गीता द्विवेदी की कविताएँ

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जय शारदे माँ  


जय शारदे माँ जय शारदे
शीश नवाकर मैं तुमको नमन कर लूँ,
बैठ जाओं माँ, तुमसे दो बातें कर लूँ।
         स्व ह्दय को मन्दिर बनाना चाहती हूँ
         मन्दिर में तुमको बैठाना चाहती हूँ
         हो जाओ विराजमान, मैं कपाट बन्द कर लूँ,
         बैठ जाओ माँ तुमसे दो बातें कर लूँ।
         शीश नवाकर मैं तुमको नमन कर लूँ,
         बैठ जाओ माँ, तुमसे दो बातें कर लूँ।।
छलक - छलक जाए करूणा का कलश
हुलस - हुलस जाए मेरे मन का कमल
रिक्त उर पात्र ज्ञान अमृत से भर लूँ,
शीश नवाकर मैं तुमको नमन कर लूँ,
बैठ जाओ माँ तुमसे दो बातें कर लूँ।।
         तैरता धवल पक्षी, तुमको बहुत भाता है
         सुना है मोती चुनना उसे बहुत भाता है
         तेरी दया के मोती, मैं भी जरा चुन लूँ,
         बैठ जाओ माँ तुमसे दो बातें कर लूँ।।
         शीश नवाकर मैं तुमको नमन कर लूँ,
         बैठ जाओ माँ तुमसे दो बातें कर लूँ।।
जय शारदे माँ जय शारदे,
शीश नवाकर मैं तुमको नमन कर लूं,
बैठ जाओ माँ तुमसे दो बातें कर लूँ।।

समर्पण माँ शारदे की चरणों में।                    


स्वर्ण कलश छलक गया


 
स्वर्ण कलश छलक गया
सितारों वाली रात में।
मैं तो भीग गई माँ तेरी,
ममता की बरसात में।।
     तन भीगा मेरा मन भीगा,
     मेरी धानी चुनरी भीग गई।
     रोम-रोम पुलकित हो उठे
     मृदुल स्मित फुहार में।
     मैं तो भीग गई माँ तेरी
     ममता की बरसात में।
खिले कमल सरोवर में
चमके सूर्य गगन पर।
ऐसे सुशोभित होता है
स्वर्ण कलश तेरे हाथ में।
मैं तो भीग गई माँ तेरी
ममता की बरसात में।
     दिन रात बरसती करूणा
     शुभ मंगलमय नवरात्र में।
     भीग रहा सारा संसार
     तेरी ममता की बरसात में।
     मैं तो भीग गई माँ तेरी
     ममता की बरसात में।

बरसते रहे युहीं हम पर
तेरी महिमा के मोती।
खोए रहें हम सदा
तेरे अनुपम श्रृंगार में।
मैं तो भीग गई माँ तेरी
ममता की बरसात में।
     स्वर्ण कलश छलक गया
     सितारों वाली रात में।
     मैं तो भीग गई माँ तेरी
     ममता की बरसात में।



हम है अक्षर अलबेले

हम हैं अक्षर अलबेले।
अलग - अलग अर्थों वाले,
नए - नए शब्द बनाएँ
शब्दों के लगते मेले।
हम है अक्षर अलबेले।।
         कोरे-कोरे कागज पे
         मोती की लड़ी सी
         एक दूसरे से जुड़ जाते,
         बढ़ते जाते शब्दों के रेले।
         हम है अक्षर अलबेले।।
मोटी - मोटी किताबों के बीच
दब कर भी जिन्दा रहते।
जिन्दा रखते अन्गिनत गाथाएँ,
भविष्य सुहाने सजीले।
हम है अक्षर अलबेले।।
         जगमगा लो अपना जीवन,
         तुम अक्षरों के दीपों से।
         ज्ञान का प्रकाश फैलाए,
         मिलकर, कभी अकेले।
         हम है अक्षर अलबेले।।
तो चलो सब पाठशाला,
वहीं मुलाकात होगी।
सुन लेना तुम सबकी,
गुनना मगर अकेले।
हम हैं अक्षर अलबेले।।

चलो मेरे गाँव


 

रेगनी पर चुन्दरी चमके,


चम्पाकल से टपके पानी,
मुन्नी के हाथों में गुड़िया,
खाट पर बैठी नानी,
आँगन में सूखती बड़ियाँ
गौरेयों की चिक-चिक बानी।
बस यही है जिन्दगानी।।
     श्यामा की धीमी पागुर,
     बछड़े की कूद बचकानी,
     पतली संकरी गलियों में,
     कुआं की चुगली-चानी,
     राम-राम बोले मिट्ठु,
     गिल्लु की आनी-जानी।
     बस यही है जिन्दगानी।।
सेम चढ़े छप्पर पर,
लौकी की खूब मचानी,
पुआल की गांज खेतों में,
गमकाए गांव घर धानी
भोर भिनसारे पड़ने लगी,
सौंधी चिउरे की घानी।
बस यही है जिन्दगानी।।
    


दीवट पर चिमनी चमके
चिमटा उलझे रोटी से,
धनिया, मिर्ची में अनबन,
खटपट सिल सिलौटी में,
चटाई बिछी पीढ़ा, पानी,
जिमने बैठे सयाने - सयानी।
बस यही है जिन्दगानी।।
     कजरी फाग चैता की,
     चढ़े तान सुहानी
     लू थमे, उमंगें पुरवैया,
     जम के नाचे बरखा रानी,
     पल पल बीते रागमय
     ये मेरे गांव की कहानी।
     बस यही है जिन्दगानी।।


एक चिंता


जिंदगी धुआं - धुआं होने की,
रेत सी फिसलने की,
और कभी न संभलने की,
एक चिंता है .................................।
         तिनका तिनका कर जो नीड़ बनाया मैंने,
         वक्त की आंधियों में बिखर न जाए कहीं,।
         देखे थे इन आंखों ने भी सुनहरे सपने
         उन सपनों पे कोहरे छा जाने की,
         एक चिंता है .........................................................।
ताउम्र हर घड़ी, हर लम्हा,
जिसका इंतजार किया,
जिसके पैरों के निशां को इख्तियार किया,।
सदा आती रही उसके दूर जाने की
दिल के शीशे के टूटने की
एक चिंता है........................................................।



वेदना .......................

एक बालिका छली गई,
दब गई कुचली गई,
इस भारत महान में।
     हम हाथ मलते रहे
     देखते रहे, रोते रहे,
     कुछ कर न सके हम,
     इस भारत महान में।
कभी सीता, कभी द्रौपदी
कभी दामिनी बनकर,
हर वेदना सहते रहे।
रोते रहे अपनी बेबसी पर,
इस भारत महान में।
     हम अबला हैं या सबला
     ये ज्ञात नहीं,
     हैं युग कौन सा
     जब हम दमित न हुए,
     कुछ याद नहीं।
     शायद चलता रहेगा ये क्रम,
     इस भारत महान में।
ऐ तिरंगा, फैल जा तू
सारे गगन में,
भर दे शक्ति अब
हमारे भी तन-मन में।
आजादी की सांस ले सकें हम भी,
इस भारत महान में।
इस भारत महान में।।                       


ऐसा भी संयम

सड़क के किनारे
पेड़ के नीचे
एक घर था,
घर नहीं झोपड़ी थी।
         झोपड़ी में  परिवार नहीं
         एक महिला बूढ़ी थी,
         कुछ अपनी उम्र से
         कुछ अपनों से कुढ़ी थी।
जूटाती रहती, पेड़ के पत्तों को
सूखी टहनियों को,
सहलाती रहती
दुखती कोहनियों को।
         मिट्टी का छोटा चूल्हा
         जलता भी था, बुझता भी,
         युं हीं हांफते-खाँसते
         मन हंसता भी था, रोता भी।
पेड़ अब नहीं है
झोपड़ी भी नहीं है,
टूटे किवाड़ की जंग लगी
खड़खड़ाती कुंडी भी नहीं है।
         नहीं, पर कुछ तो है
         अपनों से बिछड़ने का गम तो है
         उस गम को खुशियों में
         बदलने का संयम तो है।
         कुछ तो है।।
                                    

काश! सहेज लेती

काश सहेज लेती, उन पलों को
जो अब लगता है, बेहद मधुर थे।
             चुन कर रख लेती, यादों के मोती,
             जो अब लगता है, बेशकीमती कोहिनूर थे।
वक्त बदला चेहरे बदले, समझा नहीं उनको अपना,
जो अब लगता है, अँखियों के नूर थे।
             जो दिला न पाए वो, एहसास अपनी मौजूदगी का
             तो अब लगता है, हम भी बेकसूर थे।
रिवाजों की अनगिनत बेड़ियां, पायल समझकर पहन लिया,
जो अब लगता है, कुछ तो बेफिजूल थे।
             गर थे वो नादान और नासमझ,
             तो अब लगता है, हम भी मजबूर थे।
काश! सहेज लेती उन पलों को, संजोना भी था,
जो अब लगता है, दिल वो को भी मंजूर थे।




मुस्कुराते रहना .................................


तुम यूं ही मुस्कूराते रहना।
आऊँ बरसों बाद,
कर बीते दिनों को याद
आंसू न बहाना तुम,
अपनी सुरमई आंखों से,
सपने सजाते रहना।
तुम यूं ही मुस्कुराते रहना।।
             याद करते रहना मुझे,
             मुझे भी याद आना
             बीत जायेंगे जुदाई भरे दिन
             मिलन की आस की दीपक
             मन में जलाए रहना।
             तुम यूं ही मुस्कुराते रहना।।
जल सांझ ढ़लने लगे,
चाँद आसमां पर उतरने लगे,
चाँदनी भी धरा पर मचलने लगे
कोई मीठा सा गीत
गुनगुनाते रहना।
तुम यूं ही मुस्कुराते रहना।।



जागो-जागो हे तरूण केसरी

जागो-जागो हे तरूण केशरी,
भारत का प्राण पुकारा है।
             जल रहा ह्दय मेरा दुख से,
             कश्मीर बना अंगारा हैं।
             सभी राज्य हैं, विभिन्न अंग मेरे
             धरती का स्वर्ग, जान हमारा है।
             जागो जागो हे तरूण केसरी,
             भारत का प्राण पुकारा है।।
भारत एक प्रज्जवलित दीप,
पाक उन्मादी शरारा है।
भारत से लिपटकर जलने को,
उसने अपना पंख पसारा है।
जागो-जागो हे तरूण केसरी।
भारत का प्राण पुकारा है।।
             मेरा देश उगता सूरज है,
             पाक गर्दिश का सितारा है।
             इस टिमटिमाते तारे को जैसे
             रोशनी के लिए कश्मीर ही सहारा है।
             जागो - जागो हे तरूण केसरी,
             भारत का प्राण पुकारा है।।
विलग हो चुका चंद्र खण्ड सा,
पर चन्द्र होना न गंवारा है।
आक्रांतों को दूर भगाने को
भारत का वीर हूंकारा है।
जागो-जागो हे तरूण केसरी।                       
भारत का प्राण पुकारा है।।

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परिचय

जन्म : - 06 जनवरी 1974

जन्म स्थान : - केदारपुर अम्बिकापुर जिला सरगुजा

शिक्षा : - स्नातकोत्तर हिन्दी डी.एड

वर्तमान सेवा कार्य : - शिक्षिका, प्रा.शाला उधेनुपारा, जनपद- राजपुर,

जिला- बलरामपुर (छ.ग.) 497118

Email ID :- geetadwivedi1973@gmail.com

rajnarayan1970@gmail.com

कविता का प्रकाशन : - स्थानीय समाचार पत्र पत्रिका- (1) घटती घटना (2) रिहन्द टाइम्स

(3) आदित्य समय (4) अरण्यांचल

कविता पाठ एवं प्रसारण :- आकाशवाणी केन्द्र अम्बिकापुर, एफ.एम. रेडियो अम्बिकापुर

स्थानीय मंच, राजभाषा आयोग का प्रान्तीय सम्मेलन एवं गोष्ठी कोरबा (छ.ग.)

साहित्यिक संगठनों से सम्बंधः- हिन्दी साहित्य परिषद् (सदस्य), पहचान साहित्य कला समिति की सदस्य

संस्कार भारती (मातृशक्ति प्रमुख जिला- सरगुजा), अखिल भारतीय नवोदित साहित्यकार परिषद् - सदस्य

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1 टिप्पणी "गीता द्विवेदी की कविताएँ"

  1. बहुत सुंदर और दिल को छू लेने वाली कवितायें।

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