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उलझी लकीरें // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी

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वह अपना दायां हाथ टेबल पर के किनारे पर रखकर हथेली को देखने लगा। मैंने यह बात नोट की थी कि वह जब चुप रहता था तो ज्यादातर अपनी हथेलियों को देख...

वह अपना दायां हाथ टेबल पर के किनारे पर रखकर हथेली को देखने लगा। मैंने यह बात नोट की थी कि वह जब चुप रहता था तो ज्यादातर अपनी हथेलियों को देखता रहता था। एक बार मैंने उससे पूछा था, ‘‘तुम अपनी हथेलियों में क्या देखते रहते हो?’’

‘‘लकीरें।’’

‘‘लकीरें! पामिस्ट्री जानते हो क्या?’’

‘‘नहीं। पामिस्ट्री जानता होता तो औरों के हाथ नहीं देखता,’’ और वह थोड़ा हंसा। ‘‘फिर तो तुम्हारा हाथ भी देखता।’’

‘‘यह तुम अपने हाथों की लकीरों में क्या देखते रहते हो, जबकि तुम्हें कुछ मालूम भी नहीं?’’

उसने अपने दोनों हाथ उल्टे करके मेरे आगे टेबल पर रखे।

‘‘इन हाथों में तुम्हें कोई खास बात नजर आती है?’’ उसने मुझसे पूछा।

उसके हाथों की लकीरें बहुत ज्यादा, गहरी और अस्पष्ट थीं। मैंने कुछ नहीं कहा, केवल उसकी ओर देखा।

‘‘एक पामिस्ट ने मुझे कहा था कि तुम्हारी लकीरें उलझी हुई हैं, और मैं ये लकीरें इसलिए देखता हूं क्योंकि मुझे इनमें अजीब शक्लें नजर आती हैं। ये लकीरें एक दूसरे को काटती हैं और मुझे क्रॉस नजर आते हैं और मुझे लगता है कि मेरे भाग्य पर भी क्रॉस लगे हुए हैं।’’

रेस्तरां में हम दोनो चुपचाप बैठे थे। वह पहली बार यूनिवर्सिटी के बाहर किसी जगह पर मुझसे मिला था।

‘‘क्या सोच रही हो?’’ अचानक उसने पूछा।

मैं उलझ गई। कहना चाहा कि मैं तुम्हारे ही बारे में सोच रही थी, लेकिन कह नहीं पाई।

‘‘कुछ नहीं, ऐसे ही बैठी थी।’’

उनसे दोनों कुहनियां टेबल पर रखकर ठुट्डी हथेलियों के प्याले तक लाया और मेरी आंखों में देखते कहा, ‘‘तुम्हें मुझमें ऐसी क्या खास बात नजर आई जो तुम मेरी ओर आकर्षित हो यहां पर आयीं। बाकी लड़कियां तो मेरी उबाऊ कंपनी और उबाऊ व्यक्तित्व से दूर भागती हैं।’’

मुझे कोई उत्तर नहीं सूझा। वह और लोगों से अलग था, निराला था, शायद इसलिए।

‘‘तुम थोड़े अजीब हो!’’


‘‘अजीब!’’ वह हंसा। दूसरे अर्थ में मैं तुम्हारे लिए एक रहस्य हूं जिसे तुम हल करना चाहती हो। लेकिन जब तुम सब कुछ जान जाओगी तब मैं तुम्हारे लिए रहस्य नहीं रहूंगा। और तब... तब तुम्हारी दिलचस्पी परेशानी में बदल जाएगी और तुम तंग हो जाओगी।’’ उसकी आँखोें की उदासी ज्यादा गहरी हो गई। वह खाली कप में चम्मच घुमाने लगा।

‘‘तुम्हारी यही बातें जो अजीब हैं,’’ मैंने कुछ कहने के लिए बात की।

‘‘समीना, मुझमें कोई भी अजीब और खास बात नहीं है। तुम थोड़ा ध्यान लगाकर देखोगी तो तुम्हें मेरे जैसे और भी कई लोग नजर आएंगे, जिन्हें दुनिया में केवल तकलीफों के और कुछ नहीं मिला। यह और बात है कि उनमें से कुछ लोग खुद को छिपा सकते हैं और कुछ लोग मेरे जैसे होते हैं जो छिपा नहीं सकते हैं। मैं एक चोट खाया और हारा हुआ इन्सान हूं। जब छोटा था तो अपनी हम उम्र के हाथों मार खाकर रोता हुआ घर आता था। घर पर माँ अपने बेरोजगार पति और सख्त स्वभाव सास की कसर मुझसे निकालती थी। जैसे जैसे मैं बड़ा होता गया, भोंदू और बुजदिल होता गया। दुनिया के हाथों मैंने हमेशा मार खायी है। मुझमें मुकाबला करने की शक्ति नहीं है। मुझमें कुछ भी नहीं, और जब तुम्हें पता चलेगा कि मैं अंदर से कितना खोखला हूं, तब तुम भी किनारा करके चली जाओगी।’’

‘‘पहले कौन चला गया है?’’

‘‘पहले?’’ और मेरी ओर देखे बिना कहा, ‘‘मेरी जिंदगी में कौन आएगा! अगर कोई भूलकर आ भी गया तो झांककर, वीरानी से डरकर चला जाएगा।’’

मुझे लगा कि वह बात से ध्यान हटाना चाहता है।

‘‘डिपार्टमेंट की ओर से पिकनिक का प्रोग्राम बना है, कींझर (नाम) तालाब पर तुम चल रहे हो न?’’ मैंने पूछा।

‘‘नहीं। तुम्हें पता है कि मैं ऐसी बातों में भाग नहीं लेता।’’

‘‘लेकिन क्यों? अकेले रह रहकर तो डिप्रेशन के मरीज बन गए हो। और लोगों के साथ वक्त गुजर जाता है। औरों की कम्पनी में, किसी की मौजूदगी में आदमी अपने आप में से निकल आएगा। तुम तो न किसी दावत में आते हो, न किसी फंक्शन में। आखिर तुमने अपने आप पर अकेलापन हावी क्यों किया है?’’

वह कुछ देर तक मेरी ओर देखता रहा।

‘‘देख समीना, मैं अपनी निजी जिंदगी में किसी का दखल बर्दाश्त नहीं करता। न ही किसी के करीब जाता हूं। तुमने मेरी ओर मित्रता का हाथ बढ़ाया है। इसके लिए धन्यवाद। मैं तुम्हें इतना बता दूं कि मेरे लिए सारतर के शब्दों में बाकी सब लोग नर्क हैं।’’ उसने बैरे को बुलाया। बैरे ने थोड़ी देर की तो वह चिढ़ गया। उसने अपना क्रोध बैरे पर निकालना चाहा।

उसे हमारे डिपार्टमेंट में लेक्चरार की हैसियत से आए पांच छः महीने हो चुके थे। डिपार्टमेंट के सभी साथी उसे प्रोफेसर कहकर बुलाते थे, इसलिए वह सभी लोगों से अलग थलग और अकेला रहता था। क्लास लेने के बाद बाकी पूरा वक्त सेमिनार लायब्रेरी में बैठकर पढ़ता रहता था। कोई उससे बात करता तो वह इतना संक्षेप में उत्तर देता था कि उस व्यक्ति को उससे खुलकर बात करने की हिम्मत ही नहीं होती थी। पहले पहले हमें लगा कि शायद वह खुद को कुछ समझता है। लेकिन बाद में उसे सब क्रैक कहने लगे। लेकिन मुझे लगा कि वह ऐसा नहीं था जैसा वह बाहर से नजर आता था। यह मेरी जिज्ञासा ही थी जो मुझे उसके नजदीक ले गई। उसके नजदीक होना इतना आसान नहीं था। वह किसी को नजदीक आने ही नहीं देता था। जैसे कि यह उसकी जिंदगी का उसूल हो। मैंने समझा कि वह बहुत कठिन व्यक्ति है, लेकिन बाद में पता चला कि वह उतना ही कठिन था जैसे एक शरारती बच्चा और जिसको मनाना हर किसी के बस की बात नहीं होती है।

मैंने उसे मना लिया कि वह पिकनिक पर चलेगा और यह मेरा वादा था कि मैं उसके साथ ही रहूंगी। हमारे कुछ साथी नावों में बैठकर कींझर तालाब का सैर कर रहे थे और कुछ किनारे पर बैठकर हंसी मजाक में मशगूल थे। हम औरों से दूर जाकर बैठे थे। मैंने देखा कि हमारे कुछ साथी हमारी ओर देखकर हंस रहे थे, शायद हमारे बारे में बातें करके मजाक उड़ा रहे थे। यह उसने भी महसूस किया।

‘‘पहले मैं अकेला था जिस पर हंसते थे, अब दो हुए हैं...’’ उसने कहा और एक बड़ा ठहाका लगाया। मैं भी उसके साथ हंसने लगी। जो हमारी ओर देखकर हंस रहे थे वे चुप हो गए। वह खुद को डरपोक और कमजोर मानता था। लेकिन उसमें इतनी हिम्मत थी कि औरों की बातों को हवा में उड़ा सकता था और उन पर हंस सकता था।

‘‘तुम बहुत ही मुश्किल से किसी को अपने करीब आने देते हो, ऐसा क्यों है?’’ मैंने उससे पूछा।

‘‘क्यों तुम्हें कोई कठिनाई हुई?’’

‘‘कठिनाई की बात है! जब अपने पर उतर आई तब जाकर साहब ने कुछ ध्यान दिया।’’

वह हंसने लगा और फिर गंभीर होकर कहा, ‘‘समीना! यह सच नहीं है कि मैं किसी को अपने करीब आने नहीं देता। बात यह है कि मैं एक ही जगह पर खड़ा हूं, जहां कोई मुझे छोड़ गया था और मैं किसी के करीब नहीं जा सकता।’’

‘‘वह कौन थी?’’

‘‘क्या तुम सचमुच जानना चाहती हो?’’

‘‘हां, अगर तुम्हें बुरा न लगे...’’ मैं यह दिखाना नहीं चाहती थी कि मैं यह जानने के लिए कितनी उतावली थी। वह कौन थी जो उसकी जिंदगी में इतना करीब आई और फिर क्यों इतनी दूर चली गई!

‘‘उसका नाम... लेकिन नाम का तुम क्या करोगी! बस, वह मेरा पहला प्यार थी। वह पहला प्यार जिसके निशान पूरी जिंदगी कायम रहते हैं।’’ वह चुप हो गया। थोड़ी देर तक उंगली से सर को रगड़ने लगा।

‘‘मेरे हालात ऐसे थे जो हमारी शादी नहीं हो सकती थी। मैं अभी पढ़ रहा था। मुझे कोई नौकरी नहीं थी। गरीब व्यक्ति जब तक अपने पैरों पर खड़ा नहीं होता तब तक घर बनाना असंभव है। उसके लिए उसकी माँ ने इतना लंबा इंतजार करना पसंद नहीं किया।’’

‘‘लेकिन खुद उसने क्या किया?’’ मैंने पूछा।

‘‘वही जो उसकी माँ ने उसे कहा।’’

‘‘कमाल है! यह कैसा प्यार था? और तुम इसे सीने से लगाकर चल रहे हो!’’ मैंने चिढ़ते हुए कहा।

‘‘नहीं समीना, मुझे इस प्यार में आज भी कोई शक नहीं है। उसने ऐसा क्यों किया वह मैं समझ सकता हूं। वह भी एक गरीब घर की लड़की थी। उसने मुझसे ज्यादा गरीबी, तकलीफें देखी थीं। शायद इसलिए वह एक अच्छी और बेहतर जिंदगी गुजारना चाहती थी, जो मेरे साथ संभव नहीं थी।’’

‘‘और अब उसे सब कुछ उपलब्ध है?’’

‘‘हां! कार, बंगला, जिंदगी की हर सहूलियत...’’

‘‘और तुम अब भी उसे चाहते हो?’’ मुझे लगा कि मैं एक वकील की तरह टेढ़ी पूछताछ कर रही थी और वह शांत होकर उत्तर देता रहा।

‘‘वह मेरी नाकामियों और पराजयों की निशानी है। मैं उसे भूल नहीं पाया हूं।’’

मुझे उस पर इतना गुस्सा आया कि विचार आया कि उसे छोड़कर बाकी साथियों की तरफ चली जाऊं। हम दोनों कितनी ही देर तक चुपचाप तालाब के साफ पानी पर आकाश की नीली ijNkb± देखते रहे। हमारे बाकी साथी खुश थे, वे हंस रहे थे और एक दूसरे के पीछे दौड़ रहे थे। मैं उसके बारे में सोच रही थी, लेकिन वह क्या सोच रहा था? शायद उस लड़की के बारे में जो इस वक्त अपने बंगले में अपने बच्चों के साथ खुश बैठी होगी या काम में अपने पति के साथ घूम रही होगी और ठहाके लगा रही होगी और जिसे एक पल के लिए भी यह विचार नहीं आया होगा कि एक पागल व्यक्ति अभी अभी ही उसकी बातें करके उसकी याद में गुम हो गया है।

‘‘उस लड़की से तुम्हारा प्यार एक पागल का प्यार है...’’ मेरे मुंह से निकल गया। मैं अपने क्रोध को दबा नहीं पायी।

‘‘पागल का प्यार!’’ उसने ठहाका लगाया। ‘‘नहीं समीना, यह बात नहीं है। मैं औरों की तरह नहीं हूं, उसका कारण यह नहीं है। तुम मेरे भूतकाल से परिचित नहीं हो। तुम्हें पता नहीं है कि मैंने जिंदगी में क्या क्या सहन किया है। मैंने अपने छोटे भाइयों और बहनों को रोटी के लिए विनतियां करते देखा है, नए कपड़े के लिए तरसता देखा है। अपनी बीमार माँ को बिना इलाज के तड़पते और मेहनत करते देखा है। जब मैं मैट्रिक की परीक्षा का फार्म भर रहा था तो केवल पचास रुपयों के लिए अपने सभी रिश्तेदारों के आगे झोली फैलाई और मेरी झोली तानों और डांटों से भरी गई। मेरी माँ ने अपने स्वर्गवासी रिश्तेदारों की याद में रखे अपने दहेज के कपड़े और मेरी छोटी बहन की कानों की सोने की बालियों को बेचकर फीस के पैसे दिए, उसके बाद नौकरी के लिए फिर से उन रिश्तेदारों के दरवाजों पर भटकता रहा। ये सभी जिल्लतें और बेइज्जतियां जहर के घूंट बनकर मेरे अंदर इकट्ठे होते गए और तुम कहती हो कि वह बंगले और कार की खातिर मुझे छोड़कर चली गई, फिर भी मैं उसे प्यार करता रहा हूं! उसने भी जिल्लतें और मायूसियां देखी थीं और लड़की होने के कारण मुझसे भी ज्यादा। वह नीलाम घर में रखी एक चीज थी जिसे खरीद करने के लिए काले कलूटे और अपाहिज साहूकार बड़ी बड़ी बोलियां लगा रहे थे। पता नहीं कि वह अपने बेहतर भविष्य के लिए या अपने घर वालों के लिए बिक गई। मैं उसे दोष कैसे दे सकता हूं। नहीं उसका कोई दोष नहीं है...’’ वह उठ खड़ा हुआ। ‘‘हो सकता है कि वह मुझे भूल गई हो और मेरी यह प्रार्थना है कि वह मुझे भुला दे। किसी की कमी, किसी की गुमशुदगी जिंदगी में ऐसा शून्य पैदा कर देता है जो फिर कभी भर नहीं पाता है।’’

मैं भी उठ खड़ी हुई और उसकी ओर देखते कहा, ‘‘क्या और कोई भी यह शून्य नहीं भर सकता?’’ उसने मुझे घूरकर देखा।

‘‘समीना, मुझे ऐसे लोग पसंद हैं जो हमेशा खुश रहते हों, जो हमेशा हंसते रहें और बेपरवाह होते हैं। मुझे उनपर रश्क होती है, लेकिन मैं उनसे जलता नहीं हूं, इसलिए उन्हें नुकसान पहुंचाना भी नहीं चाहता।’’

‘‘क्या मतलब? मैंने तुम्हारी बात समझी नहीं!’’ मैं समझ गई थी कि वह क्या कहना चाहता है।

‘‘मैं नहीं चाहता कि मेरी उदासियों और मेरी मेहरूमियों की ijNkb± किसी और पर पड़े।’’ उसने धीरे और भारी स्वर में कहा।

पता नहीं क्यों उसकी बात पर मेरा मन भर आया। मैंने दूर दूर तालाब की सतह पर हवा से बनने वाली पतली लहरों की ओर देखते कहा, ‘‘लेकिन मैं उन सभी को तुमसे शेयर करना चाहती हूं।’’ मैंने उसकी ओर देखा। उसकी आंखों में वही तटस्थता थी।

‘‘नहीं समीना, नहीं...’’ उसके स्वर में कुछ परेशानी थी। ‘‘तुम बेवजह मुझ पर तरस खा रही हो। मैं तुम्हारे लिए सही व्यक्ति नहीं हूं। तुम मेरे साथ खुश नहीं रह पाओगी...’’ वह रुक गया और फिर चेहरा दूसरी ओर करके डूबे स्वर में कहा, ‘‘और दूसरी कोई भी लड़की उसकी जगह नहीं भर सकती।’’

मैं लड़खड़ाते कदमों से जाने लगी। मुझे पता था कि वह मुझे रोकेगा नहीं। मैं उसकी कुछ नहीं थी। वह इतना अकेला था जो कोई भी उसका नहीं हो सकता था और न ही वह किसी का हो सकता था। मैंने दूर जाकर गर्दन घुमाकर उसकी ओर देखा। वह तालाब की ओर मुंह करके पत्थर बना खड़ा था और मुझे पूरा विश्वास था कि वह अब भी मेरे बारे में नहीं सोच रहा था।

दूसरे दिन चौकीदार ने एक बंद लिफाफा मुझे लाकर दिया। खोलकर देखा तो उसका पत्र था। उसने बीते दिन वाली घटना पर उसके विचार के अनुसार की गई बदतमीजी पर माफी मांगी थी और लिखा था, ‘‘एक पागल, एक सचमुच के जानदार व्यक्ति से प्यार नहीं कर सकता। वह तस्वीर से ही प्यार कर सकता है, जिससे वह कुछ मांगना नहीं चाहता और वह तस्वीर जो उसे कुछ दे नहीं सकती। उसे इस बात की परवाह नहीं है कि तस्वीर उसके साथ प्यार करती है या नहीं, वह प्यार करता है और यही उसके लिए काफी है।’’

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भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,616,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,668,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,49,साहित्यिक गतिविधियाँ,179,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,51,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: उलझी लकीरें // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी
उलझी लकीरें // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी
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