मृत विश्वास // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी

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अस्पताल के आगे फैले चौड़े लॉन पर कितने ही व्यक्ति बैठे थे। मरीजों के रिश्तेदार औरतें और मर्द, उनके साथ आए बच्चे और कुछ मरीज भी जो घूमने फिरने लायक थे और ताजी हवा खाने के लिए बाहर निकले थे। शाम होने को थी। लॉन का रंग ज्यादा गहरा हो गया था। लॉन के चारों ओर रंग बिरंगी फूल हल्की हल्की हवा पर हिल रहे थे। एल्यास फूलों और बच्चों को शून्य नजरों से देख रहा था। उसका ध्यान परवीन की ओर था जो जनरल वार्ड के एक बिस्तर पर मरणींग हालत में पड़ी थी। एल्यास को लगा कि वह धीरे धीरे तबाही की ओर बढ़ रहा था - या तबाही उसकी ओर बढ़ रही थी! अगर... अगर... अचानक एक बच्चा दौड़ते-दौड़ते मुंह के बल जा गिरा। एल्यास हड़बड़ाकर उठ बैठा और बच्चे को उठाने के लिए बढ़ा, लेकिन तब तक बच्चे की माँ ने दौड़कर बच्चे को उठा लिया। एल्यास बैठ गया। ‘‘बच्चों को फूलों समान क्यों कहा जाता है?’’ उसने खुद से पूछा। शायद इसलिए कि फूल कुछ वक्त तक ताजे रहते हैं और जब बड़े होते हैं तो उनके अंदर न खुशी रहती है और न बेपरवाही। एल्यास को अपने बच्चे याद आए। उसे लगा कि उसके बच्चे वक्त से पहले बड़े हो गए थे। उनको हर बात पर डराया जा रहा था, हर चीज के लिए तरसाया जा रहा था...’’ और मैं तो कभी बच्चा ही नहीं था। मुझे याद नहीं आता कि मैंने कभी बचपन में कोई मांग की हो!’’

उसने खुद भी तो पूरी जिंदगी तरसकर गुजारी थी, लेकिन उसने चाहा था कि उसके बच्चे बच्चे ही रहें और उनकी जरूरतें अपूर्ण नहीं रहें।

‘‘हो सकता है पिताजी ने भी मेरे लिए ऐसा ही चाहा हो! हर रिश्तेदार ऐसा ही चाहता है और अपनी पूरी जिंदगी, अपनी सभी खुशियां संतान को देना चाहता है, लेकिन होता क्या है? उसकी जिंदगी पिसती जाती है और खुशियां उसके पास ही नहीं तो संतान को क्या देगा? यह सब ठगी है। वह जानता है कि उसके पास अपनी संतान को देने के लिए न खुशी है और न ही सुख है। हकीकत में उसके पास जो दुख और तकलीफें हैं उसमें अपनी संतान को हिस्सेदार बनाना चाहता है ‘‘और हम जैसे व्यक्तियों को संतान चाहिए ही इसलिए...’’

उसने लॉन पर दौड़ते खेलते बच्चों की ओर देखा। ‘‘अगर कोई रिश्तेदार अपनी संतान को खुशियां और सुख नहीं दे सकता है तो उसे संतान पैदा करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। यह जुल्म है, इसे रोकना चाहिए।’’ उसे अहसास हुआ कि यह बात वह खुद को कह रहा था। ‘‘पहले तो मैंने अपने बच्चों पर जो जुल्म किया है, मुझे इसकी सजा मिलनी चाहिए, लेकिन मुझे तो पहले से ही इसकी सजा मिल रही है। अगर... परवीन नहीं बचती... ओह मेरे खुदा! फिर? छोटे बच्चों का क्या होगा? उन्हें कौन संभालेगा? नहीं नहीं, मैं उन्हें दुखों और तकलीफों में नहीं देख पाऊंगा।’’ उसे लगा कि वह तबाही के किनारे पर खड़ा था। वह घबराकर उठ बैठा और चलने लगा। उसका रुख जनरल वार्ड की ओर था। डॉक्टरों ने उसे बताया कि परवीन के बचने की संभावना कम है। एल्यास चलते चलते रुक गया। ‘‘लेकिन मैं जा क्यों रहा था? अभी अभी तो परवीन के यहां से होकर आया हूं, फिर एकदम... मैंने कुछ देर मरीजों के कराहने और दवाओं की बदबू से दूर रहकर, बाहर खुली हवा में सांस लेनी चाही और अब फिर से वापस लौट जाऊं वहां!’’ वह लॉन में आकर बैठ गया।

इतने दिनों तक वह अस्पताल में रहकर खुद को मरीज महसूस करने लगा था। उसे याद आया कि कल उसे दवाओं के लिए पैसे लगेंगे। उसके पास इतने पैसे नहीं थे और ऐसा कोई व्यक्ति भी नहीं सूझ रहा था जिससे कर्ज ले। उसने जो कर्ज लिया था अभी तक वह भी वापस नहीं कर पाया था। ऐसा कौन था जो कर्ज के ऊपर कर्ज देता रहे। जिन मित्रों को डर था कि एल्यास उनसे कर्ज लेगा उन्होंने उससे मिलना छोड़ दिया था और जिनसे उसने कर्ज लिया था, वे भी उससे इसलिए मिलने से कतरा रहे थे कि कहीं वह और ज्यादा कर्ज न ले ले।

‘‘परवीन की बीमारी कितनी लंबी खिंच गई है! उसकी बीमारी के पीछे सब कुछ खत्म हो गया। गुजर बसर कैसे होगा...परवीन को मरना ही है तो फिर यह देरी...’’ उसने एकदम से खुद को रोक लिया। ‘‘पता नहीं मैं क्या क्या सोच रहा हूं। परवीन के बिना मेरा घर बिखर जाएगा। आखिर कहां पहुंचेंगे? अंत कहां पर है, या खुदा! अंत किधर है?’’ उसके दिल में आया कि हाथों से मुंह छिपाकर सिसककर रोए। उसने अपने हाथों को देखा। सूखे हाथ और हड्डी समान उंगलियां, जैसे किसी मुर्दे के हाथ थे। हाथ के तल लकड़े की तरह सख्त थे, मांस तो था ही नहीं। हाथों के पीछे बड़ी नीली नसें उभरी हुई थीं।

‘‘ये मेरे हाथ हैं?’’ उसे इस बात का अहसास पहली बार हुआ। ‘‘मेरे हाथ ऐसे तो नहीं थे...’’ उसे विश्वास नहीं हो रहा था। ‘‘मेरे साथ ये सब क्यों हुआ? कुछ और नहीं हो सकता था? अगर ऐसा न होता तो दुनिया को क्या नुकसान पहुंचता। लेकिन अगर मुझे ही दुख और तकलीफें सहन करनी थीं तो मेरे बच्चों का क्या दोष है। मुझे मिली सजा ये मेरे साथ क्यों भोगें? हां, उन्हें भी मेरे साथ ये दुख और तकलीफें सहन करनी हैं, जब तक वे इस लायक हों कि अपने भाग्य को मेरे भाग्य से तोड़कर अलग कर दें। लेकिन अगर मेरे बच्चों को मेरे दुख और तकलीफें वर्से में मिले तो...’’ वह डर गया।

परवीन ने उसे कहा था, ‘‘हम कैसे बदनसीब रिश्तेदार हैं जो अपनी संतान की मामूली मांग भी पूरी नहीं कर सकते।’’ तब उसने उसे उत्तर दिया था, ‘‘केवल हम ही नहीं हैं, हमारे जैसे और भी कई हैं। कई हैं ही हमारे जैसे। ऐसे व्यक्ति तो थोड़े हैं जिनके बच्चे कभी किसी चीज के लिए नहीं तरसते हों।’’ परवीन ने उसकी ओर आश्चर्य से देखा था। उसे एल्यास की बात समझ में नहीं आई थी, या उसके गुस्सा आया था कि एल्यास उसकी बात को कोई महत्व ही नहीं देगा। एल्यास ने सोचा था कि अब वह यही समझेगी कि उसे अपने बच्चों का कोई ख्याल नहीं। ‘‘हर माँ ऐसा ही समझती है। मेरी माँ भी पिताजी को हमेशा ऐसा ही कहती थी कि तुझे अपने बच्चों की कोई चिंता नहीं, कोई फिक्र नहीं-जैसे कि अब पिताजी चाहता तो सब मुसीबतें खत्म हो जातीं और हम सुखी हो जाते? एल्यास को आश्चर्य हुआ कि जब वह बच्चा था, तब वह खुद भी अपने पिता के लिए ऐसा ही सोचता था। स्कूल में पुस्तक या कॉपी न होने पर, फीस नहीं दे पाने के कारण मास्टर मारता था, या वह कोई चीज लेना चाहता था तो ले न पाता था तब अपने पिता को दोषी समझता था।

अचानक उसे विचार आया कि कहीं उसके बच्चे भी तो यही नहीं समझते होंगे? उसे याद आया कि जब भी वह बच्चों की कोई मांग पूरी नहीं कर पता था तो बच्चे उसे ऐसे देखते थे जैसे वह जानबूझकर वह चीज नहीं लेकर दे रहा हो। अगर चाहे तो ले सकता है। वह बच्चों को कितना भी बताता कि भाई हम गरीब हैं, हम में वह चीज ले पाने की ताकत नहीं है, लेकिन बच्चों को विश्वास नहीं होता था।

‘‘अपने बच्चों की नजरों में मैं झूठा और कंजूस हूं... परवीन समझती है कि मुझे बच्चों का ख्याल नहीं, मैं उनके लिए कुछ नहीं करता, बच्चे समझते हैं कि मैं कंजूसी कर रहा हूं...’’ उसका दिल डूबने लगा। दिल में आया कि लॉन पर लेट जाए, लेकिन वह बैठा रहा जैसे कि उसमें चलने फिरने की ताकत ही न बची हो। वह बाहर से जितना चुप और पत्थर बना खड़ा था अंदर से उतना ही गल टूट रहा था। उसके अंदर उठने वाली सोच की लहरें एक जगह ठहकर जम गईं। उसे महसूस हुआ कि उसके सर की नसें दर्द की वजह से खिंचकर फट रही थीं। उसे वहां बैठे काफी देर हो चुकी थी। ‘‘इतनी देर तक परवीन को अकेला छोड़ना ठीक नहीं है। अब परवीन की ओर से होकर घर जाऊंगा और परवीन की माँ को अस्पताल भेजूंगा। बच्चों के पास भी जाकर कोई आश्वासन दूं।’’ वह हथेली के जोर पर उठ खड़ा हुआ और धीरे धीरे चलने लगा।

जनरल वार्ड के बड़े चौड़े हॉल में बल्ब जल चुके थे। हल्की रोशनी में परवीन के मुंह का पीलापन बढ़ गया था। उसकी आंखें बंद थीं। एल्यास पलंग के बाजू खड़ा होकर उसे कुछ देर तक देखता रहा। वह हड्डियों का पिंजरा बनकर रह गई थी। मांस जैसी कोई चीज उसके शरीर पर थी ही नहीं।

परवीन ने आंखें खोलकर उसकी ओर देखा। शायद उसने अपने बाजू में एल्यास के आकर खड़े होने को महसूस कर लिया था।

‘‘तुम कहां चले गए थे?’’ परवीन ने शिकायती अंदाज में उससे पूछा।

‘‘क्यों मैं तो यहीं था,’’ एल्यास को उसका प्रश्न अजीब लगा।

‘‘नर्स भी पता नहीं कहां गई है, प्यास से मर रही हूं।’’

एल्यास पानी का ग्लास भरकर लाया और परवीन को कंधे के पीछे बांह का सहारा दे उठाया। परवीन ने पानी के दो तीन घूंट भरे और ग्लास लौटा दिया।

‘‘बस, प्यास भी इतनी। उसकी मर्जी ये है कि मैं पूरा दिन उसके पास बैठा रहूं...’’ उसने चिढ़कर सोचा।

‘‘आज शाम को बच्चे भी नहीं आए। जब तक जिंदा हूं तब तक तो उनको देखकर आंखें ठंडी करूं ।’’ परवीन खुद से बातें करती चुप हो गई। एल्यास समझ गया कि उसने यह बात उसे बताने के लिए की थी।

‘‘मैं अकेला आदमी क्या क्या करूं ! ऑफिस जाऊं, अस्पताल जाऊं और रोज रोज बच्चों को भी लेकर आऊं... आखिर कहां कहां पहुंचूं!’’ उसे महसूस हुआ कि उसकी आवाज में परेशानी और चिढ़ थी।

‘‘अब तो भगवान अपने पास बुला ले। इस हाल में तो हर कोई परेशान हो जाए...’’ परवीन ने और भी कुछ कहना चाहा, लेकिन उसकी आवाज घुटकर रह गई।

‘‘तुम बेकार में ऐसी बातें क्यों सोचती हो? परेशान कौन हुआ है!’’ उसने परवीन को आश्वासन दिया, लेकिन उसे यह सब बेकार लगा। और उसकी आवाज में भी आश्वासन वाली कोई बात नहीं थी। उसे आश्चर्य हुआ कि उसे अचानक यह क्या हो गया था!

‘‘बदनसीब औरत! मैंने उसे कभी प्यार नहीं दिया। मैंने उसे हमेशा अपने गले का पत्थर समझा। अपनी सभी मुसीबतों का कारण समझा। मैं यही समझता रहा कि वह मेरे गले में न पड़ती तो जान छूट जाती।’’

एल्यास के मन में परवीन के लिए हमदर्दी की लहर उठी। उसने चाहा कि परवीन को आश्वासन दे।

‘‘तुम कोई चिंता मत कर परवीन, सब ठीक हो जाएगा। डॉक्टर कह रहा था कि अब थोड़े ही दिनों में तुम्हें घर जाने की छुट्टी दे देगा।’’

परवीन ने उसकी ओर देखा। उसके मुंह पर दुख और लाचारी के छाये बादल कुछ ज्यादा ही गहरा हो गया और उसकी नजरों में विश्वास मृत था। एल्यास को अपने शब्द खोखले लगे, जिनका कोई अर्थ नहीं था, कोई महत्व नहीं था।

‘‘मैं आता हूं,’’ वह जल्दी बाहर निकल गया।

अस्पताल का लंबा कॉरीडोर वीरान था। कॉरीडोर में हल्के बल्ब जल रहे थे, जिनकी हल्की रोशनी ने वीरान माहौल में ज्यादा उदासी भर दी थी। एल्यास एक खिड़की के आगे खड़ा हो गया। बाहर अनगिनत बल्ब जल रहे थे। अचानक उसकी सिसकी निकल गई और वह धीरे धीरे रोने लगा। लेकिन उसे यह पता नहीं था कि वह क्यों रो रहा था - परवीन के लिए, बच्चों के लिए या खुद अपने लिए?

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