बाल विज्ञान-कथा // चाँद के चक्कर में // कल्पना कुलश्रेष्ठ // विज्ञान कथा / जनवरी-मार्च 2018

clip_image002 ह अक्टूबर 2115 की एक सुहावनी सुबह थी। दिल्ली की चौड़ी, साफ-सुथरी सड़कें काँच की तरह चमक रही थीं। सड़क के दोनों ओर बनी रंगबिरंगी गगनचुम्बी इमारतें बड़ी मनोरम दिखाई दे रही थीं। इनकी बालकनी में लगे वर्टिकल फॉरेस्ट सुंदर फूलों से लदे खुशबू बिखेर रहे थे। आकाश में कहीं-कहीं कृत्रिम रूप से बनाये गए चमकदार रंगीन बादल छाए हुए थे। जो किसी विशेष पदार्थ से बने होने के कारण धूल, धुआँ और प्रदूषण सोखकर वातावरण को शुद्ध कर रहे थे। स्मार्ट इमारतों में लगे कंप्यूटराइज्ड सिस्टम के कारण इनकी डिजाइन जरूरत के हिसाब से बदलती जा रही थी। ऐसी ही एक किताबनुमा आकृति की इमारत पर लिखा हुआ ‘दिल्ली मॉन्टेसरी स्कूल’ का बोर्ड बहुत दूर से ही झिलमिला रहा था।

स्कूल की एक कक्षा में रोहन व शीना अपने दोस्तों के साथ बैठे अपने ह्यूमेनॉइड रोबो शिक्षक की बातें बड़े ध्यान से सुन रहे थे, जो उन्हें पाई का मान निकालना सिखा रहे थे। स्कूल के कुछ शिक्षक साइबोर्ग, कुछ रोबो तो कुछ मौलिक मनुष्य थे। स्कूल के अधिकतर कार्य जैसे- खेलकूद, पी.टी., संगीत व कला की जिम्मेदारी रोबो कर्मचारियों पर ही थी। हालाँकि स्कूलों में अब पढ़ाई इतनी महत्वपूर्ण नहीं रह गई थी जितना कि बच्चों में मेल-जोल, भावनात्मक विकास और सामाजिकता बढ़ाना। तेजी से यांत्रिक होते जा रहे समाज में कई प्रकार की भावनाएँ लुप्त होने लगी थीं, जबकि समाज वैज्ञानिकों का मानना था कि दिमाग के संपूर्ण विकास के लिए यह सब जरूरी था। इसलिए पुराने समय के स्कूलों जैसा वातावरण आज भी कायम था।

थोड़ी देर बाद लंचटाइम में वे सब बाहर आ गए।

‘इस बार जाड़े की छुट्टियों में कहाँ जाने का कार्यक्रम है शीना?’ यह विमल था।

‘हम लोग इस बार मून पर जाएँगे। वहाँ हमारे मामा रहते हैं। हम सबने ‘प्लैनेट पासपोर्ट’ बनवा लिया है और मून वीजा के लिए आवेदन भी कर दिया है’ शीना ने खुश होकर बताया।

‘हमारी नानी मून के मशहूर रेस्तराँ ‘फूडी’ में शेफ हैं। कुछ दिनों बाद वह रिटायर हो रही हैं। मून से वापस आते समय नानी साथ आ जाएँगी और फिर हमारे पास ही रहेंगी’ रोहन भी बेहद खुश दिखाई दे रहा था। आधी छुट्टी के बाद स्कूल उन्हें जूलॉजिकल पार्क और कुतुबमीनार दिखाने ले जाने वाला था। बच्चे उसे देखने के लिए बहुत उत्सुक थे। कुछ देर बाद स्कूल की एयरबस में बैठकर वे सब जूलॉजिकल पार्क पहुँच कर घूमने लगे।

‘देखो तो यह शेर कैसा डरावना लग रहा है’ रोमांचित हुए सोनू ने रोहन से कहा।

‘हाँ बच्चे , लेकिन डरने की कोई बात नहीं। इतनी ऊँची चारदीवारी जो है। वैसे भी शेर, तेंदुआ, गैंडा और दरियाई घोड़ा एकदम असली लगने वाले कंप्यूटराइज्ड मॉडल हैं। सिर्फ बंदर, लोमड़ी और भेड़िया जैसे छोटे जानवर ही असली हैं’ गाइड ने बताया।

‘ओह ऐसा क्यों? नकली जानवर क्यों रखे गए हैं?’ वे हैरान थे।

‘क्योंकि इनकी नस्लें धरती से विलुप्त हो चुकी हैं। लेकिन मनुष्य को प्रकृति की समीपता का अनुभव कराने के लिए उनके हूबहू मॉडल यहाँ रखे गए हैं। जानते हो आसमान में उड़ने वाली निन्यानवे प्रतिशत गौरैयाँ रोबोटिक हैं। जो चिड़िया तुम्हारे बर्ड हाउस में रह रही है वह असली है या रोबोटिक, तुम नहीं जान सकते। जीवों की हजारों प्रजातियाँ लुप्त हो जाने के बाद अब मनुष्य को अक्ल आई है। लेकिन देर हो चुकी है।’ गाइड जो पूर्ण मनुष्य था, न जाने क्यों गुस्से में आ गया था।

‘सही कहा लेकिन जो कुछ बचा है उसे तो सहेज सकते हैं न। जैसे अब भोजन के लिए जानवर नहीं मारे जाते क्योंकि माँस आज प्रयोगशालाओं और फैक्ट्रियों में कोशिकाओं के संवर्धन से बनाया जा रहा है। वैसे ही जैसे बीज से पौधा’ शर्मा सर ने कहा।

‘ओह हाँ मैंने पढ़ा था कि पुराने जमाने में लोग पशुओं को मारकर खाते थे’ शीना ने सिहर कर कहा।

‘अब चलो, हमें कुतुबमीनार देखने भी जाना है। पहले कुछ खा लेते हैं। स्कूल की ओर से सबके लिए लंच है। पार्क की कैंटीन भी खुलने वाली है।’ शर्मा सर ने बहस खत्म करते हुए कहा।

आपस में बातचीत करते वे कैंटीन की ओर चल दिए। हाथी की आकृति जैसी बनी कैंटीन में बैठकर उन्होंने जमकर खाया-पीया। कुछ देर बाद फिर स्कूल की एयर बस में सवार वे कुतुबमीनार की ओर जा रहे थे। ऊपर बहुत ट्रैफिक था। बैलून वैन और एयर बस की भीड़ के अलावा पीठ पर छोटे-छोटे रॉकेट लगाये लोग भी उड़ते फिर रहे थे और जब-तब ‘स्काई रेड सिगनल’ तोड़ने के कारण चालान भर रहे थे। कुतुबमीनार की ऊँची इमारत दूर से दिखाई दे रही

थी। अभी वे दूर ही थे कि अचानक एक तेज धमाका हुआ। पलक झपकते ही कुतुबमीनार वहाँ घूम रहे लोगों सहित गायब हो चुकी थी। इसकी जगह एक बड़ा सा गढ्ढा नजर आ रहा था। वे सभी स्तब्ध रह गए। चारों ओर मची अफरातफरी के बीच एक गहरी आवाज गूँज रही थी।

‘हमने कुतुबमीनार को एक अनजान स्थान पर टेलीपोर्ट कर दिया है जहाँ उसे कोई नहीं ढूँढ सकता। हम पृथ्वी की सरकारों को हिलाकर रख देंगे। तुम सब चाँद से दूर रहो। चाँद सिर्फ हमारा है। हमारी माँगें न मानी गईं तो अगला नंबर ताजमहल और एफिल टॉवर का होगा’ लेजर लाइट से बने ध्ामकी भरे संदेश चारों ओर चमकते हुए लहरा रहे थे।

‘ओह यह तो हद है’ शर्मा सर चिल्ला उठे।

‘यह सब क्या है सर?’ बच्चों ने सहमकर पूछा।

‘उन्होंने कुतुबमीनार को टेलीपोर्ट कर दिया है। किसी वस्तु को उसके अणुओं में तोड़कर किसी और जगह ले जाकर फिर से मूल वस्तु के रूप में संयोजित किया जा सकता है। यह टेलीपोर्टेशन है।’

‘पर वे ऐसा क्यों कर रहे हैं?’

‘दरअसल यह एक खूंख्वार आतंकवादी संगठन ‘मून इज माइन’ है जो चंद्रमा पर कब्जा करना चाहता है। वह चाहता है कि सिर्फ उनके सम्प्रदाय और संस्कृति के लोग ही मून पर रहें शेष पृथ्वी के लोगों का वहाँ कोई दखल न हो’ शर्मा सर ने बताया।

‘तो हम मामा के घर नहीं जा पाएँगे?’ रोहन मायूस हो उठा। फिर अपनी सैर अधूरी छोड़कर वे सभी वापस लौटने लगे। अगले दिन तमाम देशों की गुप्तचर एजेंसियों की इमरजेंसी मीटिंग बुलाई गई जिसकी अध्यक्षता तत्कालीन अर्थ कमांडर मिस्टर रमाशंकर कर रहे थे।

‘आतंकवादियों की धमकी के सामने सरकारें झुकने वाली नहीं हैं। परंतु यह चिंताजनक है कि टेलीपोर्टेशन की तकनीक उनके हाथ लग गई है। समझ में नहीं आता कि यह बेहद गोपनीय तकनीक उनके हाथ लगी कैसे? जबकि टेलीपोर्टेशन पर विश्व भर में प्रतिबंध लगाया जा चुका है और अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रिया के बाद कुछ विशेष मामलों में ही इसकी इजाजत दी जा सकती है।’

‘हमने पहले ही चेतावनी दी थी कि चोरीछिपे आतंकवाद का समर्थन करने वाले कुछ देश इस तकनीक को आतंकवादियों के हाथ बेचने की तैयारी में हैं। पर हमारी बात को तब किसी ने गंभीरता से नहीं लिया।’ इजरायल के खुफिया प्रमुख कमांडर मोशे तीखे स्वर में बोल उठे।

‘आपने सही कहा था। इस तकनीक के कारण आतंकवादी बेहद खतरनाक हो चुके हैं। हमें डर है कि सरकारों पर दबाव बनाने के लिए वे महत्वपूर्ण व्यक्तियों को टेलीपोर्ट करके उनका अपहरण कर सकते हैं। हम जानते हैं कि जब जीवित प्राणियों को टेलीपोर्ट करने के प्रयोग किए गए थे तो वे प्रयोग के बाद पागल हो गए थे। कुछ तो मर भी गए थे। पौधों के अतिरिक्त अन्य किसी प्राणी पर ये प्रयोग सफल नहीं रहे थे।’ मिस्टर रमाशंकर की बात पर सब सहमति में सिर हिला रहे थे। दरअसल शुरू में इस तकनीक को बड़ा फायदेमंद माना गया था। इमारतों, बड़े-बड़े सामानों, भारी मशीनों, कारखानों, पेड़ों और बगीचों वगैरह को दूसरे स्थानों पर शिफ्ट करने के लिए टेलीपोर्टेशन की जटिल तकनीक का प्रयोग किया जाने लगा था। परंतु इससे एक विचित्र समस्या उठ खड़ी हुई। मनुष्यों से खाली कराने के बाद भी इन स्थानों पर छिपकर रहने वाले जीव जैसे मच्छर, चींटियाँ, छिपकलियाँ, कॉकरोच, मक्खियाँ, दीमक और चूहे वगैरह भी साथ में टेलीपोर्ट हो जाते थे। फिर वे अजीब व्यवहार करने लगते थे। लोगों के नाक, मुँह, कान में घुसते, उन्हें काटते या हर जगह उत्पात मचाने लगते थे। इससे कुछ लोगों की दर्दनाक मौत होने और अपराधिक संगठनों द्वारा इसे घातक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की आशंका के कारण इस तकनीक को अव्यावहारिक मानकर विश्व भर में इस पर रोक लगा दी गई। ‘इंटरनेशनल टेलीपोर्ट नियमन संस्था’ द्वारा अत्यंत दुर्लभ मामले में ही इसकी अनुमति दी जा सकती थी। परंतु सच यही था कि कहीं न कहीं चोरी-छिपे इसका प्रयोग अब भी किया जा रहा था। कल की घटना इसी का नतीजा थी।

‘हम उन्हें मनमानी नहीं करने दे सकते। वे चाहे कुछ भी कर लें हम उनके सामने नहीं झुकेंगे। लेकिन शीघ्र ही हमें कुछ करना होगा वरना ताजमहल और एफिल टॉवर को गँवा बैठेंगे।’ यह सी.आई.ए. प्रमुख मिस्टर डकवर्थ थे। लम्बे विचार

-विमर्श के बाद मीटिंग समाप्त कर दी गई । इस भयानक घटना के तीन दिन बाद स्कूल खुले तो एसेंबली के दौरान बच्चों के बीच यही चर्चा थी।

‘हमारी पुलिस उन्हें पकड़ती क्यों नहीं?’ गुस्से में भरकर शुभि बोल उठी ।

‘वे पहचान में नहीं आते क्योंकि वे हम सब के बीच घुलमिल कर रहते हैं’ रोजी मैडम का विचार था।

‘मैं पुलिस होता तो हर आतंकवादी के अन्दर चिप लगा देता’ कंप्यूटर गेम्स का शौकीन शुभम चिल्लाया।

‘बुद्धू चिप लगाने के लिए उन्हें पहचानता कैसे?’ शीना ने मुँह बनाया। शुभम सोच में पड़ गया। शर्मा सर बहुत दिलचस्पी से उनकी बातें सुन रहे थे।

‘ऊँहूँ. ...चिप लगाना, आईडिया तो बुरा नहीं। लगता है अब हमें ही कुछ करना पड़ेगा। वह न जाने क्यों मुस्करा रहे थे।

इस आतंकवादी घटना को अभी अधिक समय नहीं बीता था कि एक नई मुसीबत खड़ी हो गई। अचानक ही चाँद पर न जाने कैसे एक घातक एलियन वायरस फैल गया था। इसकी चपेट में आने पर व्यक्ति का पूरा शरीर काले चकत्तों से भर जाता था। संक्रमित होने के बाद इसका कोई इलाज नहीं था और मौत निश्चित थी। हालाँकि पृथ्वी के वातावरण में यह प्रभावहीन था। पिछली सदी से चली आ रही पेजबुक, क्विटर और इंस्टाग्राफ जैसी लोकप्रिय सोशल साइट्स पर ये संदेश वायरल हो रहे थे। उन लोगों में अफरा-तफरी मच गई थी जो चाँद पर आते-जाते रहते थे या जिनका किसी प्रकार भी चाँद से संपर्क था। आज पृथ्वीवासियों के लिए चाँद बहुत ही शानदार हॉलीडे डेस्टिनेशन बन चुका था। वहाँ के अनूठे परिवेश, पृथ्वी से कम गुरुत्वाकर्षण में होने वाले मजेदार खेल और रोमांचक झूलों के पृथ्वीवासी दीवाने थे। दुर्भाग्य से सरकारों की ओर से भी इस विषय में कोई जानकारी या स्पष्टीकरण नहीं दिया गया था। हालाँकि सरकारी स्वास्थ्य विभाग चाँद पर जाने से पहले एक खास वैक्सीन लगवाने की सलाह देने लगे थे। फिर यों ही चिंता और डर के माहौल में लगभग तीन महीने बीत गए थे।

आज दोपहर दो बजे से नई दिल्ली के आलीशान ऑडिटोरियम में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस जारी थी। जिसका सीधा प्रसारण पूरी पृथ्वी पर देखा जा रहा था। वहाँ पत्रकारों व दर्शकों की काफी भीड़ दिखाई दे रही थी। सामने बड़े से मंच पर प्रशासनिक एवं गुप्तचर एजेंसियों के विभिन्न अधिकारी सशरीर अथवा वर्चुअल रूप में उपस्थित थे। अर्थ कमांडर मिस्टर रमाशंकर पत्रकारों को जानकारी दे रहे थे।

‘आपको जानकर खुशी होगी कि ताजमहल और एफिल टॉवर को खोने से पहले ही हमने आतंकवादी संगठन के सभी सदस्यों को पकड़ लिया है। अब कहीं कोई खतरा नहीं।’

‘लेकिन आपने उन आतंकवादियों की पहचान कैसे की?’ एक प्रमुख न्यूज चौनल के पत्रकार ने प्रश्न किया।

‘एक अनोखे तरीके से। बच्चों की जिन बातों को हम बचकाना समझ कर टाल देते हैं वे किसी समस्या से निपटने का रास्ता भी बन सकती हैं। जरूरत है बड़ों को अपना दिमाग खुला रखने की। इस मामले में हमें बच्चों से ही आइडिया मिला। फिर हमने एक योजना बनाई।’

‘कैसी योजना?’ पत्रकार उत्सुक थे।

‘सबसे पहले हमने सोशल मीडिया का उपयोग करके चाँद पर एलियन वायरस की अफवाह फैलाई और फिर इससे बचाव के लिए वैक्सीन प्रस्तुत किया जो वास्तव में माइक्रोफोन युक्त नैनो चिप और ग्लूकोज का घोल था। जाहिर था चाँद पर कब्जा करने का इरादा रखने वाले आतंकवादी भी यह वैक्सीन जरूर लगवाते। यही हुआ और हमारे पास उन सब व्यक्तियों की लोकेशन व बातचीत का रिकॉर्ड उपलब्ध हो गया जिनका चाँद से कुछ भी संबंध था। फिर दुनिया भर में फैले अपने मित्र देशों की मदद से हमने हर संदिग्ध व्यक्ति की छानबीन की और आतंकवादियों का पूरा नेटवर्क हमारी पकड़ में आ गया। वे हमारी मनोवैज्ञानिक चाल में फँस गए।’

‘कुतुबमीनार और वे पर्यटक अब कहाँ है?’ प्रश्नों की बौछार जारी थी।

‘कतु बु मीनार का पता हमेंलग चकु ह।ै हालाँक टलेपाटे र्श्ेन के दौरान इसका रूप कुछ बदल गया है। क्योंकि आतंकवादी इतने एक्सपर्ट नहीं थे। जल्द ही यह वापस अपनी जगह पर होगी। पर्यटकों के बारे में हम अभी मीडिया को इतना ही बता सकते हैं कि उनकी गहन चिकित्सा जाँच चल रही है’ मिस्टर रमाशंकर ने कहा।

‘और वे आतंकवादी?’

‘उन्हें स्पेस जेल में डाल दिया गया है। जहाँ से वे कभी भाग नहीं सकते। ‘मून इज माइन’ संगठन पूरी तरह खत्म हो चुका है। देश के कानून का पालन करते हुए वैक्सीन लगवाने वाले अन्य लोगों में चिप को निष्क्रिय कर दिया गया है। साथ ही आतंकवादियों को सपोर्ट करने वाले देशों के खिलाफ सख्त अंतर्राष्ट्रीय कार्यवाही की जा रही है। इस केस में हम शर्मा सर और उनकी टीम के बच्चों का विशेष धन्यवाद करते हैं जिन्होंने यह जबरदस्त आइडिया दिया और सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने में हमारा पूरा साथ दिया। देश और मानवता के प्रति उनकी सच्ची सेवा को देखते हुए भारत के राष्ट्रपति की ओर से उन्हें विशेष पुरस्कार दिया जा रहा है।’ मिस्टर रमाशंकर ने मुस्कराते हुए कहा।

‘हुर्रे.. चाँद के चक्कर में हम भी मशहूर हो गए।’ स्क्रीन पर निगाह जमाये शर्मा सर और उनकी टीम के बच्चे खुशी से तालियाँ बजाने लगे। रोहन और शीना भी मुस्करा उठे। पृथ्वी और चाँद बिलकुल सुरक्षित थे। वे मामा के यहाँ जाकर ‘फूडी’ के स्वादिष्ट व्यंजनों का मजा ले सकते थे।

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