शब्द-संधान // चारा-बेचारा // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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नहीं, मैं किसी चारा-घोटाले की बात नहीं कर रहा हूँ, मेरा उद्देश्य तो यहाँ सिर्फ शब्द ‘चारा’ के अर्थ और उसकी अर्थ छटाओं पर प्रकाश डालना भर है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं चारा पशुओं के आहार को कहते हैं। गाय, भैंस, बकरी, घोड़ा आदि, पशुओं को खिलाई जाने योग्य सभी चीजें चारा या पशु-चारा कहलाती हैं। मुर्गियों को दाना और चिड़ियों को ‘चुग्गा’ डालना, चौपायों को घास-फूस डालना, गाय आदि की सानी लगाना, मछलियों के शिकार हेतु उन्हें फांसने के लिए कटिया में कोई खाद्य पदार्थ, जैसे गीला आंटा लगा देना – आदि, सभी कार्य चारा डालने की श्रेणी में आने वाले शब्द हैं। चारे के कई रूप हैं। चुग्गा, दाना, घास-फूस, सानी, कुट्टी, खली, आदि सभी पशु आहार के नाते ‘चारा’ ही हैं।

बस, केवल मनुष्य का भोजन ही चारा नहीं कहलाता। लेकिन जैसे मछलियों को फांसने के लिए हम बंसी में उनके लिए चारा लटका देते हैं, वैसे ही व्यक्तियों को किसी बात के लिए जब कोई लालच दिया जाता है, तो उसे भी व्यंजनार्थ “चारा” कहा गया है। इस प्रकार मनुष्यों के सन्दर्भ में प्रलोभन की कोई वस्तु, भले ही वह खाने की वस्तु न हो, ‘चारा’ नाम से ही जानी जाती है। चारा डालना अपना काम कराने के लिए एक तरह से ‘रिश्वत देना’ है।

गाय किसी मैदान या खेत में जब घास खाती है, तो खाते समय उनके मुंह से ‘चर-चर’ की-सी आवाज़ निकलती है। शायद इसीलिए उनके भोजन को “चारा” और उनके खाने को “चरना” कहा गया है। बाद में चारा और चरना क्रमश: पशु-आहार और पशुओं द्वारा उसका सेवन करना हो गया। इसी चरने से ‘चरनी’ बना। चरनी गाय-बैल को चारा-पानी देने के लिए बनाई गई ‘नांद’ है, जिसमें चारा रखकर उन्हें ‘चराया’ जाता है। चरनी मेंढ़दार लम्बोतरा चबूतरा भी हो सकता है जिस पर गाय-बैल को चारा-पानी देते हैं। ‘चारागाह’ में गाय को चराने वाला ‘चरवाहा’ कहलाता है।

हिन्दी में एक और शब्द है, ‘चारण’। चरवाहागीरी, चरवाही, या चराई को ‘चारण’ कहा गया है। चारण राजपूताना में एक जाति है जो चराने का कार्य करती है। यों चारण के अन्य अर्थ भी हैं जिनका चारा या चारा चरने से कोई स्पष्ट सम्बन्ध नहीं दिखाई देता। उदाहरण के लिए वन्दना करने व़ाला, चापलूसी करने वाला, भी चारण ही कहा गया है। किसी की चापलूसी में, उसकी प्रशंसा में, गीत और कवितायेँ लिखने वाले कवि भी चारण कहलाते हैं। क्या इसका सम्बन्ध चारा डालने से हो सकता है ?

पशु-पक्षियों का आहार तो चारा कहलाता ही है किन्तु कभी कभी किसी शिकार के लिए पशु और पक्षियों को हम चारे की तरह भी इस्तेमाल भी करते हैं। शेर के शिकार के लिए अक्सर पाड़े को शेर का चारा बनाया जाता हैं।

मनुष्य बेशक घास नहीं चरता लेकिन ‘चना-चबेना’ तो लेता ही है। चना चबेने को भी चरबन ही तो कहते हैं। खाना खूब चबा कर खाया जाता है। इसका चर्वण किया जाता है। जो भी चबाने योग्य है चर्व्य है। लाक्षणिक रूप से कही हुई बात को फिर फिर कहना भी बात का चर्वण करना ही तो है। जहां भी चर-चर की आवाज़ है, प्रसंगानुसार उसके लिए हिन्दी में अलग अलग शब्द मिलते हैं। जूते चरमर करते हैं, बोझ से चारपाई चरमरा जाती है। वैसे चरमराने को तो कुछ भी चरमरा सकता है। लाक्षणिक तौर पर व्यवस्था तक चरमरा जाती है।

“चारा” फारसी भाषा का भी एक शब्द है जिसे हिन्दी ने उसके अर्थ सहित पूरी तरह अपना लिया है। फारसी में चारे का अर्थ है, उपाय या इलाज। हम अक्सर ‘बेचारा’ हो जाते हैं। हमें कोई उपाय नहीं सूझता। हम मजबूर हो जाते हैं किसी काम को करने के लिए जो हम नहीं करना चाहते। यही मजबूरी हमें बेचारा बना देती है। जहां मजबूरी है, वहीं बेचारगी है। चारा, जिसका अर्थ पशु-आहार से है, का विलोम ‘बेचारा’ नहीं है। बेचारा होना तो बिना किसी उपाय के या विकल्प के रह जाना / हो जाना है। जिसके पास उपाय है, वह बेचारा नहीं है।

चारा से कई संयुक्त पद भी बने हैं। अदालत में की गई नालिश को, किसी अन्याय के प्रतिकार की प्रार्थना को, फ़रियाद को, ‘चाराजोई’ कहा गया है। ‘चारासाज़’ काम में मदद करने वाला, अधीनस्त कर्मचारी या सहायक है। इसी तरह ‘चारा-साज़ी’ शब्द स्वयं मदद या सहायता के लिए प्रयुक्त होने वाला पद है। ये सभी शब्द उर्दू ज़ुबान से हिन्दी में आ गए हैं / अपना लिए गए हैं।

हाल ही में ‘चारा-घपला’ और चारा-काण्ड’ जैसे पद-बंध’ काफी प्रचालन में आ गए हैं। चारे की छोटी मोटी चोरियां तो होती ही रहतीं हैं। पशुओं को चारा डालने वाले सेवक प्राय: पशुओं के चारे में से चोरी कर उसे बेंच-बांच देते हैं या चारे के पैसे हड़प लेते हैं। पर एक बड़े पैमाने पर चारे की चोरी एक आदमी का कार्य नहीं होता। इस प्रकार का ‘चारा-घपला’ या ‘चारा-काण्ड’ कई लोगों की मिली भगत से ही संभव हो पाता है। इसके लिए एक अटूट “भाईचारे” की भी ज़रूरत है। ऐसे सहयोगी उपक्रम में हर सहयोगी भाई को चारा मिलने की उम्मीद रहती है। क्या ‘भाईचारा’ शब्द की उत्पत्ति यहीं कहीं से हुई है ? नहीं ना !

- डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / सर्कुलर रोड,

इलाहाबाद -२११००१

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