छात्र नेता // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी

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वह ओल्ड कैंपस के बस अड्डे पर खड़ा रहा। बसें छात्रों से भरकर न्यू कैंपस जा रही थीं। उसने हर बार बस में चढ़ने के लिए सोचा और उसके पैर थे, जो अपनी जगह से हिल ही न रहे थे। उसने जाना चाहा/उसने जाना नहीं चाहा। उसके लिए निर्णय लेना मुश्किल हो गया था। उसने जेल में सोचा था कि फिर से यूनिवर्सिटी नहीं जायेगा परंतु छूटने के बाद एक जोरदार इच्छा उभरी थी उसके मन में : एक बार, केवल एक बार यूनिवर्सिटी जाने की, देखने की। छह वर्ष एक बड़ा वक्त था। जेल में तो ऐसा लग रहा था जैसे पूरी उम्र ही गुजर चुकी हो। उस पर जितने भी केस थे, उनमें वह बारी बारी से सज़ा काट चुका था। फिर भी उसके छूटने के आसार नजर नहीं आ रहे थे। वक्त उसके इरादों और विचारों पर जगह बनाकर, दरार बनाकर गुजरता रहा। उसके अंदर में धीरे धीरे कुछ टूटता फूटता रहा। शुरू शुरू में कुछ मित्र उससे मिलने के लिए आते थे और उसे बताते थे कि उसकी गिरफ्तारी के खिलाफ हलचल का सिलसिला जोर शोर से चल रहा है, और उसे किसी ने भी भुलाया नहीं है। लेकिन बाद में दोस्तों का आना कम होता गया। केवल उसका बूढ़ा बाप कभी कभी गाँव से आता था और बताता था कि उसकी माँ रो रोकर आंखों की रोशनी गंवा चुकी है।

सुनवाई पर इत्तेफाक से कोई दोस्त मिलता था तो उसे यूनिवर्सिटी के बारे में हालचाल मालूम होता था। हलचल खत्म हो चुकी थी। क्लास बाकायदा चल रहे थे। उसका नाम यूनिवर्सिटी से काट दिया गया था। इतने शोरगुल के बाद अब बिल्कुल शांति थी।

‘‘और हमारी मांगें?’’ उसने पूछा।

‘‘उनमें से एक भी नहीं मानी गई।’’

‘‘भला आम लोगों की प्रतिक्रिया? कहीं से कोई सहयोग मिला?’’ उसके दोस्त ने ‘ना’ में सिर हिलाया।

‘‘बाकी हम इतना किसके लिए लड़ रहे थे?’’ उसने गुस्से से कहा। उसका दोस्त सर झुकाकर खड़ा रहा।

‘‘बाकी साथियों का क्या हुआ?’’ उसने फिर पूछा।

‘‘अंडरग्राऊंड हो गये हैं।’’

‘‘अंडरग्राऊंड!’’ उसने ठहाका लगाया। ‘‘भाग जाने के लिए अच्छा शब्द है।’’ वापस जेल में आकर वह लगातार सोचता रहा। ‘क़ौमी जंग (आजादी की जंग) ऐसे चलेगी कि एक भाग जाएं और दूसरे बोझ बनकर बैठे रहें! लानत है स्टूडंटस पॉलिटिक्स पर, उसे बहुत क्रोध आया। ‘लेकिन जहाँ देश की राजनीति में दम न हो, वहाँ विद्यार्थी राजनीति की कैसी दशा होगी! किसी मजबूत राजनैतिक ऑग्रेनाइज़ेशन के अलावा केवल विद्यार्थी राजनीति का सहारा लेना खुदकुशी करने के बराबर है। यह खुद ही नौजवान नस्ल को तबाह करने के समान है। वे केवल खपते जाएंगे परिणाम कुछ न निकलेगा।’

काफी देर के बाद भी बस न आई थी। उसने देखा कि वहां काफी लोग इकठ्ठे हो गये थे। वह उनमें जानी पहचानी शक्लें ढूंढने लगा। सभी लड़के लड़कियां अनजान थे।

‘छह वर्ष!’ उसने एक लंबी सांस ली।

अचानक दौड़ भाग शुरू हो गई। बस आई थी। वह भी भीड़ में धकेलता बस में जा चढ़ा। सभी सीटें भर गई थीं। वह डंडे में हाथ डालकर खड़ा रहा। पहले जब बस में चढ़ता था और कोई सीट खाली न होती थी तो लड़के उसे देखकर जबरदस्ती अपनी सीट देते थे। लेकिन आज किसी को पता न था कि यह वही व्यक्ति है जिसके लिए नारे लगते थे, जिसे हर छात्र पहचानता था और उसकी इज्जत करता था। पहले यूनिवर्सिटी में छात्र राजनीति केवल लड़कों तक ही सीमित थी, लेकिन यह पहला व्यक्ति था, जिसने लड़कियों को भी भाग लेने के लिए उत्साहित किया। उसके विचार में छात्र केवल छात्र थे और जब तक सिंधी लड़कियां सक्रिय न होंगी, तब तक राजनैतिक और सामाजिक तौर पर हम आगे नहीं बढ़ पायेंगे। उसके उकसाने पर लड़कियों ने जनरल बाडी की मीटिंगों में शरीक होना शुरू किया था, नहीं तो वे इन बातों से दूर ही रहती थीं।

उसे एक बात याद आई :

वह दो तीन दोस्तों के साथ आर्ट्स फेकल्टी के लॉन पर बैठकर बातें कर रहा था तो कुछ लड़कियां वहां आईं और एक लड़की जो सभी में से सबसे ज्यादा बोल्ड लग रही थी, उससे रूबरू हुई :

‘‘मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहती हूं।’’

वह उस लड़की को पहचानता था। उसका नाम हमीदा था। उसने प्रथम वर्ष में दाखला ली थी, लेकिन नई होते हुए भी काफी सक्रिय थी। वह अपने कॉलेज यूनियन की नेता रह चुकी थी और अच्छी डिबेटर (बहसबाज) थी।

‘‘जी ज़रूर पूछिये, लेकिन पहले बैठो तो सही। आप खड़ी होकर ऐसे पूछ रही हैं जैसे लड़ने के लिए तैयार होकर आई हैं,’’ उसने मुस्कराकर कहा। लड़कियां हंसने लगीं और लॉन पर बैठ गईं।

‘‘अब फरमाइये?’’ उसने कहा।

‘‘यूनिवर्सिटी में आकर आप में से कितने ही लड़के औरतों की आजादी के समर्थक बन जाते हो। लेकिन अपने घर में अपनी बहनों को मजबूती से पकड़कर रखते हो। आप यह बर्दाश्त नहीं करते हो कि आपकी बहनें भी यूनिवर्सिटी में आएं और अजनबी लड़कों से बातें करें। आप परायी बहनों की आजादी के समर्थक हो और अपनी बहनों को बंद करके बैठे रहते हो। यह फर्क क्यों है?’’ हमीदा ने भाषण दे दिया।

‘‘यह फर्क अपनी जगह पर एक हकीकत है, इससे मुझे इंकार नहीं। हमारे लड़के/लड़कियां ज्यादातर गांवों से आते हैं जहां अभी तक परम्पराई समाज है। परम्पराई समाज में रस्मो रिवाज और पाबंदियों की जकड़ ज्यादा होती है। हम में एक मजबूत मिडिल क्लास पैदा न हो सका है जो माहौल में तब्दीली ला सके। इसलिए जिस माहौल में हम रहते हैं उसमें ऐसा फर्क होना कोई अजीब बात नहीं है।’’

‘‘अगर आपकी कोई बहन घर में बंद हो तो आप क्या करेंगे?’’

‘‘पहली बात तो बदकिस्मती से मेरी कोई बहन नहीं है। लेकिन अगर होती भी तो उसे उसे मां-बाप की मर्जी पर चलना पड़ता, न कि मेरी मर्जी पर। मैं अपने माँ-बाप को समझाने की कोशिश करता, लेकिन फिर भी आखिरी निर्णय उन्हीं का होता।’’

‘‘जो व्यक्ति अपना घर न सुधार पाए वह देश को क्या सुधारेगा?’’ हमीदा ने लड़कियों की ओर देखकर ताना मारा। लड़कियां खास अंदाज से हंसीं।

‘‘आपका मतलब है कि घर वालों को डंडे से सुधारें!’’

उसने ताने का उत्तर हंसकर दिया। लड़कों ने ठहाके लगाए।

हमीदा उठ खड़ी हुई और लड़कियों के साथ चली गई। उसके बाद हमीदा कभी सामने आती तो नाराज़ होकर चली जाती थी। एक बार उसने खुद हमीदा को रोका।

‘‘बात तो सुनिए!’’

‘‘जी?’’ हमीदा ने नाराज़ होकर कहा।

‘‘मुझे लगता है कि आपका मेरे ऊपर गुस्सा है। लेकिन मेरा दोष क्या है? अगर मुझसे कोई गल्ती हो गई हो तो उसके लिए मैं माफी तलबदार हूं...’’

‘‘नहीं नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं,’’ हमीदा ने एकदम कहा।

‘‘हो सकता है मैंने गलत समझा हो। खैर, बात यह है कि कल माई बख्तावर शहीद का दिन है। ठीक समझो तो इस अवसर पर आप भी कुछ बोलें।’’

‘‘लेकिन मुझे तो माई बख्तावर के बारे में ज्यादा कुछ जानकारी नहीं।’’

‘‘माई बख्तावर एक किसान थी जिसने अंग्रेज़ों के वक्त में किसानों के अधिकारों की खातिर लड़कर मरना कबूल किया। लेकिन बड़े लोगों के आगे न झुकी। आप माई बख्तावर की ओर से सिंधी औरत की राजनैतिक जागृती पर बोलना।’’

‘‘ठीक है, मैं कोशिश करूं गी।’’

‘‘नहीं, पक्का बतायें।’’

हमीदा ने उसकी ओर देखकर कुछ पल के लिए सोचा और फिर हंसकर कहा, ‘‘पक्का।’’

बस कैम्पस में दाखिल हो चुकी थी। उसे लगा अपनी गायब हुई दुनिया में सदियों के बाद लौटकर आया था। सब कुछ वैसा ही था/सब कुछ बदल गया था। वही जगहें थीं और हर बिल्डिंग की दीवार नारों से पटी हुई थी। नारे दिलकश नारे... खाली नगाड़े की तरह बजने वाले। नारे पढ़ते उसके अंदर क्रोध आने लगा। बस आर्ट्स फॉकल्टी के आगे जाकर खड़ी हुई। वह लोगों की भीड़ में पिसता नीचे उतरा।

vkV~Zl फॉकल्टी के आगे और अंदर लड़के लड़कियों के झुंड खड़े थे। गपशप, हंसी-मजाक, ठहाके थे। उन झुंडों के पास से होता हुआ अंदर घुसा। अनजान...किसी को भी विचार नहीं आया कि यह वही है। उसके अंदर से कोई चीखा : मैं हूं वह... वह मैं हूं... मैं हूं... और मुस्कराकर उसने खुद से कहा : तुम कुछ नहीं। तुझे इनमें से कोई नहीं पहचानता। वह ऑडीटोरियम के दरवाजे पर जा खड़ा हुआ। हॉल खाली था। इस हॉल में उसकी आवाज गूंजती थी और उसके पीछे तालियों और नारों की गूंज होती थी। वह ऑडीटोरियम में अंदर घुस गया और चलते चलते पहली लाइन के पास आ पहुंचा। कुछ देर तक उन खाली सीटों पर खड़ा रहा और फिर एक सीट पर जा बैठा। सामने डाईस पर तीन कुर्सियां रखी हुई थीं। बीच में बड़ी सिदारती (उद्घाटन) कुर्सी और उसके आस पास दो कुर्सियां। वह उन खाली कुर्सियों को ताकता रहा। उस स्टेज पर उसने आखिरी भाषण दिया था और घोषणा की थी कि हलचल जारी रहेगी जब तक छीने गये अधिकार वापस नहीं मिलते हैं। उसके दूसरी रात हॉस्टलों पर छापा पड़ा था और वह गिरफ्तार हो गया था। वह आंखें बंद करके सीट पर फैल गया। छात्र मंडल के नेताओं को शपथ लेने के लिए बैठक बुलाई गई थी। कसम लेने की रस्म पूरी होने के बाद मौसीक़ी का कार्यक्रम था। उसके सभी साथी काम को लग गये थे और वह खुद इस कार्य से अलग रहा। उसका काम था अपनी फेडरेशन के उम्मीदवारों को चुनाव में जिताना। वह काम पूरा हो चुका था। उसके ही ज़ोर भरने पर हमीदा लड़कियों के नेतृत्व के तौर पर चुनाव में खड़ी हुई थी और जीत गई थी। वह आडीटोरियम के पीछे लॉन पर बैठकर सिगरेट के ऊपर सिगरेट सुलगाकर पीता रहा। मौसीक़ी का कार्यक्रम शुरू हो चुका था। सभी लोग अंदर ऑडीटोरियम में थे और वह अकेला ही लान पर बैठा रहा। उसे लगा कि कोई उसके पास आकर खड़ा हो गया है। उसने गर्दन घुमाई।

‘‘आप यहां बैठे हैं!’’ हमीदा ने आश्चर्यचकित हो कहा था।

‘‘आओ बैठो,’’ उसने कहा। वह उसके सामने बैठ गई।

‘‘मैं आपको पूरे हॉल में ढूंढती रही...’’

‘‘इतनी भीड़ में घुस गई क्या मुझे ढूंढने के लिए?’’ वह हंसा।

‘‘शपथ लेते वक्त हम सभी डाईस पर बैठे थे और मेरी आंखें आपको एक एक सीट पर ढूंढती रही।’’

और उत्तर में उसने अयाज़ का शेर गुनगुनाया : ‘मेले में तुम तन्हा तन्हा, किसे ढूंढ रहे हो...’

‘‘आज साहब की मूड को क्या हुआ है? फंक्शन में क्यों नहीं चल रहे? सभी साथी पूछताछ रहे थे...’’

‘‘कोई खास बात नहीं। यहां आकर बैठा तो एकदम बैठ ही गया।’’

‘‘और ये इतनी सारी सिगरेट तुमने पी हैं? मैंने इतनी सारी सिगरेट पीते तुम्हें कभी नहीं देखा है। सच बताओ, बात क्या है?’’

‘‘बस आज मैं खुद को बहुत अकेला महसूस कर रहा हूं। आया था, लेकिन इतना शोर देखकर ऑडीटोरियम के दरवाजे से वापस लौट गया। अंदर जाने को मन नहीं हुआ।’’

‘‘लेकिन आखिर क्यों? यह शोरगुल और हंगामा कोई नई बात तो नहीं। तुम तो इन सबके आदी हो!’’

‘‘सब बेकार है, हमीदा छात्र राजनीति की ये अति है। यूनियन का लीडर और जनरल सेक्रेटरी दोनों उसी फेडरेशन के हैं, परंतु रात को यूनियन फंड के पैसों के बंटवारे को लेकर आपस में लड़ पड़े और एक दूसरे पर पिस्तौल तानकर खड़े हो गए।’’

‘‘यह बात मैंने भी सुनी है। है तो खेदजनक, लेकिन क्या करें! खैर, बाद में तो सहमत हो गए न आपस में?’’

वह हंसने लगा।

‘‘पूरा वर्ष केवल लड़ने और बनने में गुज़र जाएगा...’’

‘‘तुम्हें पहले मालूम नहीं था क्या कि छात्र राजनीति सतही और टेम्प्रेरी होती है!’’

उसने गौर से हमीदा की ओर देखा।

‘‘यह बात तुम्हारे दिमाग में कब आई कि छात्र राजनीति सतही और टेम्प्रेरी है?’’

‘‘यह तो साफ बात है। यहां से निकलने के बाद और सभी बातें भूल जायेंगे। हर किसी को अपने रोजगार की चिंता होगी। यहां की मौज मस्ती भूल जायेंगे। बाद में पता चलेगा कि प्रैक्टीकल लाइफ में किन किन मुसीबतों को मुंह देखा है।’’

‘‘तुम मुझसे ज्यादा प्रैक्टीकल निकलीं...’’ उसने हंसते कहा।

‘‘तुम समझते हो कि तुम्हें कोई केवल ऑईडलिस्ट बनकर रहने देगा?’’

‘‘क्यों? मुझे क्या करना पड़ेगा?’’ उसने आश्चर्यचकित हो पूछा।

‘‘प्रैक्टीकल व्यक्ति के साथ तुम्हें भी प्रैक्टीकल होना पड़ेगा, साहब मेरे।’’ हमीदा की हंसी के जवाब में वह केवल मुस्कराया। वह आखिरी वर्ष में था। हमीदा का विचार था कि एम.ए. करने के बाद वह सी.एस.एस. के लिए तैयारी करे। इस बात पर दोनों में बहस छिड़ जाती थी।

‘‘तुम ज़हीन (होशियार) हो। सी.एस.एस. की परीक्षा में टॉप करोगे। क्यों फालतू ऑईडलिस्ट बनकर अपनी सेवाओं को व्यर्थ गंवाना चाहते हो।’’

‘‘सेवाओं को काम में लाने का केवल यही एक तरीका है कि आदमी सरकारी मशीनरी का पुर्ज़ा बन जाए! मैं एक मामूली पुर्ज़ा बनना नहीं चाहता।’’

‘‘तुम पागल हो। पृथ्वी और लोगों की खिदमत आदमी कहीं भी कर सकता है। तुम्हारी कोई हैसियत होगी, तुम्हारे पास पॉवर होगा तो कुछ ज्यादा ही कर पाओगे।’’

इस बात पर उसने ठहाका लगाया।

‘‘ये केवल बातें हैं, खुद को और औरों को धोखा देने के लिए। हम करना खुद के लिए चाहते हैं, थोड़ा पृथ्वी और लोगों के लिए करते हैं। तुम्हें पता है पॉवर व्यक्ति को स्वार्थी बनाता है!’’

‘‘क्यों? जिंदगी बिताने के लिए खुद को कुछ नहीं चाहिए? इतना पढ़ने के बाद भिखारी बनकर जिंदगी बितायेंगे क्या? खुद को रहने के लिए अच्छा घर नहीं चाहिए... कार नहीं चाहिए... कल बच्चे होंगे तो उनके लिए चीज़ें नहीं चाहिए?’’

उसका मन उलझने लगा और उसने एकदम आंखें खोलकर चारों ओर देखा। वह हॉल में तन्हा तन्हा बैठा था और उसने खुद से पूछा : ‘‘उस घर को बनने से पहले गिराने पर मुझे क्या मिला? मेरे विचारों को, मेरे नज़रिये को कौन-सी ताकत मिली? फंक्शन वाली रात मैंने खुद को बहुत अकेला महसूस किया लेकिन हमीदा के वजूद ने मुझे सांत्वना दी थी कि मैं अकेला नहीं हूं और आज कोई सांत्वना नहीं है, दिल को सांत्वना देने वाला कोई नहीं है। वह कहां होगी! कैसी होगी!

उसने चाहा कि किसी से हमीदा के बारे में पूछे। लेकिन तुरंत ही उसने इस बात को छोड़ दिया। ऐसा हर किसी से पूछना ठीक बात नहीं थी। जब वह कारागृह में था तो किसी मित्र ने मुलाकात पर उसे बताया था कि हमीदा एम.ए. करने के बाद यूनिवर्सिटी में ही प्रोफेसर नियुक्त हुई थी। बाद में उसे पता चला कि पढ़ने के लिए स्कॉलरशिप पर इंग्लैंड गई थी। इससे ज्यादा उसे कुछ पता न था। हमीदा के वापस लौटने का उसे पता होता तो शायद वह यहां न आता।

‘परंतु मैं यहां पर आया क्यों हूं?’ उसने खुद से पूछा। मैं तो बिल्कुल ही आऊटसाइडर हूं यहां पर। यह बिल्डिंग, यह ऑडीटोरियम, यहां के पेड़, यहां के रास्ते... कोई भी तो मुझे नहीं पहचानता। लोग तो आते जाते रहते हैं। किसी के लिए मैं अनजान हूं, कोई मेरे लिए अनजान है। लेकिन यहां के पेड़, यहां के रास्ते और जगहें? और अगर इत्तेफाक से हमीदा मिल जाये तो? वह भी लोगों, जगहों, रास्तों और पेड़ों की तरह मिलेगी?’’

वह उठ खड़ा हुआ और उसने सोचा कि यहां आकर गल्ती की थी। एक बार फिर उसने अपने आप से पूछा कि वह यहां पर क्यों आया था? कौन-सी बात उसे यहां खींच लाई थी।

वह ऑडीटोरियम से निकलकर लंबे कॉरीडोर में आया। कुछ क्लास चल रही थीं। फॉकल्टी के अंदर के लॉन पर लड़के लड़कियां बैठे थे। वही चहल पहल थी। वही चकाचौंध थी। केवल वक्त वही न था। वक्त बहुत आगे बढ़ गया था और खुद बहुत पीछे रह गया था। उसके पैर भारी हो रहे थे, आगे बढ़ना मुश्किल हो गया था और अचानक उसके पैर जम गये। सामने से हमीदा आ रही थी। हमीदा ने देखा कोई व्यक्ति है जो पत्थर की मूर्ति बन गया था, बीच कॉरीडोर में। पास आकर उसके मुंह से अचानक निकला : ‘‘तुम...आप?’’ जमे होंठ हिले, वह केवल मुस्कराया।

‘‘आप कब आये?’’

‘‘अभी ही आया हूं...’’

‘‘मेरा मतलब है... कब... आपको कब छोड़ा?’’ हमीदा ने अटककर अपनी बात पूरी की।

वह हंसा। ‘‘दस बारह दिन हुए।’’

‘‘आओ... बैठो आकर।’’ हमीदा ने बीच कॉरीडोर में खड़े होकर बात करना ठीक नहीं समझा। ‘‘वह दूर मेरी ऑफिस है। आओ।’’

चलते चलते उसने कहा, ‘‘शुक्र है, किसी ने तो पहचाना। यहां तो सभी अनजान चेहरे हैं...’’

हमीदा ने कुछ न कहा, केवल उसकी ओर देखा। उसे लगा, जैसे पूछेगी : तुम्हें क्या ज़रूरत थी?

ऑफिस में घुसते ही हमीदा ने कर्मचारी को बोतलें लाने के लिए कहा।

कुर्सी पर बैठकर वह टेबल पर रखे कागजों को पलटने लगी। उसे लगा कि हमीदा कुछ नर्वस थी और उसकी ओर देखने से कतरा रही थी।

‘‘मैंने सुना था कि आप पढ़ने के लिए इंग्लैंड गए थे?’’ उसने शांति भंग की।

‘‘हां, तीन वर्ष तक वहीं पर थी,’’ उसका चेहरा कागजों में था।

‘‘वापस कब आए?’’

‘‘एक साल हो गया है,’’ हमीदा ने गर्दन ऊपर उठाकर उत्तर दिया और फिर से कागजों को उलटने पलटने लगी-जैसे कोई आवश्यक कागज ढूंढ रही हो।

कुछ वक्त तक शांति छाई रही। उसे लगा कि छह वर्ष बहुत बड़ा वक्त था, सौ वर्षों के बराबर।

कर्मचारी बोतलें लेकर आया। तभी हमीदा ने गर्दन ऊपर उठाई।

‘‘लीजिए।’’ उसने बोतल की ओर इशारा किया।

उसने बोतल उठाई और उसका मुंह हाथ से साफ करके एक बड़ा घूंट भरा।

‘‘अब क्या इरादा है आपका?’’ हमीदा ने पूछा।

‘‘इरादा? अभी तक तो कोई इरादा नहीं किसी बात का,’’ वह जबरदस्ती मुस्कराया।

‘‘मेरा मतलब है कि एम.ए. कम्पलीट करेंगे या?’’

‘‘रस्टीकेशन के पांच वर्ष तो गुजर चुके हैं। पता नहीं अब परीक्षा में बैठने की अनुमति मिलेगी या नहीं?’’

‘‘कोशिश करके देखिए। केवल परीक्षा ही तो देनी है, अनुमति मिलनी तो चाहिए,’’ हमीदा ने अनजान बनते कहा।

उसने चाहा कि हमीदा से पूछे, ‘तुम कैसी हो?’

‘‘आप काफी कमज़ोर बन गए हैं, वैसे जो जेल जाते हैं वे बैठकर खा खा कर तगड़े बनकर निकलते हैं,’’ हमीदा ने पहली बार मुस्कराकर उसकी ओर देखा।

जवाब में वह केवल मुस्कराया। हमीदा कुछ देर तक उसे देखती रही, जैसे भांपना चाहती हो, फिर एकदम नज़रें हटाकर कागजों में देखने लगी।

उसने पूछना चाहा, ‘तुम अभी तक नाराज़ हो मुझसे?’ लेकिन छह वर्ष बहुत बड़ा वक्त था।

हमीदा ने घड़ी में वक्त देखा।

‘‘माफ कीजिएगा, मुझे क्लास लेनी है,’’ वह अचानक उठ खड़ी हुई। वह भी उठ खड़ा हुआ।

‘‘ओह! एक मिनट...’’ हमीदा को कोई बात याद आ गई। उसने टेबल का पट खोला। उसमें से लिफाफे में पड़ा कार्ड निकालकर टेबल पर रखकर उसका नाम लिखा।

‘‘अच्छा हुआ जो आप खुद मिल गये। अगले हफ्ते मेरी शादी है, आना,’’ हमीदा ने कार्ड उसकी ओर बढ़ाया। उसने हमीदा से लिफाफा लेते वक्त केवल लिफाफे की ओर देखा। वह समझ तो रहा था कि क्यों हमीदा की ओर देखने से कतरा रहा था।

‘‘ओके, सी यू,’’ हमीदा ने कहा और जल्दी बाहर निकल गई।

वह भी बाहर निकल आया। एक बहुत बड़ी खाई उत्पन्न हो गई थी जो उसके दिमाग को, सोच को, उसके वजूद को निगल गया। वह धीरे धीरे चलता, लंबा कॉरीडोर लांघता बाहर निकला। फॉकल्टी के आगे बस स्टॉप पर आकर लड़के लड़कियों के साथ खड़ा हो गया और बस के आने का इंतजार करने लगा।

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