व्यंग्य // आनंद से छेड़छाड़ // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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भारतीय दर्शन ने आनंद को एक ऐसे स्थान पर अवस्थित कर रखा है कि वहां हम पहुँच ही नहीं सकते। अब ऐसे आनंद का बताइए हम क्या करें ? यह आनंद नहीं, परमानंद है। अपने अभिन्न मित्र सत और चित के साथ रहता है। तीनों मिलकर एक हो जाते हैं – सच्चिदानंद। सच्चिदानंद हमारे रोजमर्रा के व्यावहारिक जगत में तो कहीं मिलता नहीं। सुख दुःख से परे यह एक ऐसा आनंद है, जिसके साथ हम कोई छेड़-छाड़ नहीं कर सकते।

भारत के मध्य में पिछले साल आनंद से छेड़-छाड़ की एक दिलचस्प घटना घटी। जी नहीं, मैं किसी आनंद कुमार या किसी आनंद कौर के साथ किसी छेड़-छाड़ की बात नहीं कर रहा हूँ। ऐसी छेड़-छाड़ की घटनाएं तो होती ही रहती हैं और जनता और पुलिस उनको निबटाने में सक्षम मानी गई है। मैं जिस आनंद के साथ छेड़-छाड़ की बात कर रहा हूँ वह व्यक्ति आनंद की बात न होकर व्यक्ति और समाज के आनंद की बात है।

ऐसा महसूस किया गया कि भौतिक विकास से नागरिकों की खुशहाली के स्तर का अंदाज़ या उसका सही ज्ञान प्राप्त करना संभव नहीं हो पा रहा है सो भारत के मध्य में, २०१६ के मध्य, एक ‘आनंद विभाग’ के गठन का निर्णय लिया गया। यह विभाग इस मान्यता पर आधारित है कि परिपूर्ण जीवन के लिए आतंरिक व वाह्य सकुशलता आवश्यक है। अत: संतुलित जीवन शैली के लिए नागरिकों को ऐसी विधियां और उपकरण उपलब्ध कराना ज़रूरी है जो उनके लिए आनंद का कारक बन सकें। केवल भौतिक विकास ही अपने आप में आनंद कारक नहीं हो सकता। भौतिक विकास आपको खाना आसानी से उपलब्ध करा सकता है पर आप उस खाने का आनंद उठा सकें यह बिलकुल अलग बात है।

आनंद विभाग ने अपना काम करना शुरू कर दिया है। आनंद उत्सव, आनंद क्लब, आनंद सभाएं, आदि, आयोजित की जाने लगी हैं। यहाँ तक कि आनंद कैलेंडर और आनंद डायरियां तक बनाने को प्रोत्साहित किया जा रहा है। आनंदाकांक्षी लोगों का पंजीकरण भी शुरू हो गया है।

जल्दी कीजिए। सीट्स असीमित हैं। आनंद विभाग “आनंदकों” की तलाश में जुटा हुआ है। कोई भी व्यक्ति अपने अन्य सामान्य कार्य-कलापों के अतिरिक्त ‘आनंद विभाग’ की गतिविधियों को स्वप्रेरणा से तथा बिना किसी मानदंड के संचालन को यदि तैयार है, तो वह “आनंदक” के रूप में अपना रजिस्ट्रेशन करा सकता है। ये ‘आनंदक’ आनंद-विभाग की गतिविधियों में न केवल भाग लेंगे बल्कि उसे अपने सुझाव भी देंगे और दूसरों को भी इस दिशा में आने के लिए प्रेरित करेंगे।

हमारे आनंद-विभाग को परम-आनंद और/ या सच्चिदानंद से कोई लेना देना नहीं है। लेकिन मुझे तो कुछ-कुछ ऐसा लगता है की हो न हो यह उसी के साथ छेड़-छाड़ का मामला है। आनंद तो सभी प्राप्त करना चाहते हैं, परमानंद मिल जाए तो और भी अच्छा है। पर कैसे मिले? भारत के मध्य शासन ने एक उपाय ढूँढ़ लिया गया है। आनंद विभाग के ऊपर यह ज़िम्मेदारी डाल दी गई है। अब आप परेशान न हों। आपको पका-पकाया आनंद बस मिलने ही वाला है। “आनंदक” बन जाइए। आनंद लूटिए और लुटाइए। क्या पता ये छोटे छोटे आनंद, जिनकी आपको तलाश है। आपको कभी परम आनंद तक से साक्षात्कार करवा दें। लगे रहिए।

आजकल की दौड़ –भाग वाली ज़िंदगी में हर कोई तनाव ग्रस्त है। ऐसे में सभी को आनंद की आवश्यकता है। अगर आज के समय किसी से पूछा जाए कि क्या आप प्रसन्न हैं ? क्या आपकी जीवन-शैली संतुलित है ? क्या आप तनाव-मुक्त जीवन जीना चाहते हैं ? क्या आप सभी को खुश देखना चाहते है ? तो इसके लिए प्रयत्न कीजिए, लोगों को इस प्रयत्न में साझा कीजिए। आनंद विभाग के कार्यक्रमों में भाग लीजिए। फिर देखिए आनंद ही आनंद है। बस आनंदक के रूप में आपको अपना पंजीकरण भर कराना है।

पर मुश्किल यही है। दुनिया में भाँति भाँति के लोग हैं और उन सबके अलग अलग आनंद हैं| आनंद के साथ छेड़ छाड़ करने से कोई बाज़ नहीं आता। किसी को रसानंद चाहिए तो किसी को रति-आनंद। कोई ठलुआनन्द चाहता है तो किसी अन्य को ठाकुरसुहाती में आनंद आता है। कई लोग पर-पीड़ा में आनंद लेते हैं तो कुछ आनंद के लिए स्वयं अपने आप को ही पीड़ित करने में मज़ा लेते हैं। वास्तविक आनंद न भी मिले तो ख्वाबी पुलाव बनाने में भी आनंद लिया जा सकता है। झूठ बोलने का भी अपना एक आनंद है और पर-निंदा तो महानंद है। आनंद क्रीड़ाओं का कोई अंत नहीं है। आप ही बताइए, आनन्द-विभाग किस किस के लिए आनंद जुटाने का प्रबंध करेगा ? मुझे तो लगता है आनंद एक व्यक्तिगत अनुभूति का ऐसा विषय है जिसे कोई भी विभाग जुटा नहीं सकता। कौन चाहेगा कि उसके आनंद से कोई छेड़-छाड़ की जाए।

बहरहाल आनंद की बात यह है कि आनंद के नाम पर कुछ हो तो रहा है। व्यक्ति और समाज के आनंद के लिए कम से कम सरकार का ध्यान तो गया और साथ ही यह भी स्वीकार किया की भौतिक विकास ही आनंद के लिए पर्याप्त नहीं है। पर हकीकत यह भी है कि आप आनंद की खोज के लिए प्रयत्नशील हुए नहीं कि आनंद भागने लगता है और आप उसके पीछे पीछे दौड़ते रह जाते हैं।

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--डॉ, सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद (उ.प्र.) २११००१

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