संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 6 - यात्रा संस्‍मरण - तीर्थों का दान - डॉ लता अग्रवाल


प्रविष्टि क्र. 6

१. तीर्थों का दान

डॉ़. लता अग्रवाल


जीवन भी एक यात्रा है जिसमें हम विविध पड़ावों से गुजरते हैं, आँसू और मुस्‍कुराहटों से भरे सफर में कई रोमांचक अनुभूति हमें होती है। बिना यात्रा के जीवनानुभव की परिधि न केवल सीमित हो जाती है वरन नवोन्‍मेष की संभावना भी समाप्‍त सी हो जाती है। सच! यही संस्‍मरण ही तो हमारे जीवन की अनमोल पूँजी है। किसी ने सच ही कहा है-‘संस्‍मरण निधि है इतिहास की, समझो न इसे वस्‍तु परिहास की’ यात्रा के इस अनुभव से ही कीर्ति के अर्जन का मार्ग प्रशस्‍त होता है वास्‍कोडिगामा हो या सिकंदर यदि यात्री न बनते तो इतिहास में उनका नाम दर्ज न होता। इसीलिए यात्रा को जीवन के विकास से जोड़कर देखा गया है और संस्‍मरण को इतिहास की निधि माना गया है। कुछ संस्‍मरण अपने-आप में इतने निराले होते हैं कि अपनी अवस्‍मरणीय छवि दिल पर सदा के लिए अंकित कर जाते हैं, भावात्‍मक रूप से जुड़े होने के कारण कुछ संस्‍मरण जीवन के अधिक निकट होने से सदैव संजीवनी का एहसास देते हैं। कभी जाने-अनजाने ईश्‍वर हमें कुछ नेकियों का हिस्‍सेदार बनाकर यह एहसास करा देता है कि यह जीवन कितना पवित्र और मूल्‍यवान है।

पूर्वजों का कहना है -‘‘मन का हो तो अच्‍छा, न हो तो और भी अच्‍छा क्‍योंकि उसमें ईश्‍वर की मर्जी शामिल होती है, और ईश्‍वर कभी हमारा अहित नहीं चाहते।’’ यही बात श्रीकृष्‍ण ने गीता में अर्जुन से कहा है - ‘‘जो कुछ करता हूँ मैं ही करता हूँ तू तो निमित्‍त मात्र हैं। अतः हे अर्जुन! स्‍वयं को किसी कर्ता भाव में लिप्‍त न करते हुए केवल कर्म भाव से यह युद्ध कर।’’ सच ही तो है संसार भी एक कर्मक्षेत्र है, जहाँ हम केवल निमित्‍त मात्र है चाहे जितनी योजनाएं क्‍यों न हम बना लें किन्‍तु होता वही है जो ईश्‍वर को मंजूर होता है।

कुछ ऐसे ही संस्‍मरण से गत दिनों मैं भी रूबरू हुई। बच्‍चों की जिम्‍मेदारियों से मुक्‍त होना आज के दौर में किसी तीर्थ से कम नहीं किन्‍तु भारतीय संस्‍कृति में आस्‍था होने से इस बात में विश्‍वास गहरा है कि तीर्थ-व्रत हमारे मंगलकारी हैं। शास्‍त्रों में तो इस पुण्‍य का प्रताप जन्‍मों तक संचय होता है। अपना वर्तमान सफल बनाते हुए कुछ अगले जन्‍म हेतु पुण्‍य अर्जित कर लूँ, इसी भाव से पति महोदय के समक्ष तीर्थयात्राा की मंशा व्‍यक्‍त की। मेरी भावना का सम्‍मान करते हुए उन्‍होंने फौरन मंजूरी दे दी। अब बारी आई मित्रमंडली तैयार करने की कुछ मित्रों ने सहजता से अपनी स्‍वीकृति दे दी। एक मिनी बस की व्‍यवस्‍था कर, पंडितों से शुभ मुहूर्त पूछ कर हम लोगों ने तीर्थ यात्रा का दिन निश्‍चित किया। उम्र का तकाजा है न चाहते हुए भी कुछ दवाईयों के भरोसे हमारी दिनचर्या आरंभ होती है अतः उन्‍हें प्राथमिकता से रखते हुए, कुछ हल्‍के फुल्‍के नाश्‍ते बच्‍चों के कहने पर कि नए स्‍थान पर कुछ राशि नगद रूप में बाकी ए.टी.एम. के भरोसे यात्रा की तैयारी पूरी हुई। सुनती थी कि तीर्थ यात्रा के लिए ईश्‍वर की कृपा बहुत जरूरी है। किन्‍तु अपनी योजना में किसी प्रकार का कोई विध्‍न न देख मेरा मनोबल बहुत मजबूत हो गया।

नियत दिन शुभ मुहूर्त में यात्रा आरंभ कर हम लोग भोपाल से निकले। अभी हम रायसेन रोड पर ही पहुँचे थे कि सड़क पर काफी जाम मिला, पूछने पर पता चला कि कोई दुर्घटना घट गई है। पुरूष वर्ग पड़ताल हेतु बस से नीचे उतर गए। पता चला कोई नवजवान लड़का है संभवतः किसी कॉलेज का छात्र हो। पति महोदय स्‍वयं को रोक न पाए और भीड़ को चीरते हुए जा पहुँचे घटना स्‍थल पर देखा वह युवा रक्‍तरंजित अवस्‍था में बेहोश पड़ा हुआ है चारों ओर से भीड़ उसे घेरे हुए है।

‘‘अरे! यह तो गंभीर अवस्‍था में है, इसे फौरन अस्‍पताल ले जाना चाहिए, इन्‍होंने कहा।’’

मगर कहीं से कोई प्रतिक्रिया न देख इनकी बेचैनी बढ़ गई । ‘‘अरे ! कोई आगे आओ, इसे उठाकर अस्‍पताल ले चलते हैं।’’ ये फिर बोले।

‘‘108 को फोन कर दिया है। अभी आती ही होगी।’’ तभी भीड़ से किसी की आवाज आई।

‘‘मगर 108 के भरोसे हम इसे इस तरह छोड़ भी तो नहीं सकते, चलो भाई हम लिए चलते हैं। इतना कहते ही धीरे-धीरे भीड़ छटना शुरू हो गई। साथ ही हल्‍का सा मिला-जुला स्‍वर भी उभरा- इनसे मिलो आ गए हातिमताई। अगर हादसों से दुनिया रूकती तो कभी की थम गई होती। दुनिया की खासियत है ये कभी झुकती नहीं है, जिन्‍दगी चलती रहती है कभी रूकती नहीं। सभी ने अपनी राह पकड़ ली। रास्‍ता साफ हो गया तो हमारे साथियों ने भी आवाज लगाई ।

‘‘अरे! चलिए सरजी! वैसे ही काफी लेट हो गए।’’ मगर इन्‍हें तो मानो कुछ सुनाई ही नहीं आ रहा था।

‘‘नहीं, यार! पहले इस बच्‍चे को अस्‍पताल पहुँचा दें फिर चलते हैं चोट गहरी है, समय पर सहायता न मिली तो अनर्थ हो सकता है। ’’

‘‘कोई बात नहीं हमारी सरकार ने 108 की व्‍यवस्‍था इसीलिए तो की है।’’

मगर अब तक कहीं 108 का पता नहीं था। उधर हमारे बस वाले ने भी जल्‍दी मचाना शुरू कर दिया। इन्‍होंने दो टूक शब्‍दो में जवाब दे दिया कि आप लोग अपनी यात्रा आरंभ करें, मैं इस बच्‍चे को लेकर अस्‍पताल जा रहा हूँ । सबने काफी समझाया किन्‍तु महोदय माने तब न ....साथ ही मुझे भी हिदायत मिली कि तुम भी सबके साथ चलो मैं बाद में आप लोगों को ज्‍वाइन कर लूँगा। मगर सीता ने भला राम के बिना स्‍वर्ग स्‍वीकारा है....? सो मैं भी अपनी यात्रा को वहीं स्‍थगित कर एक सहधर्मिणी के रूप में उनके साथ हो ली। तब तक 108 का कहीं कोई पता नहीं था। एक आटो को रोक हम उस बालक को नेशनल अस्‍पताल ले गए आनन-फानन में उसे भर्ती तो करा दिया किन्‍तु दुर्घटनाग्रस्‍त व्‍यक्‍ति का पता पूछने पर हम अनुत्‍तरीय हो गए।

सोचा उसकी जेब में शायद कोई परिचयपत्र या मोबाइल हो .....! मगर आज के युग का यह बालक.......! पता नहीं किस सोच में जी रहा था ना कोई आई कार्ड न ही मोबाइल बालक भी बेहोश....मन में कुछ आशा की किरण थी कि जल्‍द ही बालक को उसके परिजन के हाथों सौंप हम लोग अपनी यात्रा को पुनः आरंभ करें। आखिर अगले जन्‍म के खाते की गुल्‍लक में कुछ तो अर्जन हो। श्रीमान की पीड़ित बालक के प्रति चिंता जायज थी उसके पीछे जो कारण है वह केवल मैं ही समझ पा रही थी। उसे भी स्‍पष्‍ट करती चलूँ , दरअसल कुछ साल पहले अपने छोटे भाई को इसी तरह एक सड़क हादसे में खो देने के बाद से जब उन्‍हें पुलिस और डॉक्‍टर सूत्रों द्वारा पता चला कि हादसे के बाद भी भाई 2 घंटे तक जीवित , छटपटाता रहा मगर किसी ने कोई सुध न ली। समय रहते उसे सहायता मिल जाती तो उसे बचाया जा सकता था। बाँया हाथ होता है छोटा भाई, बहुत तड़पे हैं अपने भाई के वियोग में ये, सदा यही अफसोस रहा कि क्‍या सड़क की इस भीड़ में किसी में संवेदना न था कुछ और नहीं कम से कम इतनी मानवता होती कि रास्‍ते में लहू-लुहान व्‍यक्‍ति को अस्‍पताल तक पहुँचा सके। क्‍या मानवता मर गई बिलकुल ....? क्‍या इस कदर जीवन के मायने खो चुके हैं हम.....? तब से जब कभी इस तरह का कोई हादसा वे देखते हैं तो फौरन सहायता के लिए दौड़ पड़ते। आज इस हादसे ने उनकी यादों को और भी जीवित कर दिया क्‍योंकि बालक लगभग उसी उम्र का था। जानते हैं भाई तो लौटेगा नहीं बस तभी से प्रण किया कि अपनी आँखों के सामने किसी को इस तरह मरने नहीं छोड़ सकते। भाई को तो बचा नहीं सके किसी की जान बचाकर कुछ पल को राहत जरूर महसूस कर लेते हैं।

डॉक्‍टर ने सिर पर गंभीर चोट बताई और फौरन इलाज की प्रक्रिया आरंभ करने को कहा अन्‍यथा जान को खतरा हो सकता है। इस हेतु कुछ अग्रिम राशि जमा करना था। इन्‍होंने मुझे एक स्‍वर में आदेश दिया -‘तुमने जो नगद रूपए रखे थे वो काउन्‍टर पर जमा कर दो। ’ दो दिन के बाद उस बालक को होश आया तब तक ये पूरी निष्‍ठा से उसकी सेवा में लगे रहे। पिछले जन्‍म का कोई रिश्‍ता हो जैसे .....। जयेश नाम था उसका। पूछने पर पता चला बिहार के एक छोटे से गाँव से अपना भविष्‍य बनाने आया यह बालक निहायत ही गरीब परिवार से है। ट्‌यूशन करके अपनी शिक्षा को अनवरत रखे हुए है, वहीं से बच्‍चों को पढ़ाकर लौट रहा था कि एक कार तेजी से टक्‍कर मारकर निकल गई। मेरे पूछने पर कि कम से कम मोबाइल तो रखा करो पास ...ताकि समय-असमय काम आ सके।

वह बोला -‘‘आंटीजी! मोबाइल यानि अनावश्‍यक का खर्च मैं अभी यह खर्च उठाने की स्‍थिति में नहीं हूँ। बस मम्‍मी-पापा से बात करनी होती है सप्‍ताह में एक बार सो किसी भी पी.सी.ओ. से कर लेता हूँ।’’

खैर! जयेश के पिता को सूचित कर दिया गया वे आए सारी बातें सुनकर जयेश के पिता रो पडे, कृतज्ञता जाहिर करते न अघाते थे। बोले-

‘‘मुझ गरीब का इकलौता बेटा है जयेश यदि आप न मिलते तो.....जाने क्‍या ....हमारे जीवन की एक मात्र आस है यह..... आपने मेरे कुल के बुझते चिराग को रोशनी दी है। ईश्‍वर आपका जीवन सुख से भर दे। आपके बच्‍चों को ईश्‍वर दीघार्यु करे। मैं अभी जयेश को अपने साथ लिए जा रहा हूँ ठीक होने पर ही भेजूँगा। साहबजी! मैं इस जन्‍म में आपका ऋण नहीं चुका सकता......।’’

‘‘ऋण मेरा नहीं उपर वाले का कहो, मैं न होता तो कोई और होता। ईश्‍वर को बचाना था सो हमें निमित्‍त बनाया है। ’’

‘‘मगर मेरी वजह से आपकी तीर्थयात्रा पूरी न हो सकी इस बात का मुझे बहुत दुख है अंकल - आंटी।’’

‘‘तुम उसकी चिंता न करो, बस अपना ध्‍यान रखो और हाँ!..... पूरी तरह स्‍वस्‍थ होकर आना।’’ ये बोले।

जयेश चला गया। उसे अपने पिता के हाथों सौंपकर इन्‍हें तसल्‍ली हुई। काफी समय निकल जाने के कारण यात्रा पर जाने का मन अब ठंड़ा सा पड़ गया था। दिसम्‍बर की गुलाबी -गुलाबी ठंड थी , शाम का सिंदूरी सूरज थके कदमों से अपना साम्राज्‍य समेटे जाने की तैयारी में लगा था। पुराना साल भी बिदाई की इजाजत माँग रहा था। मैं घर में ही बैठी टेलीविजन के साथ अपने दिन की यात्रा को अंजाम दे रही थी। सच कहूँ तो मन में कुछ खटक भी रहा था। अपने साथियों के बारे में सोच रही थी। यात्रा के उन पलों की कल्‍पना कर स्‍वयं को बहला रही थी। तभी पीछे से दबे पांव आकर इन्‍होंने धीरे से मेरे कंधों पर थपकी दी। मैं किसी सुखद स्‍वप्‍न में थी अचानक चौंक गई मानो किसी ने मेरी चोरी पकड़ ली हो। बोले -

‘‘क्‍या सोच रही हो.....? अपनी यात्रा के बारे.....?’’

मैंने उनका मन रखने को कहा -

‘‘नहीं बस यूँ ही.....!’’

‘‘सॉरी ! वसुधा! मेरी वजह से तुम्‍हारी तीर्थयात्रा रह गई।’’

‘‘आप ऐसा क्‍यों सोचते हैं.....? मैं खुश हूँ ईश्‍वर ने आपको नेकी का हकदार बनाया है। ऐसा सुयोग कम ही मिलता है।

‘‘सच कहूँ वसु! तो ईश्‍वर ने उस बालक को निमित्‍त बनाकर यहीं हमें तीर्थयात्रा का फल दे दिया है।’’

अन्‍तर्मन से आवाज आई, हम ये तीर्थ क्‍यों करते हैं .....? अपने जीवन में मंगल की कामना, बच्‍चों के सुखी जीवन के लिए और अगले जन्‍म हेतु कुछ नेकियाँ बटोरने के लिए ही ना!..... मेरे कानों में जयेश के पिता के वो शब्‍द गूँज रहे थे-‘‘ आपने मेरे कुल के बुझते चिराग को रोशनी दी है। ईश्‍वर आपका जीवन सुख से भर दे। आपके बच्‍चों को ईश्‍वर दीघार्यु करे।’’

‘‘सच ही कहा आपने हमारा तीर्थ तो पूरा हो गया। अब मेरे शब्‍दों में एक विश्‍वास था। सच ही तो है तीर्थ का अभिप्राय ही सकाम भाव से मुक्‍ति होकर किसी ऐसे कार्य में रत रहना जो हमें ईश्‍वर के निकट ले जाए। संभवतः ईश्‍वर हमसे यही करवाना चाहते थे।’’

‘‘मेरा यह तीर्थ भला कैसे पूरा हो पाता.....यदि तुम साथ न देतीं। हमने तीर्थ नहीं महा तीर्थ किया है।’’ इनकी आवाज में एक प्‍यार भरा स्‍पर्श था।

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परिचय -

डॉ लता अग्रवाल


शिक्षा - एम ए अर्थशास्त्र. एम ए हिन्दी, एम एड. पी-एच डी हिन्दी.

जन्म – शोलापुर महाराष्ट्र

प्रकाशन - शिक्षा. एवं साहित्य की विभिन्न विधाओं में अनेक पुस्तकों का प्रकाशन| पिछले 9 वर्षों से आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर संचालन, कहानी तथा कविताओं का प्रसारण पिछले 22 वर्षों से निजी महाविद्यालय में प्राध्यापक एवं प्राचार्य का कार्यानुभव ।


सम्मान –

१. अंतराष्ट्रीय सम्मान

 प्रथम पुस्तक ‘मैं बरगद’ का ‘गोल्डन बुक ऑफ़ वार्ड रिकार्ड’ में चयन

 विश्व मैत्री मंच द्वारा ‘राधा अवधेश स्मृति सम्मान |

 " साहित्य रत्न" मॉरीशस हिंदी साहित्य अकादमी ।

२. राष्ट्रीय सम्मान –

अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता अजमेर में राष्ट्रीय शब्द्निष्ठा सम्मान, समीर दस्तक चित्तौड़ से साहित्य गौरव सम्मान, बाल कहानी पर स्वतंत्रता सेनानी ओंकारलाल शास्त्री पुरस्कार सलूम्बर , महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान, शिलांग ,श्रीमती सुषमा तिवारी सम्मान,भोपाल, प्रेमचंद साहित्य सम्मान,रायपुर छत्तीसगढ़ , श्रीमती सुशीला देवी भार्गव सम्मान आगरा, कमलेश्वर स्मृति कथा सम्मान, मुंबई ,श्रीमती सुमन चतुर्वेदी श्रेष्ठ साधना सम्मान ,भोपाल ,श्रीमती मथुरा देवी सम्मान , सन्त बलि शोध संस्थान , उज्जैन, तुलसी सम्मान ,भोपाल ,डा उमा गौतम सम्मान , बाल शोध संस्थान, भोपाल , कौशल्या गांधी पुरस्कार, समीरा भोपाल, विवेकानंद सम्मान , इटारसी, शिक्षा रश्मि सम्मान, होशंगाबाद, अग्रवाल महासभा प्रतिभा सम्मान, भोपाल ,"माहेश्वरी सम्मान ,भोपाल ,सारस्वत सम्मान ,आगरा, स्वर्ण पदक राष्ट्रीय समता मंच दिल्ली, मनस्वी सम्मान , अन्य कई सम्मान एवं प्रशस्ति पत्र।

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७३ यश विला भवानी धाम फेस-१

नरेला शंकरी

भोपाल -४६२०४१

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