उर्मिला पचीसिया की कविताएँ


                          (१)
                        ज़िंदगी

विवशताओं से समझौता शायद ज़िंदगी है..
सिसकियाँ को साँसें बनाना शायद ज़िंदगी है..
कालचक्र में फँसते जाना शायद ज़िंदगी है..
दर्द छुपाकर भी मुस्कुराना शायद ज़िंदगी है..
क़रीब हों दिल के उनसे दूर जाना शायद ज़िंदगी है..
बीते दिनों को सपना समझना शायद ज़िंदगी है..
मौत से इत्तफ़ाक़न मिलते रहना शायद ज़िंदगी है..

                            (२)
         संस्कार जगाओ संस्कृति बचाओ

समय फिर से आन पड़ा है भारतीयता को जगाने का..
सौंधी मिट्टी का पावन तिलक फिर अपने भाल लगाने का..

स्वतंत्रता के जिस अंकुर को वीरों नें निज रक्त सींच कर बोया था
छायादार वटवृक्ष का सपना सुखद बापू पटेल ने संजोया था..

पाश्चात्य संस्कृति से आकृष्ट हो, वह बीज जब अंकुरित हुआ
परावलंबी लता बन,अविकसित सा अग्रसित हुआ..

लुप्त हुआ तब प्रेम भाव, त्याग और बड़ों का मान-सम्मान..
संस्कृति को खोखला कर गया आपस का मिथ्या स्वाभिमान ..

आज हमको स्वयं सचेत हो औरों को भी जगाना है..
सुप्त संस्कारों को जागृत कर संस्कृति को बचाना है..

                         (३)
                        मतभेद

सरहद पर नही मंदिर-मस्जिद का भेद
फिर समाज में क्यों है धर्म को लेकर मतभेद ..?

हाथ मिलाकर हिंदू-मुसलमान देते हैं क़ुर्बानी
मज़हब के झगड़ों में फँसकर आज़ादी बनी बेमानी..

हिंदू हो या मुसलमान सबके ख़ून का रंग है लाल
दुख होता है इन झगड़ों में जब भारतीयता होती हलाल !

इन सामाजिक झगड़ों  से देश का हुआ है बुरा हाल
माँ का दिल रोता है जब भी मरता है कोई भारतीय लाल !

                                    (४)
                                  आशा

वेदना के अश्रुओं
से..
भावनाओं की
रेतीला मुँडेर के
ढह जाने पर..
निस्तब्ध
शून्यता
के..
सागर में
पुन:
उभरती है..
आशा की
एक..
नई लहर..!

                      (५)
               शांतिमय संसार

युद्ध के भीषण परिणाम से..
इस धरती को बचाओ !
घायल हुए हैं सभी रिश्ते
यह लहू..
अब और न बहाओ !

मानव..
मानव  का दुश्मन ना बने
प्रेम की नदियाँ..
कुछ ऐसी बहाओ !

भाईचारे और दोस्ती के
रिश्ते हों..
शांतिमय-सुखमय
संसार बनाओ !


                       (६)
                    नारी वेदना

द्रौपदी का चीर हरण
गत युग की बात नही
हर युग में..
हर सभा में..
शील भंग हुआ है नारी का !
अमर्यादित ..
असम्मानित..
हुई है नारी जब-जब..
सभा में बैठे
भीष्म और द्रोण जैसे
दिग्गजों के पुरुषार्थ
       और
निर्लज्जता का
चीरहरण हुआ है
     तब-तब

आँसुओं के घूँट को
विवशता समझना
पुरूष की भूल
     और
कायरता की निशानी है..
धरती का संतुलन बनाए रखने का
उद्देश्य ही..
नारी मूकता
      और
वेदना के पीछे..
छिपी कहानी है.. !

                       (७)
                       नारी

रिश्तों की तपिश से
     अविचलित
    मोम की तरह
      पिघलकर
  परिस्थितिनुकूल
   ढल जाती है नारी !

समय के थपेड़ों से
      टूटे बिना
ममतामयी डोर में
सहजता के साथ
     संबंधों को
बाँधे रखती है नारी !

परिस्थिति से टकरा कर
धराशायी हुए बिना
त्याग के लिबास में
अनुकूल परिवेश
बनाए रखती है नारी !


                  (८)
               तलाश

रेगिस्तान के सफ़र सी
यह ज़िंदगी..
जलपुंज की तलाश में
भटक रही..
तूफ़ान के आग़ोश में फँसी
           नाव..
किनारा ढूँढ रही है..!


शोले बरसाती ..
ज़ेठ की दोपहरी
पेड़ की ठंडी छाँव
   तलाशती
क्षुब्ध मन की..
अक्षुब्ध पिपासा..
शीतल जल को तरसती..!


                          (९)
                       पहचान

एक सुखद परिचय..
जो..
बहार न बन सका..
पर..
पतझड़ में हरियाली बन..
महकता हो !
एक अहसास..
जो..
श्वास बनकर..
रग रग में..
समाया हो..
अविश्वास बन..
दम तोड़ नही सकता !


            (१०)
            यादें

नयनों के पीछे
बड़े जतन से..
रोक रखा है..
आँसुओं का बहाव !
मत कुरेदो ..
बीते पलों को..
कि थम न पाए..
भावनाओं का सैलाब !

 उर्मिला पचीसिया , बडौदा , गुजरात

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