बाजियों में बाज़ी – पैंतरेबाज़ी डा. सुरेन्द्र वर्मा

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अपने अपने क्षेत्रों की कितनी कितनी ओर कैसी कैसी तो बाजियां हैं।

ताश-बाजी, शतरंज-बाज़ी, पतंग-बाज़ी

मुक्के-बाजी, तलवार-बाज़ी, पत्थर-बाज़ी

जुएं बाज़ी, सट्टेबाजी, नशे बाज़ी

इश्क-बाज़ी, यार-बाज़ी, गप्प-बाजी,

जुमले-बाज़ी, बयान-बाज़ी, बहाने-बाज़ी

चाल-बाज़ी, दगा-बाज़ी, धोखे-बाज़ी

बाज़ी करतब और तमाशा है; बाज़ी शर्त है और शौक है; बाज़ी दांव-पेंच है; खेल है। खेल खेल में तो लोग हारी बाज़ी जीतने के लिए जान की बाजी तक लगा देते हैं, पर बदकिस्मती देखिए, कभी जीती बाज़ी हार भी जाते हैं। वक्त वक्त की बात है।

महाराष्ट्र में बाजी नाम के कई लोग मिल जावेंगे। बाजीराव तो एक जाना-माना नाम है ही। लेकिन ज़रूरी नहीं बाजी नाम का हर आदमी बाजीगर भी हो। नाम में क्या रखा है ! हिन्दी सिनेमा में बाजी नाम से एकाधिक फ़िल्में भी तो बनी हैं। सफल रहीं हैं। गाने भी मशहूर हुए हैं।

कृपया जल्दबाज़ी न करें। बस मैं अपने विषय, ‘पैतरे-बाजी’ पर आ ही रहा हूँ। राजनैतिक गलियारों में इन दिनों पैंतरे-बाजी सुर्ख़ियों में है। यों पैतरे-बाज़ी सुर्ख़ियों में तो हमेशा से ही रही है। अखाड़ों में कुश्तियां जीतने के लिए तरह तरह के पैतरे सिखाए जाते हैं, और जीत के लिए पैतरे बदलने पड़ते हैं। जूडो-कराटे आदि, में भी कई किस्म के पैंतरे इस्तेमाल किए जाते हैं। जहां भी पक्ष और प्रतिपक्ष आमने सामने होता है, जीत के लिए पैंतरेबाजी के बिना काम नहीं चल सकता।

पैंतरा हर क्षेत्र में काम आने वाला एक रुख है, अंदाज़ है; कौशल और तरकीब है। हम जो भी पैंतरा अख्तियार करते हैं कभी सार्थक हो जाता है तो कभी चूक भी जाता है।

हमारे नेता लोग तो पैंतरे बदलने में माहिर हैं। चुनाव के वक्त तो उनकी पैंतरेबाजी देखते ही बनती है। वे झूठ को सच और सच को झूठ करके दिखा देते हैं। सरकारें तक कहती कुछ हैं और पैंतरा बदल कर करती कुछ और ही हैं। राजनैतिक परिदृश्य में पैंतरेबाजी के सर्वश्रेष्ठ नमूने हमें संसद में देखने को मिलते हैं। तीन तलाक के मुद्दे को ही लें। लोक सभा में तीन तलाक का विधेयक ध्वनि मत से पारित कर दिता गया। आशा थी कि अब यह राज्य सभा में भी पारित हो ही जाएगा। पर राज्य सभा में कांग्रेस की पैंतरे-बाज़ी से फिलहाल तो मामला लटक ही गया। अब देखना है कि सरकार विधेयक पास कराने के लिए कौन सा पैंतरा अपनाती है !

इधर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी दिलचस्प पैंतरेबाजी देखी जा सकती है। पाकिस्तान और चीन तो पैंतरेबाजी में उस्ताद हैं। वे जो भी कहते है बस वही नहीं करते।

हाल ही में कुलभूषण जाधव के सन्दर्भ में पाकिस्तान की पैतरे बाजी बस देखने लायक थी। कहाँ तो भारत में जाधव की पत्नी और उनकी माँ ने जाधव से मुलाकात का अपना दर्द साझा किया और कहाँ पाकिस्तान ने एक वीडियो जारी कर दिया। इस नए पैंतरे को इस्तेमाल करते हुए जाधव के मुंह से कहलाया गया कि उसकी सेहत देखकर जाधव की माँ बहुत प्रसन्न हुई। जहां तक पत्नी के डरे हुए होने का सवाल है तो इसमें तो भारत का ही हाथ है !

पाक बात सुलह की करता है और पैतरे आतंकवादी अपनाता है। आतंकवाद को ख़त्म करने का ऐलान करके वह प्रश्रय आतंकवाद को देता है। कश्मीर में शान्ति चाहता है और वहां के नौजवानों को पत्थरबाजी करने के लिए उकसाता है। पत्थरबाज़ी तो कश्मीर का राष्ट्रीय खेल ही होते होते बच गया।

अमेरिका का हमेशा से ही पाकिस्तान के प्रति एक दोस्ताना रवैया रहा है। लेकिन उसने भी आतंकियों के प्रति पाकिस्तान के सहयोगी रवैये से नाराज़ होकर अब अपना पैंतरा बदल दिया है। ट्रंप प्रशासन ने पाक को दी जाने वाली अधिकतर सुरक्षा मदद और सैन्य उपकरणों की आपूर्ति रोक दी है। देखना दिलचस्प होगा कि दोनों तरफ की यह पैंतरे- बाजी क्या रंग लाती है ?

राजनीति का खेल भी एक अजब खेल है। पैंतरेबाजी के बिना यहाँ काम नहीं चलता। यहाँ कोई स्थाई मित्र या स्थाई दुश्मन नहीं होता। पैतरा बदलते ही आज का दोस्त दुश्मन बन जाता है और दुश्मन दोस्त हो जाता है।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो.९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड,

इलाहाबाद – २११००१

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