टूटे फूटे ठहाके // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी

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मैंने हाथों पर मेहंदी रखना नहीं चाहा, लेकिन सभी रिश्तेदारों ने जोर भरा था। उन्हें मेरे इन्कार करने पर आश्चर्य हुआ था। ‘‘बहन, यह कैसा लड़का है, मेहंदी रखने नहीं दे रहा! मेहंदी के बिना कैसी शादी!’’ सभी छोटे बड़े रिश्तेदारों ने जबरदस्ती गद्दी पर बिठाया था। तभी अचानक शोर मच गया। ‘‘शमा आ रही है!... अरे, शमा आई है...’’

मन हिचकोला खा गया। अंदर का शून्य ज्यादा गहरा हो गया।

‘‘पता नहीं पति ने उसे कैसे छोड़ा!’’ माँ ने कहा और सभी औरतें बाहर दौड़ीं। पल भर के लिए मैं अकेला हो गया और चाहा कि गद्दी से उतरकर चला जाऊं।

‘‘बहन, हमें उम्मीद ही नहीं थी कि तुम आओगी!’’

‘‘अरे, अच्छा हुआ जो आईं, चलकर पति के हाथों पर मेहंदी रख।’’

मैंने उसकी आवाज नहीं सुनी, लेकिन लगा कि वह बहाने बना रही थी। जब सभी औरतें लौटने लगीं, तो उस वक्त लाईट चली गई। शायद यह अच्छा ही हुआ था। इतने सारे लोगों के बीच और इस हाल में मैं उसे देखना नहीं चाहता था। जब मैं उसे देखना चाहता था, दस वर्ष हो गए तो मैं उसे देख नहीं पाया था। अब वह मुझे इस हालत में देखकर क्या महसूस करेगी! यह सब मैं इतने लोगों के बीच जानना नहीं चाहता था। लेकिन मन में दुःख की लहर उठ रही थी।

किसी ने जल्दी जल्दी में मोमबत्ती जलाई थी। औरतों ने उसे लाकर मेरे आगे बिठा दिया। ‘‘भाई साहब, हाथ सीधे कीजिए तो शमा मेहंदी रखे।’’ किसी ने कहा। मैंने अपने दोनों हाथ उसके सामने किए। शमा ने थाली से मेहंदी लेकर मेरे हाथों पर उतारी। मुझे लगा कि उसके हाथ कांप रहे थे या शायद मेरे भी हाथ कांप रहे थे...

औरतें कोई गीत गुनगुना रही थीं। मैंने अंधेरे में उसे देखना चाहा। वह शरीर में कुछ भर गई थी।

‘‘शमा तुम इतनी सुंदर क्यों हो जो लोग केवल तुम्हारा बाहरी रूप ही देखते रहें?’’

‘‘क्यों, मैं अंदर से क्या इतनी काली हूं क्या?’’

आकाश तक उठते मेरे ठहाके।

‘‘तुम इतने बड़े ठहाके लगाते हो कि पड़ोसी भी सुनते हैं।’’

‘‘तुम्हारे ठहाके तो जैसे दबे हुए हैं!’’

‘‘तो भी लोग तो केवल तुम्हारे ठहाकों की बातें करते हैं।’’

‘‘शमा, ठहाके दो प्रकार के होते हैं : एक खुशी, बेफिक्री के होते हैं और दूसरे दुःख के, अंदर की पीड़ा को छिपाने के लिए होते हैं।’’

‘‘यह जानकारी देने के लिए शुक्रिया,’’ उसने हंसते कहा। ‘‘भला इनमें से साहब के ठहाके किस प्रकार के हैं?’’

शमा ने हथेली के पिछले भाग से जल्दी से आंखें पोंछ दीं। वह उठ खड़ी हुई। हाथों पर पूरी मेहंदी नहीं लगी थी। फिर तो पता नहीं कौन कौन मेहंदी लगाने लगीं। तब तक लाईट भी आ चुकी थी, लेकिन शमा औरतों की भीड़ में खो गई।

मेरी आंखें डर डरकर औरतों की भीड़ में उसे ढूंढने लगीं - लेकिन वह तो दस वर्ष पहले ही खो गई थी।

‘‘तुम्हारे इंटरव्यू का क्या हुआ?’’

‘‘अभी तक पता नहीं चला है।’’

‘‘और इससे पहले जो इंटरव्यू हुआ था?’’

‘‘मुझे नहीं लिया।’’

‘‘अभी जो इंटरव्यू दिया है उससे कोई उम्मीद है?’’

‘‘उसमें भी उम्मीद कम है।’’

‘‘क्यों भला, उनकी तुमसे कोई दुश्मनी है क्या?’’

‘‘तुम क्या समझती हो कि मैं इंटरव्यू में पास नहीं होता?’’

‘‘खैर, मैं ऐसा नहीं कहूंगी कि तुम बिल्कुल गए गुजरे हो,’’ वह हंसने लगी, लेकिन मैं मुस्करा भी नहीं पाया।

‘‘तुम्हें पता है कि सिफारिश के बिना कोई नौकरी नहीं मिलती है। मेरे पास कौन-सी सिफारिश है जो उम्मीद रखूं?’’

‘‘यह सिलसिला कब तक चलेगा?’’

‘‘कौन-सा सिलसिला?’’

‘‘इंटरव्यूओं का। आखिर कोई नतीजा भी निकलेगा या...’’

‘‘मेरे बस में होता तो कब का नौकरी लेकर बैठा होता। कहीं तुम इस सिलसिले से तंग तो नहीं आ गई हो?’’

‘‘यह बात तुम सोच सकते हो! मैं तो किसी भी हालत में तंग नहीं हो सकती, लेकिन...’’

‘‘लेकिन क्या? देख शमा, मुझे तुम्हारी यह बात अच्छी नहीं लगती है। तुम मुझसे कोई भी बात छुपाती हो तो मुझे बहुत दुःख होता है। जो कुछ है मुझे साफ साफ बताओ।’’

‘‘तुम शुरू से ही भोंदू हो। मैं तुमसे कोई बात क्यों छुपाऊंगी? मैं नहीं चाहती कि तुम्हें इधर उधर की बेकार बातें बताकर परेशान करूं । तुम्हारे लिए बेरोजगारी क्या कम परेशानी है?’’

‘‘चाचा साहब परेशान हो गए होंगे। यही बात है न?’’

शमा चुप रही।

यह बात मैं भी महसूस करता हूं। लेकिन मैं चाचा को दोष नहीं दे रहा। वे बेरोजगार व्यक्ति का बोझा कब तक उठाते रहेंगे। बेरोजगार बेटे से तो माँ-बाप भी तंग आ जाते हैं। यह भी चाचा साहब की मेहरबानी है कि मुझे इतने वक्त तक अपने घर में जगह दी है, वर्ना कराची जैसे महंगे शहर में मैं कहां रह पाता। बस, हफ्ते के बाद आखिरी इंटरव्यू देकर मैं अपने घर चला जाऊंगा।’’

मैं नहीं चाहता था कि शमा मुझे झूठा आश्वासन दे। अगर वह कुछ कहती तो उसके शब्द मुझे व्यवहारी और बेमतलब लगते। वह चुपचाप बेबसी से मुझे देखती रही।

शमा मेरे मौसी की लड़की थी। उसका पिता अनाज का व्यापारी था और अच्छी पहुंच वाला व्यक्ति था। उसके इतने सम्बंध थे कि अगर वह थोड़ी कोशिश करता तो कोई छोटी मोटी नौकरी मुझे आसानी से मिल जाती। लेकिन वह घर से इतना ताल्लुक नहीं रखता था और स्वभाव का भी कठोर होने के कारण मैं उसे कुछ कहने की हिम्मत न कर सका। मौसी की तो सुनता ही नहीं था। कभी कभी मेरे सामने आ जाता था तो पूछता, ‘‘क्या हाल है, क्या हुआ तुम्हारा?’’ और मैं उत्तर देता, ‘‘अभी तक तो कुछ नहीं हुआ है।’’ वह आगे बढ़ जाता था।

मैं गाँव चला गया। माँ और पिताजी ने मना कर दिया कि जब तक अपने पैरों पर खड़े नहीं होते तब तक शमा के रिश्तेदारों से बातचीत करने नहीं जाएंगे। ‘‘हम खुद का पेट मुश्किल से भर पाते हैं, और परायी लड़की को मुश्किल में डालें।’’

अपने पैरों पर खड़ा होने में मुझे काफी वक्त लग गया और शमा की शादी हो गई। एक बड़ा व्यापारी जिसका बाहरी देशों में भी व्यापार था, शमा के पिता का मित्र था और चालीस वर्षों तक कँवारा रहा था। शमा से शादी करने के बाद वह घर गृहस्थी वाला हो गया।

मैं हाथों पर से मेहंदी उतारकर वापस थाली में रखने लगा। एक औरत ने देख लिया।

‘‘अरे भाई साहब, ये क्या कर रहे हैं, अभी तो रंग लगा ही नहीं होगा!’’

‘‘मुझे हाथ लाल नहीं करने हैं। आपने अपनी बात रख ली, अब मेरी मर्जी।’’

‘‘भाई, लड़का है क्या है? ऐसा माजरा तो हमने कहीं नहीं देखा।’’

औरतों को मेरे व्यवहार पर अचंभा हो रहा था।

मैं हाथों पर से मेहंदी उतारकर घर से बाहर निकल गया। बाहर रिश्तेदार थे, छोटे बड़े और पहचान वाले थे। मेरे और रिश्तेदारों के बीच की पुल मुझे हमेशा टूटी हुई लगी है। उनके बीच बैठकर बातें करने का मेरा कभी भी मन नहीं हुआ है। मैं जहां तक पढ़ा, ये ही वे रिश्तेदार थे जो मेरे माँ बाप पर हंसते थे, टोकते रहे कि ये क्या पढ़कर अपने घर वालों को खिलाएगा। मैट्रिक पास करने के बाद क्लर्की या मास्टरी दिलाने के लिए इन्हीं रिश्तेदारों से विनती करता रहता था और मुझे बेरोजगार देखकर, परेशानी में भटकता देखकर खुश होकर मुस्काते रहते थे। इन्होंने तो कभी मुझसे हमदर्दी के दो शब्द भी नहीं कहे, परंतु इस सारी भीड़ में जिसने मुझसे हमदर्दी दिखानी चाही, जिसने मेरे दुःख में शामिल होना चाहा, उसे भी अच्छा नहीं लगा। इन रिश्तेदारों ने ही तो मुझे अनंत दुःखों के रेगिस्तान में फेंक दिया था। मैं ये रेगिस्तान जागते हुए किसी मंजिल पर पहुंचने के लिए भटकता रह गया।

बाहर आकर मुझे अपनी गल्ती का अहसास हुआ। तड़पते मन को शरण न बाहर मिलती है न घर में। मुझे देखकर सभी बेफिक्री से थोड़ा दूर हटकर, मुस्कराकर बातें करने लगे। मुझे पता नहीं था कि वे क्या बातें कर रहे थे और मैं क्या बात कर रहा था। मैं फिर से घर लौट आया। औरतों का शोर शराबा था। मैं कमरे में जाकर लेट गया। डिप्रेशन बढ़ गया था और सर भारी हो गया था। मुझे लगा कि ये सब बेकार है। सरवाईव करने के लिए मैंने जो कोशिश की थी वह बेकार थी। अंधेरे कमरे में मैंने खुद को परखना चाहा। मेरे व्यक्तित्व की खास बातें दुःख, मायूसियां और नाकामियां थीं जो पूरी ज़िंदगी की प्राप्ति थीं। व्यक्तित्व में कुछ खोट थी। कोई पुरानी खोट थी। यह खोट कौन-सी थी? बुनियाद कहां था? मुझे अपनी नासमझी पर हंसी आ गई।

‘‘शमा, मश्वरा यह कहता है कि जिस व्यक्ति से आप दिल की गहराईयों तक प्रेम करते हैं उसके भलाई की बात सोचें, उसके अच्छे के लिए सोचें।’’

‘‘फिर तुमने मेरी भलाई और अच्छे के लिए क्या सोचा है?’’ उसने हंसते पूछा।

‘‘यही कि मेरे साथ तुम खुश नहीं रह पाओगी।’’

कुछ देर तक वह मुझे देखती रही। फिर जब वह बोली तो उसका स्वर दुःख भरा था।

‘‘यह तुमने कैसे समझा?’’

‘‘मुझसे तुम्हें क्या सुख मिलेगा? तुम्हें सुखी रखना और तुम्हें खुशियां देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है।’’

‘‘मैं अंधी नहीं हूं। मुझे पता है कि खुशियां और सुख तुम्हारे पास नहीं हैं। मैंने तुम्हारे दुःखों और भावनाओं को अपना करना चाहा है। यह अपना मश्वरा अपने पास रख और पागलपन की बातें सोचना छोड़ दो।’’

लेकिन मैं पहले से भी अधिक पागलपन की बातें सोचने लगा हूं। अगर मुझे शमा का साथ मिलता तो शायद मेरे व्यक्तित्व की खोट पूरी हो जाती। शमा मेरे लिए बड़ा आश्वासन होती, मेरा सहारा होती। वह मुझे कभी थकने न देती। उसने शादी से पहले शीशा कूटकर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की थी और यह सुनकर मैंने पागलों की तरह ठहाके लगाये थे और उसके बाद रो पड़ा था।

बसहर बहुत शोर-शराबा था और अंदर कमरे में अंधेरा था। मैं कहीं भी नहीं था। मैंने खुद को ढूंढना चाहा, लेकिन अंधेरा मेरे व्यक्तिव समान कभी न भरने वाली खोट समान और दुःखों समान अनंत था, गहरा और फैला हुआ था। चारों ओर अंधेरा दूर दूर तक, जहां तक नजरें जाएं, फैलता जा रहा था। मैंने हाथ पैर उठाने चाहे, चीखें करना चाहा, लेकिन अंधेरा ज्यादा गहरा, ज्यादा भारी होता गया.....

अचानक कमरे में रोशनी फैल गई। एक पल के लिए दोनों हाथ आँखों पर रख दिए। पता नहीं किसने बटन नीचे किया था। आँखों से हाथ हटाए तो सामने शमा खड़ी थी।

‘‘अंधेरे में क्या देख रहे थे?’’

‘‘खुद को देखने की कोशिश कर रहा था।’’

‘‘बच्चा चुप ही नहीं हो रहा। मौसी ने कहा कपाट में खिलौने पड़े हैं, वे दूं तो शायद चुप हो जाए। कहता है कि पापा कार में बिठाकर घुमाए। अब यहां उसका बाप कहां है जो उसे घुमाए।’’

‘‘क्यों गफार साहब नहीं आये?’’

‘‘नहीं, बहुत बिज़ी था। इफ यू डोंट माइंड, मैं बच्चे को यहां ले आऊं, हो सकता है खिलौनों से बहलकर सो जाए। बाहर शोर में तो उसे नींद नहीं आएगी।’’

‘‘यह तुम कह रही हो कि मैं माइंड करूंगा!’’ वह मुस्कराकर बाहर चली गई और छोटे बच्चे को लेकर अंदर आ गई।

‘‘चाचा को सलाम कर,’’ ढाई-तीन वर्ष के सुंदर और तंदुरुस्त बच्चे ने मेरी ओर गौर से देखा। शमा ने उसे नीचे बिठाकर कपाट में से खिलौने निकालकर उसके आगे रखे। वह भी उसके साथ खेलने बैठ गई। मैं खाट पर बैठकर दोनों को देखने लगा। बच्चा खेल से बहल गया और उसके बाद वह खुद ही खेलने लगा। शमा कुर्सी पर चढ़ बैठी।

‘‘बच्चा कौन-सा नंबर है?’’ मैंने पूछा।

‘‘तीसरा नंबर। इससे बड़ी बहन और एक भाई है।’’

‘‘वे नहीं आए क्या?’’

‘‘नहीं, अपनी दादी के घर गए हैं।’’

‘‘गफार साहब ने तुम्हें खुशी से जाने दिया या...’’

‘‘उसने मुझे कहीं भी जाने से रोका नहीं है। उसे तो फुर्सत होती नहीं है, ज्यादातर बाहर रहता है। उल्टे कह दिया है कि कहीं भी जाना चाहूं तो जा सकती हूं। लेकिन मेरा दिल नहीं मानता है कहीं जाने के लिए।’’

‘‘अकेली होने के कारण।’’

उसने मेरी ओर देखा और चुप रही। शायद उत्तर सोच रही थी, फिर मैंने दूसरा प्रश्न पूछा।

‘‘तुम खुश और संतुष्ट हो?’’

एक पल के उसकी नजरें पथराकर शून्य में खो गईं। मैंने सोचा कि मुझे ऐसा प्रश्न नहीं पूछना चाहिए था।

आखिर वह बोली और उसका स्वर गंभीर था, ‘‘हम दोनों में बीस वर्षों का अंतर है। मैं दिली तौर पर उसे कबूल नहीं कर पायी, लेकिन बाद में मैं सब भूल गई। वह मेरे तीन बच्चों का बाप है। मैं उसकी इज्जत करती हूं और व्यक्ति गुजरे हुए कल के लिए कब तक मातम मनाता रहेगा वह भी तब जब समझौता करने के अलावा कोई चारा ही न हो...’’

मैं बोला, ‘‘मुझे अफसोस है। ऐसे व्यक्तिगत प्रश्न पूछने का मुझे कोई अधिकार नहीं है।’’

‘‘नहीं, ऐसा नहीं है, बहरहाल हम पराये नहीं हैं जो एक दूसरे का हाल भी जान न सकें,’’ वह हंस पड़ी। ‘‘मैं अपने घर में अपने बच्चों के साथ खुश और संतुष्ट हूं। सच्ची बात यह है कि वह मुझे खुश रखने की बहुत कोशिश करता है। अब जब शादी की दावत मिली तो उसने ही जोर भरा था शरीक होने के लिए।’’

‘‘तुम खुद नहीं आना चाहती थी?’’

‘‘मैं खुद? मैं न चाहती तो नहीं आती। मैंने खुद चाहा था कि देखूं कि इतने वर्षों के बाद क्या हुआ है। तुम में कितना परिवर्तन हुआ है, जो नहीं हुआ है, और तुमने चुनाव कैसा किया है?’’

‘‘चुनाव औरों का है, मैंने केवल ‘हां’ की है। खैर, तुम्हें कैसी लगी?’’

‘‘एक बात पूछूं? तुम एक ऐसी लड़की से शादी क्यों कर रहे हो जो अनपढ़ है, बिल्कुल घरेलू टाईप की है।’’

‘‘इसके कई कारण हैं, जिन में मेरे माता पिता की इच्छा का भी बड़ा दखल है। इन घरेलू बातों और दूसरों की इच्छाओं को छोड़कर अगर तुम यह जानना चाहती हो कि इसमें मेरी कौन-सी कंसीडिरेशन है तो शायद स्पष्ट कुछ भी न बता पाऊं।’’ मैं चुप हो गया था। खुद को समेटकर एक जगह लाने की कोशिश कर रहा था। ‘‘तुम्हें हारने के बान मैंने जो मानसिक पीड़ा भोगी है उसने मुझे शायद औरों की पसंद वाला बना दिया है। इसलिए मैं पूरी तरह से हारना चाहता हूं। यह शादी भी मेरी हार है। दूसरी बात, मैं अकेला और तन्हा रहना चाहता हूं और यह लड़की मेरे अकेलेपन में दखल नहीं देगी।’’

‘‘तुम गल्ती कर रहे हो। यह बात आगे चलकर तुम्हें और दुःखी करेगी। तुम्हें ऐसी लड़की चुननी चाहिए थी, जो मानसिक तौर पर तुम्हें समझ सके। तुम्हारी दलीलें तो मुझे समझ में ही नहीं आ रहीं।’’

‘‘यह मैंने तुम्हें पहले ही कहा था कि मैं तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर स्पष्ट नहीं दे पाऊंगा।’’

बच्चा अब खिलौनों से तंग आ गया था और अर्ध नींद में लग रहा था। शमा ने उसे लेकर अपनी गोद में लिटाया।

‘‘तुम उसे प्यार दे पाओगे?’’ अचानक उसने पूछा।

‘‘प्यार? मेरे जैसे लोगों के पास अनंत प्यार होता है। फिर अगर दिल ने चाहा तो पूरा प्यार पलट देते हैं और कहीं दिल ने इनकार किया तो इतने कंजूस हो जाते हैं जो धनवान कंजूस भी सामना न कर पाये।’’

‘‘अगर वह तुम्हें अपना पूरा प्यार दे दे?’’

‘‘देखते हैं! डैट डिपेंडस।’’

वह हंसने लगी, ‘‘भगवान बेचारी पर रहम करे।’’

‘‘और उसके साथ मुझ पर भी।’’

‘‘तुमने खुद पर रहम नहीं किया है तो भगवान तुम पर क्या रहम करेगा?’’

इतना बड़ा श्राप! मैं डर गया।

‘‘लड़के को नींद आ रही है। अब मैं चलती हूं,’’ वह बच्चे को उठाकर उठ खड़ी हुई और बाहर चली गई।

जब शोर शराबा खत्म हो जाता है और सभी लोग चले जाते हैं तो ऐसा लगता है जैसे तूफान और गर्जना के बाद अचानक खामोशी और घुटन हो गई हो। यह शांति और अकेलापन कितना विचित्र और डरावना होता है। यह तूफान जो मेरे कारण लगा था, जिसमें मेरी मर्जी शामिल नहीं थी उसका शिकार मैं ही बना था। उसने हर चीज को तोड़ फोड़कर जड़ों से उखाड़कर फेंक दिया था। शमा ने कहा था, ‘तुम गल्ती कर रहे हो...’ मैं सचमुच गल्ती कर रहा था। तब मुझे अहसास हुआ कि यह सब मैंने नहीं चाहा था। मुझे केवल शरीर नहीं चाहिए था। हम दोनों एक ही खाट पर लेटे हुए थे और पता नहीं कितने दूर थे। मैंने कोशिश की थी कि दोनों के बीच खड़ी अनदेखी दीवार को तोड़ूं।

‘‘तुम इतनी चुप्प क्यों हो?’’

‘‘बस।’’

‘‘फिर क्या बात है?’’

‘‘कुछ नहीं।’’

‘‘तुम्हें शायद अभी तक दुःख है?’’

वह चुप्प।

‘‘रिश्तेदारों से बिछड़ने का दुःख अभी तक है?’’

‘‘ऊं हूं।’’

‘‘अपनों से लगाव तो ज़रूर होगा?’’

‘‘हां।’’

‘‘बाप से ज्यादा लगाव है या माँ से?’’

‘‘दोनों से।’’

‘‘तो भी दोनों में से एक से ज़रूर ज्यादा होगा।’’

‘‘पता नहीं।’’

‘‘अच्छा तुम्हें तुम्हारी माँ ज्यादा प्यार करती है या बाप?’’

‘‘दोनों।’’

‘‘तुम्हें यहां सुख मिलता है? घुटन तो अनुभव नहीं होती?’’

‘‘ऊं हूं।’’

‘‘वैसे तुम घर में क्या करती थीं?’’

‘‘कुछ नहीं।’’

‘‘कुछ नहीं क्या? पूरा दिन हाथ पर हाथ रखकर एक ही जगह पर तो नहीं बैठी होगी। ज़रूर कोई कामकाज या किसी वक्त मनोरंजन करती होगी?’’

‘‘घर का काम।’’

‘‘कौन-सा काम? खाना पकाती थीं?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘नहीं! तुमने कभी कुछ पकाया नहीं था?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘तुम्हारी सहेलियां होंगी?’’

‘‘हां।’’

‘‘जब तुमने उनसे विदा ली थी तब रोई होंगी?’’

वह चुप्प।

‘‘क्यों, नींद आ रही है या तबियत ठीक नहीं है?’’

‘‘ऊं हूं।’’

कुछ दिनों के बाद।

मैं बाहर से आ रहा था। कमरे में से मेरी पत्नी और उसकी सहेली की आवाजें आ रही थीं। मैं हिचककर दरवाजे के बाहर खड़ा हो गया।

‘‘अच्छा यह बताओ कि लड़के के साथ खुश तो हो?’’ सहेली ने उससे पूछा।

‘‘खुश क्या रहूंगी। बाप जितना तो है...’’ उसने चिढ़कर कहा और दोनों ठहाके लगाने लगीं। मैंने चाहा कि मैं भी ठहाके लगाऊं बड़े बड़े, लेकिन उनके ठहाके आकाश की ओर उड़ रहे थे और मेरे ठहाके थककर टूटकर नीचे गिर जाते।

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