संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 11 - काश ऐसा न होता // सुशील शर्मा



प्रविष्टि क्र.  11 - 
काश ऐसा न होता 
 सुशील शर्मा

बात उन दिनों की है जब मैं अपने गांव से पांचवीं कक्षा पास कर कस्बे में अपने नाना जी के पास पढ़ाई करने के लिए आया था।

नानाजी बहुत मस्तमौला और बिंदास थे मुझे बहुत प्यार करते थे हमेशा मुझे अपने साथ घुमाने ले जाते थे अपनी पीठ पर बैठा कर बाजार मेला इत्यादि ले जाया करते थे।

मेरे नानाजी की आदत थी कि वो तम्बाखू खाया करते थे मेरा बाल मन हमेशा से उत्सुक रहा है मैंने उनसे पूछा “नानाजी आप ये क्या खाते है।” उस समय मुझे नहीं मालूम था कि इसे तम्बाखू कहते हैं।
“बेटा ये चेतन्य चूर्ण है लेकिन ये सिर्फ बड़े ही खाते है बच्चे नहीं”

नाना जी ने मेरी उत्सुकता शांत करने का प्रयास किया किन्तु उनकी इस बात से मेरी उत्सुकता और बढ़ गई।

नाना जी की आदत थी कि वो भैसों को दुह कर दूध निकाल कर स्वयं चाय बनाते थे और जब तक पेट नही भरता था तब तक चाय पीते थे करीब 8 से 10 कप शुद्ध भैंस के दूध की गाढ़ी चाय मुझे भी पिलाते थे।

जब वो चाय बना रहे थे सुबह मैंने मौका ताड़ कर उनकी तम्बाखू की डिबिया से गद्दी भर कर तम्बाखू निकाली और फांक ली।

एक मिनिट बाद मुझे चक्कर और उल्टियां होने लगी मैं जोर-जोर से रोने लगा नानी मामा मौसी नाना जी सब इकठ्ठे हो गए गांव में बैद्य जी को बुलाया बड़ी मुश्किल से उल्टी करा कर मेरी तम्बाखू पेट से निकाली गई। कई दिनों तक मैं बीमार रहा बहुत मुश्किल से स्वस्थ हो सका।

काश मैं वो तम्बाखू न खाता।

नानाजी अपने तकिये के नीचे पैसों की थैली रखते थे एक दिन मेरे मन में लालच आ गया और उनकी थैली से मैंने पच्चीस रुपये निकाल लिए और बगीचे में गढ्ढा खोद कर उनको गड़ा दिया। नाना जी बहुत आग बबूला थे घर भर पैसों की खोज शुरू हो गई घर भर छान मारा लेकिन पैसे नहीं मिले मिलते भी कैसे वो तो मैंने बगीचे में गाड़ दिए थे।

नानाजी बहुत परेशान थे उन्हें उन पैसों से खेत के लिए बीज खरीदना था बहुत रुआंसे से थे। मेरी स्थिति एक अपराधी सी थी हालांकि कोई मुझ पर शक नहीं कर रहा था। आखिर न जाने क्यों मुझ से नाना जी की स्थिति देखी नहीं गई मैं रोता हुआ उनसे लिपट गया।


“नाना जी पैसे मैंने लिए है” मैंने रोते हुए कहा।
“तूने” नानाजी को विश्वास नहीं हुआ।
“हाँ मैंने आपकी थैली से निकाले हैं” मैंने सुबकते हुए कहा।
“कहाँ है पैसे” मामा ने मुझे चांटे लगाते हुए कहा।
“वहां बगीचे में मैंने गाड़े हैं” मैंने नानाजी से लिपटते हुए कहा।

सब लोग बगीचे में गये मैंने जहां पैसे छुपाये थे वहां पैसे नहीं थे किसी ने निकाल लिए थे। शायद किसी ने मुझे छुपाते हुए देख लिया था।

नाना जी समझ गए उन्होंने मुझे चुप कराया बोले “मुझे तुम पर गर्व है कि तुमने अपनी गलती मान ली गलती करके स्वीकार करने की ये बात तुम्हें बहुत आगे ले जाएगी”

“नहीं नाना जी आप मुझे मारिये मैंने चोरी की है” मैंने सुबकते हुए कहा।

“नहीं बेटा मेरी गलती थी कि थैली मैंने खुले में रखी थी”
नाना जी ने मुझे पुचकारते हुए कहा।
उस साल नाना जी खेत में बीज नहीं बो पाए।

मेरे मन में हमेशा ये अपराध बोध बना रहा कि मेरे कारण नाना जी को कष्ट हुआ।
काश मैंने वो पच्चीस रुपये न चुराए होते।

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