खोई हुई परछाईं // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी

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हवा बंद है और कोई आवाज नहीं है। कम घुटन निगल चुकी है सभी आवाजों को। मेरे चलने की आवाज भी नहीं हो रही है रास्ते पर... केवल मेरे मन में, लगातार चलने वाली, सोच की आवाज है और मैं सोच के सिलसिले को एक पल के लिए भी रोक नहीं सकता। मन चूर हो जाता है और फिर चूर परा वजूद। लेकिन सोच के सिलसिले को रोककर एक ही जगह खड़ा करना मेरे बस के बाहर है। काश मैं विचार न कर पाता। पहले जब रास्ते पर कुछ पागल दीवाने देखता था, जो इतने तो गंदे होते थे, जो पास से गुजरने पर घबराहट होती थी। देखकर सोचता था कि मैं चाहे कदम कदम पर खुद को तकलीफों में महसूस करूं , फिर भी इनसे तो अच्छा ही हूं। लेकिन मैं भूला हुआ था। बाद में पता चला कि पागल दीवाने चाहे कैसे भी हों, लेकिन विचारने की तकलीफ से छूटे हुए हैं। तब से मुझे अपने आप पर रहम आने लगा है और इससे ज्यादा वेदना व्यक्ति से हो नहीं सकती। यह मेरे किन कर्मों का फल है, कि मैं जिस चीज को छूता हूं, वह परछाईं बनकर गायब हो जाती है। कितनी आश्चर्यजनक घटना है! मैं इस बात को सोचने से कतराता हूं, लेकिन जो बात पूरे वजूद को घेरकर चल रही है, उससे जान छुड़ाना बहुत मुश्किल है। मैं मेडास बादशाह की तरह नहीं हूं, जिसने दुआ मांगी थी कि वह जिस चीज को छुए, वह सोना बन जाए। मेरा दुआ में विश्वास ही नहीं है तो फिर दुआ किससे मांगू! या शायद दुआ में विश्वास न होने के कारण, दुआ न मांगने के कारण यह सजा मिली है कि मैं जिस चीज को छू लूं, वह गायब हो जाए।

रास्ता सुनसान और खामोश है। ऐसे लगता है जैसे रास्ता खत्म ही न होगा। वैसे भी कोई राह कहीं पर भी खत्म नहीं होती। राह में से राह निकलती है और मैं उन राहों में से निकलने वाली राहों में खो गया था। यह जान ही नहीं पाया कि मेरी राह कौन-सी है या कोई राह है ही नहीं! कुछ पक्का नहीं है। अचानक मन कदमों में उलझ जाता है तो मैं चिल्लाता हूं : कोई है...कोई है...जो मुझे मंजिल तक पहुंचाए...कोई है... पुकार, ऐको बनकर लौट आती है और मेरे अंदर ही कोई उत्तर देता है : यहां हर कोई भटका हुआ है और अपनी राह खुद ही ढूंढ रहा है, कौन फालतू बैठा है किसी की मंजिल देखने के लिए, काश इन्सान को एक दूसरे के सहारे की जरूरत नहीं होती! मुझे याद आ रहा है कि किसी ने मुझसे कहा था : मैं तुम्हारी पत्नी बनूंगी। वह कुछ वक्त तक मेरे साथ चली, लेकिन बाद में आगे चलकर उसने महसूस किया कि उसने गल्ती की थी, यह वादा करके हर कोई अपना मददगार खुद बने। उसने अपनी गल्ती को महसूस किया। न खत्म होने वाली राह पर चलते उसके पैरों में जख्म हो गए थे। उस वक्त कहीं से लोक कहानियों का राजकुमार उड़न खटोले पर चढ़कर आया और उसे अपने साथ चलने के लिए कहा। मैं भी समझता हूं कि उसके लिए और कोई चारा नहीं था।

रास्ता न खत्म होने वाला है और पैर हैं पत्थर समान, कदम कदम पर मन की नसें तनकर खिंच जाती हैं। केवल पैर ही पत्थर के नहीं हैं, घुटनों के ढक्कन भी पत्थर की हैं और टांगों में तो जान ही नहीं। मैं मन के जोर पर खुद को कहीं न खत्म होने वाली और बे आवाज राह पर धकेलता जा रहा हूं। इस न खत्म होने वाली और अकेली राह पर कभी महसूस हुआ था किसी और के वजूद का, पास आने पर देखा कि सच में दूसरा वजूद था। बांह से पकड़कर उससे कहा : तुम यहां कैसे पराई राह पर भटक रही हो?... अचानक मेरा हाथ खाली हो गया, और वह वजूद परछाईं में बदल गया। फिर वह परछाईं धीरे धीरे धुंधली पड़ने लगी, और आखिर गायब हो गई। अचानक पत्थर के कदमों में बिखर गया मेरा मन, तब देखा कि एक परछाईं मेरे साथ चल रही थी। मैं चौंक गया। लेकिन वह मेरी परछाईं थी। तब मुझे पता चला कि मेरी भी परछाईं है अकेले, सुनसान, बे आवाज रास्ते पर। मेरी परछाईं कभी कम होती, कभी बढ़ती रहती है, कभी एक ओर से निकलती राह पर तो कभी दूसरी ओर से निकलती राह पर। मेरे साथ होते हुए भी मुझसे अलग रास्ते के किनारों पर छोटे बड़े पत्थर पड़े हैं। पत्थर भी सोचते होंगे बेचारे! मेरी परछाईं बड़ी होकर फिर से कम हो गई है। व्यक्ति न केवल खुद सोचता है, लेकिन अपनी सोच औरों पर थोपता है, और हर चीज के लिए समझता है कि वह होगी मेरे जैसी, बेचारा व्यक्ति!

किसी ने एक बार कहा था, ‘तुम बहुत ही भावुक हो... हद से ज्यादा भावुक होना भी बुरी बात है।’ मैं मुस्करा दिया, तो उसने फिर कहा, ‘क्यों, एकदम से गंभीर हो गए, मेरी बात अच्छी नहीं लगी क्या!’ मैंने सोचा कि मुझे अपने साथ आईना लेकर चलना चाहिए। घर आकर आईने में मुस्कराकर देखा। मेरी शक्ल टुकड़े-टुकड़े हो गई थी।

किसी को बेहद भावुक बनाने से ज्यादा और कोई सजा नहीं दी जा सकती। भावुक व्यक्ति जिंदा ही नर्क में है। वह दुनिया में शुरुआत ही करना चाहता है तो उसे चारों ओर से बांधकर नर्क में धकेला जाता है। सारतर ने कहा है कि ‘अन्य व्यक्ति नर्क हैं, लेकिन नर्क तो खुद व्यक्ति में है, कोई महसूस करे या नहीं करे।’ मेरा मन मेरे लिए नर्क है, जिसमें वजूद जलता भुनता रहता है। यह कैसी न किए गए गुनाह की सजा है! रास्ते पर चलते चलते मन के नर्क के शोले इतना भड़कते हैं, जो चाहता हूं कि जोर जोर से चीखूं और सर को दीवारों से टकराकर मन तोड़ फोड़ दूं। उस वक्त लगता है कि मन का पूरा भरा हुआ थाल उलटा होने को है। बड़ी मुश्किल से थाल को बचाता हूं। लेकिन आखिर कब तक! मैं यहां से भाग निकलना चाहता हूं, लेकिन वह सब बेकार है। आदमी दुनिया से भाग सकता है, अपने आप से नहीं। मैं जितना अपने आप से भागता हूं, उतनी ही ज्यादा जकड़ महसूस करता हूं। क्या करूं ...क्या करूं ...क्या क्या क्या क्या...आ आ आ...ओह!

मन है या जुता हुआ खेत, जिसमें हर कोई विचार लापरवाही से अंदर घुस आता है, कोई चाहे या न चाहे। सब बकवास है, जब तक व्यक्ति की अपने ऊपर मर्जी नहीं चलती। चाहे वह चाँद पर जाकर रहे, लेकिन फिर भी अपने ऊपर उसकी कोई मर्जी नहीं चलती। कोई भी मर्जी नहीं चलेगी। यह क्या है! इन्सान अपने आगे इतना मजबूर और लाचार क्यों है? नींद, भूख, प्यास, थकान, सुस्ती। अफलातून का यूटोपिया केवल मन में ही बन सकता है। मन की दुनिया पानी का बुलबुला है। इन्सान अपने आप में ही कितनी बड़ी बकवास है।

यह पैर तो पत्थर समान हैं, उठते ही नहीं। केवल मन के सहारे धकेलता जा रहा हूं। मैं कोई देवता तो नहीं हूं, जिसने जादू से एक राजकुमारी को परछाईं बना दिया था। मेरे पास जादू नहीं है, फिर पता नहीं क्या है, जो मेरे केवल छूने से एक राजकुमारी परछाईं बन गई। हर कोई व्यक्ति खुद को देवताओं, परियों की कहानियों का राजकुमार समझता है, लेकिन मैं खुद को देवता समझता हूं। मेरे छूने भर से एक राजकुमारी परछाईं बन गई थी। यह कहानी नहीं है या सच में कहानी है तो बाद में एक राजकुमार आया था, जिसने किसी संत की दुआ से ऐसे सोने के गहने लाया जो मेरे छूने का असर खत्म हो गया। वह ये गहने पहनकर परछाईं से बदलकर राजकुमारी बन गई, राजकुमार के साथ चली गई और मेरे पैर पत्थर के बन गये।

अगर मैं पूरे का पूरा पत्थर बन जाता तो अच्छा होता। इस कम घुटन वाली अनंत खामोशी में गायब हो जाता। बे अंत खामोशी में मेरी सोच की आवाज कितनी भयानक, डरावनी और तकलीफदेह लग रही है। सब कुछ घुटा हुआ है, सब कुछ। अकेली और सुनसान राह के कदम कदम पर Silence और Slow के बोर्ड लगे हैं - अजीब हिदायतें, हुक्म ऐर हर जगह ‘सख्त मना’ के शब्द। यहां पर व्यक्ति के जिंदा रहने की सभी राहें बंद हैं। अगर रहना है तो मुर्दा बनकर रहो। चुप! चुप! अच्छे बच्चे शोर नहीं करते। शाबाश! खामोशी और संजीदगी, धर्म और समाज के लिए जरूरी तत्व हैं। खामोश! बेवकूफ, जाहिल... डंडे के बिना नहीं सुधरते। इस अनंत और बेअंत खामोशी में मेरे सोच की आवाज भी जबरदस्त गुनाह है। ओह! मेरा मन ज्वालामुखी की तरह फट रहा है... (दांतों का पिसना, शरीर की नसों का खिंचकर तन जाना और पत्थर समान कदमों को तेज करने की बेकार कोशिश।)

घर आ गया। मैं घर के आगे अचानक ही अकड़कर खड़ा होता हूं तो आश्चर्य होता है। मुझे पता ही न चला और अपने आप पहुंच गया। जब पहुंचना चाहता हूं तो पहुंच नहीं पाता, पत्थर समान पैर उठते ही नहीं और विचार आता है कभी न पहुंच पाने का। ताला खोलकर, कुंडी उतारकर अंदर जाता हूं। है क्या जिस कारण ताला लगाते हैं! व्यक्ति सब कुछ समझते हुए भी कितनी बेकार बातें करता है। यह घर है या तंग गुफा है? इतनी तंग गुफा में कोई राजकुमारी कैसे रह सकती है! बड़ा ही जलील था, जो उसे कैद करके रखना चाहा।

कितना अंधेरा है! खुद को भी नहीं देख पा रहा। ऐसे लगता है जैसे किसी गहरे बे अंत कुएं में बैठा हूं। हवा बंद है। सांस नहीं ले पा रहा। मैं बे अंत कुएं में नीचे जा रहा हूं... नीचे...नीचे...और नीचे...चारों ओर से दबाव है, मैं पानी में डूब रहा हूं। सांस लेना बंद हो गया है। मेरा पूरा वजूद अंधेरे में गायब होता जा रहा है। ऐसा कैसे हो सकता है! लेकिन मुझे तो ऐसा ही महसूस हो रहा है। ऐसा महसूस हो रहा है, जैसे अंधेरा मेरे पूरे शरीर के एक एक भाग में घुसता जा रहा है। मेरे वजूद का भाग, मेरी परछाईं कहां है? इससे पहले कि अंधेरा हर चीज को निगल ले, मुझे यहां से भाग निकलना चाहिए। मैं उठना चाहता हूं। अंधेरे का भाग बनना नहीं चाहता। उठने के लिए सोचता रहता हूं। शायद नसों ने काम करना बंद कर दिया है, जो दिमाग का हुक्म अमल में लाती हैं। मैं उठ क्यों नहीं रहा? जोर लगा रहा हूं। पैर तो पत्थर समान हैं, वे अंधेरे में नहीं बदलते। मैं शाल पहनकर उठकर बाहर निकलता हूं और रोड पर आकर खड़ा होता हूं। रोशनियां बहुत तेज हैं, जैसे कि सर्च लाईट है चारों ओर। लेकिन मेरी परछाई! मेरी परछाईं कहां है? मेरी परछाईं गायब हो गई; कब, कहां, कैसे? कहां... कहां... रोशनियां तो तेज हैं, लेकिन परछाईं कहां है? परछाईं शुरू से मेरे साथ थी, लेकिन मुझे पता नहीं चला या मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया या तो मेरे साथ होते हुए भी गायब था। कुछ भी विश्वास से नहीं कहा जा सकता। एक दिन अचानक पता चला कि मेरी भी परछाईं है। पिछली बार जब गाँव गया था, तब मैंने यह बात घर में भी की थी। घर के लोग, खास करके मेरे भाई हंसने लगे, लेकिन पिताजी तो एकदम क्रोधित हो गया : ‘ऐसी बेवकूफियों जैसी बातों पर सोचकर अपना वक्त मत गंवाया कर।’ मुझे पक्का विश्वास था कि माँ, जिसने मुझे जन्म दिया है, उसे जरूर पता होगा। लेकिन उसने केवल ठंडी सांस ली और कुछ दुआएं मांगने लगी। मेरे भाईयों ने यह बात अपने दोस्तों को जाकर सुनाई। मैं यह बात अपने दोस्तों को नहीं बताना चाहता था। मैंने सोचा था कि मेरी परछाईं के बारे में मेरे घर वाले जरूर कुछ न कुछ जानते होंगे, दोस्तों से ज्यादा। दोस्तों ने मुझसे इस बारे में पूछा तो मैंने यह सोचा कि हो सकता है वे घर वालों से कुछ ज्यादा जानते हों, मैंने उन्हें अपनी परछाईं के बारे में बताया। उन्होंने एक दूसरे की ओर देखा। आँखों से कुछ इशारे किए और मैंने महसूस किया कि उस दिन के बाद वे मुझे अजीब नजरों से देखने लगे। ऐसा होता है। मुझे यह भी पक्का विश्वास हो गया कि मुझे बाहर से, कहीं से भी कोई भी मदद नहीं मिलेगी। मैंने ‘उसकी’ परछाईं को धुंधला होकर गायब होते देखा था। वह इत्तेफाक से मुझे मिली, तो मैंने उससे उसकी परछाईं के बारे में बात की। लेकिन उसे कुछ भी पता नहीं था, और उसने शायद औरों के द्वारा मेरे बारे में सुना था। उसने मुझसे कहा कि मुझे ऐसी बेकार बातों पर नहीं सोचना चाहिए। मैं चाहे ऐसी बातों पर सोचना छोड़ दूं, लेकिन अपने आप को कैसे छोड़ सकता हूं! यह बात आखिर उन्हें समझ में क्यों नहीं आ रही?

‘‘कौन हो?’’ (अचानक चीख)

‘‘तुम कौन हो?’’

‘‘देखते नहीं हो कि मैं कौन हूं। आँखें नहीं हैं क्या?’’

हां आंखें केवल औरों को देखने के लिए हैं। वह पुलिस वाला है।

‘‘कौन हो? इस वक्त क्यों भटक रहे हो?’’ वह मुझे चुप देखकर धमकी भरे स्वर में पूछता है।

‘‘तुम्हारी परछाईं कहां है?’’ मैंने उससे पूछा।

‘‘परछाईं! कैसी परछाईं?’’ उसके स्वर में आश्चर्य है।

‘‘मैं अपनी गायब हो गई परछाईं को ढूंढ रहा हूं। लेकिन तुम्हें क्या पता।

तुम्हें तो खुद अपनी परछाईं के बारे में भी पता नहीं।’’ वह अजीब नजरों से बुदबुदाता चला जाता है। मुझे पता है कि वह मुझे क्या समझता होगा। मैंने अब इस बात की चिंता करनी छोड़ी दी है कि मुझे और लोग क्या समझते हैं।

पूरा शहर सोया हुआ है। रास्ते और जगहें भी सोयी हुई हैं। मैं औरों पर कैसे फतवा दूं कि वे बदनसीब हैं या खुशनसीब, जो अपनी परछाइयों से बेखबर और लापरवाह सोये हुए हैं। मुझे तो अपने लिए ही निर्णय लेना है। खड़े रहने से कोई लाभ नहीं है। पथरीले पैरों को तेज तेज खींचना शुरू कर देता हूं, और जैसे दौड़ रहा हूं। परछाईं का कहीं कोई पता नहीं है। मैं दौड़ने की कोशिश करता हूं और ढूंढता रहता हूं।

मैं कितना वक्त दौड़ता रहा हूं, मुझे पता नहीं है। सुबह की धुंधली रोशनी में देखता हूं कि मैं अभी तक दौड़ रहा हूं। चाहता हूं ठहाका लगाना, इतने बड़े खौफनाक ठहाके, जो पूरा सोया हुआ शहर हड़बड़ाकर जाग जाये। सोये हुए लोग जागकर आँखें रगड़ते गलियों में निकल आएं। मैं बहुत थक गया हूं। कदम ढीले पड़ते जा रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे पूरी रात कोई चट्टान ढोकर आया हूं। अचानक एक व्यक्ति घर से बाहर निकलते देखता हूं। उसके हाथ में टोकरा है। कितना थका हुआ और चूर चूर है। जैसे पूरी रात कोई पीड़ा भोगता रहा है। कहीं उसकी भी परछाईं... मुझे पूछना चाहिए, शायद कुछ पता लगे। मैं आगे बढ़कर पूछता हूं :

‘‘भाई साहब, आपकी परछाईं तो गायब नहीं हुई है?’’

उसके माथे पर बल पड़ गए।

‘‘कैसी परछाईं, कौन-सी परछाईं?’’ और घूरते चला जाता है। बेचारा! मुझे उस पर तरस आ रहा है। उसे अपनी परछाईं के बारे में भी पता नहीं। लोग धीरे-धीरे घरों से निकलते जा रहे हैं। टोकरे हाथों में, कंधा झुका हुआ और थके कदम-जैसे पूरी रात कब्र में तकलीफ सहन की हो। बेचारों को अपनी परछाईं के बारे में भी पता नहीं है। मैं भी कंधा झुकाकर, पथरीले कदमों से उनके मृत जलूस में शामिल हो जाता हूं।

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KHOI HUI PARCHHAI (Sindh Ki Kahaniyan)
by Shri Shoukat Hussain Shoro
© Translator, Dr. Sandhya Chander Kundnani
B-2/31, BEST Officers Quarters,
Devidayal Road, Mulund (W),
Mumbai - 400 080.

    ISBN    :    978-81-88425-74-7   
     लेखक    :    श्री शौकत हुसैन शोरो
     कॉपीराईट    :    अनुवादक
     आवरण डिजाईन    :    प्रवीण राज
     प्रथम संस्करण    :    2016
     मूल्य    :    ` 450
     प्रकाशक    :    भारतीश्री प्रकाशन
             10/119, पटेल गली, विश्वास नगर,
             शाहदरा, दिल्ली-110032
     फोन    :    011-22303184
     e-mail    :    shilalekhbooks@rediffmail.com
     शब्द-संयोजन    :    गणपति कम्प्यूटर्स, दिल्ली-110032
     मुद्रक    :    बी.के. आफसैट, दिल्ली-110032

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