दोषी व्यक्ति // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी


उसने सिगरेट पीना कब का छोड़ दिया था, लेकिन जिस बात के लिए उसने सिगरेट छोड़ी थी, उस बात ने उसे नहीं छोड़ा था। गुलाम मोहम्मद को जब खांसी का दौरा पड़ता था तो खांस खांसकर अधमरा हो जाता था। अब भी उसने जैसे ही खांसी को रोकने की कोशिश की, वैसे ही उसके गले में सड़सड़ाहट तेज हो गई।

उसे अपनी तकलीफ का ख्याल नहीं था। उसे इस बात का डर था कि उसकी खांसी घर वालों की नींद खराब कर देगी। हुआ भी ऐसे ही। उसका बड़ा बेटा अनवर अर्ध नींद की हालत में परेशान होकर चीखा, ‘‘तौबा!’’ फिर पिता को कुछ कहने के बदले उसने माँ को आवाज दी।

‘‘माँ! हम क्यों आकर फंसे हैं। रात के चार प्रहर नींद भी हराम है हमारी।’’

‘‘बस बाबा, पिता को क्या परवाह है। खाने और खांसने के अलावा और क्या काम है!’’ मरियम ने चिढ़ते कहा।

‘‘खाए तो भले बैठकर आए, पता नहीं कमाके रखा होगा, लेकिन कम से कम नींद तो खराब न करे।’’

‘‘पिता ने पहले कभी बच्चों का ख्याल किया है, जो अब करेगा,’’ मरियम ने मुंह बनाकर कहा और फिर से खाट पर लेट गई।

‘‘हम जो जन्म लेकर फंसे हैं,’’ अनवर ने परेशान होकर कहा।

‘‘भाई, ऐसे जान नहीं छूटेगी। पिताजी को ड्राईंग रूम में खाट डालकर दो। फिर चाहे खांसता रहे,’’ छोटे बेटे अहमद ने अनवर को सलाह दी।

‘‘वाह क्या सुंदर सलाह दी है!’’ अनवर ने गुस्से में कहा। ‘‘ड्राईंग रूम में बलगम की नुमाइश करवाकर खुद पर लोगों को हंसवाएं!’’

गुलाम मोहम्मद सब कुछ ऐसे सुन रहा था जैसे कि किसी और व्यक्ति का जिक्र चल रहा हो, लेकिन बाद में उससे सहन नहीं हुआ। वह खांसी को जानबूझकर रोककर चिल्लाया।

‘‘मुझमें कौन-से कीड़े पड़े हैं, जो लोग मुझ पर हंसेंगे?’’

‘‘तुझसे किसने बात की? बेचारे आपस में बात कर रहे हैं, तुम फालतू गुस्से मत हो। चुपचाप बैठकर खांसो!’’ मरियम ने गुस्से में कहा।

‘‘आपस में बातें कर रहे हैं! मेरी बातों के अलावा और कोई बात है क्या इस घर में?’’ गुलाम मोहम्मद को भी गुस्सा आ गया।

मरियम उठकर बैठ गई। ‘‘तुम चाहे घर वालों की नींद खराब करो! और तुम्हें कोई कहे तो उसे गले से पकड़ते हो!’’ मरियम ने अनवर और अहमद की ओर मदद के लिए देखा।

अनवर ने उठकर पिता के आगे दोनों हाथ बांधे।

‘‘भाई, अब हम पर रहम करो। पूरा दिन मेहनत करके रात के चौथे प्रहर पर आकर सोते हैं। वह तो खराब मत कर।’’

‘‘खांस खांसकर पूरा घर बलगम से भर दिया है। पता नहीं कौन-सी बीमारी है!’’ मरियम ने गुस्से में खुद से बातें करते हुए कहा।

‘‘मैं कोई खुशी से खांस रहा हूं! बलगम आता है तो कहां करूं ?’’ गुलाम मोहम्मद ने दबे स्वर में कहा।

‘‘भाई! पिताजी को किसी अस्पताल में भर्ती करवा दो। घर में सबको बीमार कर देगा,’’ अहमद ने अनवर से कहा।

‘‘हां भाई! अंत में पुत्रों से यही उम्मीद की जा सकती है। किसी अस्पताल में जाकर फेंक आओ। सबकी जान छूट जाएगी।’’ गुलाम मोहम्मद ने दुखी होकर कहा।

‘‘अब सुनो रांडों जैसे ताने!’’ मरियम ने अनवर और अहमद की ओर देखकर कहा।

‘‘इसलिए तो पिताजी से बात नहीं करते हैं,’’ अनवर ने गुस्से में कहा।

गुलाम मोहम्मद चुप हो गया। समझ गया ज्यादा बात करना ठीक नहीं। बेकार बात बढ़ जाएगी।

‘‘भाई, यह बाप नहीं, दुश्मन है बच्चों का!’’ मरियम गुस्से में मुंह घुमाकर लेट गई।

गुलाम मोहम्मद को प्यास लगी। लेकिन उसे पता था कि यह बात करना ही बेकार था। बेटा तो दूर, लेकिन पत्नी भी उठकर उसे पानी नहीं पिलाएगी। वह खाट से उठकर कूलर की ओर गया। उसे अपना खास ग्लास अपनी तय जगह पर रखा नजर नहीं आया। उसने यहां वहां नजर दौड़ाई।

‘‘मेरा ग्लास कहां है?’’ उसने लाचार होकर मरियम से पूछा।

‘‘वहीं कहीं पड़ा होगा,’’ पत्नी ने उत्तर दिया। ‘‘अपना ग्लास सम्हालकर रखा कर।’’

‘‘मैं जहां पर रखता हूं, वहां तो नजर ही नहीं आ रहा!’’ गुलाम मोहम्मद ने शिकायती अंदाज में कहा।

‘‘हां, तेरा ग्लास सोने का है! कोई चुराकर ले गया होगा...’’ पत्नी ने ताना मारकर कहा।

‘‘हम तो उस ग्लास को हाथ भी नहीं लगाते,’’ अहमद ने कहा। ‘‘उस ग्लास में पानी पीकर किसे बीमार होना है?’’

गुलाम मोहम्मद को गुस्सा आ गया।

‘‘मुझे कौन-सी दमे की बीमारी है जो मेरे ग्लास में कोई पानी पीएगा तो बीमार पड़ जाएगा!’’

‘‘दमे को कौन से सींग होते हैं! बाकी ये बलगम कैसा है? देखकर उल्टी सी आती है...’’ पत्नी ने चिढ़कर कहा।

‘‘भाई, पढ़ लिखकर पता नहीं क्या किया! घर में जहां तहां बलगम फेंकता रहता है...’’ अनवर ने मुंह बनाकर कहा।

गुलाम मोहम्मद ने कुछ कहना चाहा तो उसकी नजर अपने ग्लास पर पड़ी, जो दूर कोने में नीचे धरती पर पड़ा था। उसे कोल्हियों और मेंघवाड़ों के ग्लास और कप याद आ गए, जो छोटे शहरों में होटलों पर किसी खास तय जगह पर रखे हुए होते हैं। वह अब अपने घर में शेड्यूल्ड कॉस्ट का हो गया था। उसने ग्लास उठाया, कूलर से पानी भरकर पीकर उस ग्लास को तय जगह पर रखा और फिर आकर खाट पर लेट गया।

लानत है ऐसे जीने पर! व्यक्ति बूढ़ा होकर कितना जलील हो जाता है। साठ वर्षों के बाद नौकरी से रिटायर होने के साथ अगर व्यक्ति जिंदगी से भी रिटायर हो जाए तो अच्छा। बाहर तो कोई नहीं पूछता, लेकिन घर में भी कोई इज्जत नहीं होती है।’’

उसे अहसास हुआ कि अब वह किसी काम का नहीं रह गया था। लेकिन जब वह नौकरी में था, तब भी घर वाले उससे खुश नहीं थे। रिटायर होने के बाद घर वालों की उसके खिलाफ सबसे बड़ी शिकायत यही थी कि उसने न खुद को संवारा और न ही बच्चों के भविष्य के लिए ही कुछ किया।

‘‘तुम जब रिटायर होगे तो सरकार तुम्हारी ईमानदारी के कारण तुम्हें सोने से तौलेगी,’’ पत्नी उसे ताने मारती थी। तब गुलाम मोहम्मद का भी रौब था, पत्नी को डांटकर चुप करा देता था। लेकिन अब तो वह रौब ही नहीं रहा था। मरियम और बच्चों के आगे बेबस हो गया था। अनवर ज्यादातर उससे बात ही नहीं करता था, कभी बात भी करता था तो गुस्से में।’’

‘‘तुमने हमारे लिए किया ही क्या है? कार तो दूर, तुमने हमें साईकल भी लेकर नहीं दी और तुमसे कम ग्रेड वालों के बच्चे कारों में बैठकर घूम रहे हैं।’’

अनवर मोटर सायकिल वाली पुरानी बात भूला नहीं था। गुलाम मोहम्मद जब नौकरी में था और अनवर कॉलेज में पढ़ता था, तब उसने मोटर सायकिल लेकर देने की जिद की थी।

गुलाम मोहम्मद ने सख्ती से इन्कार कर दिया था। एक ठेकेदार गलत बिल पास करवाने के लिए गुलाम मोहम्मद के घर के चक्कर काटने लगा। गुलाम मोहम्मद तो उससे नहीं मिलता था, लेकिन ठेकेदार ने अनवर की मोटर सायकिल वाला शौक पता कर लिया था। ठेकेदार एक नई मोटर सायकिल लेकर अनवर को दे गया। गुलाम मोहम्मद ने घर पर मोटर सायकिल देखी तो क्रोधित हो गया। उसने अनवर से मोटर सायकिल छीनकर ठेकेदार को वापस कर दी। अनवर और मरियम ने उसी दिन निर्णय कर लिया कि गुलाम मोहम्मद उनका दुश्मन है।

रोटी, कपड़ा और मकान गुलाम मोहम्मद के हाथ में था, इसलिए घर के लोग मजबूर थे, वर्ना घर में वह किसी को पसंद नहीं था। वह दबी नफरत अब जाहिर हो गई थी।

गुलाम मोहम्मद भी समझ गया था कि वह घर में दोषी व्यक्ति था। लेकिन इसका और कोई रास्ता नहीं था। अपने ही घर में उसकी हैसियत दोषी व्यक्ति की भांति थी।

‘ईमानदारी मेरी अंदरूनी शांति थी या एक जिद था?’ उसने खुद से पूछा। उसके इस जिद के कारण कई व्यक्तियों को तकलीफ पहुंची होगी! उसका किसी के ऊपर विश्वास नहीं था। वह हर किसी पर शक करता था कि लोग उनसे बेईमानी करवाना चाहते हैं। इस शक में वह लोगों के जायज कामों को भी रोक देता था। जब तक वह नौकरी में था लोग उससे तंग थे और अब घर वालों पर बोझ था। उसे लगा कि इस सोसायटी में या शायद दुनिया में ही वह मिसफिट था, लेकिन अब इस बात पर सोचना बेकार था। उसने पत्नी और बच्चों की ओर देखा। सब सो चुके थे। उसके गले में फिर से सड़सड़ाहट हुई। उसके दोनों हाथ अपने गले की ओर बढ़ गये, खांसी को दबाने के लिए। उसकी आंखें बाहर निकल आईं। वह बड़ी तकलीफ से खाट पर से उठा और होंठ दबाकर दबे तरीके से खांसता संडास घर (लैट्रिन) में घुस गया। उसके बाद तो जैसे ज्वालामुखी फट पड़ा। वह एक हाथ छाती पर और दूसरा हाथ मुंह पर रखकर खांसता रहा।

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