सितारों की रजत किरणों और धानी-हरीतिमा वसुन्धरा को स्पर्श कर बहने वाली पवन के स्पंदनों ने उसके मस्तिष्क की अद्भुत चिकित्सा कर दी थी। उसने डॉक्टर प्रकृति को करबद्ध प्रणाम किया और कस्बे की उस सुगम, सुन्दर व प्राकृतिक जिंदगी को देर से अपनाने के लिए स्वयं को खूब कोसा। शहर की भीड़ से दूर के इस जीवन में प्रकृति उसकी सच्ची दोस्त बन गई थी। वह इस दोस्त को पाकर बहुत ज्यादा खुश था।

परिचय

विकेश कुमार बडोला

Vikesh Kumar Badola

(ब्लॉगर, विचारक और स्वतन्त्र लेखक)


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