भयानक मौत // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी


रात के तीन बजे थे पर फायरिंग अभी तक बंद नहीं हुई थी। रह रहकर अचानक फायरिंग की आवाजें आ रही थीं। ज़ीनब दो वर्षों के बेटे के साथ खाट पर लेटी हुई थी और बाजू में दूसरी खाट पर कामिल लेटा हुआ था। वह रह रहकर करवट बदल रहा था।

‘‘जाग रहे हो क्या?’’ ज़ीनब ने आधी नींद में कहा।

‘‘हां। तुम्हें भी नींद नहीं आ रही क्या?’’

‘‘मौत के मुंह में किसे नींद आएगी,’’ ज़ीनब ने आधी नींद में कहा। वह डर गई कि कहीं उसकी आवाज कमरे से, घर से बाहर न निकल जाए और गोली उस आवाज को पकड़कर अंदर न चली आए।

‘‘वेलीम जो लाकर दीं थीं, वे नहीं खाईं क्या?’’ कामिल ने पूछा।

‘‘दो खाई थीं। सर भारी हो गया है, लेकिन नींद नहीं आ रही है।’’

कामिल ने कुछ नहीं कहा। मौत का डर नींद की गोलियों से ज्यादा ताकतवर है। पूरी शीशी खाने से भी कुछ नहीं होगा, उसने सोचा।

‘‘पड़ोस में जो दो तीन सिंधियों के घर थे, वे सब पलायन कर गए हैं, बाकी हम जाकर बचे हैं। आप पड़ोस के मुहाजिरों की लड़की आई थी। उसने कहा कि खतरा है। आप भी पलायन कर जाएं,’’ ज़ीनब ने कहा।

‘‘तुम्हारा क्या विचार है कि वह हमदर्दी के तौर पर तुम्हें बताने आई थी। उसे डराकर भेजा गया होगा तुम्हें डराने के लिए,’’ कामिल क्रोध से खाट से उठ बैठा।

‘‘नहीं नहीं, ऐसा कैसे होगा,’’ ज़ीनब ने अविश्वास के साथ कहा। ‘‘मैं तो इस घर में अभी आई हूं। लेकिन ये चालीस वर्षों से आपके साथ पड़ोस में रहते हैं। रिश्तेदारों जैसा एक दूसरे में उठना बैठना है। ऐसा कैसे करेंगे...’’

‘‘खुद चाहे कुछ न करें, लेकिन औरों को छोड़ेंगे,’’ कामिल ने कहा। ‘‘उनकी आंख हमारे घर की ओर है।’’

‘‘तुम्हें कैसे पता चला?’’ ज़ीनब ने आश्चर्य से पूछा।

‘‘लड़की के बाप ने मुझसे बात की है। उसने भी वही लड़की वाली बात कही है कि यहां रहना हमारे लिए खतरे से खाली नहीं। उसने यह भी कहा कि अगर मैं घर बेचूं तो वह लेने के लिए तैयार है।’’

‘‘फिर? तुमने क्या कहा?’’

‘‘मैंने कहा कि मेरे घर की कीमत इस वक्त चार लाख रुपए है। लेकिन वह डेढ़ लाख से ज्यादा देने के लिए तैयार नहीं।’’

‘‘हुं...’’’ ज़ीनब सोच में पड़ गई। ठ ठ ठ ठा ठा... कहीं करीब से फायरिंग की आवाज हुई। ज़ीनब उठकर कामिल के खाट के आगे आ बैठी। कामिल का हाथ अपने हाथ में लिया। ज़ीनब का हाथ बर्फ की तरह ठंडा था। कामिल ने उसके माथे पर हाथ रखा। ज़ीनब के माथे पर पसीने का गीलापन था।

‘‘क्या बात है?’’ कामिल ने हाथ से ज़ीनब के माथे से पसीना पोंछते कहा, ‘‘डर रही हो? लेट जाओ।’’

‘‘तुम्हें डर नहीं लग रहा?’’ ज़ीनब उसके बाजू में लेट गई। कामिल ने कोई उत्तर नहीं दिया, लेकिन उसने दिल में कहा : हां, मैं भी डर रहा हूं... वह ज़ीनब के बालों में उँगलियां फिराने लगा।

‘‘पता नहीं कितनी रातों से नींद नहीं आई है। कर्फ्यू में भी डर था। कर्फ्यू होते हुए भी मुहाजिरों ने सिंधियों के घर पर हमले किए हैं। अब तो कर्फ्यू भी उतर गया है। उल्टे ज्यादा डर है। पूरी रात फायरिंग सुनकर ऐसा लग रहा है जैसे कि अपने घर पर हमला हुआ है।’’

‘‘फिर क्या करें? और कोई रास्ता भी तो नहीं। जिन सिंधियों के घर उनके गाँव में भी हैं, वे तो दंगा शुरू होते ही अपने गाँवों की ओर चले जाते हैं। हमारा तो किसी गाँव से संबंध नहीं है। दादा परदादा हैदराबाद के थे। क्या पता था कि अपने ही दादा परदादा के शहर में, अपने ही घर में जान की खैर नहीं रहेगी।’’

‘‘मेरी सलाह है कि घर बेचकर कहीं सिंधियों के मोहल्ले में जाकर रहें।’’

‘‘औने पौने दाम में अपना पुश्तैनी घर बेचकर सिंधियों के मोहल्ले में जाकर रहें।’’ कामिल ने चिढ़कर कहा।

‘‘जान से ज्यादा घर है क्या! खुदा खैर करे, कल को घर में घुसकर मारें तो फिर घर किस काम आएगा।’’ ज़ीनब ने अंधेरे में कामिल की शक्ल देखने की कोशिश की।

कामिल ने एक लंबी सांस ली। उसे लगा कि ज़ीनब की बात सच थी। दोनों जिस बात को होंठों तक लाने से कतरा रहे थे, उससे कामिल अनजान नहीं था। उन्हें अपनी जान से ज्यादा छोटे लड़के की चिंता थी।

‘‘अच्छा ठीक है, कल कासिमाबाद के पास जाकर जांच करता हूं। जगह लेकर फिर पड़ोस को ही घर बेचकर चलेंगे। और लोग तो अब इतने पैसे भी नहीं देंगे।’’

ज़ीनब ने शांति से सांस ली और कामिल के गले लग गई।

कासिमाबाद में प्रापर्टी डीलरों से पूछताछ करने पर कामिल को पता चला कि जगहों के भाव आसमान चढ़ गये थे। लतीफाबाद और हैदराबाद में मुहाजिरों के मोहल्ले में रहने वाले सिंधी पलायन कर इस ओर आने लगे थे। इसलिए प्लॉट और जगहें महंगी हो गई थीं। किराये भी बढ़ गये थे। कामिल का परिवार बड़ा नहीं था। इसलिए उसका काम छोटे घर से भी चल जाता। एक मित्र ने कामिल को बताया कि सिंधी मुस्लिम हाऊसिंग सोसायटी में एक रिटायर्ड तपेदार हाजी साहब का घर है। उसका लड़का सऊदी अरब में डॉक्टर है। खुद केवल अपनी पत्नी के साथ निचले हिस्से में रहता है। घर का ऊपरी हिस्सा खाली है, जिसमें दो बेडरूम हैं। किराया पंद्रह सौ रुपये महीना और एक साल का एडवांस लेगा। किराया ज्यादा था, लेकिन कामिल ने सोचा कि बात करने में कोई हर्ज नहीं था। हो सकता है उसकी मजबूरी देखकर एक सिंधी की हैसियत से हाजी साहब मान जाये।

शाम का वक्त था। घर के बाहर बने छोटे लॉन में कुछ कुर्सियां पड़ी थीं, जिन पर बड़ी उम्र वाले रिटायर्ड किस्म के बुजुर्ग बैठे थे। हाजी साहब ने कामिल को बिठाकर उससे हालचाल पूछा।

‘‘अब देखिये साहब, बेचारे सिंधियों को अपने दादा परदादाओं के घरों से कैसे पलायन करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। जैसे कि यह हैदराबाद दक्षिण हो। उनके बाप का शहर है, जहां सिंधियों को रहने का कोई अधिकार नहीं!’’ हाजी साहब की बात ने कामिल के दिल पर ठंडे छींटे मारे। अब हर सिंधी को अपनी लापरवाही का अहसास होने लगा था।

‘‘यही दर्द तो हम रो रहे हैं। तुम्हारे आने के बाद भी यही बात चल रही थी,’’ रिटायर्ड उस्ताद ने कामिल को कहा। ‘‘दुनिया के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं कि बाहर से आए लोगों ने असल बैठे लोगों को कैसे तबाह कर दिया। अमेरिका में रेड इंडियन का उदाहरण है।’’

‘‘ये कालोनाईजेशन के पुराने उदाहरण हैं। आप वर्तमान दौर की राजनैतिक चालों को समझने की कोशिश कीजिए,’’ दूसरे दानशूर प्रकार के रिटायर्ड बुजुर्ग ने कहा। ‘‘एम.क्यू.एम. की दहशतगर्दी उसी रास्ते बढ़ रही है जिस रास्ते पर हिटलर की नाजी हलचल उभरी थी। हिटलर ने जर्मनों में सताये लोगों का अहसास पैदा करके, नस्लभेदी भावुक नारे देकर क्रोधित कर दिया। उसी प्रकार के नाजी दहशतगर्दियों जैसे तरीके यहां पर आजमाये जा रहे हैं। नाजियों ने यहूदियों की संपत्ति लूटकर, घर और दुकान जलाकर, हत्याएं करके उनको देश से ही निकालकर बाहर कर दिया। वही हाल सिंधियों का भी किया जा रहा है।’’

‘‘हमें धकेलकर कहां भेजेंगे,’’ हाजी साहब ने पूछा। ‘‘हमें तो न हिन्दुस्तान कबूल करेगा, न अफगानिस्तान और न ही ईरान।’’

‘‘आप क्या समझते हैं कि मुहाजिर सिंध के बड़े शहरों में ये दंगा फसाद बेकार कर रहे हैं? रास्ते से जाते बेगुनाह सिंधी लोगों को बेवजह मार रहे हैं?’’ दानशूर टाईप बुजुर्ग हाजी साहब की बात को अनसुना कर कहता रहा। ‘‘यह सब सोची-समझी साजिश के तहत हो रहा है। एम.क्यू.एम. वालों की यह प्लॉनिंग है कि सिंधियों को बड़े शहरों से लूटमार कर भगा दिया जाए। इस प्रकार प्रतिक्रिया स्वरूप छोटे शहरों से मुहाजिर भागने को मजबूर होंगे। यह झगड़ा जितना ज्यादा बढ़ेगा उतना एम.क्यू.एम. की प्लॉनिंग को फायदा पहुंचेगा। आखिर एक दिन वे साफ तौर पर नारा लगाकर मुहाजरिस्तान बनाने का दावा पेश करेंगे और सिंध को दो भागों में बांटने की कोशिश करेंगे।

‘‘हां साहब, तंग आ गये हैं इन समस्याओं से,’’ हाजी साहब ने ठंडी सांस लेकर कहा।

‘‘लेकिन साहब माफ करना, ये समस्याएं हमारे बड़ों ने ही हमारे गले में डाली हैं। हिन्दुओं को सिंध से निकालकर परायों को दावत देकर यहां किसने बुलाया? कहते थे : हमारे मुसलमान भाई हैं। कराची, हैदराबाद और कई अन्य बड़े शहर हमने खुद उनको तोहफे के तौर पर पेश किए हैं। उनका किया सिंध की वर्तमान जाति भुगत रही है,’’ कामिल ने कहा।

‘‘मियाँ साहब, आपकी उम्र कितनी है?’’ रिटायर्ड उस्ता ने कामिल से पूछा।

‘‘तीस वर्ष,’’ कामिल ने उत्तर दिया।

‘‘फिर आपको उस जमाने का क्या पता। हिन्दू अगर हम पर ज्यादतियां न करते, तो हमको क्या कुत्ते ने काटा था जो हम उनसे परेशान हों। वे खुद को उच्च कोटि का समझते थे। उन्होंने जो जुल्म किए, उसका आप नौजवानों को पता ही नहीं है,’’ रिटायर्ड उस्ताद ने क्रोधित होकर कहा।

‘‘आपकी बात सही होगी, लेकिन हिन्दू दंगाईयों ने टोले बनाकर सिंधी मुसलमानों के घरों में घुसकर उनको बेइज्जत कर लूटमार नहीं की थी। उन्होंने राह चलते बेगुनाह लोगों को गोलियों से नहीं भूना होग... अगर सिंधी हिन्दुओं की नजर में सिंधी मुसलमान मूर्ख थे तो अब मुहाजिरों की नजर में हम जंगली, अधर्मी और जाहिल हैं। हमें क्या फर्क पड़ा। उल्टा एक परायी भाषा और परायी जाति हम पर थोपी गई...’’ कामिल को जोश आ गया था।

‘‘हां जवान, सच कहते हो। आँखों पर पट्टी बांधकर खाही में जा गिरे। मुहाजिरों ने तो जैसे हमें जीत लिया है। बस यार, सिंधी मुसलमानों की किस्मत ही फूटी हुई है,’’ हाजी साहब ने कामिल की बातों का समर्थन करते हुए कहा।

‘‘नहीं हाजी साहब, किस्मत की बात नहीं। हमारी खुद की कमजोरियां हैं,’’ दानशूर प्रकार के रिटायर्ड बुजुर्ग ने कहा। हम सिंधियों में देश प्रेम पूरी तरह से पैदा नहीं हो पाया है। हम में राजनैतिक सोच की कमी है। हर सिंधी में उलट सोच और अमल है। समाचार पत्र उठाकर पढ़ो। सिंधी एक दूसरे की कितनी हत्याएं करते हैं। ज़ाती दुश्मनी में घर के घर नष्ट कर देते हैं। मामूली पानी के झगड़े पर, गर्दनें काट देते हैं। सिंधी डाकू रोज कितने सिंधियों को ले जाते हैं। दूसरी ओर सिंध की राजनीति को देखो। अल्ताफ चंद ने वर्षों के अंदर सभी मुहाजिरों को एक प्लेटफॉर्म पर इकठ्ठा करके एक मजबूत दल बना डाला है। सिंधी नेता कई वर्षों से केवल बातें करते आए हैं। काम कौन-सा किया है? हर कोई इक्का-दुक्का लोगों के दल बना बैठा है। लगभग सौ दल और पार्टियां हैं। जब तक सिंधी नेता अपने ‘अहं’ को त्यागकर एक प्लेटफार्म पर इकट्ठे नहीं होते, तब तक कुछ नहीं होगा। सिंधी व्यक्ति ऐसे ही मरवाया जाएगा और सिंधियों को शहर से धकेलकर निकालने की चाल कामयाब हो जाएगी।’’

वायुमंडल में उदासी छा गई। लग रहा था कि किसी को भी बात करने का मन नहीं हो रहा था।

‘‘अच्छा यार, अब चलते हैं,’’ रिटायर्ड उस्ताद और बुजुर्ग उठ कर खड़े हो गए। दोनों से विदा लेकर हाजी साहब ने बैठते कामिल से पूछा, ‘‘आप क्या करते हैं?’’

‘‘कॉलेज में लेक्चरार हूं।’’

‘‘ठीक है जवान, तुम्हारा खुद का ही घर है। भले यहां आकर रहो। ऐसे मुश्किल वक्त में हम सिंधी एक दूसरे के काम नहीं आएंगे तो और कौन आएगा।’’

‘‘शुक्रिया साहब,’’ कामिल ने गहराई से शुक्रिया अदा करते कहा। लेकिन एक विनती है। किराया कुछ ज्यादा है। मेरी पगार तीन हजार रुपए है। अगर आधी पगार किराये में चली गई तो फिर गुजर बसर मुश्किल हो जाएगा। दूसरी सच बात मैं आपको बताता हूं कि मेरे पास इस वक्त कुल रकम इतनी है जो उसमें से मैं एडवांस के आधे पैसे ही दे पाऊंगा। हां, बाकी जैसे ही मेरी जगह बिक जाएगी तो बाकी पैसे दे दूंगा।’’

हाजी साहब सोच में पड़ गया। ‘‘ठीक है, फिर तुम ही बताओ कि तुम कितना किराया दे पाओगे?’’

‘‘साहब, आठ सौ रुपए लें तो मेहरबानी होगी,’’ कामिल ने नम्र बनकर कहा।

‘‘आठ सौ रुपए!’’ हाजी साहब से ठहाका निकल गया।

‘‘ये तो बहुत कम हैं, भाई इतना नुकसान तो नहीं दो।’’

‘‘नहीं हाजी साहब, भगवान न करे, मैं आपको नुकसान क्यों दूंगा। मैंने अपनी मजबूरी आपके सामने रखी है। अगर मेहरबानी कर सकें तो...’’

‘‘हुं...’’ हाजी साहब फिर से सोच में पड़ गया। ‘‘बच्चे कितने हैं?’’

‘‘अभी एक ही लड़का है दो वर्ष का। सच पूछिए तो हमें खुद से ज्यादा इसकी चिंता है। मेरी पत्नी पता नहीं कितनी रातों से डर की वजह से सोयी नहीं है।’’

‘‘ठीक है, मैं ज्यादा से ज्यादा तीन सौ रुपए छोड़ सकता हूं। आखिरी बात बारह सौ रुपए। बाकी आधा एडवांस देकर चाहे तो कल ही चाबी ले लो। तुम पर विश्वास है।’’

कामिल ने सोचा कि ज्यादा बोलना बेकार है।

‘‘ठीक है, साहब आपका फैसला सर आंखों पर, अब जगह दिखाने की कृपा करेंगे।’’

हाजी साहब सीढ़ी का द्वार खोलकर कामिल को ऊपर ले गया। जगह ठीक थी और कामिल की आवश्यकताओं के लिए ठीक थी।

‘‘फिर साहब, मैं कल एडवांस की रकम देकर चाबी ले जाऊंगा,’’ कामिल ने हाजी साहब से विदा लेते कहा।

कामिल ने घर आकर जब यह खुशखबरी ज़ीनब को बताई, तो उसे ऐसे लगा जैसे ज़ीनब के मुंह पर आए परेशानियों और डर के काले बादल बिखर गये हैं। ज़ीनब की डरावनी आंखों में चमक आ गई। इन्सान उम्मीद के आश्वासन से भी जी उठता है, यह बात पहली बार कामिल को महसूस हुई।

‘‘घर कैसा है भला?’’ ज़ीनब ने पूछा।

‘‘अच्छा है। अपना गुजर बसर आसानी से हो जाएगा।’’

‘‘किराया ज्यादा तो नहीं?’’

‘‘है तो ज्यादा। पहले उन्होंने 1500 रुपए मांगे थे, लेकिन बाद में आखिर 1200 रुपयों पर राजी हो गये। हाजी साहब अच्छे इन्सान हैं। बहुत हमदर्दी दिखाई। अब सिंधियों को एक दूसरे का अहसास हुआ है।’’

‘‘खुदा सिंधियों को समझ दे कि आपस में एकता में रहें, नहीं तो ये मुए हमें जीने ही नहीं देंगे,’’ ज़ीनब ने कहा।

दूसरे दिन कामिल किराये के पैसे लेकर हाजी साहब के घर आया। पचास वर्ष की एक औरत बाहर निकली।

‘‘माँ जी, हाजी साहब घर पर हैं?’’ कामिल ने पूछा।

‘‘हाजी साहब की तबियत ठीक नहीं। सोया है। काम हो तो बताओ,’’ औरत ने उसे घूरकर देखते कहा।

‘‘मैं कल हाजी साहब से मिला था। ऊपरी कमरे किराये पर लेने के लिए बात की थी। किराये के पैसे ले आया हूं। आपको हाजी साहब ने बताया होगा। हाजी साहब को तकलीफ न दें, आराम करने दें। अगर आप मुझे चाबी दें तो कल सामान लेकर आऊं। हमें वहां से जल्दी शिफ्ट होना है।’’

‘‘मैं हाजी साहब की पत्नी हूं,’’ औरत ने पहली बार अपना परिचय दिया। उसने मुझसे बात की है। आज सुबह कुछ और ग्राहक आये थे। वे 1500 रुपये किराया और एक वर्ष का एडवांस देने के लिए तैयार हैं। लेकिन हाजी साहब ने उनको जवाब दे दिया क्योंकि आपसे वायदा कर लिया था। अब आपकी मर्जी है, अब 1500 रुपए दे पाओ तो चाबी ले जाओ...’’ औरत हाजी साहब से ज्यादा कंजूस थी।

‘‘लेकिन माँ जी, हाजी साहब तो मुझसे 1200 रुपयों पर बात पक्की कर चुका है और इससे ज्यादा किराया देना मेरे बस की बात नहीं है,’’ कामिल ने नम्रता से कहा।

‘‘वह तुम्हारी मर्जी है, कोई जबरदस्ती नहीं...’’ उसने इंकार करते पैर दरवाजे के अंदर रखा।

‘‘मेरी बात तो सुनिए। हाजी साहब को पता है कि मैं सख्त मजबूर हूं। आखिर आपस में सिंधी हैं, आप हमारी मजबूरी नहीं समझेंगे तो और कौन समझेगा। मेहरबानी कीजिए...’’

कामिल ने नम्रता से कहकर औरत को अंदर जाने से रोका।

‘‘सिंधी हैं इसलिए खुद को नुकसान पहुचाएं!’’ औरत ने अंदर जाकर दरवाजा बंद कर दिया।

कामिल आश्चर्य से बंद दरवाजे को ताकता रहा। उसमें चलने की शक्ति नहीं थी, फिर भी वह घिसटता वहां से रवाना हुआ। चलता हुआ वहदत कॉलोनी से गुजरकर, चौक पर आकर बैठ गया। उसकी टांगें जवाब दे चुकी थीं।

‘ ये मेरे बाप दादाओं का शहर है, जहां से जान बचाकर भाग निकलने के लिए कोशिश कर रहा हूं और पनाह के लिए दर दर भटक रहा हूं।’ उसे विचार आया। वह अचानक उठ खड़ा हुआ। ‘मुझे अपने घर जाना चाहिए, ज़ीनब इंतजार करती होगी और परेशान होगी।’ वह शहर जाती सुज़ूकी में चढ़ पड़ा।

कामिल जब घर पहुंचा तो ज़ीनब वाकई परेशान थी। ‘‘क्या हुआ? इतनी देर क्यों हुई?’’

‘‘कोई खास बात नहीं। तुम परेशान न हो, सब ठीक है।’’ वह खाट पर बैठकर बूट उतारने लगा।

‘‘घर की चाबी लेकर आए?’’

‘‘नहीं। हमें कहीं नहीं चलना है। हम यहीं रहेंगे इसी घर में। जिस घर में मेरे सभी बड़े पिताजी और माँ मर गये, उस घर में खुद मरने से क्यों डर रहे हैं! आज से दिमाग से डर निकाल दो, कोई फिक्र मत कर।’’ कामिल खाट पर लेट गया और सिगरेट जलाकर आराम से कश लगाने लगा।

lll

0 टिप्पणी "भयानक मौत // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.