डॉ. मृणालिका ओझा की पुस्तक "उठ मोर पूत,तोर तिल पूरगे" का जनार्पण

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डॉ. मृणालिका ओझा की छत्तीसगढ़ी लोककथाओं की पुस्तक "उठ मोर पूत, तोर तिल पूरगे" (हिन्दी अनुवाद) का जनार्पण  छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के बेमेतरा में आयोजित  छठवें प्रांतीय सम्मेलन में छत्तीसगढ़ के संस्कृति मंत्री  माननीय दयालदास जी बघेल,अवधेश चन्देल, विधायक, बेमेतरा, आयोग के अध्यक्ष डॉ. विनय कुमार पाठक, आयोग के सदस्य नवदीप सुरजीत, गणेश सोनी 'प्रतीक', गुरु घासीदास शोध पीठ के अध्यक्ष डॉ. जे. आर. सोनी, आयोग के सचिव पद्मश्री डॉ. सुरेन्द्र दुबे आदि की उपस्थिति में एक गरिमामय कार्यक्रम में सम्पन्न हुआ।
      प्रथम लोककथा 'संसार' जल प्रलय के बाद सृष्टि की पुनर्रचना की कथा है। दुनिया के अनेक धर्म ग्रंथों में जल प्रलय की बात लिखी गई  है, अतः यह कथा, यथार्थ के बिलकुल निकट है।' सूरज- चंदा' और 'दिन-रात' मानवीय संवेदना की कहानी है, जो नारी के माध्यम से  प्रकृति के अधिक संवेदनशील होने के स्वभाव को बताती है। 'धरती- आकाश' एक बेहद दूरदर्शी (प्रकृति संबंधी) लोक कथा है, जो भौतिक दुनिया के  यथार्थ को भी उद्घाटित करती है। 'नदिया के सराप' पर्यावरण संरक्षण की बेहद जरूरी  सीख देते हुए जल-प्रदूषण से संभावित महामारी की ओर गंभीरतापूर्वक सचेत करती है। आज जब संपूर्ण दुनिया पर्यावरण एवं जल संकट का सामना कर रही है तो ऐसे समय ये कथा अपनी प्रासंगिकता स्वयं सिद्ध करती है।
'जंगल- मितान', 'लतगुरदी भई लतगुरदी', 'गेदुरी माई' ये सभी पर्यावरण व खाद्य संरक्षण तथा मानवीय संवेदनाओं की कथाएं  हैं। हमारे अखबार "भूख से मौत" के समाचार देते ही रहते हैं ऐसे में 'खाद्य संरक्षण' के  महत्व को ये कथाएं भली- भांति स्थापित करती हैं। 'भँइसी अउ बोकरी', 'सल्हई अउ बेंदरा', 'अलाल टूरा' जैसी कथाएं अपने कलेवर में छोटी होते हुए भी अपने भीतर तीक्ष्ण व्यंग्य समाहित किए हुए हैं। 'देवता भागे' धर्मांधता और चतुराई की कहानी है, पर इसमें भी एक सार्थक व्यंग्य समाहित है। 'बइहा राजा' अपने आप हास्य के साथ राजनैतिक दबंगई की मूर्खता को प्रमाणित करती है। शीर्षक कथा 'उठ मोर पूत, तोर तिल पूरगे' अत्यंत मार्मिकता के साथ जल संरक्षण के प्रति जागरूक करती हुई कथा है। जल संकट आज इतने विकट रूप में हमारे सामने है यह दो देशों के बीच युद्ध को भी आमंत्रित कर सकता है ऐसे में 'जल को बचाना' कितना जरूरी है, यह अलग से रेखांकित करने की आवश्यकता नहीं है। 'सरबरस' पूर्णतः भारतीय संस्कृति  एवं बिटिया के अपने मायके के प्रति प्रेम एवं हर कीमत पर मायके की लाज बचाए रखने की कहानी है। 'चूड़ी हरवा' समाज के उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है जो आज भी किसी न किसी छोटे से उपकार के बहाने मनुष्य का इतना शोषण करता है कि व्यक्ति का आत्मविश्वास और आर्थिक आधार सब कुछ धराशायी होने लगता है। 'टो टो के बिहाव' हास्य व्यंग्य की कथा है। संग्रह की समस्त कहानियाँ न केवल अपनी भाषा में ही सरल है अपितु अपने संदेश को सरलता पूर्वक संप्रेषित भी करती है।

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