माह की कविताएँ

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सुशील शर्मा

दोहे बन गए दीप -14
बापू पर दोहे

बापू का अवसान था ,भारत पर आघात।
व्यथित ह्रदय सबके हुए ,नयनों से बरसात।

राम राजका स्वप्न था ,नव भारत संकल्प।
शांतिदूत बापू बने ,उनका नहीं विकल्प।

कर्मपुत्र बापू रहे ,बने अहिंसा दूत।
विश्वबंधु तुमको कहें ,या भारत के पूत।

दीप अहिंसा का जला ,किया तिमिर का नाश।
समता ममता बाँट कर ,फैला नया प्रकाश।

युग संचालक आप थे ,युग निर्माता आप।
हे युगाधार युगमूर्ति ,मानवता का जाप।

आ जाओ एक बार फिर ,चिंता गहन अनेक।
भटक रहें हैं रास्ता ,जन गण मन प्रत्येक।

कश्मीरी केसर बना ,आतंकों का जाल।
भारत के टुकड़े करें ,इस धरती के लाल।

हे भारत की आत्मा ,हे विप्लव के वीर।
शत शत वंदन आपका ,हे आलोक प्रवीर।


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    दोहा बन गए दीप-13
     विविध

    परमात्मा का अंश है, अविनाशी आनंद।
     अंत समय उनमें मिले,जीव ब्रह्म सानंद।

    परेशान मत कीजिये,जो हैं बहुत गरीब।
     सेवा उनकी कीजिये,जाकर बहुत करीब।

    प्रेम किनारा बन गया,प्रीत बनी है आस।
     जबसे तुमसे हैं मिले, दूर हुआ वनवास।

    डूबा है आकंठ क्यों,पाप गठरिया लाद।
     प्रभु को मन मे धार कर, जीवन कर आबाद।

    लेखन सामयिक उचित ,लिखना मन के भाव।
     जीवन की अनुभूतियां,अंदर रिसते घाव।

    मन से मन का प्रेम ही ,हो जीवन का लक्ष्य।
     अनुष्ठान सबसे बड़ा,मानवता का पक्ष।

    हरियाली से भी हरा, मानव मन का प्रेम।
     पेड़ काटकर आदमी, हरता खुद का क्षेम।

    पेड़ काट कर मत करो,लकड़ी का व्यापार।
     वृक्षारोपण से मिले,खुशियों का संसार।

    राष्ट्र एकता में निहित ,छात्र वर्ग है खास।
     भारत के उत्थान में, युवा वर्ग से आस।

    बात करें अधिकार की, कर्तव्यों की भूल।
     गर भूले कर्तव्य को,जीवन बनता शूल।
    
     --.
    
दोहा बन गए दीप -11
सरस्वती वंदना

मातु शारदा आप हैं ,विद्या बुद्धि विवेक।
माँ चरणों की धूलि से ,मिलती सिद्धि अनेक।

झंकृत वीणा आपकी ,बरसे विद्या ज्ञान।
सत्कर्मों की रीति से ,हम सबका सम्मान।

जीवन का उद्देश्य तुम ,मन की शक्ति अपार।
विमल आचरण दो हमें ,मन को दो आधार।

घोर तिमिर अंतर बसा ,ज्ञान किरण की आस।
ज्ञान दीप ज्योतिर करो ,अंतर करो सुवास।

नित्य सृजन होवे नवल ,शब्द भाव गंभीर।
मन की अभिव्यक्ति लिखूं ,सबके मन की पीर।

कलम सृजन सार्थक सदा ,शब्द सृजित सन्देश।
माँ दो ऐसी लेखनी ,गुंजित हो परिवेश।

ज्ञान सुधा की आस है ,दे दो माँ वरदान।
भाव विमल निर्मल सकल ,परिमल स्वर उत्थान।


उर में माँ आकर बसो,स्वप्न करो साकार।
माँ तेरे अनुसार हों, छंदों के आकार।

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जय भारती
  

हिम तुंग शिखर से आच्छादित
भारत का स्वर्णमुकुट चमके।
माता के पावन चरणों में
हिन्द नील का जल दमके।

पश्चिम में कच्छ की विशाल भुजा
पूरब में मेघ की गागर है।
उत्तर में है कश्मीरी केसर
दक्षिण में हिन्द का सागर है।

भारत अविचल और सनातन
  सब धर्मों का सम्मान यहां।
बाइबिल गीता और कुरान की
शिक्षाओं का गुणगान यहां।

भारत माता की जय कहना
अपना सौभाग्य समझता हूं।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाना
जीवन लक्ष्य समझता हूं।

मीरा की भक्ति का भारत
सीता की त्याग कहानी है।
पन्ना धाय की है ये भूमि
बलिदानों की अमर कहानी है।


आजाद,भगत सिंह,के सीने से
हुंकार उठी आज़ादी की।
बिस्मिल अशफाक ने पूरी की
कसम अंग्रेजों की बर्बादी की।


आज़ादी को हमने पाकर
उसका मूल्य नहीं जाना है।
मनमानी को ही हमने अब तक
अपनी स्वतंत्रता माना है।

बलिदानों की बलिवेदी पर
हम शीश चढ़ाना क्या जानें?
भारत माता के शुभ्र भाल पर
आरक्त चढ़ाना हम क्या जाने?

भारत माता क्या होती है
तुम पूछो वीर भगतसिंह से।
त्याग अगर करना चाहो तो
सीखो शहीद नृसिंहों से।


जिस रज में मैंने जन्म लिया
तन मन उसको धारे है।
भारत माता की रक्षा में
प्राण समर्पण सारे हैं।

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मधुमास


ऋतु वसंत है आसपास।
स्वप्निल गुंजित-मधुमास।
तुंग हिमालय के स्वर्णाभ शिखर।
अरुणिम आभा चहुँ ओर बिखर।
  नव्य जीवन का रजत प्रसार।
मधुकर सा गुंजित अपार।
सुरभित मलयज मंद पवन.
नील निर्मल शुभ्र गगन।
मृदु अधरों पर मधुआमंत्रण।
नयनों का है नेह निमंत्रण।
बासंती सोलह सिंगार।
सतरंगी फूलों की बहार।
पीत  पुष्प आखर से।
उपवन हैं बाखर से।
शतदल खिली कमलिनी।
गंधित रसवंती कामिनी।
कम्पित अधरों का मकरंद।
किसलय कम्पित मन के छंद।
मंजरियों में बौराई आमों की गंध
अभिसारी गीतों में प्रेम के आबंध।

हाइकु -123

 बसंत

आया बसंत
पतझड़ का अंत
मधु से कंत

ऋतु वसंत
नवल भू यौवन
खिले आकंठ

शाल पलाश
रसवंती कामिनी
महुआ गंध।

केसरी धूप
जीवन की गंध में
है मकरंद

कुहू के स्वर
उन्माती  कोयलिया
गीत अनंग।

प्रीत पावनी
पिया हैं परदेशी
रूठा बसंत।

प्रिय बसंत
केसरिया शबाब
पीले गुलाब
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मन की पाँखें


एक सपना
आंसू सा गिरा
झिलमिलाता हुआ
बना यादों की नदी।

शब्द झरे लेखनी से
कुछ छंद से
कुछ मुक्त से
लिपटे हैं कागज में
तुम्हारे प्रतिबिम्ब।

एक पेड़ सी तुम
जीवन दायनी
काटता हूँ कुल्हाड़ी सा तुम्हें
और खुद कट कर
गिर जाता हूँ।
चरमराता हुआ
निरीह सा।

हर कविता
चेतना की धारा सी
रूपायित होकर
स्वयंसिद्धा बन
तुम्हें समेटे
बन जाती है
संचित स्मृति।

आम का बौरना
सन्देश है कि
तुम्हारी स्मृतियाँ 
आरण्यक प्रकृति लिए
कालमृगया बन
आ रही हैं
मन को छलाँगते।

आकुल मधु समीर
सी पुलकित
मन की पाँखें
झरते मधुकामिनी
के फूलों सी
तुम्हें पाने की
जिजीविषा
और फिर अंत हीन
तन्हाई।

अनुक्षण प्रतिपल
सौंदर्य वेष्टित
प्रेम विन्यास लिए
शब्दों के छंद सी
तुम्हारी यादें।

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प्रभा मुजुमदार

बयान जारी रखते  

अलगू चौधरियों और

जुम्मन शेखों सुन लो.

पंच परमेश्वर सच नहीं कहा करते.

जबकि वे देखते हैं हर दिन,

सींग लडाते सांडों को.

आवारा कुत्तों की जमात को.

शेर की खाल में

घूमते सियारों को.

रंग बदलते गिरगिटों को

आँसू बहाते मगरमच्छों को.

बगुलों की समाधियों 

बहेलियों के पसरते जालों को  ,

चलचित्र की रील की तरह.

हर दिन वे सुनते है

व्यवस्था के डंडे की टनकार

जो अक्सर पड़ती है

छोटी मछलियों, हिरणों या खरगोशों पर.

उन्मत्त राजाओं के फैसलों,

फरमानों की आरी से,

कटते जा रहे

सभ्यताओं के घने जंगलों का रुदन.

विश्वास और सद्भावों के

उदात्त पहाडों को चीर कर

लूटी जा रही सम्पदाओं को.

मलबों में बदली जा रही,

संस्कृति की नदियों की

क्षीण होती कराहों को.

कानून की किताबों के

पन्ने पलटते हुए

वे सुनते है

निरीहों के आर्तनाद.

आक्रांताओं के अट्टहास

सन्नाटों में उड़ती,

जुल्म ज्यादती की कहानियों ,

भोंपूओं के शोर.

वे जानते है

किसी भी घटना को

सुर्खियों में लाने

अथवा सुर्खियों से बाहर

कर दिये जाने के पीछे के कारण,

घटनाएं नहीं

उससे जुडे लोग होते है.

अधूरे साक्ष्यों और बदलते

बयानों की वजह से

टूटती और जकड़ती हैं

किसी के हाथों में

हथकडियां.

यूँ भी इतना आसान कहाँ है

सच कहना.

प्रलोभनों की चमकदार

घूमावदार सीढियों से गुजरते हुए,

फिसलन भरी गुमनाम घाटी

खींच सकती है कभी भी.


बयान जारी रखते


बयान देने से पहले

वह जायजा लेता है

सभाकक्ष का.

आंकता है भीड़ की शक्ति,

संख्या, अनुकूलता.

न्यायाधीशों की निष्पक्षता

अथवा प्रतिबद्धता.

वकीलों का काइंयापन.

अपने तर्क की सामर्थ्य,

विश्वसनीयता का अहसास

खड़े रह सकने का आत्मविश्वास.

तराजू के पलडों में,

तौलता है वह

अवसरों और प्रतिबद्धताओं को.

धमकी और प्रलोभनों को,

सम्भावित निष्कर्षॉ को.

सच और झूठ के बीच की,

महीन रेखा का विस्तार

मापता है.

बयान देने से पहले,

वह खुद को टटोलता है

कि कितना बयां करना है

अपने बयान में. 


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   महबूब हसन मुज़फ़्फ़रनगरी


    
बच्चों के लिए एक नज़म
    
     ठन्डा ठन्डा कूल कूल कूल
आई  सर्दी   हू ,,,, हू ,,,, हू,,

हर तरफ़ है  गहरा कोहरा
सर्दी का है  हर सू  पहरा

चल  रही  है  सर्द  लहर
बन न जाए  कहीँ क़हर

बाहर न जाना सोनू सोनिया
हो जाएगा तुम को निमोनिया

फिर पड़ेगा डॉक्टर के जाना
नहीं चलेगा   कोई बहाना

और  कहोगे  रो करके तुम
डॉक्टर साहब डॉक्टर साहब

प्लीज़ मुझ पर रहम खाओ
इन्जैक्शन न तुम मेरे लगाओ

अब जाड़े में कभी न बाहर जाऊं
रज़ाई में छुप कर यह गुनगुनाऊं

मम्मी मम्मी खिचड़ी  बनाओ
सर्दी को तुम अब दूर भगाओ

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वरिष्ठ अध्यापक
मदरसा इस्लामिय्या अरबिय्या बैतुल उलूम गौकुलपुर कमालपुर मेरठ
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रामानुज श्रीवास्तव अनुज


    
मत कहो वो आदमी शालीन है।
यह तो पूरे कौम की तौहीन है।

घर भले लगे नया सा दूर से,
नींव कहती है बहुत प्राचीन है।

वह किसी की जान का दुश्मन नहीं,
आदमी बस बहस का शौकीन है।

पहन जूते बैठ सकते हैं इधर,
फर्श के ऊपर बिछा कालीन है।

फर्क जब जीने ओ मरने में नहीँ,
किसलिये ये जिंदगी ग़मगीन है।

बज़्म कैसे हो मुकम्मल सोचिये,
रंग में न बेसुरी न बीन है।

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वो तुम्हारा कान पकड़े मुँह सटाकर सो गया।
और तुम कहते हो कैसे हादसा ये हो गया।

साथ चलिये हम दिखाएं सड़क में खोदा कुआं,
जान लेना देख कर के और क्या क्या हो गया।

कोशिशें पुरजोर थीं कि कोई न जाये उधर,
पर न मालूम कौन जाहिल हाथ गंदे धो गया।

जो कहावत थी पुरानी आज देखा सच लगी,
रोटियाँ कुत्ते ने खाई और अंधा पो गया।

फूल पथ में थे बिछाये सूँघकर पहचान कर,
ये न जाने कौन दुश्मन रात काँटे बो गया।

दोपहर तूफान आने की हिदायत क्या मिली,
रौशनी के तार में ही शहर आधा खो गया।

इंकलाबी लोग अब के देखकर निकलो 'अनुज"
काट लेंगे पैर आधा चीखना मत वो गया।
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रमेश शर्मा


दोहे  रमेश के गणतंत्र दिवस पर
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रचें सियासी बेशरम ,जब-जब भी षड्यंत्र !
आँखें मूँद खड़ा विवश, दिखा मुझे गणतंत्र !!
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कहलाता गणतंत्र का, दिवस राष्ट्रीय पर्व !
होता है इस बात का , ...हमें हमेशा गर्व !!
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हुआ पतन गणतंत्र का, बिगड़ा सकल हिसाब !
अपराधी नेता हुए, ……..सिस्टम हुआ खराब !!
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राजनीतिक के लाभ का, ..जिसने पाया भोग !
उसे सियासी जाति का, लगा समझ लो रोग !!
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यूँ करते हैं आजकल, राजनीति में लोग !
लोकतंत्र की आड़ में, सत्ता का उपभोग !!
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भूखे को रोटी मिले,मिले हाथ को काम !
समझेगी गणतंत्र का, अर्थ तभी आवाम !!
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मात्र ख़िलौना रह गया अपना अब गणतंत्र !
भ्रष्टाचारी देश का , .......चला रहे जब तंत्र! !
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लोकतंत्र के तंत्र को , ........करते हैं बरबाद!
स्वार्थ-पथी गणतंत्र का, बदल रहे अनुवाद!!
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रूप -रंग गणतंत्र का ,बदल गया है आज!
करते अब इस देश में , भ्रष्ट शान से राज !!
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अपनों ने ही कर दिया,अपनों को परतंत्र!
आँखें अपनी मूँद कर, देख रहा गणतंत्र! !
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जिसको देखो कर रहा, .वादों की बौछार !
और घोषणा-पत्र भी , बना एक हथियार !!
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दूषित है अब देश का ,बुरी तरह गणतंत्र !
राजनीति भी हो गई,.बस सत्ता का यंत्र !!

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दोहे रमेश के, मकर संक्राँति पर
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मकर राशि पर सूर्य जब, आ जाते है आज !
उत्तरायणी पर्व का,……हो जाता आगाज !!

घर्र-घर्र फिरकी फिरी, .उड़ने लगी पतंग !
कनकौओं की छिड़ गई,.आसमान में जंग !!

कनकौओं की आपने,ऐसी भरी उड़ान !
आसमान में हो गये ,पंछी लहू लुहान !!

अनुशासित हो कर लडें,लड़नी हो जो जंग !
कहे डोर से आज फिर, उड़ती हुई पतंग !!

भारत देश विशाल है,अलग-अलग हैं प्रांत !
तभी मनें पोंगल कहीं, कहीं मकर संक्रांत !!

उनका मेरा साथ है,…जैसे डोर पतंग !
जीवन के आकाश में,उडें हमेशा संग !!

त्योहारों में घुस गई, यहां कदाचित भ्राँति !
मनें एक ही रोज अब,नहीं मकर संक्राँति !!

जीवन में मिल कर रहो, सबसे सदा “रमेश” !
देता है संक्रांति का, …..पर्व यही सन्देश !!

तिल गुड़ की के लड्डू मिलें, खाने को हर बार !
आता है संक्राँति का,......... जब पावन त्यौहार !!

तिल-गुड़ गज्जक रेवड़ी,सर्दी के पकवान !
खाएं जिनको  स्वाद ले , हर कोई इंसान !!

लेवें सब संक्रांति पर, आज यही संज्ञान !
तिल के लाडू से बड़ा, नहीं दूसरा  दान !!

पोंगल  खिचड़ी लोहड़ी,तीनों  ही त्यौहार !
आते हैं संक्रांति के ,साथ साथ हर बार !!


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प्रियंक खरे   "शोज"


(मैंने इस कविता को  "अनुप्रास अलंकार" से संयोजित व संवारा है।  जिसमें ऊष्म (संघर्षी) "स" व्यंजन वर्णों की बार बार आवृत्ति हुई है । जिसका मैंने काफी गहन प्रयास किया है। जो आपके समक्ष प्रस्तुत है।।)
  
सर्व सुसम्पन्न , सुगम स्वसाधन
संस्कृति समरसता की पहचान हो

सौभाग्य सुशोभित हो रहा
सौम्य सरस्वती का आह्वान हो।

साकार सपने समस्त हो अपने
सबल समृद्धि का सैलाब हो

सहज सरलता की आस लिए हम
सतत् सम्भव का प्रयास हो।

सच सचेत का विश्वास भरा जो
स्वयं सक्षम का आगाज़ हो

सार्थक सामर्थ्य भरा ये जीवन सारा
सदभावना सहानुभूति का भाव हो।

सद्वृत्ति सदैव  बनी रहे निरंतर
सार संग्रह का मान हो।

सुन्दर सजीले जो उतरे मन में
सदा संयोग भरा सम्मान हो

सत्य संकल्प की जो लगन करे
समक्ष सम्मुख का व्याख्यान हो।

स्वाभिमान सम्मोहन जन जन में
संगीत साहित्य से कल्याण हो।


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शबनम शर्मा


फौजी
फौजी भी इक इंसान है हमारी तरह
जिसे हमारा समाज महज़ जिम्मेदारियों
का गठ्ठर समझता है
व करता है सदैव इक अलग सी उम्मीद।
ताजुब तो तब होता है जब वह भी बना
लेता है खुद को समाज के तमाम बाशिंदों
से अलग और चल पड़ता है पीठ मोड़कर
सामाजिक भावनाओं की ओर से,
     सिसक कर लम्बा घूंट भर लेती है प्रेयसी,
     और मुंह बंद कर सिसक लेते हैं लाडले,
     कांपती हैं माँ की दुबली पतली देह और
     चुपके से पोंछ लेता है दो माती बापू किसी
     दरवाज़े की ओट में।
कितने अलग हैं ये फरिश्ते हम सबसे,
जो अपने जिगर के टुकड़े को रोकते नहीं,
और भेज देते हैं हम सबों के लिये,
अनजान राहों पर, बारूद के, बिस्तर पर
गोलियों के सामने। धन्य हैं वो,
उन्हें मेरा शत-शत प्रणाम।


पनघट सूने हो गये
जब से दिये हैं पलटे माहौल ने समाज को
अब नहाती है गुसलखाने में नारियाँ
और पनघट सूने हो गये।
चल पड़ते हैं नल सुबहो-शाम
और चल नहीं पाती सिर पर घड़ा
लिए सुन्दरी तब से वो रास्ते ही
सूने हो गये।
धूल मिट्टी से सनी कई ओखलियाँ
कई चक्कियाँ सिसकती हैं चूड़ियों
की खनक को, वो क्या जाने कितने
आँगन पायल की झंकार को तरसते
सूने हो गये।
शुरु हुआ है सिलसिला जब से
जमीन को हड़पने का, चोटियों को
क्या पता कितने घर हैं सूने हो गये।


जिन्दगी की किताब
दूर पर्वत की बर्फ भी पिघला जाती है मुझे,
जब कभी महसूस करता हूँ तेरे हाथों का स्पर्श
फूट पड़ते हैं सहस्त्रों झरने मेरे मन अन्दर,
जब कभी तेरी खनकती हँसी ने मुझे आ झंझोड़ा।
टूट जाऊँगी मैं जब दुनिया के ज़ुल्मों से,
जोड़ देगा मुझे तेरा वो मुस्करा के चल देना।
खींचकर पल्लू मेरा, बैठाना मुझको अपने पास,
ज़ार-ज़ार रुलाता है मेरे दामन को आज भी
कहाँ लिखती मैं दास्ताने ज़िन्दगी अपनी,
मेरी ज़िन्दगी की किताब भरी है तेरे दस्तखतों से।


सपने

बड़ा खतरनाक हो जाता है,
अरमानों को कैद करना,
सपने न देखना,
किसी को पलटकर कुछ भी
तो न कहना,
पूरी सज़ा सिर्फ अपने आपको
ही देना,
शुरु हो जाना अपनी हस्ती को,
अपने हाथों से मिटाना,
वास्ता, दोस्तों का छोड़कर
दुश्मनों को नज़रअंदाज करना,
फेंक देना उन खुशगवार नज़ारों
का साथ, जो जीवन में
देखे थे कभी,
मुस्कुरा देना अपने आँसुओं में भी
हँसी को लबों तक आने न देना
अपनों में परायापन तलाशना
और आहों में मुस्कुराहटों को
मिला देना।


तुम्हारा स्पर्श

तुम्हारा अनकहा स्पर्श
बरसों बाद दिल की बंजर
जमीं पर महसूस किया
कुछ ठंडी बौछारों का स्पर्श,
और मूंद गई आँखें खुद-ब-खुद,
ही देने के लिये नया आयाम।
लगा बाज बोने लगा कोई प्यार
का धीरे-धीरे
और बजा रहा है चुपचाप मन की
सूनी घंटियाँ।
डरने लगी हूँ कहीं ये स्वप्न ही न हो
गर ऐसा हुआ तो कितनी बुरी तरह
टूट जाऊँगी मैं और ये धरती इतनी
पथरीली हो जायेगी कि शायद इस
पर कभी कुछ उग भी न सकेगा।


टीस
इक अजीब सी टीस ने
जन्म लिया और दुश्वार
हो गया मेरा जीना
रातों की नींद सपनों में
चली गई व दिल का
चैन उड़ा ले गया कोई
ऐसा क्यों हुआ मुझे
कुछ भी तो पता नहीं
ज़रूर किसी जन्म में, मेरे
शरीर का कोई हिस्सा रहे होंगे आप
सोचती हूँ आठों पहर तुम्हारी
आँखों में बैठी रहूँ छिपकर
और पाऊँ सहारा तुम्हारी
बलिष्ठ बाहों का हरदम।
डरती हूँ ऐसी सोच से
पता नहीं कल्पना या सोच से
आगे जा सकूँगी या नहीं
यथार्थ को बदल पाऊँगी
या फिर सामाजिक कटघरे
में बंद होकर रह जाऊँगी।

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सत्य मित्र


नया साल 2018
(हैप्पी न्यू ईयर 2018 की कविता)
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आज भी मेरे बन्द गुजरे सालों की
खिड़कियों से सुरमई शाम झाँकती हैं
  उम्र की बंद किवाड़ों से
चुर चुराती सी आवाज आती है
पर तुम नहीं आते अब....
जज्बातों की तरह...
कई बार सोचा था
तुमसे कहूं अपनी बात
बिठा के मन की बाइक पर ले चलूं दूर...

*वक़्त के नदी के उस किनारे
और वही बैठ कर करूं बातें
सदियों से सदियों तक*

यही तो था मेरा शगल
तेरे लिए जिंदगी
कोई वादा नहीं
न साथ होने की फरमाइश
बस बेपर सिर की बात
  सिर्फ तुमको सुनाने तुझको सुनने की ख्वाहिश थी
पर ता्-उमर जरूरतों की तरह अधूरी ही रही

जैसे वक्त कटता नहीं
साल गुजर जाता है....
में बड़ा भी नहीं हुआ
और जिंदगी कह रही कि उम्र गुजर गई
2017 तक बड़ी हसरत रही मेरी

*इसी  जिंदगी के शहर में रहते है हम तीनों
उम्र ,ख्वाहिश व जरूरत पर
महीनों मुलाकातें नहीं होतीं,
हां कभी कभी  दिख सी जाती है वक़्त के सीसे में
अपनी बदहवास जिंदगी को काटते
और देख कर उम्र मुस्करा देती है
सालो के आईने में*

और में भी निकल लेता हूं
खुद को  वही छोड़कर जरूरतों के रास्तों पर
पर देर रात तेरे सपनों के  सोहबत में कटती है
अब अक्सर उम्र के इस पड़ाव पर.......
वक़्त वे वक़्त
गुज़र जाती हैं 'सपनों' के पदों पर.
कड़ी दर कड़ी
बड़ी बेचैन करती है ये हसरतें ....
इन्हें अब नींद में
तुम्हें साथ ले के चलने की आदत हो गई है
क्या ये जानती हो तुम जिंदगी

यह उसी रात से का वाकया शुरू है
जिस रात तुम उसकी दुलहन बनी थी
और तुम फुर से उसके साथ से उड़ चली थी
रात के तीसरे पहर....
क्यूंकी इतवार को विदाई नहीं होती
उसके बाद  हर रोज तुम रात के तीसरे पहर मेरे
ख्वाब में आती हो और में ले चलता हूँ
उसी वक़्त के नदी के किनारे
करता हूं हजार बातें
और पो फटने के पहले तुम्हें छोड़ देता हूं
तुम्हारी सुर्ख लाल धोती में
जहां से तुम इस कामकाजी जिंदगी में सोम वार को
विदा हो जाती हो ।



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सीताराम पटेल



1ः- आत्मरोदन
मैं अपना पहला वेतन से एक घड़ी लाया
सोचा समय पर शाला जाउंगा
घड़ी तो सही चलता था
पर हम देर से उठते थे
और जिस समय हमें शाला जाना होता
उसी समय हम शाला जाते
बच्चे आते, प्रार्थना करवाते, पढ़ाते
दलिया खिलाते, शाम को 4बजे छुट्टी देते
एक सेकंड हैंड साईकिल खरीदी
जिसे कोई चुरा ले गया
बहुत दिन के बाद हमने साईकिल खरीदा था
31 मई 2002 को हमारे पास
यमाहा क्रक्स मोटर साईकिल आया
जिसे आज तक चढ़ रहा हूं
लोग अक्सर उसे बदलने की बात करते हैं
पर किस किस को बदलूं
बदलने लायक तो मेरा घर हो गया है
जिन्दगी में गुजर बसर तो हो जाता है
पर जीना किसे कहते हैं
हमने आज तक नहीं जाना
एक राह चलता भी
हमें ठोकर मारकर चला जाता है
वो कमीना है
आज तक हमने समझा नहीं
कठिन परिश्रम और अनुशासन किसे कहते हैं
हमने आज तक जाना नहीं
लापरवाही में हम बड़े बड़े काम कर जाते हैं


2ः- एक और शबरी
अमराई में झोपड़ी बनाकर पड़ी है मेरी मां
धूप और पानी को समान सह रही है मां
मैं जब भी जाता पका आम खिलाती है वो
आज न जाने कहां चली गई है मेरी मां वो
जब भी मैं जाता बेटा कहकर मुझे बुलाती
पका आम वह अपने हाथों से मुझे खिलाती
वो प्यार मैं आज तक भूल नहीं पाया हूं
जब भी याद आती, आंखें नम हो जाती
क्या नाम है उसकी मुझे मालूम नहीं है
सकराली से आई है, सकरेलहीन कहलाती
उसे देखकर शबरी की याद आ जाती है
लोग मुझे भी सीताराम कहते हैं यहां
अमराई की बातें मैं घर पर बतलाता
मां और बाबूजी उसका ही बेटा कहते
मैं यह सुनकर कुछ उदास हो जाता
क्यों उदास होता मैं समझ नहीं पाता
मैं घर से अमराई नहीं जाना चाहता
उसके हाथों पका आम खाना चाहता
एक दिन आई हमारे घर आकर बोली
चल बेटा अपने घर, कितने दिन रहोगे
उसके कहने पर मेरी आंखें भर आई
उसके जाने के बाद मां ने दुलराया
बहुत दिनों के बाद रहस्य जान पाया
वो मेरी मया की मां थी सकरेलहीन  


3ः- प्रकोप
प्राकृतिक प्रकोप, लाता है प्रौद्योगिक विकास
विनाश की ओर बढ़ाता है मानव लालच
जितना हम करेंगे प्रकृति का विनाश
उतना ही हमारे ऊपर आएगा प्रकृति का कहर
हम किस ओर जा रहे हैं हमें मालूम नहीं
मच्छर कृमि जूं खटमल ज्यादा पैदा हो रहे हैं
हमारी लालच इतनी ज्यादा बढ़ गई है
हम अपनों से अपनों का नाश कर रहे हैं
आंधी तूफान गरज चमक के साथ पानी
इस अंधड़ में उड़ गए न जाने कितने कहानी
बाजार में फंस गया था एक बच्चा
चौदह साल में कर रहा था पहला व्यापार
अपना मक्का लेकर गया था वह बाजार
सात किलो बिक्री के बाद आया अंधकार
बहुत मुश्किल के बाद वह घर आ पाया
अपने लोहे के बाट को वह गुमा आया
जाने से पहले उसके मन में जोश था
उसे बहुत ही ज्यादा अपने पर होश था
अब समझ आ गया क्या होता है व्यापार
अब वो बेहोश हो गया था
ये अंधड़ सबको उड़ा ले गया था
टीन छप्पर सबको उड़ा ले गया था
ये रिश्तों को भी उड़ा ले गया था
ये क्या पूरी दुनिया को उड़ा ले गया था


4ः- देने का आनंद
जो देता है, उसी का मान होता है
देना क्या सिर्फ रूपया का होता है
बेटी भी दे बाप को तब मान होता
बेटी से भी बाप बहुत चाहत रखता
बेटी से देते वक्त बाप कुछ नहीं देता
बेटी से लेता है वह, बहन से लेता है
ससूराल से भी वह लेता है
उसे लेना है, जो उसे देगा उसे सम्मान करेगा
बहन अगर घर आ जाए तो उसकी पहरेदारी करेगा
बेटी अगर घर आ जाए तो कुछ ले जाएगी सोचेगा
अपने बहन बेटी को वह सम्मान नहीं करेगा
वह ससुराल से पाता है तो उनका सम्मान करेगा
भतीजा की शादी में बुआ आई है
घर आकर भी लगती वह पराई है
चूंकि वह दी नहीं दहेज ले गई है
इसीलिए आज उसकी तो रूलाई है
बाप बेटी को उसका हक कब देता है
बहन को भाई उसका हक कब देता है
जब उनसे कुछ कुछ पाएगा
जब उनसे कुछ कुछ खाएगा
तो उसका सम्मान करेगा
घर में आदर सत्कार करेगा
वरना वह अपने घर से दुत्कारी जाएगी
हम बेटी बचाओ को जीवन में रिवाज बनाएं


5ः- संगीत
काग करता कांव कांव, कागी पसंद करती
मेंढक करता टर्र टों, मेंढकी पसंद करती
मोर करता पैंको पैंको, मोरनी पसंद करती
नीलकंठ करता टांय, नीलकंठी पसंद करती
कितना भी बेसुरा आवाज मादा पसंद करती
एक कोयल के बोलने से जंगल आबाद नहीं
अपनों की आवाज सबको लगती है सुहानी
पर हमें तो अपने अपनी आवाज सुनाते नहीं
पंछी पहचानते हैं अपनी अपनी सब बोलियां
नन्हें बच्चे के लिए गाते हैं वो भी लोरियां
अभिनव का स्वागत हर कोई करता यहां
बूढ़ापा से हर कोई डरता रहता है यहां
आओ हम सब मिल नवयुग का स्वागत करें
आगत को हम जानें, विगत से कुछ सीख लें
कर्म ही पूजा है, हम कर्म को पहचानें
कर्तव्य को न भुलाएं, मानवता को निभाएं
क्यों हुआ है हमारा मानव में जन्म पहचाने
सबसे भाईचारा और मानवता हम फैलाएं
हर प्राणियों में मोहब्बत औ एकता लाएं
तभी हम मानव तो सच्चे मानव कहलाएंगे
आओ हम सब मिलकर यहां उल्फत लाएं
दुनिया से हम भ्रष्टाचार, व्यभिचार भगाएं
अंतिम आदमी को उठाने को उर्जा खपाएं
दुनिया में प्रेम भाव और हम एकता लाएं


6ः- अकेला
अकेला आए हैं, अकेला रहेंगे, अकेला जाएंगे
किस किस ने हमें अकेला छोड़ा किसे बताएं
मां-बाप ने पैदा कर हमें छोड़ दिया अकेला
भाई बहन चाचा चाची दादा दादी से अकेला
जिसे हम घर कहते थे, था स्वर्ग से सुन्दर
हम यहां हमेशा रहे अकेला, कहां गया घर
किसी ने सुना, न हम सुने, ये मन की बातें
वो समाज कहां गया जिसमें हमने पैदा किया
मातृभूमि की बातें हम करते है अब वह कहां
व्यक्ति की विकास सामाजिकता में होती है
पर हम समाज में भी रहे बहुत बहुत अकेला
न समाज ने हमें स्वीकारा, न हमने समाज को
संसार में आदमी बहुत अधिक हो रहे हैं पैदा
इस भीड़ भाड़ जगह में भी हम हो गए अकेले
हम किसकी बात करें ये सांसे भी हमारे नहीं
सबसे होकर अकेले हम जिन्दा है, क्या कम है
फिर क्यों हमारी ये आंखें थोड़ी थोड़ी नम है
अरे चार दिन की जिन्दगी फिर अंधेरी रात है
फिर भी यहां किसी से बात नहीं, क्या बात है
आओ मरने से पहले परस्पर सभी एक हो लें
वरना हम सबको अलग अलग रहना ही है
आप न मरते तक साथ देंगे, न मैं तुम्हारा दूं,
जो भी कहूंगा, मैं बहुत ज्यादा झूठ कहूंगा
फिर भी मैं अपने प्रिये के साथ मरना चाहूंगा


7ः-सुदामा
ये तेरी कैसी लीला! लीलाधर
एक मुट्ठी चने के बदले
उसे कंगाल बना दो
उसे चावल के लिए
त्राहि त्राहि कर दो
उसे अपने पास मांगने के लिए
मजबूर कर दो
उसे कर्महीन बना दो
ज्ञानी का कर्महीन
मेरे कुछ पाले नहीं पड़े! लीलाधर
एक ज्ञानी, सुशील
सरल व्यक्ति की पत्नी
वे भी समझदार
उसे कर्महीन बनाकर
आपके पास मांगने को भेजे
शायद तुम दोनों का दोस्ती था
जो उसे तुम्हारे पास
आने को मजबूर कर रहा था
पर वो आ नहीं पा रहा था
इसी कारण सुशीला
अपने पड़ोसी से
चावल या चिवड़ा नहीं
मुरमुरा और खील लाई थी
जिसे उसके पिछोरी के
एक किनारे में बांध दिया था
जब वह तुम्हारे महल गया
तो तुम्हारे द्वारपालों ने
उसे भिखारी समझ दुत्कार दिया
पर आपके नाम का
बार बार इस्तेमाल करने पर
उन्हें मानना पड़ा
और आप भी
उसके नाम सुनकर
झटपट दौड़कर आए
इतने दिनों तक आपको भी
उसकी सुधि नहीं आई थी
शायद आपका कार्य बहुत अधिक था
राजकार्य के मद में
बड़े बड़े व्यस्त हो जाते हैं
फिर आप तो भगवान ठहरे
आपको अपनी लीला को
मानव में बतानी है
आपने बिन बुलाए मेहमान का
बहुत सत्कार किया
उसके एक मुट्ठी मुरमुरा को
बड़े प्यार से खाया
ज्यादा खा जाने से कहीं
आपको अजीर्ण न हो जाए
रूक्मणी ने आपको टोका
दूसरे दिन सुदामा को रवाना कर दिया
उस एक मुट्ठी मुरमुरे के बदले
आपने उसे बहुत बड़ा महल दे दिया
संग में दास दासियां भी दे दिया
आपका क्या कहने भगवन!
आप लीलाधर जो ठहरे
0000000000000

लोकेश कुमार 'समंदर'

चलते चलते थक जाता हूँ जब ग़म के साथ
बैठ कर बतिया लेता हूँ थोड़ा सा क़लम के साथ

उम्मीदें जिनसे थी कि मेरे ज़ख़्म सिएंगे
नमक उन्होंने ही मिला दिया मरहम के साथ

इश्क़ होगा तो ज़िन्दगी गुलज़ार हो जाएगी
नादान सब जी रहे हैं भरम के साथ

ग़ैर हुए, दूर हुए, आख़िर भूल भी गए
क़ुबूल हैं ये सितम भी सब सितम के साथ

कान्हा का भी बाँसुरी से वही रिश्ता हैं
जो हैं रिश्ता मेरा क़लम के साथ


000000000000
    

    -जितेन्द्र कुमार


किस तरह से दर्द को दिल में छुपाना पड़ रहा है।
बह  रहे  हैं  अश्क लेकिन गुनगुनाना पड़ रहा है॥

बैठे-बैठे  मिल  रहा  था  स्वाद  उसके  हाथ का,
अब  तो अपने हाथ से चूल्हा जलाना पड़ रहा है।

एक ही  थाली  में मिलकर  खाते थे हम प्यार से,
आजकल   तन्हाई में  रोटी  चबाना  पड़ रहा है ॥

वह हँसी और वह  चहक  और  वो  अपने कहाँ,
हैं अकेले फिर भी अब खुशियाँ मनाना पड़ रहा है॥

वक्त  था  जब  रिश्तों  को  भी  वक्त देते थे सभी,
अब तो केवल फोन पर रिश्ता निभाना पड़ रहा है।

गाँव   वह,  वो  घर,  गली  और  वो  दीवारों-दर,
नौकरी! तेरे  लिए  सब  भूल  जाना  पड़ रहा है॥

                              
0000000000000000

डॉ नन्दलाल भारती 


बन्दोबस्त

जानने को तो सभी जानते हैं
दुनिया में सभी अकेले हैं
हां मोहब्बत तो होती है
आदमी से आदमी की......
मोहब्बतें ही तो हैं
दर्द के दरिया में भी
जीने की उम्मीद जगाती है
आदमी मोह में तो लुटा देता है
भर भर अजुरी गाढी कमाई.......
मोहब्बतें बेमौत जब मार दी जाती हैं
बहुत दर्द होता है बाबू
उजियारा में अंधेरा दिखता है
दिन में तारे दिखाई देने लगते हैं
जिन्दा इंसान मरा महसूस करता है
खून पसीने की कमाई से सृजित
अंश अपना दगा जब देता है बाबू.....
क्यों अंश पर कुर्बान होते हैं लोग
शायद इसीलिए कि
होगा जीवन सुरक्षित
लाठी होगी मजबूत और मजबूत
कंधे पर अंश के अपने जाएगा
टूट रहे हैं ख्वाब
अंश ही असमय देने लगे हैं मौत.....
ये कैसा वक्त चल रहा हैं
खून से श्रृंगारित कत्ल करने लगा है
बेवक्त बेमौत मारने लगा है
कल के लिए जिसके, कल-आज
हुआ पतझर
रेत-रेत देना लगा है मौत
जीवन भी लगने लगा है मौत
हार नहीं उम्मीद रखना होगा
खुद के जनाजे तक का
बन्दोबस्त करना होगा ।

                                  

0000000000000

पवन वैष्णव

1: अब भी लिखा जा सकता है..!
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
कई दिनों बाद,
लिखता हूँ कोई कविता
कई दिनों बाद
खो जाता हूँ कल्पनाओं के रंग में,
या खिलती है गेंदे की कली कोई
बहुत दिनों बाद,
तब
अहसास होता है कि
अब भी लिखा जा सकता है,
रंगा जा सकता है
या खिला जा सकता है
जब जब भी जमीन गीली हो
चाहे क्षिति की
या
हृदय की!


2: माँ की पीठ पर कचरे का थैला
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
वो भी एक माँ है
और आखिर
वो भी तो उसका एक  नन्हा बच्चा है,
होगा कोई डेढ़-दो साल का
चल रहा है
अपने नन्हें - नन्हें पैरों से
सुबह-सुबह की सर्द हवा से दो-दो हाथ करते हुए सड़क पर
अपनी माँ का हाथ थामे,
मैं समझ नहीँ पाया कि
माँ का हाथ उसने थाम रखा है
या उसका हाथ माँ ने थाम रखा है।
सवाल कई उठे दिल में
कि क्यों उसकी माँ
अपने मासूम बच्चे को सड़क पर चला रही है?
क्यों नहीँ उठा लेती अपनी गोद में उसे?
आखिर बच्चा थक जाएगा?
पर ये क्या बच्चा तो हंस रहा है
अपनी माँ के साथ!
पर ये आप नहीँ जानते हैं कि
यह बच्चा उस माँ का है
जो सुबह-सुबह कचरा बीनने का काम करती है
आज भी उसकी पीठ पर बड़ा सा कचरे का थैला लदा है,
अब आप ही बताएं वह माँ अपने बच्चे को
कैसे गोद में ले सकती है भला?
पीठ पर लेने का तो आप और मैं सोच ही नहीँ सकते!
वह माँ और उसका बच्चा
फिर भी हँसते हुए जा रहे है,
क्या ऐसे भी कोई माँ अपने बच्चे
के साथ हँस सकती है?
माँ की पीठ पर वह कचरे का थैला
उस बच्चे का अधिकार छिन रहा है??
पर....
ये कचरा किसका है,
कोई बताएगा मुझे??

@पवन वैष्णव
   बड़गाँव,उदयपुर
      राजस्थान
00000000000

महेश गोहिल


शब्दों की महफ़िल
  १.     ऐसा होता .....
       एक दिन यू होता कि ,
                इंसान शायद " इंसान " होता ।
       मजबूरी में घिरा परिंदा गिर भी जाये तो क्या ?
       पंख उसके काट भी लिए जाए तो भी क्या ?
                      कैसे कहे वो गिर जाए ,
                      देखके उसको थोड़ा ही सही ,
                       काश ऐसा होता ,
                      आसमाँ की ओर थोड़ा हाथ बढ़ता ।
                       इंसान शायद " इंसान " होता ।
      लहू पीकर तगड़े बने है " मान्यवर "
      चुप्पी साधे है सब " क्रांतिवीर " ,
                       कब तक चुप रहेंगे ,
                       हाथ पर हाथ धरे ,
                       काश ऐसा होता ,
                    कोई " गाँधी " तलवार लिए खड़ा होता ।
                    इंसान शायद " इंसान " होता ।
      दूर से आहत आ रही है " हैवानियत " की ,
      दिया बुज रहा है - उजाला कहीँ " खो " रहा है,
                       तिमिर आ गया है झोपड़ियों में ,
                आँखे मूंदे खड़े है सब फावड़े और कलम ,
                      बाजर में जो चल पड़े बिना डरे ,
                      कोई तो ऐसा " पैर " होता ,
                       इंसान शायद " इंसान " होता ।
सब का " तल " आ चुका है ,
भूख बस सवार है ,
लाइनें चारों ओर है ।
               कभी तो  वह चीरकर निकलेगा ,
               ध्वंश होंगे महल , होगा  कुर्शी पर वार ,
               काश  कोई  भगतसिंह ऐसा होता ,
      एक दिन यू होता ,
                इंसान बेचारा " आज़ाद इंसान " होता ।



२.  चल पड़ा ...
                पड़ गए लाले तब जाकर वह निकला ,
              करना जो नहीं था वही अब वो कर चला , मरे हुए को फिर मारने चला ।
                    
                          इस तरह तो नहीं बनते मजदूर क़ातिल ,
                          दो दिन की भूखी मुन्नी ने उसे उकसाया था ,
                           कई बार " मरने " के बाद वो मारने चला ।
आख़िर वह ख़ुद मरने चला , मरे हुए को फिर मारने चला ।
                         हाथ जोडनेवालों ने मौत के सिवा कुछ न छोड़ा ,
                         कब का आस लगाए बैठा था , कुछ तो सस्ता होगा ।
जब कूड़ेदान भी साफ़ रहने लगे , तब वह निकला ।
                          आख़िर पेट काटकर दूसरे को काटने निकला ,
                           मरे हुए को फिर मारने निकला ।
                    कागज़ की तरह जब फूट गया उसका नसीब ,
                     वादों में वादों ने फिर से वादे ही दिए जब ,
नशीली कुर्सियां जब डोलने लगी ग़रीब के आँगन में ,
ग़रीब का दुप्पट्टा जब छीन लेने के बाद उसका "व्यापार " बनने लगा ।
                   तब वह फाँसी का फंदा ले के चल पड़ा ,
                   फिर से वह मरे हुए को मारने चल पड़ा ।
कोर्ट को भी अब प्रश्न है ? हम न्याय कहाँ मांगे ?
अब डॉक्टर को डिग्री और शिक्षक को भी फिर से पढ़ाना हुआ तय ।
                    जब बुनियाद ही हिल गई ,
                  तब वो अपनी औक़ात पर चल पड़ा ,
                    तब वह बेचारा एक बार फिर मरे हुए को मारने चल पड़ा ।



३.      अकेलापन

   
      रोज सो जाते है यूं ही झूठे धोखे में ,
     होगा अच्छा कल , परसों यूं ही किनारों में ।
             किसी किसी  को न ख़्याल है ,
                     बच्चा कौन सी कक्षा में है ?
              क्यों खड़ा है आज जिस जगह ,
                     न अता है न पता है
               सोचता है बस सुख खड़ा पास है !
                               रोज सो जाते है यूं ही  झूठे धोखे में !
कुछ सवाल है जिंदगी से ,
कुछ गीले है अफसानों से ,
कुछ बवाल है तन्हाई से ,
कुछ शिकायत है " भगवान से भी "
                 सोचा जब कहीँ " बैठ " के
                 हर सवाल का जवाब है अकेलेपन में ।
                 रोज सो जाते है यूं ही  झूठे धोखे में ।
       अब हम क्या करे कि मूँगफली के दाम गिर गए ?
       जब बटन दबाने गए थे कभी मिला था आपसे ?
                  मौज की थी एक थाली रोटी की ,
                  मजा लिया था दारू की एक बोतल में ।
                 याद आया आप सो गए थे पांच सालों में ।
                 अब सोते रहिये यू ही  झूठे धोखे में ।
अब न थाली है न बोतल ,
बिटिया रो रही है घेंहु को ,
               इतने सालों तक आप चुप थे ,
                आँख खोले अंध थे   ,
               कभी मील जाए " आलस " से फ़ुर्सत ,
                 सोचना क्या अब है तेरी सोच में ?
                  कब तक सोना है यूं ही   झूठे धोखे में ?
पत्थर का भगवान नहीं आता ,
जब फ़टे हो कपड़े स्त्री के ।
कार्यवाही नहीं " कार्य " है जान में ?
   नहीं तो सड़ते रहो और
    सोते रहो  हमेशा की तरह यूं ही धोखे में ...
    00000000000
   

धर्मेन्द्र अरोड़ा "मुसाफ़िर"


नज़ारा लाख दिलकश हो मगर अच्छा नहीँ लगता!
रखे जो दूर छाया को शज़र अच्छा नहीँ लगता!!
::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
खुशी सारे ज़माने की भले मौजूद हो लेकिन!
भरा ग़म है अगर  दिल में  बशर अच्छा नहीँ लगता!!
::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
रहे अभिमान में अकड़ा हमेशा जो  ज़माने में!
सिवा अपने कोई भी नामवर अच्छा नहीँ लगता!!
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सियासत के दरिंदो की यही पहचान है होती!
बिना वोटों के कोई भी नगर अच्छा नहीं लगता!!
::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
सदा आसान हों राहें नहीँ मुमकिन यहाँ हरगिज़!
गिले हों ज़िन्दगानी से सफर अच्छा नहीँ लगता!!
::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
ज़माने को अगर देखो मुसाफ़िर की नज़र से तुम!
इरादों के बिना जीवन समर अच्छा नहीं लगता!
::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

0000000000000000

कमलेश सवि ध्रुवे


मां तो आखिर मां होती है*****
     
 

माँ तो आख़िर माँ होती है ।
उसके जैसी कोई कहाँ होती है ।।

माँ ही देवी देवता
सखा गुरु भगवान है ।
बिन ममता रईस भी
कौड़ी का इंसान है ।।

वही तो है जो ज्ञान का
पहला बीज बोती है ।
माँ तो आख़िर माँ होती है ।।

थक जाता है हर दर्द का तपन
जब ममता से वो भिगोती है ।
अपनों को सिरजाने में
न जाने क्या-क्या खोती है ।।

आँसू सुखाती औरों पर
वह खुद के लिए कहाँ रोती है
माँ तो आख़िर माँ होती है ।।

*बेशरम*बनकर अक्सर माँ
सह जाती है लाखों दुत्कार ।
क्योंकि है कुबेर का ख़ज़ाना
माँ ही सबका पहला प्यार ।।

निंदिया बेच अपनों को सुलाती
वो निश्चिंत कहाँ सोती है
माँ  तो आख़िर माँ होती है

टाल जाती है हँसकर
जीवन के हर अभाव को ।
हर दर्द का यह मरहम
छुपा लेती है अपने घाव को ।

झंझावतों में बन दीवार
सपने नये सजोती है
माँ तो आख़िर माँ होती है

नियति की नियत निराली
सबको बस देनेवाली
ताउम्र भरकर भण्डार
हाथ रह जाता है खाली।।

गम को लादे होंठ पर
सदा प्रेम गीत पिरोती है
माँ तो आख़िर माँ होती है

मौका मिले तो कोने में
तनहा ही सिसक लेती है ।
बच्चों की ख़ुशियों के लिए
मुस्कानों से चिपक लेती है ।।

न जाने किस-किस का दर्द
ताउम्र वही धोती है
माँ तो आख़िर माँ होती है
उसके जैसी कोई कहाँ होती है .......................


राजनांदगांव,छ.ग.
00000000000

मुस्कान चाँदनी


अग्निपरीक्षा

हर युग में नारी
देती आयी है अग्निपरीक्षा
किसी न किसी रूप में समाज को
कभी अपने अस्तित्व के लिए
कभी अपने अस्मिता को बचाने के लिए
पुरूष प्रधान समाज लेता रहा है
समय-समय पर उसकी अग्निपरीक्षा
न कभी उसके जज्बातों का ख्याल किया
न कभी उसकी भावनाओं का कद्र
अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए
नारी को मोहरा बनाता रहा है
कभी सीता ने भी दी थी अग्निपरीक्षा
अपनी पवित्रता को बताने के लिए
आखिर नारी ही क्यों देती है
हर युग में अग्निपरीक्षा
उसके अधिकारों का हक भी नहीं देता कोई
कभी माँ ,कभी बहन, कभी पत्नी के रूप में
साथ देती रही है नारी
सुख-दुख में भी कभी छोड़ा नहीं पुरूषों को
फिर भी नारी ही देती है अग्निपरीक्षा
अपने को साबित करने के लिए
पुरूष की बनायी दुनिया में ।

--

भाभी

सिर्फ आप की
आने की खबर से ही
घर में कितनी रौनक छा गई
वरना आप बिन सुना पड़ा था
मेरे घर का कोना कोना
उम्मीद जगाकर आपने
बना दिया इसे सलोना
आ जाइये अब जल्दी से
लेकर खुशियों का खजाना
प्यार ममता और बलिदान की
दीजियेगा ऐसी परिभाषा
देखकर आप को मेरे शहर वाले
आप जैसी पाने की करे अभिलाषा
प्रेरणा हो आप मेरे भईया की
जरूरत हो भाभी आप हम सब की
यही सोचकर मैंने
किया है आपको लाने का फैसला
उतर जाइयेगा हमारी उम्मीद पर
बस इतनी सी है मेरे दिल की तमन्ना
देकर आदर बड़ों को
पाना आप उनका आशीर्वाद
स्नेह कर छोटों से
बन बैठियेगा उन सब की चहेती
एक गुजारिश है हमें आपसे
करना ना बहाना मायके जाने की
हर सुख-दुख हँसते हुए सह जाइयेगा
इतना कीजिए हम सबसे वादा
दोस्त बनाकर रखना हमें
समझना ना मुझे बेगाना
यही आशा करते हैं हम आपसे ।

, बिहारशरीफ
0000000000

जितेन्द्र वर्मा


कुछ हाइकु

तुम भी नहीं
तारे भी नहीं‌ हैं
चांद अकेला

कोई नहीं है
पीड़ा कराहती है
सहला जाते

चले क्यों गये?
रोकते रहे तुम्हें
अकेलापन

अकेला खड़ा
मैं प्लेटफा़र्म पर
ट्रेन चल दी

उदासी छाई
ख़त का इन्तजा़र
खला करता

मिटती नहीं
चादर की सिल्वटें
उभरी यादें

तुम न आए
सब लोगों ने घेरा
मेरा जनाज़ा

कुछ तो करॊ
मिट जाएं जो यादें
तड़पता हू़

दिल खा़ली है
तुम जो चले गये
प्यार ले कर
१०
ढूंढता रहा
  प्यार जो तुमने दिया
साथ ले गये
00000000000

सम्राट की कविताएं

●●भारत माँ के वीर सपूत●●
भारत माँ के वीर सपूत,
थकना ना तुम हार के,
पुकार रही है भारत माता,
अपनी आंचल पसार के।
    बलिदानी की बलि बेदी पे
   अपना जीवन कुर्बान करो
   अपनी प्यारी माता के
   दुखो का संताप हरो।
उस पल को तुम भूल न जाना
जब भारत माता खोई थी
अपने प्यारे बच्चों का सर
गोद में लेकर रोई थी।
   सत्य अहिंसा का जब
   बापू ने प्रचार किया
   फिर भी गोरे लोगों ने
   हम पर अत्याचार किया।
क्षमा दया तप त्याग मनोबल
सबको हमने अपनाया है
पर दुष्ट आतंकवाद ने
हर पल हमें रुलाया है।
   जब मिली है हमें आजादी
   तब पूंजीवाद ने सताया है
   कभी रुपये की कीमत गिरी
   कभी पेट्रोल ने तडपाया है
कही धर्म तो कही जाती
के नाम पर लड़ाया है
हम सब हो जाए अलग
लोगों ने ये हथकंडा अपनाया है।
   जिस दिन हम भारतवासी
   एक जूट हो जाएँगे
   उस दिन दुनिया की सबसे
   बड़ी ताकत बन जाएँगे।
परिवार और संस्कार का
ये जो अचूक बाण है
दुनिया के और देश में
इसका ना कही प्रमाण है।
   भुखमरी और गरीबी का
   कुछ तो तुम उपचार करो
अगर ना कर सको तो
   सिर्फ शिक्षा का प्रचार करो।
कश्मीर की सुन्दरता या
थार की कठोरता
ये अमिट रहे
कुछ तो इसका ख्याल करो।
   भारत माँ के वीर सपूत हो
   अपना जीवन कुर्बान करो।।।
00000000

नरेश गुज्जर


हिन्दुस्तान के बेटे
थर थर कैसे कांपे है देखो दुश्मन के कलेजे,
सरहद पर गूंज करने निकले जब हिन्दुस्तान के बेटे,
  ना गोला बारूद ना कोई टैंक से डरते
लेकर चलते है अपने कंधों पर जीत के जज्बे,
ना पीठ दिखाई कभी ना पीठ पे कभी वार किया
जब जब चली सामने से गोली तो उसका करारा जवाब दिया,
चुन चुनकर दुश्मन के सीने में फिर अपना खंजर उतार दिया,
भारत माता के वीर जवानों ने सारे जहान में ऊँचा अपने वतन का नाम किया,
  इनकी कुर्बानी को भूलें ना जग
चलो ऐसा हम कुछ काम करें
भरकर हृदय को करूणा से
हाथ जोड़कर आओ नरेश इनको प्रणाम करें
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बृजेन्द्र श्रीवास्तव "उत्कर्ष"


नया सबेरा
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नए साल का,नया सबेरा,
जब, अम्बर से धरती पर उतरे,
तब,शान्ति,प्रेम की पंखुरियाँ,
धरती के कण-कण पर बिखरें,

चिडियों के कलरव गान के संग,
मानवता की शुरू कहानी हो,
फिर न किसी का लहू बहे,
न किसी आँख में पानी हो,

शबनम की सतरंगी बूँदें,
बरसे घर-घर द्वार,
मिटे गरीबी,भुखमरी,
नफरत की दीवार,
 
ठण्डी-ठण्डी पवन खोल दे,
समरसता के द्वार,
सत्य,अहिंसा,और प्रेम,
सीखे सारा संसार,
 
सूरज की ऊर्जामय किरणें,
अन्तरमन का तम हर ले,
नई सोच के नव प्रभात से,
घर घर मंगल दीप जलें//


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रामाशीष यादव

अपनी धुन के पक्के लोग खत्म हो गए?
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जब जब मैंने देखा,
झूठ और झूठों को।
बहुत रोया, चिल्लाया।
क्योंकि सहने वाले लोग सच्चे थे।

कुछ ऐसे लोग भी मिले,
जिनपर हँसी आई।
आती भी क्यों नहीं।
हरियाली की महक
अंधे लोग महसूस कराने की दावा कर रहे थे।

ग्लानि भी बहुत होती है,
उन किरदारों को पाकर।
जिनके रहने-ना रहने का कोई अर्थ ही नहीं।
वे सस्ते बहरूपिये दो कौड़ी में भी,
महंगे लगते हैं।

लाख समझाने से कोई फायदा,
नहीं दिखता।
मेरी गुजारिश, कोई नहीं सुनता।
क्या ऊंचे लोग किसी की नहीं सुनते ?
ऐसे लोग ऊँचे क़द के हैं छोटे लोग ?

ऐसे चले क्यों जा रहे हो,
क्या मैं मान लूं?
तुम मेरे नहीं हो।
मान लूं, धोखेबाज हो।
क्या मान लूं कि महफिलों में।
अच्छे लोग भी ओछी हरकत करते हैं ?

अरे! पर जो आंसुओं को पोंछेगा।
वो गैर होगा या फिर कोई अपना बनेगा ?
कहीं दुबारा रुलायेगा तो नहीं।
डरता हूँ। यही सोचकर पल-पल मरता हूँ।

आने दो उनको। गुरु जी से पूछुंगा।
कि क्या अपनी धुन के पक्के लोग खत्म हो गए?
कभी नहीं मिलेंगे अब?


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मोहित

ऐ जाने वाले पल कह दे, इस आने वाले पल से

उम्मीदें बहुत हैं, आने वाले कल से।

ऐ जाने वाले पल कह दे,

इस आने वाले पल से।

यह वर्ष भला हो मधुमय हो,

सत्पथ की राह पे तन्मय हो,

यह खुशियों का उजियाला लाये ,

यह शांति-प्रेम का भाव सिखाये ,

इस वर्ष खड़े हों हटकर ,

कपट-द्वेष से, छल से।

ऐ जाने वाले पल कह दे, .

इस आने वाले पल से।

यह साल नए कुछ घाव न दे ,

असमय-अनुचित बर्ताव न दे ,

इस साल कोई अवसाद न हो ,

किसी से कुछ दुर्वाद न हो,

यह साल विलग कर दे हमको ,

पापों के टिड्डे-दल से।

ऐ जाने वाले पल कह दे,

इस आने वाले पल से।

हम नभ से धीर-गंभीर बनें ,

हम लक्ष्य भेदते तीर बनें ,

हम प्रखर तेजस्वी सूर्य बनें ,

हम रण के बजते तूर्य्य बनें ,

परिपूर्ण रहें सदा ही ,

अमित तेज से बल से।

ऐ जाने वाले पल कह दे,

इस आने वाले पल से।
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     आज फिर दर्द छलका

    आज फिर दर्द छलका।
     आँख फिर आज रोयी।
     प्रिये, दिल ने फिर से-
     स्मृतियाँ संजोई।

    शिशिर रात में वह-
     प्रणय के मधुर क्षण।
     चांदनी की चादर पर -
     हम और तुहिन-कण।
     नर्म लबों पर-
     पीयूष सा वो पानी।
     हौले हवा में -
     वो घुलती जवानी।
     पल पास हैं सब-
     तुम ही हो खोयी।
     आज फिर दर्द छलका।
     आँख फिर आज रोयी।


     शलभ बन जला मैं,
     शिखा प्यार की थी।
     बात इच्छाओं के,
     बस सत्कार की थी।
     जुदा मोड़ पर ,
     आज दोनों खड़े हैं।
     गम के कड़े शूल ,
     दिल में गड़े हैं।
     आँसू से तुमने-
     भी आँखें भिगोई।
     आज फिर दर्द छलका।
     आँख फिर आज रोयी।

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