डॉ. राम गरीब ‘विकल' की ग़ज़लें

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ग़ज़ल - १

०डॉ. राम गरीब ‘विकल'

सीधी (म.प्र.), भारत

वादों की ये बरसात, है काफ़ी नहीं।

घड़ियाल का दृगपात, है काफ़ी नहीं।


गिनती करानी चाहिए, उपजाति की,

वोटर की, केवल जात, है काफ़ी नहीं।


मालूम है मुझको, दिये के सामने,

कोई अँधेरी रात, है काफ़ी नहीं।


तू और कोई दाँव, मुझ पर आजमा,

ऐ ज़िन्दगी! यह मात, है काफ़ी नहीं।


सूरज उगाना, अब जरूरी लग रहा,

जुगनू की यह बारात, है काफ़ी नहीं।


चाहत तुम्हारी, ,दिल में ही दम तोड़ती,

सपनों की यह शुरूआत, है काफ़ी नहीं।


कोई ‘विकल', कैसे लड़ेगा भाग्य से,

होगी सही, पर बात है काफ़ी नहीं।

०००


 

ग़ज़ल -२

 

आदमी में आदमी जैसी, निशानी कुछ तो हो।

क्रोध, करुणा, प्रेम हो, आँखों में पानी कुछ तो हो।


बेटियाँ बढ़ने लगी हैं, परवरिश के वास्ते,

घर में माँ, भाभी, बहन, दादी या नानी, कुछ तो हो।


नाम पर कविता के, कितने पृष्ठ जाया कर रहे,

छन्द-लय में धड़कती, इक जिन्दगानी कुछ तो हो।


वो मेरे ख्वाबों में भी, आयें तो आयें किस तरह,

याद में तीखी, मधुर, कड़वी कहानी, कुछ तो हो।


गिन रहे फुटपाथ पर जिनको, हर इक दस साल में,

उनके सर पर कोई छत, छप्पर या छानी कुछ तो हो।


तितलियाँ-भौंरे, कहाँ मकरन्द की आशा करें,

बाग में बेला, जुही या रातरानी कुछ तो हो।


तेरे होने पर ‘विकल' आखिर यकीं कैसे करे,

जिन्दगी या मौत दे पर मेहरबानी कुछ तो हो।


०००

 

ग़ज़ल -३

 

बात से बनती न कोई बात, अब बस भी करो।

जानते हैं हम तुम्हारी जात, अब बस भी करो।


साँस की सरगम पे, है करताल बजती दाँत की,

माघ में यह बेरहम बरसात, अब बस भी करो।


गन्ध बारूदी, असलहे खेत में उगने लगे,

बद से बदतर हो रहे हालात, अब बस भी करो।


घुट रहा दम कोपलों का, अन्ध कारागार में,

पीत होते जा रहे सब पात, अब बस भी करो।


ये ठिठोली आपकी, आँखों पे भारी पड़ रही,

आँसुओं की सज गई बारात, अब बस भी करो।


ख्वाब मेरे, आपकी जागीर तो हर्गिज नहीं,

दाँव पर लगती दिखे औकात, अब बस भी करो।


दान कहते हो जिसे तुम, वह मेरा हक है ‘विकल',

मागते तुमसे नहीं खैरात, अब बस भी करो।


०००


ग़ज़ल -४

 

आँखों से, आँसुओं का लगन लिख दिया।

आम ये जिन्दगी का चलन, लिख दिया।


पेट से पीठ मिलकर, झुकी ये कमर,

क्यों मेरी बेबसी को, नमन लिख दिया।


प्यास दिखती नहीं, कुम्भजों के लिए,

आपने, सिन्धु का आचमन लिख दिया।


राज्य दे राम को, आपने क्यों पुनः

- जानकी के लिए, वनगमन लिख दिया।


चाँद तारों की बातें, करें किस तरह,

नाम उनके, ये सारा गगन लिख दिया।


पेट की आग में, आह के मंत्र पर,

कामनाओं का, होता हवन लिख दिया।


भूख, आराधना का विषय थी यहाँ,

क्यों ‘विकल' क्रन्दनों को, भजन लिख दिया।


०००

 

ग़ज़ल -५

 

अभी इन्कार है, इक रोज हामी लौट आएगी।

कोई राहत की सूरत, दूरगामी लौट आएगी।


ये कुदरत है, तवायफ का दुपट्टा तो नहीं यारों,

नहीं छेड़ो इसे, वरना सुनामी लौट आएगी।


ये भ्रष्टाचार, खरपतवार-गाजरघास जैसा है,

जला डालो, नहीं तो कोई खामी लौट आएगी।


भला किस काम के लंगर, नहीं यदि काम हाथों को,

समस्या भूख की ये है मुकामी, लौट आएगी।


सियासत हो रही हर दर्द पर, जज्बात मंडी में,

नहीं विश्वास होता, ऋतु अवामी लौट आएगी।


नहीं रोके गये यदि, जाति-भाषा-धर्म के झगड़े,

कोई बर्तानिया नामी गिरामी, लौट आएगी।


अँधेरों में ‘विकल', गुमनाम हो सकता है कुछ दिन को,

मगर उम्मीद, इक दिन नेकनामी लौट आएगी।


०००

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