व्यंग्य // आनंद ही आनंद // राजशेखर चौबे

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आनंद ही आनंद

आनंद एक ऐसा शब्द है जिसे पढ़कर ही आनंद आ जाता है। आनंद की अनुभूति जिसे होती है वही इसका आनंद उठा सकता है। यह अनुभूति सभी को मयस्सर नहीं है बल्कि यह कहना अधिक सही होगा कि बहुत ही गिने-चुने लोगों को ही यह मयस्सर है। अचानक आनंद की चर्चा इसीलिए क्योंकि म0प्र0 की कैबिनेट ने प्रदेश में ‘आनंद‘ विभाग के लिए मंजूरी दे दी है। मुख्यमंत्री के पास ही यह विभाग रहेगा और यह एक सोसायटी ‘राज्य आनंद संस्थान‘ के जरिए संचालित होगा। इस हेतु 3.60 करोड़ रूपये का प्रावधान रखा गया है। आखिर आनंद है क्या ? क्या यह मंत्रालय केवल 3.60 करोड़ रूपये से 7.2 करोड़ लोगों को आनंद की पूर्ति कर सकेगा। म0प्र0 की पूरी आबादी को 50-50 पैसा प्राप्त होगा। व्यापम घोटाले के लाभार्थियों को हटाने पर इसमें कितनी वृद्धि होगी यह कोई बड़ा अर्थशास्त्री ही बता सकता है। इस विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों के आनंद का ध्यान अवश्य ही रखना पड़ेगा। जब वे ही आनंदित नहीं होंगे तब वे किस तरह दूसरों को आनंद प्रदान कर पाएंगे। वे आनंद का आवागमन ( आवागमन के बदले प्रवाह कहना उचित होगा ) कैसे सुनिश्चित करेंगे यह अभी भविष्य के गर्भ में है। सभी के लिए आनंद की परिभाषा अलग-अलग है। भूखे के लिए रोटी और प्यासे को पानी मिलने पर जो आनंद प्राप्त होता है वह दूसरों के लिए अकल्पनीय है।

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ता निर्माण के नहीं बल्कि विध्वंस के हामी हैं। एम0एन0एस0 के कार्यकर्ता मल्टीप्लेक्स के सीसे तोड़कर, आनंदित होते हैं। समाज के ठेकेदारों को ‘वेलेंटाईन डे‘ में प्रेमी युगलों की पिटाई में आनंद आता है। जाट आरक्षण के लिए रेल की पटरियाँ उखाड़कर उसके नीचे आनंद की खोज करते हैं। नेता अभिनेता, अधिकारी व्यापारी उद्योगपति बड़ी पार्टियों के कार्यकर्ता हमेशा आनंद में रहते हैं। बाबा परमानंद में रहते हैं और दूसरों को सीख देते है- ‘‘संतोषी सदा सुखी‘‘ बड़े लोग आम जनता को समझाते है भौतिकवाद के पचड़े में मत पड़ो। आध्यात्म की ओर जाओ वहीं सुख-शांति है। सांसारिक भोग विलास सभी दुखों की जड़ है, उन्हें हमारे लिए छोड़ दो। आदिवासियों को बताया जाता है कि तुम अपनी पारंपरिक रीतिरिवाजों से बंधे रहो तभी तुम्हारी पहचान व अस्मिता बनी रहेगी। लंगोटी बांधकर जंगल में कंद-मूल खाकर पड़े रहो, इसी में आनंद की प्राप्ति है। पढ़ाई-लिखाई या किसी और तरह से आर्थिक संपन्नता मिलने पर दुखों का दौर प्रारंभ हो जाएगा। तुम्हें इस सांसारिक मोह-माया से दूर रहना है।

हम समाचार पत्रों में पढ़ते हैं कि हमारे देश में करोड़पतियों एवं अरबपतियों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। इस मामले में भारतवर्ष पांचवे नंबर पर आ गया है। यह खबर पढ़कर आम जनता के साथ-साथ भिखारी भी आनंदित हो जाते है। इनका भी सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। भिखारी शायद अधिक भीख की आस में आनंदित हो जाते है। आम आदमी सपने देखता है और एक यूटोपिया में निवास करता है। वह यही सोचकर प्रसन्न होता है कि वह एक विकासशील राष्ट्र से विकसित राष्ट्र की राह पर अग्रसर है। हम यह नहीं सोचते हैं कि करोड़पतियों व अरबपतियों की संख्या के साथ-साथ गरीबों की संख्या भी बढ़ती जाती है।

यह भी पता चला है कि ‘हेप्पीनेस‘ मंत्रालय ने एक माह के अंदर एक परिपत्र निकाला है और सबसे कहा गया कि आप अपनी जरूरत या पसंद की वस्तु का नाम बताएं जिससे आपको आनंद की प्राप्ति हो सके सभी तरह की वस्तुओं की मांग आई है जैसे रोटी, चावल, दाल, परमिट, लाइसेंस, दवाई, सायकल, बाईक स्कूटर, कार, हेलीकाप्टर, हवाई जहाज, कपड़ा, मकान, विला आदि आदि। सभी वस्तुओं का नाम लिखा जाए तो एक महाकाव्य की रचना हो जाएगी। अब आनंद मंत्रालय के अधिकारी व कर्मचारी-गण सिर पकड़कर बैठे हैं कि किस तरह 3.60 करोड़ रू. में इन सभी वस्तुओं की पूर्ति की जाएगी। एक काबिल अधिकारी ने रास्ता सुझाया, फलस्वरूप सभी आवेदकों को एक संदेश भेजा गया-

‘आपके आवेदन पर कार्यवाही चल रही है, अगले चुनाव के पश्चात् आपकी वांछित वस्तु प्रदान करना संभव हो सकेगा वह भी जब हमारी सरकार बने, तब तक आप जाप करें- ‘संतोषी सदा सुखी‘।

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परिचयः-

एक प्रबुद्ध, स्वतंत्र लेखक एवं व्यंग्यकार । श्री राजशेखर चौबे कविता, कहानी लेख आदि लगातार लिख रहे हैं लेकिन उनकी प्रथम रूचि व्यंग्य ही है । वे श्री हरिशंकर परसाई एवं श्री शरद जोशी से विशेष प्रभावित हैं। व्यंग्य की विधा में उनकी अभिरूचि उनकी विशिष्टता व्यक्त करती है । इस क्षेत्र में उनकी लेखनी बहुत ही पैनी है । व्यंग्य संग्रह ‘आजादी का जश्न‘ में उन्होंने हमारे आस-पास की सम-सामयिक घटनाओं पर ही व्यंग्य तैयार किया है । ‘आजादी का जश्न‘ भावना प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई एवं अमेजन सेल पर भी उपलब्ध है ।

राजशेखर चौबे,

पता- मकान नं. 295/ए

रोहिणीपुरम रायपुर

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