कहानी // प्‍यार के आँसू // हरिश्चन्द्र शाक्य

बारहवीं कक्षा का छात्र धीरज प्रेम-प्यार की भाषा समझने लगा था। वह किसी भी सुन्दर युवा लड़की को देखता तो उसके रूप सौन्दर्य से प्रभावित हुए बिना न रहता। संकोची स्वभाव होने के कारण और समाज में बदनामी के भय से उसने किसी भी लड़की से आँख नहीं मिलायी थी। गाँव से काफी दूर एक शहर में वह पढ़ता था। जहाँ वह कितनी ही सुन्दरियों को देखता पर किसी से प्यार से बात करना उसके वश की बात नहीं थी।

धीरज जब अपने गाँव जाता तो वहाँ की हम उम्र लड़कियों से बात करना उसे अच्छा लगता था। लड़कियाँ भी उसकी बातों में रुचि लेती थीं और उससे प्रभावित होती थीं। एक दिन धीरज गाँव के उस विद्यालय में पहुँचा जहाँ का वह पूर्व छात्र रहा था। वहाँ के अध्यापक तो उसके परिचित थे ही। वह प्रतिभाशाली छात्र रहा था इसलिए अध्यापकों को उससे विशेष स्नेह रहा था। विद्यालय में गाँव की कई खूबसूरत लड़कियाँ कक्षा आठ की छात्राएँ थी जो यौवनावस्था में प्रवेश कर चुकी थीं। धीरज की अभिलाषा शायद उन्हीं लड़कियों का सामीप्य पाने की थी। उन लड़कियों की कक्षा में पहुँचने का कोई बहाना तो चाहिये था। उसने अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने हेतु हैड मास्टर से कक्षाएँ पढ़ाने की अनुमति माँगी तो हैड मास्टर ने उसे सहर्ष अनुमति प्रदान कर दी।

एक दिन धीरज कक्षा आठ के विद्यार्थियों को पढ़ा रहा था तो उसकी निगाह कक्षा की एक खूबसूरत लड़की आशा की आँखों सेमल गयी। दोनों एक दूसरे को एकटक देखते रहे फिर सामान्य हो गये। आशा मन ही मन धीरज को प्यार करने लगी थी किन्तु धीरज को इस बात का पता ही नहीं चला था। आशा को तो सोते-जागते हर समय धीरज ही दिखाई देने लगा था।

धीरज का गाँव आशा का गाँव नहीं था। दोनों एक बिरादरी के भी नहीं थे। आशा धीरज के गाँव में अपनी बुआ के घर पर रहती थी। धीरज को भी आशा से प्यार हो गया था किन्तु इस रूढ़िवादी सामाजिक परिवेश में धीरज और आशा का मिलन लगभग असम्भव ही था। यही सोचकर धीरज ने आशा के सपनों को अपनी निराशा बना लेना ही उचित समझा।

एक दिन धीरज अपने मित्र दिनेश की छत पर टहल रहा था जहाँ से आशा की बुआ का घर दिखाई पड़ रहा था। धीरज का दिनेश से मिलना तो एक बहाना मात्र था। उसका मूल उद्देश्य तो आशा की एक झलक मात्र पाना था। धीरज को अपनी चाह के मुताबिक आशातीत सफलता भी मिली। धीरज को दिनेश की छत पर खड़ा देखकर आशा भी सचमुच मिलनातुर हो गयी थी। वह अपने दरवाजे के सामने खड़ी होकर धीरज को टकटकी लगाकर देखने लगी। धीरज ने अपने प्यार की परीक्षा लेने हेतु ऐसी जगह खड़ा होना मुनासिब समझा जहाँ से वह आशा को दिखाई देना बन्द हो जाय। आशा पर तो प्यार का नशा सवार था। वह भी अपना स्थान बदलकर ऐसे स्थान पर खड़ी हो गयी जहाँ से धीरज को पुनः भलीभाँति देख सके। धीरज आशा की गतिविधियाँ देखकर समझ गया था कि आशा उसे बहुत प्यार करती है। दोनों का प्यार अभी तक मूक ही बना हुआ था। उसे भाषा प्रदान करने हेतु अभी तक दोनों में कोई बात-चीत नहीं हुई थी।

समय ने पलटा खाया धीरज ने न चाहते हुए भी आशा को भूल जाना ही उचित समझा। इस बीच धीरज को नौकरी दिलाने के बहाने एक ठग ने ठग लिया और धीरज के घर की हालत खस्ता हो गयी। उसके पिता ने बुरे वक्त में धीरज की शादी बिना दान-दहेज लिए ही ऐसी लड़की से कर दी जो धीरज को कतई पसन्द नहीं थी। अपने अरमानों का गला घोंटकर धीरज ने परिस्थितियों से समझौता कर लिया और अपनी बिना पसन्द की लड़की के साथ ही अपनी गृहस्थी की नाव खेना शुरू कर दिया। आशा को तो वह कतई भूल चुका था।

पाँच साल बाद आशा होली के अवसर पर अपनी बुआ के घर पर आयी। गाँव में हुरिहारों की टोली होली गीत गाते और एक दूसरे पर रंगों की बौछार करते हुए जब आशा की बुआ के दरवाजे पर पहुँची तो आशा भी हुरिहारों का नाच गाना और हुड़दंग देखने अपनी सहेलियों के साथ घर से बाहर आयी। उसने टोली में गा रहे धीरज के पास जाकर उसकी कलाई पकड़ ली और अपने मूक प्यार को वाणी प्रदान करते हुए बोली, ‘‘इधर आओ धीरज।’’

धीरज ने जैसे ही आशा को देखा तो उसके शरीर में सिहरन सी दौड़ गयी। अपनी स्वप्न-सुन्दरी के कोमल हाथ का स्पर्श पाकर तो धीरज को बिजली जैसा झटका लगा। वह आशा की ओर चुम्बक की भाँति खिंचता चला गया। अपनी सहेलियों के बीच खड़ी आशा ने धीरज से कहा, ‘‘मैं तुम्हें कब से सच्चा प्यार करती हूँ धीरज! ..... किन्तु तुमने मेरी कोई खबर ही नहीं ली।’’

धीरज ने कहा, ‘‘क्या बताऊँ आशा!... परिस्थितियों ने हमें एक-दूसरे से मिलने ही नहीं दिया।’’ आशा से ज्यादा देर बात करना धीरज ने उचित नहीं समझा क्योंकि वह सोच रहा था कि आशा से बात करते देख कहीं कोई उन दोनों पर शक की उँगली न उठाने लगे।

धीरज आशा के रूप-सौन्दर्य को देखकर पागल सा हो गया था। यह जानकर उसे बेहद दुख हुआ कि आशा उसके विरह में तिल-तिल जलती रही। उसे अपने आप पर बहुत क्रोध आ रहा था। सोते-जागते, उठते-बैठते उसे अब आशा ही नजर आ रही थी। विरह की लपटें अब उसे भी धू-धू कर जलाने लगी थीं।

आशा से मिलन की आशा लेकर धीरज ने आशा की बुआ के मुहल्ले में चक्कर लगाना शुरू कर दिया किन्तु उसे आशा की एक झलक तक न मिल पायी। मिलनातुर धीरज ने आशा से मिलने की युक्ति सोची। आशा की बुआ के एक पड़ोसी ने हाल ही में अपने घर पर गोबर गैस संयंत्र लगाया था जो गाँव में आश्चर्य का विषय बना हुआ था। धीरज ने उस व्यक्ति से उस संयंत्र का उपयोग देखेने की इच्छा प्रकट की तो वह व्यक्ति उसे अपने दुमंजिला मकान में दूसरी मंजिल पर ले गया। वहाँ जाकर धीरज ने जोर-जोर से बातचीत करनी शुरू कर दी तो धीरज की आवाज सुनकर अपनी छत से होती हुई आशा भी वहाँ आ गयी। वह उस व्यक्ति की नजर बचाकर धीरज से इशारे में अभिवादन करके तथा मौन मिलन करके मुस्कराते हुए लौट गयी।

नित्य की भाँति आज भी धीरज आशा की एक झलक पाने की आशा मन में लिये सबेरे ही गाँव में घूमने निकल पड़ा। उसे नये वस्त्रों में सजी-धजी आशा अपनी ओर आती दिखाई पड़ी। आशा ने पास आकर धीरज से कहा, ‘‘आज मैं अपने गाँव जा रही हूँ.... क्या मुझे विदा करने नहीं चलोगे?’’

धीरज को लगा कि कोई उसकी सारी खुशियाँ छीनकर उसकी ज़िन्दगी में ज़हर खोल रहा है। उसने अनमने मन से कह दिया कि अवश्य चलूँगा तुम्हें विदा करने। थोड़ी देर में आशा का भाई अवधेश अपनी पत्नी के साथ आ गया। आशा का भाई और धीरज गाँव के विद्यालय में सहपाठी रहे थे इसलिए एक दूसरे को अच्छी तरह पहचानते थे। धीरज वहाँ से चला गया और गाँव के विद्यालय के पास ऐसी जगह बैठ गया जहाँ से जाती हुई आशा दिखाई दे रही थी।

बस अड्डा गाँव से तीन किलोमीटर की दूरी पर एक अन्य गाँव में था। आशा को अपने भइया-भाभी के साथ पैदल ही बस-अड्डे तक जाना था। आशा ने पीछे मुड़कर देखा तो धीरज उसे दिखाई दे गया। उसने धीरज से हाथ जोड़कर अभिवादन किया और इशारे से उसे बुलाने लगी। उसके भइया-भाभी उसके इस कृत्य से बेखबर रहे।

धीरज आशा का इशारा पाकर अपने को रोक न सका। वह तुरन्त ही अपने घर से साइकिल उठा लाया और बस अड्डे की ओर चल पड़ा। रास्ते में ही वे सब लोग मिल गये। अवधेश पर भी साइकिल तो थी किन्तु आशा और पत्नी दोनों को बैठा पाना मुश्किल था इसलिए वह साइकिल हाथ में लिये पैदल चल रहा था। धीरज को देखते ही अवधेश ने पूछा, ‘‘तुम कहाँ जा रहे हो धीरज?’’

‘‘मैं बस अड्डे के पास ही एक व्यक्ति से अपने रुपये बसूलने जा रहा हूँ।’’ धीरज का यह बनावटी उत्तर ही था।

‘‘तो मेरी एक सवारी अपनी साइकिल पर बैठाल लो।’’ अवधेश ने कहा। आशा झटपट धीरज की साइकिल पर बैठ गयी और अपनी भाभी से कह दिया, ‘‘भाभी जी! आप भाई साहब की साइकिल पर बैठ जाइये।’’ और फिर उसने धीरज से काना फूँसी करते हुए साइकिल की चाल बढ़ाने को कहा। धीरज ने साइकिल तेज कर दी और अवधेश से काफी आगे निकल गया।

आगे निकलकर आशा ने धीरज से कहा, ‘‘आपको मैं तभी से सच्चा प्यार करने लगी थी जब आप मेरी कक्षा में पहली बार पढ़ाने आये थे... मैं दिन-रात आपके लिए तड़पती रही किन्तु आपने कभी एक पल के लिए भी दर्शन देने की नहीं सोची.... आपके विरह में मेरी क्या हालत रही है यह तो कोई विरहिणी नायिका ही जान सकती है।’’

धीरज को लगा कि उससे बहुत बड़ी भूल हुई है। उसने आशा से कहा, ‘‘मैं तुम्हारे प्यार को समझ गया था आशा!.... किन्तु तुम्हारे और अपने मिलने को असम्भव समझ कर मैं निराश हो गया था... हमारे मूक प्यार को उस समय यदि भाषा मिल गयी होती तो शायद यह गलती नहीं हुई होती.... मुझे माफ कर दो आशा... मैं भी तुम्हें सच्चे दिल से प्यार करता हूँ।’’

आशा ने रुँआसे स्वर में बताया, ‘‘कुद़रत भी कितनी निर्दयी है धीरज!... हम दोनों का मधुर मिलन कराया भी तो ऐसे मोड़ पर जहाँ से फिर हम दोनों को बिछुड़ना पड़ेगा।’’

‘‘मगर आशा क्यों?... मुझ पर इतना जुल्म न ढाओ.... बरसों के बाद तो तुम गिली हो.... अब मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।’’ यह कहते-कहते धीरज का गला रुँध गया।

आशा ने कहा, ‘‘अब वक्त बहुत आगे निकल चुका है धीरज!... मैं अब चाह कर भी तुमको नहीं मिल सकती.... तुमने तो मुझे पूछे बगैर अपनी ज़िन्दगी का फैसला कर लिया है... अब मैं उस बहिन के जीवन में जहर नहीं घोलना चाहती जो तुम्हारी पत्नी है.... मैंने तुम्हारे साथ जीने-मरने की कसम खा रखी थी.... मेरे सारे अरमान धरे के धरे रह गये... धीरज! अब मैं तुम्हें कभी नहीं मिल सकती क्योंकि इसी महीने की पच्चीस तारीख को मेरी शादी होने जा रही है.... इसीलिए मैं अपने गाँव जा रही हूँ।’’ यह कह आशा सचमुच ही रो पड़ी थी। आशा की शादी की बात सुनकर धीरज के होश उड़ गये थे। उसे लग रहा था कि उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी है और वह एक गहरे खन्दक में गिरता चला जा रहा है।

अपने पर काबू पाते हुए धीरज ने कहा, ‘‘मेरे लिए यह सजा बहुत बड़ी हो गयी आशा!... मैंने तुम्हें पाँच वर्ष विरह में तड़पाया है वह भी जान बूझकर नहीं.... और तुम अब मुझे ज़िन्दगी भर तड़पाओगी।’’ दोनों ही वार्तालाप में ऐसे मग्न हो गये थे कि कब बस अड्डा आ गया यह पता ही नहीं चला। बस अड्डा पर धीरज ने आशा, अवधेश और उसकी पत्नी को बस में बैठा दिया और अवधेश की साइकिल बस की छत पर लदवा दी।

धीरज नीचे खड़ा था। आशा उसे बराबर देखे जा रही थी। ज्यों ही बस आगे बढ़ी आशा ने धीरज से हाथ जोड़कर नमस्ते की और उसकी आँखों से आँसुओं की प्रबल धारा प्रवाहित होने लगी। धीरज तब तक बस को देखता रहा जब तक वह उसकी आँखों से ओझल नहीं हो गयी। धीरज को फिर आशा कभी नहीं मिली। जब भी उसकी याद आती वह अकेले में रोकर अपना अकथनीय दर्द हल्का कर लेता था। उसका दर्द समझने वाला समाज में कोई न था। उसके प्यार के आँसू जब बहते थे, घंटों बहते थे।


- डॉ० हरिश्‍चन्‍द्र शाक्‍य, डी0लिट्‌0

शाक्य प्रकाशन, घंटाघर चौक

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