कहानी // फरिश्ता // रामानुज श्रीवास्तव 'अनुज'


जब ऑटो रिक्शे से वह अपनी बीमार माँ को अस्पताल लेकर पहुँची उस समय रात के दो बजे थे। ये लोग मोहल्ले में अभी नये-नये आये थे, इसलिये किसी से ज्यादा जान पहचान नहीँ थी। भला हो छोटी के ऑटो रिक्शा चालक कुंदन का जो फोन पाते ही दौड़ा चला आया था।

मदद के लिए शुभा ने सभी बंद दरवाज़ों को पीटा था, लेकिन कौन सुनता है.... ठंड के दिनों में वो भी रात को.... आजकल आदमी अपना कान पहले सुलाता है....बाद में बिस्तर लगाता है.... बेचारे पड़ोसी भी अपनी जगह सही होते है....दिन भर के थके मांदे घर आये....तो क्या करें कौन चाहेगा बाहर निकल कर चौकीदारी करे .. वैसे भी अकेली औरत जात लड़कियों को पढ़ाने ही तो आयी है.....इससे अपना क्या लेना देना। ..जून जमाना ठीक नहीं है घर में कोई मर्द होता तो एक बार जाने की सोचते....लेकिन इधर तो....न न रात में दरवाज़ा खोलना उचित नहीं... सुबह बात आयेगी तो कह देंगे ....भई !! सुना नहीं। अरे ये सब कुछ देखना मकान मालिक का काम है....किराये की रकम के साथ और भी चीजें है....शायद इन्हीं झंझटों से दूर अलग घर में रहता है।

कौशिल्या देवी को मौजूद ड्यूटी डॉक्टर देखते ही एडमिट कर लिया था...और उन्हें कुछ दवाइयां और इंजेक्शन दिया था, ...छोटी बहुत वाचाल है...किसी से बोलने में उसे रत्ती भर संकोच नहीं होता है... उसने डॉक्टर से पूछा था....

"डॉक्टर अंकल माँ को क्या हो गया है?"

"कुछ नहीं !! चिंता मत करो.....दो तीन दिन में ठीक हो जायेंगीं।" हाँ !! इन्हें सोने देना और ये ड्रिप चढ़ी है इसकी बूँद देखते रहना...जब खत्म होने लगे तो नर्स से बोलकर निकलवा देना। ओके !!"

डॉक्टर इतना बोलकर चला गया था।

अभी छोटी है भी कितनी छोटी.... नौ साल की तो है.... इसी जुलाई महीने में हम दोनों बहनों का शहर के स्कूलों में एडमीशन दिलाकर पापा गये हैं। पापा कहते थे गाँव में अब आगे की पढ़ाई का स्कूल नहीं है, आगे की पढ़ाई करने सुभा को तो शहर भेजना ही पड़ेगा...इसलिये सब लोग शहर में किराये का कमरा लेकर रहें...लडकियां वहीँ से पढ़ाई लिखाई करे तो बेहतर होगा। माँ शहर आने से डर रही थी...क्या करे बेचारी शहर में कभी रही नहीं...गांव देहात के खेत पेड़ के अलावा बेचारी कुछ जानती भी नहीं....अभी परसो ही तो टी.बी.में रेल गाड़ी देख बोली थी...

"शुभा रेल में अभी तक नहीं बैठी हूँ....कितनी बड़ी होती है?"

"बहुत बड़ी"....मैंने हँसते हुए कहा था।

"पापा जी से इस बार बोलेंगे की हम सब को रेलगाड़ी में घुमाने ले चले....दूर... बहुत दूर" छोटी आँख मटकाते हुए बोली थी।

"अरे नहीं !! ये सब मत कहना...अभी उमर थोड़ी निकल गई है....फिर कभी रेल में घूम लेंगे।" फिर इस टी.बी. नाम के डिब्बे में तो सब कुछ भरा है...शेर चीता, भालू बन्दर, से लेकर हवाई जहाज तक...सब इसी में देख लो...उनसे कुछ मत कहना।

"वैसे भी तीन रोज की गली नापकर थके मांदे घर आते है...और भी तो कई जरूरी काम रहते है।"

छोटी को टोकते हुए माँ हंसते हुए बोली थी।

"सुभा बिटिया तुम छोटी के साथ कम्बल ओढ़कर लेट जाओ....छोटी अलसा रही है।" मैं बोतल देख लूँगा।" कुंदन की आवाज सुनकर सुभा के विचार स्वप्न टूट गये। "चाचा !! आप घर जाओ...सुबह सबेरे बच्चों को स्कूल छोड़ना होगा"....सुभा बोली। "ऐसे कैसे घर जायें".....मेरी फ़िक्र छोड़ो....सब देख लूँगा".....कुंदन बोला।

" आपके पास मोबाइल है चाचा !!...पापा को खबर कर दें...मेरा तो घर में ही जल्दी जल्दी में छूट गया।"

हाँ...है तो...नम्बर बोलो.....पेंट  की जेब से मोबाइल निकालता हुआ कुंदन बोला।

कुंदन फोन मिलाकर सुभा के हाथों में देकर बोला... 'लो बात करो।"

"हलो पापा !! सुभा बोल रही हूँ... माँ की तबियत अचानक ज्यादा खराब हो गई है..कुंदन चाचा के ऑटो से अस्पताल लाई हूँ... डॉक्टर भर्ती कर लिये हैं।"

'अरे बेटा !! क्या हुआ माँ को...मै तो भली चंगी छोड़कर आया था?? हलो.. हलो..सुभा बेटा जल्दी बता न...क्या हुआ ??...घबराओ नहीं मैं अभी निकलने की कोशिश करता हूँ... हलो... हलो .....बोलती क्यों नहीं बेटा.... कुंदन चाचा को फोन दो।"

"जगत भाई घबराओ नहीं...कुछ नहीं हुआ है....रात में भाभी बाथ रूम जाते समय फिसल गई थी...बेहोश हो गई हैं... कुंदन ने दिलासा दिया।"

"अब कैसी तबीयत है??"...जगत ने पुनः पूछा।

"ठीक है...डॉक्टर ने दवा दी है...सो रहीँ है...डॉक्टर बोला है... दो तीन दिन में बिलकुल ठीक हो जाएंगी....आप चिंता न करना... आपके आने तक मैं यहीँ रहूँगा।" बात पूरी नहीं हो पाई थी की नर्स कुंदन के हाथ से मोबाइल छीनती हुई बोली... "अरे चुप कर.....ये अस्पताल है तुम्हारा घर नहीं है.....इधर फोन करना अलाउ नहीं है, और मरीज भी हैं... नींद डिस्टर्ब होता है.... फोन ऑफ़ करो...नहीं तो अभी निकाल बाहर करूंगी।" नर्स कुंदन को डाँटती हुई अपने कक्ष की ओर चली गई।

जगत और कुंदन आठवीं तक साथ-साथ पढ़े हैं... इस लिहाज से दोनों एक दूसरे पर बहुत भरोसा करते है। तभी वही डॉक्टर आता दिखाई दिया जिसने कौशिल्या को एडमिट किया था...आकर के वह हाथ में लगी ड्रिप अलग कर देता है.....बोतल में थोड़ी सी दवा और बची थी। डॉक्टर कुंदन की ओर देखकर पूछा...

"कहाँ से आये हो, आप लोग??

"साब हम लोग गाँव के हैं....मैं ऑटो रिक्शा चलाता हूं...और ये किराये के घर लेकर इधर शहर में रहती है।"...कौशिल्या देवी की ओर इशारा करते हुए कुंदन ने बताया।

"साथ में और कोई है?"..डॉक्टर ने पुनः पूछा।

"नहीं साब !! बस मैं हूँ और ये दोनों लडकियां।"

'इसके फादर कहाँ है?"

"पापा आर्मी में हैं...श्रीनगर पोस्टिंग है।,"..इस बार सुभा ने जबाब दिया।

"उनको बता दिया"

"जी" !!

डॉक्टर ने एक नज़र सुभा के उदास और मुरझाये हुए चेहरे की तरफ डाली , फिर तुरन्त ही कौशिल्या देवी को ओर देखने लगा...शायद सहृदय डॉक्टर की आँखों में शुभा के गोरे मुखड़े में ढरक कर सूख गये आँसुओं को देखने की हिम्मत नहीं थी...वह मुड़कर नर्स की केबिन में चला गया।

" सर !! आप सोये नहीं।" नर्स कुर्सी से हड़बड़ाकर उठी और बोली।

"नींद नहीं आ रही।"

"नींद नहीं आ रही या दिमाग़ में कुछ और चल रहा है। कहीँ वो लड़की तो नहीं !!" नर्स मुस्कान में तंज घोलती हुई बोली।

" सिस्टर !! प्लीज़.. प्लीज़....आपको पता नहीं उस महिला की हालत क्रिटिकल है...जल्द से जल्द उचित इलाज की जरूरत है... ये बात...किससे कहूँ।...उन लोगो के साथ कोई सयाना है भी नहीं...जिसे सब बता सकें...उस ऑटो चालक से कहने में कोई फायदा नहीं और उस लड़की से बोलने की मेरी हिम्मत नहीं हैं।" डॉक्टर बोला।

"सॉरी सर !! मैं मजाक में बोल गई थी।" उसे हुआ क्या है?

"वो घर में फिसलकर गिर रही है....सर में अंदरुनी चोट लगने से बेहोश है...तत्काल जाँच से उसकी पोजीशन पता चलनी चाहिए...तभी सही इलाज हो पायेगा।" ज्यादा देरी से जान को खतरा हो सकता है।"

"मैडम से बताना चाहिए।"..नर्स से सुझाव दिया।

हाँ !! "मैं भी यही सोच रहा हूँ।

ड्यूटी में तैनात जूनियर डॉक्टर ने सारी जानकारी सीनियर डॉक्टर एवं इंचार्ज मधुलिका को फोन पर बता दी..... सुनते ही महिला डॉक्टर कोई मशवरा देने की बजाय नाराज होते हुए बोलीं.....

  " आप भी डॉक्टर बहुत इमोशनल होते हो.....उन्हें सही सही बता दो.....वे कही और ले जायें।"

"लेकिन मैडम हम एडमिशन दे चुके हैं।" डॉक्टर बोला।

"मुझसे बिना पूछे एडमिट कर लिया है तो आप खुद डिसीजन लो.....क्या करना है...क्या नहीं करना है। मुझसे मतलब नहीं।"

मैडम प्लीज !!

ओक्के !!  आई.सी.यू. में शिप्ट कर  देख लो...ज्यादा गम्भीर लगे तो रेफर कर देना। मॉर्निंग में आकर देख लूँगी.....ओके।"

"सर !! मेरी राय है कि पेसेंट को फौरन आय.सी.यू में लेकर आप स्वयं देखें...... कल दस बजे तक कोई आने वाला नहीँ हैं।" नर्स ने सुझाव दिया।

"सिस्टर हिम्मत नहीं हो रही...इतना बड़ा केस अकेले कैसे हैंडिल कर पाऊँगा.. समझ नहीँ आ रहा।"

आप अकेले नहीं है डॉक्टर !!  माँ बाप का आशीर्वाद साथ है और की छोड़िए जिसने हम सबको बनाया है.... वह भी आपके साथ है। हौसला कीजिये....कुछ गलत नहीं हो सकता।" तुम बहुत अच्छी हो....तुमने मुझे रास्ता दिखाया है....बहुत बहुत शुक्रिया.....मैं इस पेशेंट को मरने नहीं दूँगा....ये मेरा तुमसे वादा है। डॉक्टर आत्म विश्वास से बोला।

डॉक्टर कौशिल्या देवी के बेड के नज़दीक आकर देखा की छोटी बेटी कम्बल में लिपटी सो रही है, बड़ी बेटी माँ के सिरहाने बैठी हुई माँ को अपलक निहार रही है। डॉक्टर को देखते ही सुभा बेड से नीचे आ गई।

"इन्हें दूसरी जगह शिप्ट करना है।"..डॉक्टर बोला।

" का बात है साब !!" कुंदन ने पूछा।

"कोई खास नहीं ...साफ सुथरा कमरा है...जाँच की मशीनें है...सब सुविधाएं एक साथ हैं, दवा इलाज़ में सहूलियत रहेगी।" डॉक्टर बोला।

"आप कुछ छिपा रहे है सर...साफ बताइये न" .... गाल में ठहरे आँसुओं के दाग रुमाल से साफ करती हुई सुभा बोली।

"देखो बताना नहीं चाहता था...मै किसी भी हालत में तुम लोगों को और परेशान नहीं देखना चाहता था...लेकिन पूछ रही तो सुनो।"

"फर्स में गिरने से तुम्हारी माँ के सर में अंदरूनी चोट लगी है...हो सकता है खून का रिसाव हुआ हो...यही सब देखने के लिए आई.सी.यू भी रखना होगा।"

"अर्थात हालत गम्भीर है..ये सो नहीं रही है...बल्कि बेहोश है।" सुभा ने कहा।

डॉक्टर को चुप खड़े देख सुभा फिर बोली...."सर !!! चुप क्यों है....खुलकर कहें...  "मुझे कोई डर नहीं लगेगा.....मैं फौजी की बेटी हूँ......हर बात सुनने का हौसला मेरे में है।" सुभा रुआंसी होकर बोली।

"तुम सही बोल रही हो .....लेकिन मेरा आप सबसे वायदा है...ये बिल्कुल ठीक होकर घर जायेगी।"

कौशिल्या देवी को गहन चिकित्सा यूनिट में ले जाया जा चुका था...कुंदन और सुभा को बाहर बरामदे में रोक दिया गया था। लगभग एक घण्टे बाद डॉक्टर बाहर आया और कुन्दन के हाथ में पर्चा थमाकर बोला.....नीचे जाकर ये इंजेक्शन तुरन्त लेकर आओ।

कुन्दन जाने को तैयार हुआ ही था कि डॉक्टर ने पूछा...."इंजेक्शन महँगा आयेगा...पैसे कितने है पास में?"

"चिल्लर सहित मिलाकर चार सौ होंगे।"..कुंदन पेंट की जेब में हाथ डालते हुए बोला।

"मेरे पास भी है...कुल तीन हजार के लगभग...ये रख लो चाचा पास में.... दवा के पैसे चुकाने होगें।" पर्स खोलते हुए सुभा ने कहा।

"परेशान मत हो !! हम दुकानदार से बोले देते है..दवाएं बराबर देता रहे....जब तुम्हारे पापा आ जायेंगे....तब पैसे चुका देंगे।"...डॉक्टर ने कहा।

इंजेक्शन दवा ला दिए गये थे....उधर इलाज़ चल रहा था.. इधर प्रार्थनायें चल रहीँ थी।

मालूम नहीं चला कब भगवान भास्कर धरती में अवतरित होकर सूर्या विखेर चुके हैं। छोटी अभी भी बेखबर सो रही थी।  वह डॉक्टर भी न जाने कब आकर पास में खड़ा हो गया था। सुभा उसकी आवाज़ पहचान कर नेत्र खोलती है। वह कह रहा था.......

"भगवान का धन्यवाद बोलो !! कौशिल्या देवी खतरे से बाहर है....लेकिन अभी ठीक से होश नहीं आया है...आंखें खोलती बंद करतीं हैं...बॉडी में भी हरकत आ गई है। यह पॉज़िटिव रिस्पॉन्स है। तुम लोग उस ग्लास से उन्हें देख सकते हो...कुन्दन और सुभा दोनों डॉक्टर के साथ उन्हें देखने चले गये थे....... इसी बीच में किसी ने उनका बैग पार कर दिया ...जिसमें कुछ पहनने के कपडे भरे थे.......सुभा अपना पर्स बैग के ऊपर छोड़कर देखने गई थी.. वह भी नहीं था।

वापस लौटने पर बैग और ऊपर रखे पर्स को न पाकर सुभा कुन्दन चाचा से पूछती है.... चाचा !! "इधर बैग रखा था, अब नहीं है है, लगता है चोरी हो गया।"

दोनों बैग की तलाश में इधर उधर देख आते है...वहाँ बैठे लोगों से पूछते हैं ..लेकिन कोई पता नहीं चल सका। दुखी मन से सुभा पुनः सोयी हुई छोटी के पास आकर उदास मन से बैठ जाती है...तभी डॉक्टर आकर पूछता है...." क्या बात है? कुछ परेशान लग रही हो।" "जी !! कोई मेरा बैग और पर्स ले गया.....जब हम माँ को देखने ग्लास तक गये थे तभी।" "ओह !!  इधर तो ये सब आये दिन हो रहा है।'

'मुझे नहीँ पता था सर की अस्पताल में भी चोरी होती है...पहली बार तो अस्पताल देखी हूँ।" सुभा ने दुःख प्रकट करते हुए कहा।

"यहाँ क्या कुछ नहीं होता...सरकार का हॉस्पिटल है न।"...खैर जो हुआ सो हुआ मिलने वाला नहीं...चाहो तो पुलिस चौकी में रिपोर्ट डाल सकती हो।" पैसे की फ़िक्र मत करो सब मैनेज हो जायेगा।

आज से कौशिल्या देवी को अस्पताल आये पाँच दिन पूरे हो गये थे...सुभा के पापा भी आ गये थे...गाँव से भी कोई न कोई आ जा रहा था...रिश्तेदार भी आने लगे थे जिसको जैसे ही पता लग रहा था। 

आज सुबह की तो बात है मैडम राउंड में आईं थी...वे उस डॉक्टर से नाराज़गी जाहिर करते हुए बोली थी....

" अभय !! जब इस पेशेंट की हालत ठीक है तो जनरल वार्ड में रखो।"

"मैडम !!  बीच-बीच में इनकी  मेमोरी चली जाती है...तो उस समय चेक करना होता है।" डा. अभय ने कहा था।

"तो इसको अभी प्राइवेट वार्ड में शिप्ट करो...उनसे बोलो चार्ज पे करें.. नहीं तो छुट्टी करो।" जी !! मैम...डा. अभय इतना ही बोल पाये थे।

माँ को प्राइवेट वार्ड में रखा गया था.... लेकिन वह भी जरनल वार्ड से कुछ अलग नहीं था अस्पताल में पन्द्रह दिन हो गए थे...महँगी दवाइयां और कमरे का बिल भरते भरते पापा के पास की सब जमा पूंजी खत्म हो गई थी...कुन्दन चाचा भी कुछ रकम की व्यवस्था किये थे। वो भी खत्म हो गए थे। सन्तोष केवल इस बात का रहा की माँ की जिंदगी डा.अभय के कारण बच गई। नहीं तो....सुभा के ख्याल डा. अभय को आता देख रुक गये। नजदीक आकर वे बोले... " आज मैं बहुत खुश हूँ.. ईश्वर की मेहरबानी से माँ जी पूर्ण स्वस्थ होकर घर जाएंगी...ये लीजिये "छुट्टी की पर्ची और बेफिक्र होकर घर जाये...मेरी अगर कभी भी जरूरत समझे मुझे फोन कर देंगे...मैं हाज़िर हो जाऊँगा।"

हम लोग उनका धन्यवाद तक नहीं कर सके...मुँह से बोल नहीं फूटे.होंठ बस कांपते रहे. पापा तो रो पड़े थे ...दोनों हाथ जोड़े हुए।

आज हम लोग फिर कुन्दन चाचा के ऑटो रिक्शा में बैठकर वापस माँ को लेकर घर आ रहे थे...रास्ते भर में डा. अभय की चर्चा चलती रही...सोचते है कि फरिश्ते शायद ऐसे ही होते हैं...जो डा.अभय के रूप में यदा कदा मिल जाते हैं।

/समाप्त/

1 टिप्पणी "कहानी // फरिश्ता // रामानुज श्रीवास्तव 'अनुज'"

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