परिवर्तन // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------


चौधरी के मुंह से लार टपक रही थी, जबान पर गालियों की बौछार थी।

‘‘उस कमीने, कुत्ते की औलाद की इतनी हिम्मत हो गई है जो मेरी भैंसों को चढ़ाने वाले को गालियां देकर मेरी भैंसों को भगा दिया! अरे उल्लू, उसे जल्दी पकड़कर मेरे सामने ला,’’ चौधरी ने किसान को झिड़ककर कहा। किसानों को तो जैसे सांप सूंघ गया, उनका तो रक्त ही जम गया। डर के मारे चौधरी को ऐसे देखने लगे, जैसे बिल्ली कुत्ते को।

‘‘भगवान रहम करे! आज तो बेचारे दीने की खैर नहीं।’’ बूढ़े विलू ने धीरे से बुदबुदाकर कहा।

‘‘चाचा आखिर हुआ क्या है? आज तो चौधरी गुस्से में पागल हो गया है!’’ करीब बैठे एक नौजवान ने पूछा।

‘‘भाई, चौधरी का जो भैंसें चढ़ाने वाला है वह है उसका रिश्तेदार, इसलिए चौधरी भी उसे अपनी आँखों का तारा मानता है। आज दीने के खेत में भैंसें आ गईं, बेचारे का काफी नुकसान हो गया। उसने भैंसें चढ़ाने वाले को कहा कि भैंसें खेत में से निकाल, इस बात से इतनी आग लग गई है!’’

‘‘चाचा, यह तो अत्याचार है! अगर चौधरी का माल आता है तो भी मुसीबत, और अगर उसको भगाते हैं तो भी मुसीबत! अब जाएं तो जाएं कहां?’’ नौजवान ने उत्तर दिया।

‘‘बस भाई, सबसे भली चुप!’’ बूढ़े ने ठंडी सांस लेकर कहा।

‘‘यह उल्लू कहां गायब हो गया, बदू जाकर देख, अपने बाप दीने के पास जाकर बैठ गया क्या?’’ चौधरी ने उस नौजवान को झिड़ककर कहा। बदू धिक्कार से मुंह बनाकर उठा।

दीना दूर से डरता डरता आया। आंखें कठोर, होंठ सूखे, डर के मारे चेहरे का रंग उड़ा हुआ था। देखते ही चौधरी ने उस पर गालियों की बौछार कर दी :

‘‘अरे सूअर के बच्चे, तुमने मेरी भैंसें चढ़ाने वाले को गालियां देकर भैंसें भगा दीं। कुछ नहीं बोलता तो सर पर चढ़ते जा रहे हो...’’

‘‘साहब, पूरा वर्ष मेहनत करते हैं, वह एक पल में बरबाद हो जाती है...’’ दीने ने कोशिश करके दो तीन शब्द गले से निकाले।

‘‘कमीने, खेत क्या तेरे बाप का है क्या? चौधरी आग बबूला हो गया। वह कुर्सी से उठ खड़ा हुआ, ‘‘अरे उल्लू, जल्दी कर, पकड़ साले को... अरे सुनते नहीं हो क्या, अरे जल्दी कर, या तुझे भी सीधा करूं !’’ चौधरी की डांट सुनकर वह आगे बढ़ा, उसने दीने की ओर देखा, उसकी नम्र, डरी हुई आंखें देखकर वह पहाड़ की तरह एक ही जगह जम गया।

‘‘बदू, अरे ओ बदू! अरे तू आकर इसे मजा चखा!’’ बदू ने उसे तेज तेज नजरों से घूरकर देखा। दीने की मुर्दा दिल में जान आ गई, उसने जबान फेरकर होंठों को गीला किया। चौधरी ने बेबस होकर लोगों की ओर देखा, वह तेज नजरों की तपिश झेल नहीं पाया। उसने दीने की ओर देखा, उसे महसूस हुआ कि दीने में एक परिवर्तन आ चुका है, सभी किसानों में परिवर्तन आ चुका था। वह पीछे हटा और हारे जुआरी की भांति खुद को कुर्सी पर पटक दिया।

lll

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "परिवर्तन // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.