रविवार, 14 जनवरी 2018

श्रीसीताजी के पिता के इतने नाम क्यों ? // मानसश्री डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग

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श्रीसीताजी के पिता के इतने नाम क्यों ?

एवं

वंश परिचय

मानसश्री डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

’’मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति’’

श्रीराम के शुभ विवाह के अवसर पर उनके कुलगुरू एवं राजपुरोहित महर्षि वसिष्ठजी ने इक्ष्वाकु वंश के राजाओं का कन्यादान के समय परिचय देकर कहा- ब्रह्माजी, स्वयंम्भू, ब्रह्माजी से मरीचि तथा मारीचि से कश्यप, कश्यप से विवस्वान् और विवस्वान् से वैवस्वत मनु का जन्म बताया। मनु प्रथम प्रजापति थे, इनके इक्ष्वाकु नामक पुत्र हुआ था। इन इक्ष्वाकु को अयोध्या का प्रथम राजा बताकर इनके द्वारा समस्त राजाओं का परिचय देते हुए अंत में कहा कि इक्ष्वाकुवंश में ये उत्पन्न हुए राजाओं का वंश आदिकाल से ही शुद्ध रहा है। ये सब के सब राजा धर्मात्मा और वीर सत्यवादी होते आये है तथा कहा कि -

रामलक्ष्मणयोरर्थे त्वत्सुते वरये नृप ।

संदृशाभ्यां नरश्रेष्ठ सदृशे दातुमर्हसि।।

श्री.वा.रा.बाल सर्ग 70-45

नरश्रेष्ठ, नरेश्वर (जनकीजी) इसी इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न श्रीराम और लक्ष्मण के लिये मै आपकी दो कन्याओं को वधू रूप में स्वीकार करता हूं। ये आपकी कन्याओं के लिए योग्य हैं और आपकी कन्याएँ इनके योग्य हैं। अब आप इन्हें कन्यादान करें।

भारतीय पौराणिक विवाह पद्धति के अनुसार वर पक्ष के कुल गौरव-वंश एवं गोत्र के वर्णन उपरांत कन्या पक्ष भी अपनी वंश परम्परा इतिहास वर पक्ष के समक्ष प्रस्तुत करता है।

इसी परम्परा के अंतर्गत महर्षि वसिष्ठ के इक्ष्वाकु वंश के परिचय पश्चात् कन्या पक्ष के राजा जनक ने हाथ जोड़कर महर्षि वसिष्ठ से कहा-हे मुनि श्रेष्ठ! अब हम भी अपने कुल का परिचय दे रहे हैं क्योंकि कुलीन पुरूष के लिये कन्यादान के शुभ अवसर पर अपने कुल (वंश-गौत्र) का परिचय देना शास्त्र में आवश्यक समझा गया है।

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प्राचीन काल में निमि नामक एक धार्मिक राजा हुए है जो महापुरूषों में बड़े ही धैर्यवान तथा अपने पराक्रम से तीनों लोकों में विख्यात थे। उनके मिथि नामक एक पुत्र था मिथि के पुत्र का नाम जनक था। ये कुल के प्रथम जनक है। अतः इन्हीं के नाम पर प्रत्येक राजा जनक कहलाता था। राजा जनक ने श्रीसीताजी के कन्यादान के अवसर पर अपने वंश के राजाओं के नाम इस प्रकार बताये-

1- इक्ष्वाकु

2- निमि

3- मिथि

4- जनक

5- उदावसु

6- नंदीवर्धन

7- सुकेतु

8- देवरात

9- बृहद्रथ (बृहदुक्थ)

10- महावीर्य (महावीर)

11- सुधृति

12- धृष्टकेतु

13- हर्यश्व

14- मरू (मनु)

15- प्रतींधक (प्रतिक) (प्रतीपक) (प्रतीन्धक)घ्

16- कीर्तिरथ (कृतरथ) (कृतिरथ)

17- देवमीढ़

18- विबुध (विश्रुत)

19- महीध्रक (महाधृति )

20- कीर्तिरात (कृतरात) (कृतिरात)

21- महारोमा

22- स्वर्णरोमा (सुवर्ण रोमा)

23- हृस्वरोमा

24- सीरध्वज ( जनक-विदेह - मिथिलेश) भाई कुशध्वज

25- पुत्री सीताजी (जानकी -विदेहनन्दिनी)

नोट - कोष्टक में दिये नाम एक ही राजा के है। अलग-अलग ग्रन्थों के आधार पर वर्णित ये नाम है

1- श्रीविष्णु पुराण 4-5-10-34

2- श्रीमद् भागवत महापुराण स्कन्ध 9-13-14-20

3- श्रीमद् वा.रा.बालकाण्ड सर्ग -71-1-13

जनकजी के वंश का इतिहास जानने के पश्चात् राजा मिथि की कथा का रामायण, श्री विष्णुपुराण एवं श्रीमद् भागवतमहापुराण में भी इस प्रकार वर्णित हैं। इक्ष्वाकु महाराज के पुत्र निमि ने एक सहस्त्रवर्ष में समाप्त होने वाले यज्ञ का आरम्भ किया। उस यज्ञ में उसने वसिष्ठजी को ‘‘होता’’वरण किया। वसिष्ठजी ने निमि से कहा-पाँच सौ वर्ष यज्ञ के लिए इन्द्र ने उन्हें पहले ही निमंत्रण देकर वरण कर लिया है। अतः इतने समय तक तुम रूक कर मेरे आने की प्रतीक्षा करों। इन्द्रलोक से आने पर मैं तुम्हारा भी ऋत्विक हो जाउँगा। निमि ने वसिष्ठजी को कुछ भी उत्तर नहीं दिया। वसिष्ठजी ने यह विचार कर कि निमि ने उनका कथन स्वीकार कर लिया है। अतः वे इन्द्र के यज्ञ के लिये चले गये। निमि ने महर्षि वसिष्ठजी के जाने के उपरांत महर्षि गौतम तथा अन्य ऋषियों तथा होताओं द्वारा अपना यज्ञ प्रारम्भ कर दिया।

देवराज इन्द्र के यज्ञ को समाप्त कर महर्षि वसिष्ठजी निमि के यहाँ आ गये तथा महर्षि गौतम को होता का कर्म कराते देखकर सोते हुए राजा निमि को शाप दे दिया- महर्षि वसिष्ठजी ने निमि को शाप दिया कि तुम ‘‘ देहहीन ’’ हो जाओगे। राजा निमि ने भी महर्षि वसिष्ठजी को बदले में शाप दिया कि तुम्हारी देह भी नष्ट हो जावे। इतना कहकर निमि ने अपना शरीर त्याग दिया।

राजा निमि के शाप से महर्षि वसिष्ठजी को मित्रावरूण के तेज (वीर्य) में प्रविष्ठ होना पड़ा उर्वशी को देखते ही मित्रावरूण के उसके तेज के स्खलित होने पर दूसरा शरीर धारण करना पड़ा। निमि का शरीर अत्यन्त सुगन्धित तैल और अन्य पदार्थो से सुरक्षित रहा तथा सड़ा-गला नहीं एवं उसका शरीर तत्काल मृत्यु को प्राप्त मनुष्य की देह जैसा दिखाई पड़ता था।

यज्ञ समाप्ति पर देवतागण अपना-अपना भाग ग्रहण करने आये तो उनसे ऋत्विकगण बोले कि-‘‘ यजमान को वर दीजिये’’। देवताओं के कहने पर राजा निमि ने उनसे कहा-भगवान्! आप लोग सम्पूर्ण संसार के दुःख को दूर करने वाले हैं और कहा कि मेरे विचार में शरीर और आत्मा के वियोग होने में जैसा दुःख एवं कष्ट होता है वैसा और कोई इससे बड़ा दुःख नहीं होता है। इसलिये मैं अब फिर शरीर ग्रहण करना नहीं चाहता हूँ। अब मैं समस्त लोगों के नेत्रो में ही वास करना चाहता हूँ । ऐसा कहने पर देवताओं ने निमि को समस्त जीवों के नेत्रों में अवस्थित कर दिया। ऐसा माना गया है कि तभी से समस्त प्राणी ‘‘निमेषोन्मेष’’ (पलक खोलना मूँदना) करने लगे।

मुनिजनों ने उस समय विचार किया कि राजा के न होने से अराजकता की स्थिति निर्मित हो जावेगी तथा राज्य सुरक्षित नहीं रह सकता। अतः पुत्रहीन निमि के शरीर को अरणि (शमीदण्ड)से मँथा। उससे एक कुमार उत्पन्न हुआ जो जन्म लेने के कारण‘‘जनक’’कहलाया। उसके पिता विदेह थे इसलिये यह वैदेह कहलाया तथा मंथन करने से उत्पन्न होने के कारण मिथि भी कहा जाता है।

सीताजी के पिता का नाम सीरध्वज था। वे जब यज्ञ के लिये धरती जोत रहे थे, तब उनके सीर (हल) के अग्रभाग (फाल) से सीताजी की उत्पत्ति हुई। इसी से उनका नाम ‘‘सीरध्वज’’ भी है इस प्रकार जनक के ये नाम सीरध्वज, विदेहराज, मिथिलेश आदि।

वर्तमान मे भी विवाह आदि शुभ कार्यो में एवं मृत्यु के कर्मकाण्ड के अवसर पर वर-वधू के पक्षों द्वारा उनके गौत्र, वंश एवं पूर्वजों के नाम लिये जाते है तब आधुनिक परिवेश की नई पीढ़ी आजू-बाजू वृद्धजनों की ओर देखती है ताकि उन्हें उनके पूर्वजों के नाम-गौत्र बता सके। ये स्थिति न आवे, ऐसा न हो इसलिये हमें अपनी पीढ़ी को कम से कम 3-4 पीढ़ियों के माता-पिता,

दादा-दादी के नाम उन्हें बता देना चाहिये। घर में वंश वृक्ष बनाना चाहिए। अपनी कुल, वंश का गौरव पूर्ण इतिहास परम्पराएं इस पीढ़ी को धरोहर के रूप में देना चाहिये। यदि ऐसा न कर सके तो आपको भी यह पीढ़ी हमेशा के लिये भुला देगी। यह अति आवश्यक है नहीं तो जैसा कि आपने अपने जीवन में जो बोया वो काटना पड़ेगा। यदि आपकों कम से कम तीन पीढ़ियों के नाम याद नहीं है तो पंड़ितजी आपकों पुरूषों के स्थान पर ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र तथा महिलाओं के नाम के स्थान पर गंगा, यमुना,सरस्वती का नाम देकर सकल्प करवा ही लेंगे।

इति

- मानसश्री डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

‘‘मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति’’

Sr.MIG-103,व्यासनगर, ऋषिनगर विस्तार उज्जैन (म.प्र.)पिनकोड-456010

Email:drnarendrakmehta@gmail.com

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