हिन्दी साहित्य पढ़ने की ललक सुराबों तक ले आती है-देवी नागरानी

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सुराबों तक ले आने वाली शायरा

हिन्दी साहित्य पढ़ने की ललक सुराबों तक ले आती है-देवी नागरानी

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-साक्षात्कार -डॉ. सरिता मेहता

न्यूयार्क ! दोपहर का समय, मैं अपने ‘सिन्दूरी शाम’ प्रोग्राम के आयोजन में व्यस्त थी. फोन की घंटी बजी और आपकी मधुर आवाज़ सुनाई दी| और मेरी पहली मुलाकात उनसे उसी आयोजित कार्यक्रम में ११ नवंबर 2008 में हुई। श्री सत्यनारायण मंदिर, वुड साइड, न्यू यार्क में, विद्याधाम की ओर से आयोगित एक बहु-भाषी कवि-सम्मेलन था। पहली बार उस आयोजन में उन्होंने एक सिन्धी की ग़ज़ल अपने सुरमई आवाज़ में सुनाई, और साथ में उसका हिन्दी अनुवाद भी उसी लय में गाकर सुनाया, जिसकी प्रतिध्वनि आज भी यादों में माधुर्य भर देती है। तब से आज तक यह सिलसिला मिलने का, बातचीत करने का, सतत कायम है। आज छः बरस के बाद मुझे मौका मिला है उनसे बातचीत करने का, उनके अन्तर्मन को जानने का, उनके जीवन के उन क्षणों को तजुर्बात से रूबरू होने का, जो संघर्ष की राहों से होकर साहित्य के चौराहे तक उन्हें ले आए हैं। मन में कई सवाल मन में कुलबुला रहे हैं, छटपटा रहे हैं, अपने जवाब पाने के लिए! जी हाँ मैं शायरा देवी नागरानी जी से मुखातिब हुई हूँ। तो आइये देवी जी से रू-ब-रू होते हैं-और सुनते है उनकी कहानी उनकी जुबानी:

प्रश्न 1: जब अचानक आपको पहली बार न्यू-यार्क में आयोजित ‘सिंदूरी शाम’ के मंच में पर सम्मानित किया गया तो आप को कैसा लगा?

उत्तर 1: सरिता जी ११ नवंबर 2008 की शाम मेरी स्मृतियों में एक खुशनुमा यादगार शाम बनकर रह गई है। श्री सत्यनारायण मंदिर, में आपकी संस्था ‘विद्याधाम’ ने मुझे निमंत्रित किया जिसके लिए मैं आभारी हूँ। यह बहु-भाषी कवि सम्मेलन मेरे लिए विदेश की सरज़मीं पर एक नया मंच रहा जिसने मुझे बहुत अधिक रोमांचित किया क्योंकि इसमें बहू-भाषी पंजाबी, बंगाली, सिन्धी, अवधी और अंग्रेज़ी भाषा के कवियों ने भाग लिया और सोने पे सुहागा ही कहूँ जब आप ने मुझे सिन्धी एवं हिन्दी में पाठ करने का अवसर दिया। निर्देशिका के तौर पर आपने और मंदिर के मुख्य पंडित शास्त्री जगदीश त्रिपाठी जी के साथ मुझे ‘काव्य रतन’ स्मृति चिन्ह और शाल देकर सन्मान किया! मान सम्मान बहुत अच्छा लगता है, खुशी भी होती है, और साथ में एक जवाबदारी की भावना भी जुड़ जाती है। तब से आज तक जो लेखन मेरी पहचान बना है, उसे बनाए रखने की मर्यादा भी भावनाओं में शामिल होती हैं। उसके प्रति सजग व जागरूक रहकर और बेहतर लिख पाऊँ यही कोशिश करती हूँ। वही लिखूँ जिसका संबंध समाज से हो, उसमें पल रही कुनीतियों से हो...हाँ लिखने मात्र से बदलाव लाने की जागरूकता संचारित होने की संभावना बनी रहती है, सामाजिक प्राणी जो इन विषयों को पढ़ते है, अपने विचार अभिव्यक्त करते हैं, उससे चेतना का संचार होता है। ....यही तो है जागरूकता ...जहां जन-जनार्दन अपनी सोच के साथ सामने आए...अपनी बात रखने की क्षमता रखे...बस यहीं से बदलाव की शुरूआत होती है। एक सांझी जवाबदारी सी होती है अपने समाज के प्रति, अपने देश के प्रति और अपनी मात्रभाषा व राष्ट्रभाषा के प्रति। आपको इस सफल बहू-भाषी काव्य कवि-गोष्ठी के लिए पुनः बधाई।

प्र 2 :आपके अमेरिका के अनुभव?

अमेरिका में रहते हुए मैंने एक नए माहौल, नई संस्कृति, नए परिवेश से समझौता करती हुई मनोवृत्ति का आवरण पहन लिया। यहाँ के वातावरण को देखा, समझा और खुद को उसमें पूरी तरह से ढाल लिया। हां समय ज़रूर लगा, पर काम करते करते बहुत कुछ सीखा, जिसकी संभावनाएं भारत में शायद कम होती। खुले हुए माहौल में हर तरह की आज़ादी को महसूस किया, वेश भूषा की आज़ादी, आर्थिक आज़ादी, निर्णयात्मक आज़ादी.....! एक बात जो अमेरिका में मुझे अच्छी लगी वह है स्पेस, जो हर किसी को मिलता है. हाँ एक कमी जो यहाँ और वहाँ के बीच लगी वह थी किताबों की कमी ! हिन्दी साहित्य पढ़ने के लिए जो ललक थी वह मुझे सुराबों तक ले आई।

प्र 3 : आप के इस साहित्यक सफ़र की शुरूआत कब शुरू हुई? आप को कैसी अनभूति होती है?

सरिता जी कब, कैसे और किन हालातों में मेरा यह सफ़र शुरू हुआ याद नहीं। पर एक बात तय है, दर्द का दौर जब शिद्दत की हदों को छूता है तो, सोच करवटें बदलतीं हैं, ख़यालों में तहलका मच जाता है, और मन अपने मनचाहे पड़ाव पर थाह पाने के लिए छटपटाता है। ऐसा ही कुछ हुआ जब 1972 में मेरे पति के बाद मेरी ज़िंदगी की कश्ती डगमगाने लगी। इस संगीन हादसे ने मुझे हिलाकर रख दिया....। दिल को करारी चोट लगी। तत्पश्चात 1982 में मेरे बहनोई हृदय की गति रुक जाने के कारण हमें छोड़ गए। पहले वाले जख्म फिर से हरे हो गए। शायद वही वह कबूलियत का लम्हा था जब कश्मकश से गुज़रते मैंने पहली बार कलम उठाई और कागज़ पर दर्द की लकीरें खींचती चली गयी। यह पता न था कि आंसुओं की बहती धाराएँ गद्य और पद्य के बीच की लकीरों को मिलाने के रास्ते तराश रही है। यहीं से मेरी शुरूआत हुई 1982 के हादसे ने जैसे हवन की आग में घी डाला हो। जो लिखा वह आंसुओं की जुबानी थी।.....

दर्द नहीं दामन में जिनके / खाक वो जीते खाक वो मरते!

तब यह भी पता नहीं था की यह शेर है.....एक जुनून के तहत कुछ डायरी में लिखना। मन के संघर्षमय स्थिति को बेज़ुबान शब्दों से कुछ राहत ज़रूरी मिलती और एक अनकहा, अछूता शौक मेरे खाली समय को भरता रहा। वे शब्द फूलों की मानिंद डायरी में बंद रहे, न जाने कितने दिन, महीने, साल....!सुर फिर अचानक बरसों बाद 1992 के आस पास सिन्धी भाषा में लिखना शुरू किया, जो प्रकाशित हुआ और बस एक नई ‘देवी’ जा जन्म हुआ....! छपना बहुत अच्छा लगा और मुझे प्रेरित भी करता रहा। 1995 में मैंने हिन्दी भाषा में लिखना शुरू किया...और आज तक निरंतर---प्रयास जारी है इस खयाल के साथ, इस विश्वास के साथ कि....

मैं कलम थामे हुए हूँ, लिख रहा कोई और है

मैं लकीरें खींचती हूँ, सोचता कोई और है

प्रश्न 4: आपके लेखन की शुरुआत कैसे हुई ? आप को कब अहसास हुआ कि अब आपको, उन रचनाओं को प्रकाशित करवाना चहिए, यह प्रेरणा कहां से मिलती ?

एक जुनून की तहत यह होता गया, जैसे कोई सैलाब हो जो मुझे साथ कर ले जा रहा हो। यह न सोचा कि लिखना क्या है, क्यों लिखना है, बस मन के उद्गारों को भाषा में बुनती रही। लिखना मेरी मात्र भाषा सिन्धी में हुआ, जब मेरा पहला सिंधी लेख “नजाकत रिश्तों की” चार किस्तों में, सिंधी इंटरनेशनल “हिंदवासी” साप्ताहिकी पेपर में छापे। तब पहली बार एक गुदगुदाती खुशी का एहसास हुआ। उसके बाद मेरी लेखन की पगडंडी ग़ज़ल विधा के पथ पर चलने लगी और उसी धुन में चार साल तक एक नशे जैसी हालत में बस गुनगुनाती रही, शब्दों को सँजोते हुए लिखती रही...

फ़िक्र क्या, बहर क्या, क्या ग़ज़ल गीत क्या

मैं तो शब्दों के मोती सजाती रही !

प्रश्न 5: जिन्दगी फ़ूलों की सेज़ तो नहीं है। कोई भी मुकाम हासिल करने के लिए बहुत सी कठनाइयों का सामना करना पड़ता हैं। बहुत सी क़रारी चोटें खा कर, और दर्द सह कर आप इस मुकाम पर पहुंची हैं| क्या आप विस्तार से आपने इस सफ़नामे को हमारे साथ साझा करना चाहेंगी ?

जीवन एक संघर्ष, एक चुनौती है जिसे हर इंसान को स्वीकारना पड़ता है। संघर्ष में न सिर्फ़ उन्हें ऊर्जस्विता मिलती है, बल्कि जीवन की विविध दिशाओं और दशाओं से उनका परिचय भी होता है। मानव समाज का इतिहास स्त्री को सत्ता, प्रभुत्व एवं शक्ति से दूर रखने का इतिहास है। वर्तमान दौर में स्त्री विमर्श, स्त्री मुक्ति, नारी के अधिकारों को एक विषय बनाकर वाद-विवाद होता आया है, पर ज़िंदगी वाद-विवाद नहीं जो तर्क-वितर्क से उलझनों को सुलझा सके। व्यवस्था के संघर्ष के साथ-साथ जब तक स्त्री समाज की लड़ाई से नहीं जुड़ेगी, तब तक उसे अपना अभीष्ट, अपना अधिकार, अपना सन्मान हासिल नहीं पा सकेगी। यह दर्शन इस संघर्षशील समाज में अनेक विमर्शों-दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, शिक्षा विमर्श के सरोकारों से जुड़ा हुआ है, और रहेगा। एक मैं ही नहीं, हर नारी अपने जीवन में किसी न किसी मोड पर इन व्यवस्थाओं से जूझती हुए अपना रास्ता निकाल लेती है.... !जीवन में संघर्ष ही शायद उसकी क्षमता को व्यक्त कराते है। बिना लड़ाई लड़े जीत पाना भी क्या कोई जीत है? नारी में आज हर चुनौती स्वीकार करने की शक्ति आ गई है....कदम अब आगे कि ओर बढ़ रहे है....आगे और आगे-....!

प्रश्न 6: आपने कई विषयों पर कवितायें और गज़लें लिखी हैं। क्या आपको नहीं लगता कि कुछ नए विषयों पर, जैसे कि राजनीति, धर्म या अब समाज में हो रहे औरतों पर आत्याचारों पर भी लिखें? इसके प्रति‍ आपकी क्‍या प्रति‍क्रि‍या है?

जवाब-6- बहुत ही सटीक प्रश्न पूछा है आपने सरिता जी। मैंने कई गीत ग़ज़ल, लेख व संस्मरण लिखे हैं। समाज ने हमें दिया भी बहुत है, पर लिया भी कम नहीं । कर्ज़ फिर भी बाक़ी है, जाने कब चुकता होगा। अब तो जो आस पास हादसा होता है, धमाके की तरह होता है। दिल के जख्म रिसने लगते हैं। 2008 में मुंबई में हुए ताजमहल होटल वाले भयानक कांड ने वातावरण को स्याह, बोझिल बना दिया और भारत मान कि धरती पर लाल दाग लगा दिया। नौजवान वीर सिपाहियों के कारनामे देखे, जो जान हथेली पर लेकर मौत के उस तांडव में कूद पड़े। उन दिनों मैं मुंबई में थी, दहशत हवाओं में थी पर उन वीर जवानों की बहादुरी पर न जाने कितनी नज़्में, ग़ज़लें लिख दी, कुछ जाने पहचाने पत्रकारों कि शोक सभाओं में शामिल हुई और आंसुओं कि सियाही से –

इस देश के जवाँ सब, अपने ही भाई बेटे

ममता का कर्ज़ ‘देवी’ हंस हंस के है उतारा

हिंदोस्तान के हम हैं, हिंदोस्तान हमारा

पहचानता है यारो, हमको जहां सारा

प्रश्न 7: क्या आप को लगता है कि लेखक समाज़ में परिवर्तन कर सकता है ?

जवाब-7 - निश्चित ही ! सार्थक साहित्य अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ होता है। अपनी भाषा, परिवेश, सभ्यता संस्कृति की सियाही से समय के पन्नों पर लिखे हुए शब्दों के शब्दार्थ जीते हैं, ताकि परिभाषित भाषा में उनके जिये हुए पलों का निचोड़, तजुर्बा, अनुभूति से अभिव्यक्ति तक का सफर में आने वाले कल की रहें रौशन करता रहे। साहित्य में निरंतर प्रगति हो रही है। आज की नव पीढ़ी एक सुनहरे भविष्य का निर्माण करेगी। उनकी भावुक सोच, कल्पना, और आने वाले कल के सुंदर भविष्य के यथार्थ को शब्दों में ढाल रही है। उनकी लेखनी के तेजाबी तेवर और भाषाई प्रवाह भी प्रशंसनीय है...सोच और शब्दों का तालमेल भी प्रखर है....फिर चाहे वह अभिव्यक्ति किसी भी विधा में हो.....! सबसे बड़ी बात आज लेखक के साथ साथ पाठक भी जागरूक है!

प्रश्न 8: आपको अब तक मिले सम्मान और प्राप्‍त पुरस्‍कारों के बारे में कुछ बताएं?

जवाब 8-सम्मान और पुरस्कार एक लेखक की जीवनी को सुशोभित करने के साथ साथ संचारित भी करते है। अपनी तारीफ किसे अच्छी नहीं लगती। इसके बावजूद भी मुझे नहीं लगता कि मान सम्मान हमारे साहित्य सफर के माप दंड हैं। समाज की ओर से इस पथ पर मिले सम्मान से, जहां पहचान का विस्तार बढ़ता है, वहीं उसके साथ लेखन में जवाबदारी भी बढ़ जाती है। अपने लेखन के प्रति जागरूकता का भाव लेखक को आज़ादियों और परिधियों से भी खबरदार करता है। शब्दों के अर्थ में भी अनर्थ की व्यवस्था रहती है, उचित अनुचित के बीच की बारीक रेखा का उल्लंघन न हो इस लिए जागरूकता भी उचित है। वॉशिंग्टन के प्रखर गीतों के बादशाह श्री राकेश खंडेलवाल जी की निम्न पंक्तियाँ उसी शब्द स्वरूपी अक्षर की परिभाषा जो स्पष्ट करते हुए कहता है--

जीवन की गति जिसे उड़ाती रही.../ पतझड़ी पत्र बनाकर शब्द

कभी न बन पाया जो, कैसा इकलौता अक्षर हूँ...!

मुझे पद्मश्री श्री श्याम सिंह सशी कि लिखी पंक्तियाँ आ रही है, जो कहती है ---

वे दो अक्षर लिखते हैं, तो उम्र भर गाते हैं।

हम पोथियां लिखते हैं, इक उम्र दे जाते हैं।‘ सच कि परिभाषा इससे ज्यादा बेहतर और क्या हो सकती है।

राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, विश्वविद्यालयों द्वारा सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। इसे मैं रब की देन मानती हूँ। न्यू जर्सी, न्यू यॉर्क, ओस्लो, चेन्नई, धारवाड़-कर्नाटक, रायपुर, जोधपुर, नागपुर, लखनऊ, हैदराबाद, सिंधी विकास परिषद, व महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादेमी, यू. P, की से भी पुरस्कार पाया। सिंधी विकास परिषद से भी 2009 में पुरस्कार हासिल है। हमारी सिंधी भाषा में एक कहावत है जिसका अर्थ है: चादर जितनी गीली होगी, उतनी ही भारी होती जाती है। सन्मान हासिल होने के बाद लेखन में और भी गहराई और गीराई का होना लाज़मी हो जाता है, एक जवाबदारी का एहसास जुड़ जाता है।

प्रश्न 9: क्या आपको लगता है कि भाषा के क्षेत्र में जितना आपने अब तक काम किया है, आपको साहित्य जगत में उतना मान-सम्‍मान नहीं मिल पाया है।

जवाब-9- सरिता जी, मेरे साथ इसके बिलकुल विपरीत हुआ। इस मामले में मैं बहुत भाग्यशाली रही हूँ कि जिस उम्र में लोग हर काम से निवारित होते हैं, मैंने लिखना शुरू किया...! लिखने का सफर ग़ज़ल से शुरू हुआ, और मेरा पहला ग़ज़ल संग्रह ’चरागे-दिल’ लोकप्रिय हुआ और मेरी पहचान भी बना। तद पश्चात 2007 में पुस्तक समीक्षा का सफर अंजना संधीर के संग्रह ‘प्रवासिनी के बोल’ से शुरू हुआ। विध्याधाम की संस्था की निदेशिका के तौर आपका बाल साहित्य पर के संग्रह –“आओ हिन्दी सीखें” शिक्षा के क्षेत्र में मील का पत्थर बनकर स्थापित हुआ, जिसकी नींव वैज्ञानिक तत्वों की आधारशिला पर टिकी हुई थी। उस पुस्तक की समीक्षा लिखने का भी मुझे मौका मिला। अनेक दस्तावेजी शख़्सियतों के व्यक्तित्व व कृतित्व पर कलम चलाई। सबसे सुखद स्थिति यह रही कि पत्रिकाओं और रसालों में मेरी रचनाएँ स्थान पाती रही। उनकी प्रतिकृया के रूप में चिट्ठियाँ, या फोन आता है तो लगता है, यही मान है यही सम्मान है। लोगों तक हमारी कलम की आवाज़ पहुंचे यही उपलब्धि है। सुधि पाठक हों, थोड़े ही क्यों न हों...लेकिन जो विश्लेषण कर पाएँ भाषा का, अनुवाद का और कलम की हर तर्जुमानी का।

प्रश्न 10: देवी जी आप मूलतः सिन्धी भाषी है, और हाल ही में मुझे एक कहनी संग्रह ‘और मैं बड़ी हो गई” हासिल हुआ, जिसमें सिन्धी कथाकारों अनुवाद की हुई कहानियाँ थीं। जैसा कि आप ने बताया कि आप अनुवाद का काफ़ी कार्य कर रहीं हैं, तो परस्पर किन भाषाओं में कर रही, इसके बारे में बताएं की अनुवाद करते आपको किन बातों, या किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है?

जवाब-10. सरिताजी, अच्छा सवाल किया है। सन 2011 सितम्बर जब मैं भारत गई, तो देखा अनेक सिन्धी, व हिन्दी कहानियों के संग्रह व कई पत्रिकाएँ साल भर की वहाँ जमा मिली, जिनमें एक सिन्धी संग्रह में उस लेखक का पत्र भी था, मुझे उनकी कोई भी एक कहानी अनुवाद करने के लिए अनुरोध था। वह 6 माह पुरानी चिट्ठी थी, मैंने उन्हें प्रत्युत्तर देते हुए लिखा कि मैं यह प्रयास ज़रूर करूंगी। और एक महीने में उनकी कहानी ‘सच्चा पाकिस्तानी’ का सिंधी से हिन्दी में अनुवाद किया और वह हमारे जाने माने हमारे सिन्धी संपादक सेतपाल जी की सिन्धी व हिन्दी साहित्यकारों की अनूठी पत्रिका ‘प्रोत्साहन’ में छपी। कुछ चिट्ठियाँ, कुछ फोन आए और उस कहानी में एक अछूतापन है और कराची हवाई अड्डे की, व लेखक के बचपन से जवानी तक की कुछ खट्टी मीठी यादें लेखक ने उस कहानी में यूं दर्ज की है कि सिन्ध का एक सजीव चित्र आँखों के सामने उभरने लगा। इस कहानी की ठोस बातों ने मुझे भी रोमांचित किया। मैं सिन्ध की पैदाइश हूँ पर याद कुछ भी नहीं, हाँ विभाजन के बाद की कुछ धुंधली यादें मेरी विरासत में आईं। बस फिर एक जुनून के तहत एक के बाद एक कहानी करती रही। साहित्य अकादमी से पुराने सिंधी संग्रह ले आई, पढ़ती रही और जो कहानी मन को छूती उसे अनुवाद करती रही। हाँ एक विडंबना इस दौरान ज़रूर हुई, मुझे शब्दार्थ के लिए अरबी सिंधी शब्दकोश से हिन्दी के अर्थ निकालने में मेहनत करनी पड़ी, कभी तो लेखकों को फोन करके उनसे पूछ लेती। पर जब 2012 में बीस सिन्धी कहानियों का हिन्दी अनूदित संग्रह “और मैं बड़ी हो गई” मंज़र-ए-आम पर आया, तो उसकी प्रतिक्रया बड़ी ही सकारात्मक व प्रोत्साहन जनक रही। विश्वास बढ़ा और मैंने उसी साल हिन्दी कथाकारों की कहानियों का अरबी सिंधी में अनुवाद किया और दिसम्बर 2012 में दूसरा “बारिश की दुआ” प्रकाशित हुआ, जिसमें हिन्दी के 17 कहानिकारों की हिन्दी से सिंधी कहानियों में अनुवाद रहीं। 2013 अनूदित कहानी संग्रह “अपनी धरती’(2013) नाम से अरबी सिन्धी लिपि में छापा है ,इसमें भी अलग अलग भाषाओं से अनुवाद की हुई 15 कहानियाँ है- प्रांतीय भाषाओं का संग्रह “कायनात की गुफ्तगू” नाम से प्रैस में है जिसमें कश्मीरी, बलूची, पशतु, उर्दू, तेलुगू, हिन्दी, सिन्धी, अङ्ग्रेज़ी, डोंगरी, भाषाओं कि कहानियाँ शामिल हैं। जिनकी पठनीयता एक परिवेश इन्सान को दूसरे परिवेश के इन्सान से, उनकी भावनाओं से अवगत करती॥ अनूदित कहानियों के और संग्रह हैं- पंद्रह सिन्धी कहानियाँ (2014), सिन्धी कहानियाँ(2015), सरहदों कि कहानियां(2015), अपने ही घर में(2015), दर्द की एक गाथा ( 2015-प्रैस में) ।

जुलाई 2013 दो साल बाद अमेरिका लौटी और उस दौरान सिन्ध की सिन्धी कहानियों का अनुवाद किया। इन कहानियों की एक अलग खुशबू है, शहरों का तेज़ाब नहीं है पर गाँव की मिट्टी की सौंधी सौंधी खुशबू है जो बोलचाल की भाषा की तरह हमसे गुफ्तार करती हैं। अपने आस पास की परिधि से वाकिफ कराती हैं, और इन कहानियों को पढ़ते वक़्त एक अलग ज़ायका मिलता है॥

प्रश्न 11: जैसा कि आप ने बताया कि आप अनुवाद का काफ़ी कार्य कर रहीं हैं, आपको कैसा लग रहा है?

जवाब-11 यह मन कब कहाँ कैसे करवट बदलता है, कौन जाने। छः बरस लगातार ग़ज़ल के सफर में सतत रही, और फिर कुछ लघुकथाएँ और फिर कहानियाँ हिन्दी से अरबी सिन्धी भाषा में करती रही। खास करके कहानियों की मांग होती रही....इसी कारण लेखन की इस पगडंडी पर सफर सतत अब भी ज़री है.... पर मन में कहीं न कहीं मुझे मेरी ग़ज़लें आवाज़ देती हैं, बुलाती है....! आ लौट के आजा मेरे मीत ....!

प्रश्न 12 : आपकी और नई योजनाएं क्‍या हैं ? क्या कोई नया संग्रह नि‍कट भवि‍ष्‍य में प्रकाशि‍त होने वाला है?

जवाब 12- इस प्रकाशन का ज़िक्र मैं ऊपर कर चुकी हूँ, और इनमें से कई संग्रह पाठकों के हाथों में हैं। चौथी कूट (सा॰ अ॰ पुरुसकृत वरियम कारा के कहानी संग्रह का सिन्धी अनुवाद- साहित्य अकादेमी की ओर से मिला प्रोजेक्ट रहा जो मैंने नवम्बर 2014 में सम्पूर्ण किया, उम्मीद है कि वह संग्रह जल्द ही प्रकाशित हो होगा। 2015 इस साल मैं सिन्ध पाकिस्तान की बागी शायरा के एक संग्रह का सिंधी से हिन्दी में कर रही हूँ। जिसके काव्य के तेजाबी तेवर हर नारी के संघर्षमय राह में प्राण फूँक देते हैं। एक बाल साहित्य के मनोवैज्ञानिक लघु पुस्तक का “मंगल गृह के जुगनू” का अनुवाद किया है। अब मेरी दिली तमन्ना है कि मैं इस साल के अंत तक , अनुवाद के चक्रव्यूह से निकल कर अपनी प्रिय ग़ज़ल वाटिका के रचना संसार से जुड़ सकूँ।

देवी जी आप की अच्छी सेहत और तन्दरुस्ती की दुआ करती हूँ ताकि आप ज्‍यादा से ज़्यादा कवि‍तायें और गज़लें लि‍खें, तथा आप और भी कामयाबी की बुलंदियों को चूम सकें। मैं स्वयं को खु्शनसीब समझती हूँ कि आपसे यह साक्षात्कार करने का मौका मिला।

Dr. Sarita Mehta , Lecturer in Hindi, Rice University, Houston, TX-77025
Cell: 713-992-3061, R. 713- 344-159

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