एक भयभीत व्यक्ति // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी

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वह फुटपाथ पर रखी सेकंड हैंड और रद्दी पुस्तकों के स्टालों पर बारी बारी से ठहरकर पुस्तकें जाँचने लगा। एक जगह उसे ‘‘गॉड फादर’’ उपन्यास नजर आया। कीमत पूछी, बीस रुपये। उसने आश्चर्य से स्टाल वाले की ओर देखा।

‘‘दुकान पर यह पुस्तक आपको चालीस-पचास रुपये में मिलेगी।’’ स्टाल वाले ने कहा।

‘‘वह तो अच्छी हालत में होगी। इसकी हालत तो खराब लगी पड़ी है।’’

‘‘आपकी मर्ज़ी। मशहूर उपन्यास है। इस पर फिल्म भी बनी है, जिसमें मार्लिन ब्रांडो ने काम किया है। पाकिस्तान में इस फिल्म पर बंदिश है।’’ स्टाल वाले ने अपनी जानकारी व्यक्त करते हुए कहा। उसने बिना कुछ कहे पुस्तक स्टाल वाले को लौटा दी।

वह चलता दूसरे स्टाल पर आकर खड़ा हुआ। मोटी पुस्तकों के बीच उसने नोबोकोफ का उपन्यास ‘‘लोलीता’’ पड़ा देखा, पक्की बाईंडिंग के साथ, अच्छी हालत में। उसने कीमत पूछी। दस रुपए।

‘‘आठ रुपए लो।’’

स्टाल वाले ने बिना बहस के पुस्तक दे दी।

काफी समय से उसे ‘‘लोलीता’’ पढ़ने का शौक था।

स्टाल वाला कीमत कम न करता तो भी वह लेता।

शाम हो चुकी थी। कराची में रात की रोशनी जगमग जलने लगी। जॉर्ज होटल के आगे फुटपाथ पर बहुत ज्यादा भीड़ थी। जोर जोर से कैसटों के बजने का शोर था। वह लोगों की भीड़ में से पिसता चला। उसकी सांस घुटने लगी। वह सब-वे की ओर से मुड़कर विक्टोरिया रोड पर आया। कपड़ों की दुकानों से चलते उसे विचार आया कि एक नई पतलून और कमीज के लिए कपड़ा ले। पगार के पूरे पैसे उसकी जेब में थे। पिछले महीने उसने जो पतलून ली थी वह भी दर्जी से लेनी थी। उसे नए कपड़े खरीद करने की इतनी ज़रूरत नहीं थी। उसने अपना विचार बदल दिया। फिर सोचा कि किसी अच्छी होटल में बैठकर चाय पीये और ‘‘लोलीता’’ के पन्ने  पलटे। शाम का जुल्म उसे किसी भी प्रकार सहन कर गुजारना था। उसका दिल बैठने लगा। वह पैराडाईज सिनेमा के पास रास्ता लांघने के लिए आ खड़ा हुआ। एक औरत भी ट्रेफिक बंद होने का इंतजार कर रही थी। उसने औरत की ओर देखा। वह लगभग 28-30 वर्ष की थी। रंग सांवला था और चेहरा आकर्षक। औरत ने भी उसकी ओर देखा और फिर ट्रेफिक की ओर देखने लगी। ट्रेफिक बंद हुई तो वे रोड क्रास कर फुटपाथ पर आए। चलते चलते औरत ने एक बार फिर उसकी ओर देखा। उसे अनुभव नहीं था, फिर भी उसने अंदाजा लगाया कि वह ‘प्राईवेट’ थी और ग्राहक की तलाश में थी। उसने सोचा कि उससे बात करे और पता करे कि उसका भाव कितना है। लेकिन अगर वह प्राईवेट न हुई और उसका बोलना उसे खराब लगा तो! वह सोच में पड़ गया। जेब में पगार के पूरे पैसे थे। वह खर्च कर सकता था, लेकिन उसे समझ में न आ रहा था कि औरत से बात कैसे करे। लोग तो अच्छी भली औरतों को फांस लेते हैं और वह एक प्राईवेट औरत से भी बात न कर पा रहा था। उसने खुद को हिम्मत दिलाई। औरत ने उसकी ओर तिरछी नज़रों से देखा और उसने समझा कि औरत के होंठों पर हल्की मुस्कराहट थी। उसने सोचा कि अगर आस पास कोई आदमी न हो तो उससे बात करे। औरत किसी भी ओर मुड़ने के बजाय सीधी चलती रही। रैक्स सिनेमा के आगे आखिर उसे मौका मिला। उसने दिल को मजबूत कर कदम बढ़ाये और औरत के पास आकर निगलते ‘‘हैलो’’ कहा। औरत ने उसकी ओर देखा और मुस्कराई।

‘‘हैलो,’’ औरत ने उत्तर दिया। उसकी हिम्मत थोड़ी बढ़ी।

‘‘बुरा ना मानें तो कहीं बैठकर चाय पीयें।’’

उसे यह पंक्ति बड़ी अजीब लगी लेकिन उसकी समझ में न आ रहा था कि प्राईवेट औरत से किस प्रकार बात करते हैं।

‘‘ठीक है,’’ औरत ने कहा।

‘‘विलेज होटल में बैठें?’’ चर्च के फुटपाथ पर आकर उसने पूछा।

‘‘आपकी मर्जी, जहां भी चलकर बैठें।’’

दोनों साथ चलते विलेज होटल के झोंपड़े में आकर बैठे, वेटर मीनू लेकर आया। मीनू देखकर उसने पूछा,

‘‘क्या मंगायें?’’

‘‘कुछ भी मंगायें’’, औरत ने अपनेपन से कहा। उसने आश्चर्य से औरत को देखा और उसे आश्चर्य हुआ, जैसे वह उसको पहचानता हो और उसने सब कुछ उसकी मर्जी पर छोड़ दिया हो। उसने वेटर को चिकन सैंडविच और चाय लाने को कहा।

‘‘जी?’’ उसने शुरुआत करनी चाही।

‘‘जी! आप बतायें?’’ औरत की आंखें मुस्कराने लगीं। वह एक सीधी सादी औरत थी जिसमें कोई भी अचंभे वाली बात नहीं थी। न ज्यादा मेकअप, और न ही कपड़ों से फैशनेबल लगने वाली। वह बिल्कुल गृहस्थी औरतों की तरह थी। ‘लेकिन किसी मजबूरी ने उसे इस धंधे में धकेला होगा’, उसने सोचा।

‘‘तुम्हें घर जाने की जल्दी तो नहीं?’’ उसने पूछा।

‘‘नहीं ऐसी कोई खास जल्दी तो नहीं,’’ औरत ने उत्तर दिया।

उसने सोचा कि उससे पूछे कि तुम्हारा घर कहां है, लेकिन उसे यह बात ठीक न लगी। ऐसी औरत अपना घर का पता नहीं बतायेगी और पूछने से फायदा भी क्या। लेकिन कुछ न कुछ तो बात करना ज़रूरी था। समस्या ये थी कि बात क्या करें? और उसे औरत कुछ उलझी उलझी सी लग रही थी या यह उसका भ्रम था।

‘‘तुम्हें मेकअप करना अच्छा नहीं लगता क्या?’’

‘‘क्यों? मैं मेकअप के सिवाय अच्छी नहीं लगती क्या?’’

औरत ने हंसकर कहा।

‘‘अच्छी तो लगती हो,’’ उसने औरत की आंखों में देखते कहा।

‘‘हां, तुम बिना मेकअप ज्यादा सुंदर लगती हो।’’

वह हंसने लगी, ‘‘ऐसी बातें मत कर जो मैं सचमुच खुद को समझने लगूं।’’

वह औरत को देखता रहा। उसने अपने मन को कुछ भारी महसूस किया। उसने चाहा कि औरत का मुंह अपने हाथों में पकड़कर उसकी आंखों में देखता रहे और उसमें खुद को ढूंढे।

‘‘मुझे ऐसे क्यों देख रहे हो? मैं इतनी सुंदर तो नहीं...’’

‘‘मैं तुम्हारी आंखों में कुछ ढूंढ रहा हूं।’’

औरत को आश्चर्य हुआ।

‘‘मुझे तुम्हारी बात समझ में नहीं आई...’’

समझने की ज़रूरत भी क्या है। दो तीन घंटों में एक दूसरे को समझकर क्या करेंगे!’’ वह गंभीर हो गया।

अजीब आदमी है, औरत ने सोचा। लेकिन वह यह नहीं समझ पा रही थी कि क्यों उसे उसके लिए इतनी हमदर्दी महसूस हो रही थी।

वेटर सैंडविच लेकर आया था। दोनों खाने लगे। उसके बाद नैपकिन से हाथ पोंछते औरत ने कहा : ‘‘हमें कहां चलना है?’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘कोई जगह है या होटल में कमरा लेना पड़ेगा?’’

वह मतलब समझ गया। ‘‘इसकी ज़रूरत नहीं। हमें न किसी जगह पर चलना है और न होटल के कमरे में।’’

औरत उसे आश्चर्य से देखने लगी।

‘‘फिर तुम मुझे क्यों ले आए हो?’’

‘‘मैं तुम्हें इसके लिए नहीं लेकर आया हूं,’’ उसने मुंह बनाकर कहा। उसने देखा कि औरत के चेहरे पर मायूसी छा गई है।

उसने जेब से पगार के पैसे निकालकर टेबल पर रखे।

‘‘दो-तीन घंटों के लिए तुम्हारी जो फीस है वह इनमें से ले लो।’’

औरत को कुछ भी समझ में न आया। उसे यह सब अजीब अजीब लग रहा था। इस प्रकार के व्यक्ति से उसका कभी पाला नहीं पड़ा था। उसने नोटों की ओर देखा और अंदाजा लगाया कि लगभग हजार होंगे। उसने व्यक्ति की ओर देखा, जो बिना देखे उसे ताक रहा था और खुद पता नहीं कहां था। वेटर आया और खाली प्लेटें लेकर गया। थोड़ी देर के बाद चाय लेकर आया।

‘‘नहीं, मुझे ऐसे पैसे नहीं चाहिए,’’ आखिर औरत ने कहा।

‘‘क्यों? ये पैसे मैं तुम्हें भीख में नहीं दे रहा हूं। यह तुम्हारे दो-तीन घंटों की फीस है।’’

‘‘अजीब व्यक्ति हो तुम! मुझे समझ में नहीं आ रहा कि तुम बेकार ही क्यों मुझे इतने पैसे दे रहे हो। तुम्हें क्या मिला?’’

वह मुस्कराया।

‘‘तुम्हें क्या पता कि मुझे क्या मिला। नहीं, तुम यह बात सचमुच समझ भी

न पाओगी। खैर, बात व्यवहार की है। मैंने तुम्हारा वक्त लिया है और उसकी फीस मुझे ज़रूर भरनी चाहिए। तुम्हें जितना ठीक लगे इसमें से उतने ले लो।’’

‘‘तुम्हारे पास पैसे ज्यादा हैं क्या?’’ औरत ने चाय बनाते कहा।

‘‘ज्यादा तो नहीं हैं। मैं एक मामूली कर्मचारी हूं। ये मेरी पगार के पैसे हैं।’’

‘‘और ये पैसे तुम इस प्रकार गंवा देना चाहते हो?’’

‘‘अगर मैं होटल में कमरा लेता और तुम्हें वहां लेकर चलता तब मैं समझता कि मैंने पैसे गंवा दिये, लेकिन ये सब मैं अपनी खुशी से कर रहा हूं। मुझे केवल तुम्हारा साथ चाहिए। मैं तुमसे बातें करना और तुम्हारे साथ रास्तों पर घूमना चाहता हूं। इससे ज्यादा मुझे और कुछ नहीं चाहिए।’’ उसका स्वर गंभीर हो गया।

औरत आंखें नीचे किये अपने हाथों को देखने लगी।

‘‘तुम समझती होगी कि मैं कोई पागल हूं।’’ उसने हंसते कहा।

‘‘नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं,’’ औरत को शर्म महसूस होने लगी। ‘‘अच्छा, पैसे तुम अपने पास रखो, मुझे कुछ खरीद कर देना।’’

‘‘हां, यह भी ठीक है।’’ उसने पैसे लेकर जेब में डाले। औरत ने देखा कि वह खुश हो गया था। उसने टेबल पर रखा औरत का हाथ अपने हाथ में ले लिया और उसे देखने लगा। फिर हाथ को ऊपर उठाकर पास लाया और हथेली पर अपने होंठ रख दिये। वह हर गुजरते पल को पीता रहा। वेटर एक बार फिर आया और अंदर देखकर चला गया।

‘‘तुम ऐसे क्यों हो?’’ औरत बुदबुदाई।

‘‘ऐसा कैसा?’’

औरत सोचने लगी कि वह उसे कैसे अपनी बात समझाए। वह चुप हो गई। वह औरत की बांहों पर उंगलियां फेरने लगा।

‘‘सुनो...’’ औरत बुदबुदाई।

‘‘कहो?’’

औरत ने कुछ न कहा।

‘‘क्या बात है? कहती क्यों नहीं?’’ उसने हाथ बढ़ाकर औरत के गाल पर रखा और औरत की गर्दन उसके हाथ पर झुक गई।

‘‘तुम्हारी बीवी होगी! तुम्हारे बच्चे होंगे!’’ औरत ने हिचककर कहा।

‘‘न मेरे बच्चे हैं और न मुझे बीवी है।’’

‘‘तुम बिल्कुल अकेले हो!’’ औरत ने आश्चर्य से कहा, ‘‘तुम्हारा कोई नहीं।’’

‘‘मेरा कोई भी नहीं।’’ उसने कहा और सोचा कि औरत से पूछे, ‘तुम मेरी बनोगी?’ लेकिन वह कह न पाया। औरत को शायद उसके अकेलेपन की बात सुनकर हमदर्दी महसूस हुई थी। उसने उसके हाथ को हल्के से दबाया।

उसने चाहा कि औरत का नाम और हालचाल पूछे, लेकिन फिर उसने वह विचार बदल दिया। इससे कुछ फर्क न पड़ता। वह एक औरत थी, उसके पास बैठी थी, उससे बातें कर रही थी और यही उसके लिए काफी था। वह कौन थी, यह पूछकर वह क्या करता। उसे प्राप्त कुछ न होता। यही कुछ घंटे, जो वह उसके साथ थी, उसकी प्राप्ति थे। उन घंटों से पहले और उन घंटों के बाद दोनों का एक दूसरे से कोई संबंध नहीं था, कोई पहचान नहीं थी। उसे किसी के साथ की ज़रूरत थी। वह साथ जो उसे इतने सारे जगमग शहर में न मिल पाया था, वह उसने पैसे से खरीद लिया था। बस, इससे ज्यादा उसे कुछ नहीं चाहिए था।

उसने घड़ी में वक्त देखा। आठ बजने वाले थे। वह परेशान हो गया।

‘‘अरे! आठ बज रहे हैं, दुकान तो बंद हो गये होंगे,’’ उसने घबराकर कहा।

‘‘नहीं, दुकान देर तक खुले होंगे। ईद समीप है न,’’ औरत ने कहा।

तभी उसे याद आया कि ईद में तीन दिन बाकी हैं। जिस दिन का लोग इतना इंतज़ार करते हैं, इतने पैसे खर्च करके कपड़े और सामान लेते हैं, वह उसके लिए बहुत ही बोरियत वाला दिन होता है, वह पूरा दिन सोया पड़ा रहता है। किसी के पास जाना या किसी से मिलना पसंद नहीं करता।

‘‘अब चलना चाहिए,’’ उसने वेटर को बुलाकर बिल मंगवाया और पैसा देकर औरत के साथ उठा।

दोनों धीरे धीरे घूमने के अंदाज में फुटपाथ पर चलने लगे-जैसे रोज वे ऐसे ही घूमते हों... जैसे यह उनकी रुटीन थी।

‘‘मुझे ऐसा लग रहा है जैसे कि हम दोनों रोज ही रात को कराची के रास्तों पर ऐसे ही घूमने निकलते हैं और आज भी ऐसे ही घूम रहे हैं,’’ वह हंसने लगा।

‘‘हां, मुझे भी ऐसा ही लग रहा है,’’ औरत भी हंसने लगी।

‘‘जैसे कि हम वर्षों से एक दूसरे को पहचानते हों और साथ रहते हों...’’

‘‘हूं...’’ उसने हुंकारकर औरत की आंखों में देखा और वह सचमुच शर्मा गई। उसे औरत के शर्माने पर मज़ा आया और ठहाका लगाया।

‘‘गंदे!’’ औरत ने झूठे गुस्से से उसके कंधे पर चपत लगाई। उसने हंसते हंसते औरत का हाथ अपने हाथ में लिया और फिर इकठ्ठे हंसने लगे। हंसने का कोई कारण न था, लेकिन उन्हें बेवजह हंसी आ रही थी। दोनों खुश थे।

वे देव सिनेमा का रास्ता क्रास करके ऐल्फी में दाखिल हुए।

‘‘तो मैडम कौन-सी खरीदारी का इरादा रखती हैं?’’

‘‘मैं ईद के लिए एक ड्रेस लूंगी। तुम भी ईद के लिए एक ड्रेस लेना, नहीं तो पैसे फालतू खर्च हो जाएंगे। कपड़े होंगे तो काम में आते रहेंगे।’’

‘‘नहीं, मैं ईद के लिए कपड़े नहीं लेता।’’

‘‘क्यों?’’

‘‘मैं ईद पर कहीं निकलता ही नहीं, फिर कपड़े लेकर क्या करूं गा!’’

‘‘ओह...!’’ औरत को जैसे कुछ समझ में आ गया था और उसे अपनी गल्ती का अहसास हुआ। उसने औरत के हाथ पर दबाव डाला-शायद यह कहने के लिए कि ‘‘कोई बात नहीं।’’

‘‘भला क्या किसी खास दुकान से कपड़ा लेना है?’’ उसने मजाकी अंदाज में पूछा।

‘‘नहीं, क्लॉथ मार्केट में चलते हैं।’’ औरत ने उसके चेहरे में देखा और हंस पड़ी।

वे दोनों क्लॉथ मार्केट में आए। एक दुकान में घुस गए। औरत अलग अलग प्रकार के कपड़े देखने लगी और उससे राय पूछती गई।

‘‘मुझे कपड़ों की जानकारी नहीं। तुम्हारी मर्जी, तुम्हें जो अच्छा लगे वो लो,’’ उसने कहा। आखिर औरत ने कपड़ा पसंद किया। कीमत पर दुकानदार से लड़ पड़ी। वह बिना झिक झिक के पैसे देने के लिए तैयार था, लेकिन औरत ने उसे रोका।

‘‘तुम चुपचाप खड़े रहो। आप मर्दों को वैसे ही दुकानदार लूटते हैं।’’ वह चुपचाप खड़ा रहा। औरत दुकानदार से बहस करने लगी।

‘‘अभी दो-तीन दिन पहले मेरी सहेली यही कपड़ा लेकर गई है। मुझे कीमत मालूम है। हम ईद वाली कीमत नहीं देंगे।’’

दुकानदार कसम खाने लगा कि वह ईद का भाव नहीं ले रहा, लेकिन औरत विश्वास करने के लिए तैयार ही नहीं थी, वह दुकान से बाहर जाने लगी, तो दुकानदार ने पीछे से आवाज दी : ‘‘ठीक है लेकर जाइये।’’

‘‘देखा!’’ औरत ने मुस्कराकर कहा, ‘‘ये दुकानदार बड़े हरामी होते हैं।’’

दुकानदार ने कपड़ा काटकर पैकेट में बंद किया। उसने जेब से पैसे निकालकर दुकानदार को दिये। दुकान से बाहर आए तो एक भिखारिन ने उनसे भीख मांगी।

‘‘खुदा जोड़ी सलामत रखे...’’ दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा और मुस्करा दिए। उसने जेब से एक रुपया निकालकर भिखारिन को दिया।

‘‘बेचारी भिखारिन! उसकी दुआ बेकार गई...’’ आगे चलकर उसने हंसकर कहा। औरत चुप थी।

‘‘और भी कुछ लेना है?’’ उसने पूछा।

‘‘नहीं, बस।’’

‘‘शर्म मत कर।’’

‘‘नहीं, शर्म कैसी। मुझे और किसी चीज़ की आवश्यकता नहीं है।’’ औरत ने उसे विश्वास दिलाया।

‘‘और अब?’’ उसने औरत से पूछा।

‘‘और अब?’’

‘‘अब क्या प्रोग्राम है?’’

‘‘मेरा तो कोई प्रोग्राम नहीं है। जैसा तुम कहो?’’

‘‘चल तो कहीं चलकर खाना खायें।’’

‘‘खाना? लेकिन मुझे तो भूख नहीं।’’

‘‘चाईनीज़ में चलते हैं। हल्का खाना है। ठीक है न?’’

‘‘ठीक है। जैसी तुम्हारी मर्जी,’’ औरत ने बात मानते कहा।

चलते चलते औरत ने कहा, ‘‘ईद के कारण इतनी जगमग है, नहीं तो वैसे आठ बजे के बाद सुनसान होता है।’’

‘‘हां, आज सच में जगमग है। मुझे भी नज़र आ रही है,’’ उसने औरत की ओर देखते कहा।

‘‘मुझमें क्या देख रहे हो? जगमग रास्तों पर है, मुझमें नहीं,’’ औरत ने ठहाका लगाया।

‘‘मुझे तो तुम्हारे कारण जगमग महसूस हो रही है,’’ उसने संजीदा बनते कहा।

‘‘सच?’’ औरत भी संजीदा बन गई।

‘‘सच।’’ और उसने देखा कि औरत के चेहरे पर उदासी आ गई थी।

दोनों कैफे हांगकांग में आकर बैठे। देर होने के कारण केवल तीन-चार जोड़ी बैठे थे।

‘‘तुम बोर तो नहीं हो गई हो?’’

‘‘नहीं, बिल्कुल नहीं, कमाल है, तुमने ऐसा कैसे समझा!’’ औरत ने मुस्कराते और नाराज़ होते कहा।

‘‘पता नहीं! मैं तो ऐसा ही समझता हूं कि मेरे साथ से दूसरे को केवल बोरियत ही प्राप्त होती है।’’

‘‘तुम भी अजीब आदमी हो। अपने लिए खुद ही विचार बना बैठे हो,’’ वह हसंने लगी।

‘‘खैर, मेरी आजी की शाम तुम्हारे नाम है। शायद मेरे ज़िंदगी की यह पहली शाम है, जो तुम्हारे कारण बोरियत के बिना गुज़र गई और मुझे पता भी न चला।’’

‘‘लेकिन मैंने तो कुछ भी नहीं किया है!’’

वह हंसकर चुप हो गया।

जब तक उन्होंने खाना खाया, होटल लगभग खाली हो चुकी थी। उसने बिल मंगाकर पैसे दिये। बाहर आकर उसने कहा, ‘‘अब तुम जाओगी?’’

‘‘हां जाना तो पड़ेगा ही,’’ औरत ने हंसकर कहा।

‘‘कोई टैक्सी लेनी चाहिए...’’ वह इधर उधर टैक्सी के लिए देखने लगा।

‘‘थोड़ा चलते हैं। सदर में टैक्सी मिल जाएगी,’’ औरत ने कहा और दोनों चलने लगे। उसे अपना मन भारी भारी और थका हुआ महसूस होने लगा। इस अहसास को दबाने के लिए कुछ बात करनी चाही।

‘‘अगर फिर कभी तुम कहीं मिल जाओ तो मुझे पहचानोगी?’’

‘‘मैं तुम्हें भूल नहीं पाऊंगी,’’ औरत ने पूरे संजीदगी से उत्तर दिया। वह ठहाका लगाने लगा।

‘‘क्यों? इसमें हंसने की क्या बात है?’’

‘‘यह डायलॉग तो फिल्म में हीरोईन बोलती है,’’ वह अभी तक ठहाके लगा रहा था। औरत ने उसकी ओर देखा और उसकी नज़रों में दुख था।

वह अचानक चुप हो गया और कहा, ‘‘टैक्सी तो नज़र ही नहीं आ रही...’’ औरत ने कुछ न कहा। समझ गया कि उसकी बात ने औरत को दुख पहुंचाया है, लेकिन वह कर भी क्या सकता था। उसे औरत की पंक्ति बिल्कुल परम्पराई प्रकार का लगा था और... और हंसना तो उसने जानबूझकर चाहा था।

दोनों चलते रहे और दोनों चुप थे। ट्रेफिक कम हो गई थी और शहर का शोर थक टूटकर कमजोर पड़ गया था। वे एक दूसरे से दूर दूर चल रहे थे। एक खाली टैक्सी पास से गुज़री। उसने इशारा कर टैक्सी रुकवाई। दोनों आगे बढ़कर टैक्सी के पास आए। उसने पिछला दरवाजा खोला और औरत चुपचाप टैक्सी में जा बैठी। उसने ड्राइवर को भाड़े के लिए दस रुपए का नोट निकालकर दिया और फिर टैक्सी की खुली खिड़की के पास झुककर औरत को देखा और भारी आवाज़ में कहा, ‘‘साथ के लिए शुक्रिया...’’

औरत ने आंखें उठाकर उसे देखा। उसकी आंखें गीली थीं... या उसे ऐसा लगा था। टैक्सी दोनों की नज़रों से ओझल हो गई।

वह ऐम्प्रेस मार्केट के बस स्टॉप पर आया। अपनी बस में चढ़ गया। पूरे रास्ते उसका दिमाग खाली था। घर के समीप स्टॉप पर बस से उतरा और सुनसान गली लांघकर अपने कमरे के दरवाजे के आगे आकर खड़ा हुआ। दरवाजा खोलकर दरवाजे के समीप दीवार पर बटन टटोलकर बत्ती जलाई। कमरे में रोशनी फैल गई। वह हड़बड़ाकर डरकर दरवाजे पर ही खड़ा रहा। कमरे की वीरानी और अकेलेपन की दहशत एकदम से उसके ऊपर छा गई। वह आंखें फाड़कर आश्चर्य और डर से कमरे को देखने लगा। कमरे में रखी हर चीज़ मरी हुई थी। उसे अचानक मौत का अहसास हुआ और उसके मन में डर भर गया। दिल उछलकर गले में अटक गया। उसने चाहा कि पीछे भागे, लेकिन उसके पैर पथरा गये थे। उसे महसूस हुआ कि कमरे में भरा हुआ अकेलापन और वीरानी धीरे धीरे उसकी ओर बढ़ रहे थे और फिर उसने उसके वजूद को घेर लिया।

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