आजादी // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी


एक तोता आजाद और खुले आकाश में उड़ता किसी घर पर आ बैठा। अचानक उसकी नजर आंगन में टंगे पिंजरे में बंद तोते पर जा पड़ी। अपने एक भाई को कैद में देखकर उसे बहुत दुःख हुआ। करीब आकर, दुःख भरे स्वर में कहा, ‘‘कुदरत ने हमें आजाद रहने के लिए बख्शा है, लेकिन यह कितना बड़ा जुल्म है, जो पक्षी फंसाने वाला व्यक्ति हमारे जन्मसिद्ध (प्राकृतिक) अधिकार छीनकर हमें इस प्रकार गुलामी के पिंजरे में कैद कर देता है।’’

गुलाम तोते ने कहा, ‘‘ये शब्द तो पक्षी फंसाने वाले व्यक्ति इस्तेमाल करते हैं।’’

आजाद तोते ने कहा, ‘‘इनकी गुलामी में रहकर तुम ऐसे शब्द सीख गए हो। मेरे जैसे आजाद तोते को इसकी कोई जरूरत नहीं है। मेरा हृदय तो एक भाई को कैद में देखकर दुःखी हो रहा है। मैं अपने भाईयों के साथ मिलकर इस पिंजरे को तोड़कर तुम्हें आजाद कराऊंगा।’’

गुलाम तोता भड़ककर पिंजरे से चीखा, ‘‘बंद करो अपनी ये बकवास! मैं इस पिंजरे का अटूट, कभी न अलग होने वाला एक भाग हूं। तुम आजादी और बगावत के नाम पर मेरे जैसे नमक हलाल तोतों को भड़काकर इस्तेमाल करना चाहते हो। इतने सुंदर पिंजरे को कैसे टूटने देंगे... कैसे टूटने देंगे!’’

आजाद तोते के मुंह से एक बड़ा ठहाका निकल गया, उसने कहा, ‘‘दोस्त, आजाद जिंदगी का एक दिन, गुलाम जिंदगी के सौ वर्षों से ज्यादा अच्छा है और जो आजादी की खातिर कुर्बान नहीं होता, वह हमारी जाति का नहीं है। तुम तो नमक हलाली के नाम पर अपने मालिकों के इशारे पर शब्द बोलते हो, नाचते गाते हो। मेरे भाई, तुम्हारा मन गुलामी के रंग में रंग चुका है। तुम पिंजरे की घुटन और बदबूदार गंध के इतने आदी हो चुके हो कि केवल आजादी की बात का हल्का झटका भी तुम्हें बहुत तकलीफ पहुंचा रहा है! मुबारक हो तुम्हें ऐसे पिंजरे की सलाखें, हमारी मंजिल तो आजाद माहौल में है।’’

गुलाम तोते ने तंग आकर कहा, ‘‘अच्छा अच्छा, घुटन और बदबूदार गंध इस सुंदर पिंजरे की अपनी समस्या है, तुम्हारा उससे कोई संबंध नहीं है। बड़ा आया है आजादी दिलाने, केवल बकवास करने और यहां वहां भटकने के अलावा आप और क्या करते हो! आप सब जाहिल हो, निक्कमे हो, काहिल हो, कामचोर हो, चले जाओ यहां से, हूं।’’ उसके बाद वह आंखें बंद करके, कंधे उचकाकर झपकियां लेने लगा। आजाद तोते की आंखों से आंसू गिर पड़े और फिर वह आजाद माहौल में उड़ गया।

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