सम्पादकीय // विज्ञान कथा / जनवरी-मार्च 2018

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म्पादकी

अमरत्व का व्यापार

जीवन स्वतः व्यापार है, सम्भवतः इसी कारण मनुष्य जन्मजात व्यापारी है। पर अमरता का व्यापार कुछ अटपटा सा लगता है सुनने में, इसी कारण आज इस पर लेखनी चली। इसके पीछे एक अजीब मामला था, जो भारत में न घटकर लंदन की एक अदालत में घटित हुआ था।

एक 14 वर्ष की बालिका जो लंदन में रहती थी, एक दुर्लभ प्रकार के कैंसर से ग्रसित थी। यह जानकर कि उसके जीवन के अब कुछ ही दिन शेष हैं, उसने अदालत में एक प्रार्थना-पत्र दिया कि वह चाहती है कि अपनी आसन्न मृत्यु के उपरान्त भी वह पचास अथवा सौ साल के बाद का जीवन देख सके। उसका विश्वास था कि निकट भविष्य में विज्ञान मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेगा और मृतकों को पुनःजीवित करने में सफल होगा। इतना ही नहीं चिकित्साविज्ञान भी भविष्य में कैंसर का निदान खोज लेगा। अतः वह चाहती है कि उसका मृत शरीर क्रायोजनिक विधि से, पुनर्जीवन प्राप्त करने की आशा में संरक्षित कर दिया जाये। अदालत ने उस बालिका की जिजीविषा को ध्यान में रखते हुए, उसकी मृत्यु के उपरान्त उसके शरीर को क्रायोजेनिक विधि से संरक्षित करने का ऐतिहासिक निर्णय दिया। इस प्रकार उस बालिका की मृत-देह संरक्षित कर दी गई।

क्रायोजेनिक विधि में मानव शरीर शून्य से नीचे 1960ब् के तापमान पर एक विशिष्ट वैज्ञानिक विधि द्वारा संरक्षित कर दी जाती है। यह प्रक्रिया मृत्यु के कुछ सेकेन्डों पूर्व शुरू की जाती है। इस तकनीक के पक्षधर मानते हैं कि इस प्रक्रिया के उपरान्त भविष्य में जीवन लौटने की पूरी संभावना रहती है। इस विचार का समर्थन करती 1960 में मिशिगन के प्रोफेसर राबर्ट एटिंगर की पुस्तक ‘‘प्रासपेक्ट आफ इमर्मोटिलिटी’’ ने वैज्ञानिक और नैतिक आधारों पर बहस प्रारम्भ कर दी। परन्तु इस विवाद से तटस्थ प्रोफेसर राबर्ट एटिंगर ने 1996 में, अमेरिका के मिशगिन स्टेट में पहला क्रायोजेनिक इंस्टीट्यूट बनाया था जिसमें उनकी माँ तथा उनकी दोनों पत्नियों के शव संरक्षित हैं। यह प्रक्रिया मुख्यधारा की सोच तो नहीं बन सकी, परन्तु अमेरिका में तीन सौ और रूस में 50 शव इसी पुनर्जीवन हेतु संरक्षित हैं। इस विधा पर पक्ष और विपक्ष अपना-अपना तर्क दे रहे हैं। एक के अनुसार-इस प्रक्रिया में लाखों करोड़ों का व्यय क्या उचित है। जबकि विश्व में अगिणित लोग भूख और बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। दूसरों की दृष्टि में जब इस समय में जीना दूभर हो रहा है तो जीवन के पुनः प्राप्त करने की कल्पना हमें किस ओर ले जाएगी, फिर यदि मान लें कि दौ साल बाद चिकित्सा विज्ञान यदि कैंसर का उपचार निकाल कर संरक्षित शव को जीवन दे भी दे तो वह जीवन कैसा होगा? उसके संबंध कैसे और किसके साथ किस प्रकार होंगे। क्या जीवित व्यक्ति की आयु उतनी ही रहेगी और उसकी भावनाओं को कौन समझेगा। क्या वह

व्यक्ति आने वाले समाज में अपने को उस समाज के अनुरूप ढाल पायेगा? अधिकांश का मानना है कि मानव देह को संरक्षित रखने का जो खेल यह कम्पनियाँ खेल रही हैं, वे तथ्यतः अमरता का सौदा कर रही हैं, क्योंकि उन्हें यह पता ही नहीं कि इसके खरीददार कौन होंगे? कुछ लोग या कोई नहीं? परन्तु खेल तो चल ही रहा है, अमरता बेचने का। यह मात्र समय ही बताएगा कि इसमें कौन हारा और जीता कौन?

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1 टिप्पणी "सम्पादकीय // विज्ञान कथा / जनवरी-मार्च 2018"

  1. मुझे तो ये लगता है कि ये एक पैसे बनाने का साधन है। अगर शरीर को जीवित करने वाली तकनीक बन भी जाती है तो इसकी क्या गारंटी है कि इन शरीरों को जीवित किया जायेगा?

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