शबनम शर्मा की कविताएँ

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रेखा श्रीवास्तव की कलाकृति

वक्त


क्या कभी वक्त को चलते
किसी ने देखा है? नहीं
जैसे आत्मा को शरीर से
निकलते किसी ने नहीं देखा,
     फूल तो देखे हैं सबने,
     पर इसकी खुशबु को
     बिखरते कभी किसी ने नहीं देखा।
आते हैं सीना तान कर,
पर जाते हैं कहाँ सब,
ये किसी ने नहीं देखा।
     फेंकता है पांसे कोई,
     कभी जीवन के, कभी मौत के,
     पर कौन? कभी किसी ने नहीं देखा।
उगलता है लावा कहीं
कहीं बर्फ के ढेर हैं
करता है ये करतब
कौन? किसी ने नहीं देखा।
     कहते हैं वक्त गया वापिस न
     आयेगा गलत है ये,
     लम्हें हमारे, जिन्दगी की
     कसमें ये खड़ा वक्त, पीढ़ी
     दर पीढ़ी निगल जायेगा,
     और बताएगा उन बच्चों को
     कि ‘‘मैंने इसका इस्तेमाल’’
     सही नहीं किया।

वो पल


आज भी याद है मुझे,
तेरा वो चुपचाप जड़ हो जाना,
सुनकर कि अब कभी मिल न सकेंगे हम।
     आंखों से वो बिना नीर के रोना,
     और कह देना वो सब कुछ, जिसके
     कभी शब्द होते ही नहीं।
दुपट्टे की कोर से उंगली दबाना,
और मेरे होंठों का कंपकंपाना,
आज भी याद है मुझे।
     चल देना धीरे-धीरे, दिल
     मैं लिये इक चुप्पी का तूफान
     और मुड़ कर इक बार धीरे
     से पलट के देखना
     आज भी याद है मुझे
उठ जाना मेरा हाथ खुद-ब-खुद
ही उसका तेरी तरफ हिल
जाना और तेरा हथेलियों
से अपना मुखड़ा डाँपना,
आज भी याद है मुझे।



मज़दूर


रोटी, कपड़े, मकान से
लाचार, इक़ जर्जर
अवस्था में, धरती पर
दूसरों के लिये, हर घड़ी पल
अपना पसीना बहाता इक इन्सान।
पेट पीठ से मिला,
सूरज निकलने से पहले
रोज़ी रोटी के लिये,
हर रोज़ ईंट-पत्थरों से
लड़ता इक इंसान।
दुनिया की दया पर जीता,
सुबह-शाम खून के घूंट पीता,
फिर भी जीने के लिये
विवश इक इन्सान।
अपनी-अपनी बढ़ौतरी के लिये
जलसे, जलूस निकालता है
समाज, पर कौन है वह?
जो कभी सोचे, इन
हड्डियों को भी चाहिये
अच्छी रोटी, कपड़ा और मकान,
शायद भूल गये हैं हम,
कि इनके ही बल पर,
हर सुख भोगता है इन्सान।


कल्पना


मेरी कल्पना की सेज़ पर
हर रोज़ छमछमाती, मुस्कराती तुम
आती हो,
बिता लेता हूं कुछ क्षण,
तुम्हें बाहों में भरकर,
अधरों से लगाकर, जब
तुम चुपचाप मेरी कल्पना
की सेज़ पर मुझ सब
कुछ पल बिताने आती हो।
     बहुत चाहा तुम्हें भूलना,
     पर तुम सदैव इक मीठी
     सी याद बन, मेरे तन
     बदन में चुभ जाती हो,
     मेरे आंसुओं का दामन
     पकड़, दरिया तुम बनाती हो,
     मेरी कल्पना की सेज़ पर
     हर रोज़ छमछमाती तुम आती हो।
घूम आता हूं उन वादियों में,
जहां कभी हम मिले थे,
गुनगुना लेता हूं वो गीत,
जो तेरे लिये रचे थे
बहाकर कुछ आँसू तेरे नाम से,
वापिस इस दुनिया में आ जाता हूँ,
जब कल्पना की सेज़ से दुपट्टा
मुँह में दबाये, तुम दौड़ी चली जाती हो।


रचती है नारी


रचती है नारी इक
सुदृढ़ संसार,
बलिष्ठ छाती,
पत्थर से पाषाण दिल
कीमती तोहफे
सुन्दर बाज़ार,
नन्हा सा इक विचित्र संसार,
सुन्दर खिलौने,
भीष्म पिता से आदर्श,
कृष्ण, राम से देवता,
रावण सा दशानंद,
और कई बलिष्ठ हस्तियाँ
फिर क्यूँ ठुकराई जाती है
क्यूँ बनती है मर्द के हाथ
की कठपुतली।
उठ, बता इन्हें, गर तू न होती,
कर क्या लेता अकेला मर्द
वर्ग संसार में,
दूध से रोटी, कपड़े, मकान
के लिए दास है तेरा,
तुझे ही अपना महत्व समझाना होगा।


नारी


अपने दुबले पतले बदन से
कुछ माँस, हड्डियाँ देकर
रचती है इक नारी
इक मासूम नर,
निचोड़कर खून अपने शरीर
का तृप्त करती है उसकी पिपासा,
ताउम्र रोटियों में सिंकते हैं
उसके हाथ, कई बार
कुर्बान होती है उसकी ममता,
देकर अपना असीम प्यार,
बना लेती है खुद के लिये
वो इक बलिष्ठ पहरेदार
और कुचली जाती है सदैव
उसके सामने चाहे वो बेटी है,
बहन है, पत्नि या फिर माँ।


कुछ किया जाये


आओ लीक से हटकर कुछ किया जाये,
नापाक इरादों से न अब जिया जाये,
जो चमका दे किसमत मेरे वतन की,
उन इरादों को अब बुलन्द किया जाये,
दुश्मनों के हौसले पस्त हो यारों,
खंजर कुछ इस तरह तेज़ किया जाये,
हवा मुल्क में गरम बहे न कहीं
नापाक इरादों को यूँ खत्म किया जाये,
बच्चा-बच्चा खंजर बना घूमे,
दिल उनका यूँ मजबूत किया जाये,
खून खौले बरफ की पहाड़ियों का भी,
मौसम का रुख कुछ यूँ बदल दिया जाये।



तड़पती क्यों दामिनी है?


क्यों हृदय में शूल उठते,
क्यों न कटती यामिनी है?
प्रगट हो काली घटा से
वक्त रेखा सी बनाकर
तेज की प्रतिमा अनोखी,
रजत, निर्मल देह लेकर
कड़क में धड़कन हृदय की,
भर चली क्या कामिनी है?
नील जलधर के हृदय में
ओ विरहिणी वास तेरा;
विरह-ज्वाला से जले उर
से उठा निःश्वास तेरा।
है कहाँ हृदयेश तेरा,
किस पिया की भामिनी है?
मस्त हो जाती धरा भी,
वज्र जिस थल तू गिराती
तड़पती फिरती सदा तू
न कभी भी चैन पाती
धैर्य धर कर खोज पिया को,
तू गगन की स्वामिनी है।


शबनम शर्मा
माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र. - १७३०२१

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