पुस्तक समीक्षा // बहुरंगी : गागर में सागर

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‘बहुरंगी’ अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हाइकुकार, महान साहित्यकार एवं विद्वान शिक्षाविद डॉ० मनोज सोनकर का सद्यः प्रकाशित हाइकु संग्रह है जिसमें उनके वर्षा, मोम, कंकड़, चुंबक, बाढ़, सिंगापुर, लंका, बेंकाक तथा दुबई शीर्षकों के अध्यायों के अन्तर्गत 280 उत्कृष्ट हाइकु संग्रहीत किये गये हैं। ‘बहुरंगी’ उनकी 54वीं प्रकाशित कृति है तथा आठवाँ प्रकाशित हाइकु संग्रह है। जापानी काव्य विधा हाइकु डॉ० सोनकर जी को बेहद प्रिय है। इसी का परिणाम यह है कि उनके सात हाइकु संग्रह चितकबरी, खुर्दबीन, रंगालय, आर्ट गैलरी, अक्स, बूँदे तथा प्रकृति पाश हिन्दी हाइकु जगत में अपनी धूम मचा चुके हैं।

डॉ० मनोज सोनकर जी अपने हाइकुओं में गागर में सागर भरने में सिद्धहस्त हैं। प्रतीक और बिम्बों के माध्यम से वे अमूर्त्त वस्तुओं को भी मूर्त्त बना देते है और पाठक या सहृदय के हृदय में अर्थ स्पष्ट कर देते हैं। प्रस्तुत कृति में एक हाइकु में मूढ़ व्यक्तियों का कितना मनोहारी बिम्ब प्रस्तुत किया गया है जिसमें भैंसे मूढ़ व्यक्तियों के प्रतीक हैं-

भइसे लड़े/धक्का मुक्की करते/अड़े तो अड़े


सारा संसार दुखमय है। सुख तो कुछ काल के लिए दुख का हट जाना हैं। संसार में ऐसा कोई नहीं है जो किसी न किसी कारण से दुखी न हो। हाइकुकार डॉ० मनोज सोनकर ने दुख को बहुरूपिया बताया है जो अनेक रूप धर के मानव जीवन को प्रभावित करता है। डॉ० सोनकर के कतिपय हाइकुओं में यह भाव दृष्टव्य है-

पीड़ा ना भाये/रूप धर अनेक/बैरन आये

ग़म न छोड़ा/बड़ा बहुरूपिया/सम्बन्ध जोड़ा

घटा ही नहीं/दर्द तो पिछलग्गू/हटा ही नहीं

बूढ़ा न होय/दर्द सदाबहार/जाये ना सोय


रसराज शृंगार के दोनों रूपों संयोग व वियोग का चित्रण हाइकुकार ने अपने कतिपय हाइकुओं में किया है। संयोग शृंगार में उन्होंने चेहरे को प्रेमिका के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। उनके हाइकुओं में संयोग शृंगार के कतिपय उदाहरण प्रस्तुत हैं-

जवानी जागी/चेहरे कुछ भाये/मन तो बागी

हाथ न आये/चेहरे मनोरम/खूब लुभाये


वियोग शृंगार में हाइकुकार ने रूपक अलंकार के माध्यम से विरह उपमेय की मीठी आँच उपमान से तुलना कर उसका बहुत अच्छा बिम्ब उभारा है, देखें-

जलती रहे/विरह मीठी आँच/चलती रहे


हाइकुकार डॉ० मनोज सोनकर ने निंदा, भाव, क्रोध, उल्लास, हँसी, खुशी, इच्छा, लोभ, अहंकार, निराशा, उदासी, जोश आदि अमूर्त्त मनोविकारों को रूपक व मानवीकरण के द्वारा मूर्त्त रूप प्रदान किया है-

निंदा तो गोली/दूर से अपच/बड़ी रसीली

जागे तो जागे/क्रोध करिया साँप/जल्दी न भागे

खुश्‍ा छिनार/एक नहीं पसन्द/बदले यार

अहं आहत/दाँत तो खट्टा करी/जिद्दी चाहत

निराश्‍ा ज्वाल/झुलस डाले रंग/खाती ऊबाल

लोभ लहर/बढ़ती चली जाये/चारों पहर

इच्छायें जागें/बड़ी दुससाहसी/नहीं वे भागें

रोज न आये/हँसी तो मगरूर/ठेंगा दिखाये

उल्लास खाये/उदासी खंडहर/जोश भगाये

फूटा ही करें/भाव जिद्दी झरने/धीर न धरें


हाइकुकार डॉ० मनोज सोनकर लोक कल्याण हेतु अन्ध विश्वास को दूर भगाना चाहते हैं। अन्धविश्वास पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने उसे गला काटने वाली छुरी बताया है-

गला भी काटे/अन्‍ध विश्‍वास छुरी/विष भी बाँटे


आज के उन तथाकथित समीक्षकों से हाइकुकार का मन व्यथित है जो अपना समीक्षा धर्म सही तरीके से नहीं निभाते। हाइकुकार के एक हाइकु में यह भाव देखें-

समीक्षा बड़ी/कोयल को कुक्‍कुर/बताते अड़ी


आये दिन नारियों पर अत्याचार होते रहते हैं। बलात्कार भी उन अत्याचारों में से एक है। बलात्कारी को समाज में कोई सम्मान नहीं मिलता और सजा भी मिलती है। हाइकुकार डॉ० मनोज सोनकर ने बलात्कारी की तुलना खउरहा कुत्ते से की है जो बदबू देता है-

बलातकारी/खउरहा कुक्‍कुर/बदबू भारी


प्रकृति चित्रण में भी हाइकुकार सिद्धहस्त हैं। प्राकृतिक सौन्दर्य को पतझड़ के द्वारा नष्ट कर दिया जाता है। यहाँ हाइकुकार ने पतझड़ का मानवीकरण करके एक अच्छा बिम्ब खींचा है-

सौन्‍दर्य खाये/पतझड़ भुक्‍खड़/बाज न आये


प्रकृति चित्रण के कतिपय अन्य हाइकु भी देखे जा सकते हैं-

नदी चहकी/उछलती कूदती/खूब बहकी

पेड़ नहाये/साबुन के बिना भी/रौनक पाये

रूप सजाया/बदरंग पहाड़/कलकलाया

गेंदे रंगीन/फला खूब संतरा/लागे हसीन

तितली भाये/चित्रकारी बढ़िया/आँख समाये

झरना गाये/काला पहाड़ श्रोता/लुत्‍फ उठाये

पपीता छाता/हरे पीले लटका/मन लुभाता

बौर तो आये/हरे और पीले का/स्‍वाद जगाये


पाश्चात्य सभ्यता हमारे देश पर हावी हो गयी है जिसने भारतीय संस्कृति को अत्यधिक क्षति पहुँचाई है। हाइकुकार का मन इस पाश्चात्य सभ्यता के नंग नाच से आहत है। उनके कतिपय हाइकुओं में यह पीड़ा दृष्टव्य है-

पश्‍चिम आया/रंग बदले लोग/पूरब खाया

जीभ लड़ाएँ/हीरो पूजते लोग/बाज न आएँ

जाँघ दिखाएँ/कमर वस्‍त्र छोटे/भाव जगाएँ


आज की उपभोक्तावादी संस्कृति में शिक्षा भी अब दुकान बन गयी है। शिक्षा माफिआओं की सचमुच पौबारह है। डॉ० मनोज सोनकर जी का एक हाइकु देखें-

शिक्षा दुकान/पाकेट भर आओ/खरीदो ज्ञान

प्रस्तुत पुस्तक के समस्त हाइकुओं का कला पक्ष भी कहीं शिथिल नहीं पड़ा है। समस्त हाइकुओं की भाषा आम बोल चाल की खड़ी बोली है जो हाइकुकार के भावों की संप्रेषणीयता बढ़ाने में अत्यधिक सफल हुई है। हाइकु छन्द के व्याकरण 5-7-5 अक्षर क्रम का तो कड़ाई से पालन किया गयाहै साथ ही साथ समस्त हाइकुओं में तुकान्तता का भी विशेष ध्यान रखा गया है। प्रथम व तृतीय पंक्ति में तुक मिलाने से समस्त हाइकुओं में लयात्मकता आ गयी है। पुस्तक में संग्रहीत अधिकतर हाइकु प्रसाद गुण सम्पन्न है तथा उनमें अभिधा के साथ-साथ लक्षणा व व्यंजना शब्द शक्तियों का प्रयोग किया गया है। अनुप्रास, पुररुक्ति प्रकाश, रूपक तथा मानवीकरण अलंकारों की छटा दर्शनीय है।

अन्त में हम कह सकते हैं कि डॉ० मनोज सोनकर की प्रस्तुत पुस्तक ‘बहुरंगी’ हिन्दी हाइकु संसार में एक विशिष्ट स्थान बनायेगी। हाइकुकार को मेरी शुभकामनाएँ।

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पुस्‍तक - बहुरंगी (हाइकु संग्रह)

लेखक - डॉ० मनोज सोनकर

प्रकाशन - अमृत प्रकाशन, शाहदरा, दिल्‍ली- 110032

मूल्‍य- 275/-

पृष्‍ठ - 80

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समीक्षक-

डॉ० हरिश्‍चन्‍द्र शाक्‍य, डी0लिट्‌0

शाक्य प्रकाशन, घंटाघर चौक

क्लब घर, मैनपुरी-205001 (उ.प्र.) भारत

स्थाई पता- ग्राम कैरावली पोस्ट तालिबपुर

जिला मैनपुरी-205261(उ.प्र.) भारत


ईमेल- harishchandrashakya11@gmail.com

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