व्यंग्य // हुक्का हुजूर // डा. सुरेन्द्र वर्मा

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डॉ. सुरेन्द्र वर्मा


एक समय था जब मैंने भी अपने बाबा हुजूर का हुक्का भरा था। वह भी क्या समय था। बाबा चारपाई पर विराजे हैं। आवाज़ लगाते हैं, अरे कोई है ? मैं दौड़ के उनके पास पहुंचता हूँ। ज़रा हुक्का तो लगा देना - वो आदेश देते। मैं पूछता – सुल्फा लगाऊँ या तबा? हुकुम के अनुसार हुक्का लग जाता था। हाज़िर है, हुक्का हुजूर !

वो दिन अब हवा हुए। बरसों तक हुक्का गर्दिश में ही पडा रहा है। लेकिन दिन हमेशा एक से नहीं रहते।

हुक्का फिर खबरों में है। जहां एक ओर आजकल लोग तम्बाकू के पीछे हाथ धो कर पड़े हुए हैं, वहीं हुक्के की ठसक देखिए, वह नए रूप और रंग में दोबारा अवतरित हो गया है। आजकल युवक और युवतियां कोड-वर्ड में हुक्के को “शीशा” कहते हैं, और वे किसी ‘शीशा लाउंज’ में मुगलिया स्टाइल में अधलेटे-से कांच के हुक्के की नली मुंह में दबाए कश लेते हुए देखे जा सकते हैं। इन दिनों युवाओं में बहुत लोकप्रिय हो गया है हुक्का। आप देश के किसी भी मार्केट या बड़े माँल के शीशा लाउंज में खासी भीड़ देख सकते हैं। दिल्ली और मुम्बई जैसे बड़े शहरों में सप्ताहांत आते ही युवाओं के चेहरे खिल जाते हैं। पब और हुक्का बार गुलज़ार हो जाते हैं। हुक्का पीना आज का ‘ट्रेंड’ बन गया है। युवाओं के लिए हुक्के, सौरी शीशे, के कश कोई ख़ास मंहगे भी नहीं हैं --रेगुलर शीशा रु. ३००/- ; प्रीमियर शीशा –रु. ४५०/- ; और पर्ल-कंबो शीशा, केवल ५५०/- रूपए ! जी हाँ, शीशा-लाउंज में हुक्के तरह तरह के आकार में कांच के ही बने होते हैं। आधुनिक गेजेट्स की दीवानी युवा पीढी हुक्के को शाही शौक मानकर, हुक्का-बार के चक्कर काट रही है। हुक्के का कश लेने के लिए बड़े बड़े नगरों में ही नहीं, मध्यम आकार के शहरों में भी हुक्का-बार कुकुरमुत्तों की तरह खुल चुके हैं। हमारे इलाहाबाद में ही न जाने कितने ऐसे “बार’ वैध-अवैध रूप से चल रहे हैं। प्रशासन परेशान है। शासन का क्या, वह तो हमेशा परेशान ही रहता है। धर-पकड़ होती ही रहती है। पर हुक्का अमर है।

हुक्के ने कब कहाँ और किन परिस्थितियों में जन्म लिया, कहना मुश्किल है। तरह तरह की किंवदंतियाँ हैं। पर भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे पहले इसके प्रयोग की जानकारी इतिहास में दर्ज है। कहते हैं, पंद्रहवीं शताब्दी में अकबर के शासन में हुक्के का प्रयोग शुरू हुआ था। अब्दुल नामक एक कारीगर ने हुक्के का आविष्कार किया। उसका कहना था कि पानी के माध्यम से सेहत को होने वाले धूम्रपान से कोई नुकसान नहीं होता। आश्चर्य यह है की आज भी लोग इस बात को अक्षरश: मानते हैं। आखिर बात तम्बाखू की ठहरी। इसके सेवन के लिए आदमी कोई न कोई तर्क जुटा ही लेता है।

बहरहाल हुक्का मध्ययुगीन तहजीब का प्रतीक बन गया। बादशाहों की महफ़िल से आम आदमी के घरों तक हुक्के ने अपनी जगह बना ली। सबकी पसंद बन गया हुक्का। बातचीत के लिए हुक्का; भाईचारे के लिए हुक्का; लड़ाई झगड़े निबटाने के लिए हुक्का; फुर्सत में वक्त काटने के लिए हुक्का; थकान मिटाने के लिए हुक्का; ऐश करने के लिए हुक्का; गाँव की चौपाल में हुक्का; अतिथि सत्कार के लिए हुक्का; घर घर में हुक्का ! जात की बात न मानी तो ‘हुक्का-पानी’ बंद। अपना हुक्का अपनी मरोड़ – पीया पीया नहीं छोड़ दिया !

कहते हैं भारत में हुक्के का सबसे ज्यादह चस्का हरियाणा के जाटों में लगा। जाट-संस्कृति में हुक्के ने अपना झंडा गाड़ दिया। “जहां जाट, वहां हुक्का”। कहा तो यहाँ तक जाता है कि ईरान से भारत में जाट ही इसे लाए। आपको याद ही होगा कि चौधरी देवीलाल अपनी खटिया पर बैठ कर हुक्का गुड़गुड़गुड़ाते थे और बड़े बड़े राज्नैतिकं निर्णय ले लेते थे। वहीं वे लोगों की समस्याएँ सुनते थे और उनकी मुश्किलों का निबटारा मौके पर ही कर देते थे। सामाजिक और राजनैतिक सूझ का स्रोत हुआ करता है हुक्का ! लगभग एक वर्ष पहले नवम्बर २०१७ में हरियाणा दर्शन (प्रदर्शनी) में हुक्के के नए नए रूप प्रदर्शित किए गए। जीन्द के एक गोपाल राम बांकडा हुक्कों के विभिन्न रूपों और उसमें आए बदलावों को एकत्रित करने का विशेष काम कर रहे हैं। उन्हीं के सौजन्य से यह संभव हो पाया था। अपने अपने शौक !

जो हुक्का नहीं पीते, किसी पुराने हुक्के को अपने ड्राइंग रूप में एंटीक की तरह सजाने लग गए हैं। जिनके पास कोई पुराना हुक्का नहीं वे भी कोई खिलौना-हुक्का बाज़ार से लाकर उसे सजाने से बाज़ नहीं आते|

भारतीय दर्शन में जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी और आकाश – इन पांच प्राकृतिक तत्वों का उल्लेख है जिनसे मानव शरीर निर्मित हुआ है। हुक्के के शारीरिक गठन का वर्णन करने का मेरा कोई इरादा नहीं है लेकिन आप गौर से देखें, हुक्के में भी ये पाँचों तत्व सम्मिलित हैं। निराला है हुक्के का जलवा - नीचे जल की गागरी, ऊपर सिर के आग; और मिट्टी की चिलम से कश (वायु) खींचकर आकाश में उड़ा देना। आखिर यही तो है छोटे से हुक्के की लम्बी कहानी, जो शायद ही कभी ख़त्म हो पाए !

डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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1 टिप्पणी "व्यंग्य // हुक्का हुजूर // डा. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. आपका लेख पढ़कर मेरा भी मन हुक्का गुड़गुड़ाने को हो रहा है।

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