देवर्षि नारद को दक्षप्रजापति का श्राप // डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

-----------

-----------

श्रीराम-सीता स्वयंवर

श्रीराम

श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग

देवर्षि नारद को दक्षप्रजापति का श्राप

डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति

पार्वतीजी को शिवजी ने कहा - श्रीहरि के अवतार का सिर्फ एक ही कारण होता है । ऐसी धारणा शास्त्रों में नहीं है ।

चौ- सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए । बिपुल बिसद निगमागम गाए ।

हरि अवतार हेतु जेहिं होई । इदमित्यं कहि जाई न सोई इदमित्य।।

श्रीरामचरितमानस बाल /चौ.120 घ -1

हे पार्वती वेद-शास्त्रों में श्रीहरि के सुन्दर विस्तृत और निर्मल चरित्रों का गान किया है । हरि का अवतार जिस कारण से होता है, वह कारण - ‘‘बस यहीं है ’’ ऐसा नहीं कहा जा सकता हैं। अनेकों कारण हो सकते हैं और ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें कोई जान नहीं सकता । शंकरजी पार्वतीजी से कहते हैं जहाँ तक उनकी समझ में आता है कि वे कारण मैं तुम्हे सुनाता हूँ । जब जब धर्म का हृस होता है तभा नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं । ब्राह्मण ,गौ देवता ओर पृथ्वी कष्ट पाते हैं , तब वे प्रभु दिव्य शरीर धारण कर इन सब की पीड़ा हरते है यथा -

राम जनम के हेतु अनेका । परम बिचित्र एकते एका ।।

श्रीरामचरितमानस बाल/121-1

श्रीराम के जन्म लेने के अनेक कारण है, जो एक से एक बढ़कर विचित्र हैं। इसी क्रम में -

नारद श्राप दीन्ह एक बारा । कलप एक तेहि लगि अवतारा ।

गिरिजा चकित भई सुनि बानी । नारद विष्णुभगत पुनि ग्यानी ।।

श्रीरामचरितमानस बाल/123-3

clip_image004_thumb

एक बार नारदजी ने शाप दिया अतः एक कल्प में उसके लिये अवतार हुआ । यह बात सुनकर पार्वतीजी बड़ी चकित हुई कहा कि नारदजी तो विष्णुभक्त और ज्ञानी है । नारदजी ने श्रीहरि को किस कारण शाप दिया? श्रीहरि ने उनका क्या अपराध किया? शंकरजी ने कहा -

दो- बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोई ।

जेहि जस रधुपति करहिं जब सौ तस तेहि छन होई ।।

श्रीरामचरितमानस बाल-दोहा 124(क)

महादेवजी ने हँसकर पार्वतीजी से कहा न कोई ज्ञानी है न मूर्ख । श्रीरधुनाथजी जब जिसको जैसा करते हैं वह उसी क्षण वैसा ही हो जाता है । इस प्रसंग में बताया गया है कि हिमालय पर्वत में एक बड़ी पवित्र गुफा है। उसके समीप ही पवित्र सुन्दर गंगाजी बहती है । वहाँ परम् पवित्र सुन्दर आश्रम देखने पर नारदजी के मन को बहुत ही सुहावना लगा ।

दो- निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा।

सुमरित हरिहि श्राप गति बांधी। सहज बिमल मन लागि समाधि।।

श्रीरामचरितमानस बाल-दोहा 124(ख) -2

पर्वत नदी और वन की सुन्दरता को देखकर नारदजी का लक्ष्मीकांत भगवान् के चरणों में प्रेम हो गया । भगवान का स्मरण करते ही उन नारदमुनि को शाप (जो श्राप उन्हें दक्ष प्रजापति ने दिया था ) और वे उसके कारण एक स्थान पर ठहर नहीं सकते थे । गति रूक गई और मन के स्वाभाविक ही निर्मल होने से उनकी समाधि लग गई । समाधि श्रीहरि की कृपा के कारण लगी थी तथा नारदजी को कामदेव पर विजय प्राप्त हो गई । ऐसा गर्व हो गया तथा शिवजी से यह बात कहीं । शिवजी ने उन्हें कहा कि - आप यह बात श्रीहरि से भूलकर भी मत कहना ।

clip_image006_thumb

समाधि लगने का मूल कारण श्रीहरि की कृपा थी जिसने दक्षप्रजापति के श्राप से नारदजी की उस समय निवृत्ति कर दी थी । दक्षप्रजापति द्वारा नारदजी को श्राप दिया गया था कि ‘‘वे किसी स्थान में बहुत देर तक न रह सकोगे । इस प्रसंग का वर्णन श्रीमदभागवत महापुराण में षष्ठ स्कंध के पांचवे अध्याय में वर्णित है जिसकी कथा जन-साधारण में अल्पज्ञात हैं । अतः यह संक्षिप्त में इस प्रकार हैं -

देवर्षि नारदजी सदैव परहित एवं भगवान की भक्ति के प्रचार-प्रसार में लगे रहते थे । उन्हें नारायण-नारायण के भजन-दर्शन के अतिरिक्त कुछ भी प्रिय न था। सृष्टा की आज्ञा से दक्षप्रजापति ने सृष्टि की रचना करने के उद्देश्य से सर्वप्रथम दस हजार हर्यश्व नामक पुत्रों को उत्पन्न किया और उ्रन्हें सृष्टि के विस्तार के लिये आज्ञा दी तो वे सभी सृष्टि के निमित्त तप में लग गये ।

नारदजी ने उन्हें ऐसा उपदेश दे दिया कि वे सब पुनः घर ही नहीं लौटे बल्कि विरक्त हो गये । जब यह बात दक्षप्रजापति को ज्ञात हुई तो उन्होंने पुनः दस हजार सरलाश्व नाम के पुत्रों को उत्पन्न कर सृष्टि के लिये भेजा। किन्तु इस बार भी नारदजी ने उन्हे अपने उपदेशों के माध्यम से विरक्त बना दिया । तब दक्षप्रजापति ने नारद को यह श्राप दिया ।

तन्तुकृन्तन यन्नस्त्वमभद्रमचरः पुनः ।

तस्माल्लोकेषु ते मूढ़ न भवेद् भ्रमतः पद्म् ।।

श्री भागवत स्कंन्ध 6-5-43

नारद तुम तो हमारी वंश परम्परा उच्छेद (नष्ट) करने पर ही उतारू हो रहे हो । तुमने फिर हमारे साथ वहीं दुष्टता का व्यवहार किया इसलिये मूढ़ ! जाओ लोक लोकान्तरों में भटकते रहो । कहीं भी तुम्हारे लिये ठहरने को ठौर नहीं होगी । दक्ष पुत्र शोक से मूर्छित होकर नारद जी पर अत्यन्त कुपित हुआ, क्रोध से उनके होठ फड़कने लगे । रे दुष्ट ! ऊपर से साधु-वेश धारण करने वाले तूने मेरे साथ अत्यन्त ही बुरा बर्ताव किया जो मेरे धर्मपरायण पुत्रों को भिक्षुकों के मार्ग का उपदेश दिया । तूने मुझे असहनीय अप्रिय पीड़ा दी है, तो भी मैंने इसे सह लिया । हे संतानविनाशक ! तूने मेरा जो अप्रिय किया है अतः मैं शाप देता हूँ कि सम्पूर्ण लोकों में विचरते हुए तेरे ठहरने का कोई निश्चित स्थान नहीं होगा । नारदजी यह शाप श्रीहरि की इच्छा से भूल गये तथा कामदेव पर विजय का गर्व हो गया तब श्रीहरिं ने माया तरू को उखाड़ फेकने के लिये विश्वमोहिनी तथा मायानगर बसाया तथा नारदजी के कल्याण हेतु स्वयं शापित हुए । अतः श्रीरामचरित मानस में ठीक कहा है -

हरि अनन्त हरिकथा अनंता । कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता ।।

श्रीरामचरितमानस बाल-139-3

गर्व विनाश का कारण होता है । नारदजी ने कामदेव पर विजय का असत्य गर्व किया । क्योकि वे एक जगह बैठकर तपस्या नहीं कर सकते थे । जबकि वे दक्षप्रजापति के शाप द्वारा शापित थे । कामदेव पर विजय श्रीहरि की कृपा से हुई थी न कि स्वयं की तपस्या द्वारा ।


डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति Sr. MIG-103, व्यास नगर, ऋषिनगर विस्तार उज्जैन (म.प्र.)पिनकोड- 456010

 

Email:drnarendrakmehta@gmail.com

-----------

-----------

0 टिप्पणी "देवर्षि नारद को दक्षप्रजापति का श्राप // डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.